पुस्तक : साहित्य की गुमटी
लेखक : धर्मपाल महेंद्र जैन
प्रकाशक : शिवना, एम पी
समय : 2025
मूल्य : 275/रु॰
डॉ. मधु संधु
पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष
हिन्दी विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, पंजाब
व्यंग्य से मेरा परिचय किशोरावस्था में जालंधर, पंजाब से निकलने वाले समाचार पत्र पंजाब केसरी में प्रकाशित होने वाले ‘फिक्र तौंसवी’ के चुलबुले व्यंग्यों से हुआ था। जो सोचने पर भी बाध्य करते थे और मुस्कुराने पर भी। विशेष बात यह है कि तब न साहित्य की जानकारी थी और न व्यंग्य विधा की। कालांतर में जब अध्ययन अध्यापन से जुड़ी तो 1980 के आसपास एक व्यंग्यकार पर शोध अणुबन्ध करवाने और इस विधा को गहराई से समझने का मौका मिला था।
‘साहित्य की गुमटी’ महेंद्र धर्मपाल जैन का यह आठवाँ व्यंग्य संकलन है। (गुमटी- यानी छोटा, गोलाकार, गुंबदनुमा कमरा) इसमें उनके 2023- 24 के कालखंड में लिखित 48 व्यंग्य संकलित हैं। इससे पहले उनके डॉलर के नोट’, ‘भीड़ और भेड़िये’ ‘इमोजी की मोज में’, ‘दिमाग वालो सावधान’, ‘सर क्यों दाँत फाड़ रहा है’, ‘चयनित व्यंग्य रचनाएँ’, ‘गणतंत्र के तोते’ व्यंग्य संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। उनके कविता संकलन- ‘अधलिखे पन्ने’, ‘कुछ सम कुछ विषम’ तथा ‘इस समय तक’ भी आ चुके हैं। सम्पादन और स्तम्भ लेखक के रूप में भी धर्मपाल महेंद्र जैन का हिन्दी साहित्य को योगदान रहा है। उनकी अनेक रचनाएँ पच्चीस से अधिक सांझा संकलनों में भी संकलित हैं।
व्यंग्य का सीधा संबंध व्यंजना से है। किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थिति पर कटाक्ष, उपहास, मज़ाक, विनोद, आलोचना– सब इसमें समाये रहते हैं। व्यंग्य राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक विसंगतियों और विद्रूपताओं को उजागर करने का प्रभावी तरीका है। अङ्ग्रेज़ी में इसके लिए सेटायर, आयरनी, पैरोडी आदि शब्द प्रचलित हैं।
हिन्दी साहित्य के व्यंग्य संसार की बात करें तो संत कबीर को हिन्दी व्यंग्य का आदि प्रणेता कहा गया है। लेकिन मध्यकाल में व्यंग्य विधा के रूप में स्थापित नहीं हुआ था। आधुनिक काल में भारतेन्दु हरिश्चंद्र व्यंग्य के जनक माने जाते हैं। व्यंग्य की विधा रूप में स्थापना का श्रेय भारतेंदु हरिश्चंद्र को ही जाता है। उनकी ‘अंधेर नगरी’ और ‘ मुकरियाँ’ अङ्ग्रेज़ी साम्राज्यवाद को आड़े हाथों ले रही हैं । ‘ शिवशंभू का चिट्ठा’ बाल मुकुन्द गुप्त की उल्लेखनीय लेखमाला रही। स्वातंत्रोत्तर काल के प्रमुख व्यंग्यकारों में हरिशकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, शरद जोशी, रवीन्द्रनाथ त्यागी, नरेंद्र कोहली आते हैं। व्यंग्य का लक्ष्य कुरीतियों, विसंगतियों पर प्रहार करते हुये सकारात्मक बदलाव का प्रयास है।
नागरिक और राजनीतिक मानवाधिकारों की बात मनु, चाणक्य, शुक्राचार्य ने मुख्यत: की है। यहाँ त्रिविधा सिद्धि की बात की गई है- यानी – धर्म शास्त्र और अर्थ शास्त्र राजनीतिशास्त्र के प्रमुख अंग हैं। दार्शनिक, अर्थशास्त्री, शिक्षक, शाही सलाहकार चाणक्य ने राजनीति के सात सिद्धांतों, नेता के सात गुणों की बात की है- दूरदर्शिता, साहस, बुद्धिमत्ता, आत्मानुशासन, ईमानदारी, विनम्रता, सम्मान। आज स्थितियाँ एकदम विपरीत हैं-
“भारत राजनेता प्रधान देश है। ज़मीन उपजाऊ हो तो एक राजनेता बोने पर पूरा राजनीतिक दल उग आता है। ज़मीन बंजर हो तो एक राजनेता बोने पर सौ भैया टाइप नेता उग आते हैं। ज़मीन पथरीली हो तो—-पत्थरबाजी में निष्णात नेताओं की खदान बन जाती है।”
राजनेताओं के मुखोटे उतारते यह व्यंग्य रचनाए कहती हैं कि उनके पास हाथी की तरह दिखावे के बड़े- बड़े दाँत हैं। नेता लोग चुनाव के नाम पर नकद, उपहार और आश्वासन की, योजनाओं की, बम्पर घोषणाओं की रेवड़ियाँ बाँट- बाँट 1952 से आम आदमी को उल्लू बना रहे हैं, वोट खरीद रहे हैं। चुनाव के दिनों में काले धन के बादल बरसा जीत की बम्पर फसल समेटते हैं। विकसित देश के, अच्छे दिनों के सपने बेच करोड़ों के महल खड़े करते हैं। प्रजातंत्र की अंगूठी पहनते ही बुद्धू से बुद्धू भी राजनेता/ मंत्री बन जाते हैं। गठबंधन की आड़ में ठगबंधन होते हैं । यहाँ बौने राजनेता भी हैं, चुनावी बम्पर घोषणाएँ और आश्वासन भी, गठबंधन सरकारें भी और सपनों की खरीद– फरोख्त भी। कहते हैं-
सरकार तुम ट्रिलियम हम पाई
तुम अनाज भेजो हम खाई।
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तुम अनुदानी हम भिखमंगे
तुम मगरमच्छ हम कीट पतंगे।
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तुम अमृतचन्द्र हम चकोरे
सम्माननिधि प्यासे हम लिए कटोरे।
सब सत्ता के दास हैं। मीडिया सिर्फ नेताओं का प्रचार करता है और नेता सिर्फ अपने भविष्य की चिंता लिये है, पार्टी के भविषय की चिंता न उसका गंतव्य है, न मन्तव्य। ईडी है तो प्रजातन्त्र स्थिर है। आप टी वी और अखबारों में रोज़ नेताओं को देख सकते हैं, पर दफ़तर में नहीं।
इस प्रवासी साहित्यकार के व्यंग्य वैश्विक राजनीति के, ट्रंप- एलन मस्क के पर्दे भी उठा रहे हैं। इज़राइल ने स्वरक्षा अधिकार की घोषणा कर चालीस हज़ार लोग मार डाले। रूस की नो-नाटो घोषणा ने उक्रेन को खंडहर बना दिया। पश्चिम में घोषणाएँ बिलियन डालरों में होती हैं, तो भारत में लाखों करोड़ रुपये में।
सामाजिक, धार्मिक विसंगतियों, विडंबनाओं पर तीखा प्रहार भी यहाँ मिलता है। समृद्ध लोग प्रदूषण पचाने लायक कृत्रिम फेफड़े तलाश रहे हैं। आज वट वृक्ष का नहीं ताड़ के पेड़ का समय है- सुडौल, पुष्ट, लंबा तना, नुकीली पत्तियाँ- कोई प्यार से भी उन पत्तियों को सहलाये तो उसका खून निकाल ले। अंध विश्वास फैलाने वाले पाखंडी बाबाओं को भी व्यंग्यकार ने आड़े हाथों लिया है। वे डस्ट को गोल्ड बनाने, माथे पर हाथ रख कर कैंसर ठीक करने और पाँच सौ साल ज़िंदा रहने के वायवी दावे करके आम आदमी को पटाने में लगे हैं।
नेट, मोबाइल, कम्प्यूटर, मीडिया के कुप्रयोग, दुर्प्रयोग की चर्चा अनेक रचनाओं में है। मीडिया तो सत्ताओं द्वारा खरीद ही लिया जाता है और वाट्स ऐप में समाये भाटों के चक्रवाती तूफान ने इसे भाट्स ऐप बना दिया है। तू मेरे को लाइक कर, मैं तेरे को लाइक करता हूँ का भाईचारा सब ओर चल रहा है।
साहित्यकारों की मानसिकता पर कहते हैं कि हर लेखक पुरस्कार के पीछे भाग रहा है। संपादकों को साधे बिना कोई प्रतिष्ठित आलोचक नहीं बन सकता। हर लेखक पाठ्यक्रम में शामिल हो अमर हो जाना चाहता है। निंदक नियरे राखिए का मुहावरा मीडिया नियरे राखिए बन गया है। मील का पत्थर किलोमीटर का पत्थर बन गया है। कद ऊंचा करने के लिए सत्ता के सोल वाले जूते पहनने होते हैं । गठबंधन ठगबंधन हो गया है। व्यंग्यकार आदमी की आँखें खोल देता है। अपनी पैनी दृष्टि से वे अपने को सातवें आसमान पर समझने वालों को धूल चटा रहे हैं।
व्यंग्यकार नियरे राखिए आँगन कुटि बिठाय
बिन पानी साबुन बिना घमंड दिये उतराय।
सूत्र यहाँ हीरक चमक का काम कर रहे हैं-
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गरीबों के लिए घोषणाएँ होती है, पर बिचौलिये अमीर हो जाते हैं।
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घोषणाओं की प्रगति रिपोर्ट या तो बाबू बताते हैं या खार खाये पत्रकार।
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न्यायपालिका की रीढ़ पर बुलडोजर चलाने वाले नेता।
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सरकारी चादर उड़ने के लिए होती है और घर की चादर ओढ़ने के लिए।
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साहित्यकार कितना भी भड़का हुआ हो, कभी माइक और लाइक देने वाले का निरादर नहीं करता।
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लोग कमाते हैं, पर खर्च नहीं कर पाते तो करोड़पति बन जाते हैं। लिखते हैं, पर छप नहीं पाते तो आलोचक बन जाते हैं। जो गृहस्थ वासनायेँ दमित नहीं कर पाते वे संत बन जाते हैं।
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हरी घास न दिखे तो कोई गधा घास चरने नहीं आता।
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महेंद्र धर्मपाल जैन का नाम इक्कीसवीं शती के व्यंग्यकारों में आता है। उनके व्यंग्य विसंगतियों/ विडंबनाओं, असंतोष, विरोधाभासों से जन्म लेकर पैरोडी तक पहुंचते हैं। यह व्यंग्य अपने को सातवें आसमान पर समझने वालों को भी धूल चटा रहे हैं, खुरदरी ज़मीन पर ला बिठा रहे है। बड़े बड़ो की आंखे खोल रहे हैं। इन रचनाओं में रोचक कथात्मकता भी है और चिंतन भी, सरल पठनीयता भी और ज्ञानवर्द्धन भी। असीम सत्तासुख के पीछे भाग रहे नेता, बीस तरह के नोटिस पकड़ाने वाले डाकुओं जैसे अफसर, पाठ्यक्रम का हिस्सा बन अमर होने के लिए आकांक्षित लेखक, संपादकों को साधने वाले आलोचक, बंद दुकानों के पिछले दरवाजों से चोरबाज़ारी करने वाले पूंजीपति– सब यहाँ पालथी मारे बैठे हैं। महेंद्र धर्मपाल जैन की व्यंग्य रचनाओं की पैनी धार पाठक को बांध लेती है, आँखें खोल देती है।
