पुस्तक: पं. राधेश्याम कथावाचक- लोकचेतना के सर्जक
लेखक: हरिशंकर शर्मा
प्रकाशक: वेरा प्रकाशन, जयपुर
मूल्य: रु. 250/-
पृष्ठ: 184
लोकसाहित्य जनजीवन से सम्बद्ध साहित्य होता है। सामान्य जीवन की अनेक आकांक्षाएँ, मान्यताएँ और विचार होते हैं, जिन्हें लोकसाहित्य में सामान्य तौर पर प्रतिबिम्बित किया जाता है। सामान्यजन के सरल हृदय के सरल भावों को सरल रूप में लोकसाहित्य संचित करता है। सामान्य जनता के रीति-रिवाज़, रहन-सहन, धार्मिक-सामाजिक परम्पराएँ और मान्यताएँ– लोकसाहित्य के अंतर्गत आते हैं। भरतमुनि ने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में ‘लोकधर्मी नाट्यधर्मी धर्मा तु द्विविध: स्मृत:’ अर्थात् ‘लोकधर्मी’ और ‘नाट्यधर्मी’– दो प्रकार के अभिनय या नाटक होते हैं, जिन्हें स्मृत (याद किया जाता है) है’ कहकर ‘लोकधर्मी नाट्यधारा’ का भी वर्णन किया है।
सांस्कृतिक मूल्यों और विचारों की अंतर्धाराओं में लोकसाहित्य हलचल पैदा करता है। अपनी सीधी-सरल और सहज अभिव्यक्ति से लोकचेतना का सर्जक लोक में व्याप्त आचार-विचार, उत्सव-पर्व, गीत-संगीत आदि को लोकाचार और लोक व्यवहार के रूप में निरूपित करता है।
ऐसे अनेक रचनाकार हुए हैं जो साहित्य की लोकधर्मी विचारधारा से जुड़े रहे हैं और अपने साहित्य में लोकचेतना को सामने रखकर सर्जन करते रहे हैं। पंडित राधेश्याम कथावाचक भी ऐसे ही रचनाकारों में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। पंडित जी की ‘रामायण’ तो भारतवर्ष में धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व के दृष्टिकोण से पूज्य और पठनीय है ही, लोकसाहित्य की दृष्टि से भी एक महत्त्वपूर्ण सन्दर्भ ग्रन्थ है। लोकरंजन और लोकचेतना के अनेक ऐसे तत्त्व इसमें समाहित हैं कि राधेश्याम कथावाचक लोकजीवन से जुड़े रचनाकार के रूप में भी हमारे सामने आते हैं। वेरा प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित हरिशंकर शर्मा की पुस्तक ‘पंडित राधेश्याम कथावाचक: लोकचेतना के सर्जक’ राधेश्याम कथावाचक को उनकी लोक सर्जनात्मक साधना के आयामों से देखने-समझने का प्रयास है।
पंडित राधेश्याम विरचित ‘कृष्णायन’ (वर्ष 1930) भगवान श्रीकृष्ण के जीवन पर आधारित एक प्रसिद्ध ग्रन्थ है। ब्रज की पावन भूमि पर अवतरित भगवान श्रीकृष्ण का जीवन स्वयं में ही एक लोकगाथा है। भगवान श्रीकृष्ण लोकदेवता हैं और लोक के पावन कल्याण का सेतु भी। ब्रज के अनेक लोकगीतों, रस गीतों, रसिया, धमार, होली आदि में श्रीकृष्ण की मनभावन लीलाओं का वर्णन किया जाता है। राधेश्याम जी ने अपने ग्रन्थ ‘कृष्णायन’ में भी लोकसंस्कृति का यही काव्यात्मक स्वरूप प्रस्तुत किया है। हरिशंकर शर्मा कृष्ण को लोक और लोकजीवन की व्याख्या के रूप में देखते हैं। श्रीकृष्ण जन्म, नन्द द्वार पर बधाई, ब्रज की गलियों, ब्रज के त्योहारों आदि में ब्रज की संस्कृति नज़र आती है। यह संस्कृति अपनी मिट्टी से भी जुड़ी हुई होती है, तभी तो कृष्ण के शब्द हैं–
शिशुपन की आयु इसी माटी के हित तो मैंने काटी है
मैया यह ब्रज की माटी है यह जन्मभूमि की माटी है
ग्रामीण चेतना से परिपोषित परिधान, जगह-जगह पर होने वाले कुश्ती-दंगल, कृषि जीवन पर आधारित दिनचर्या, कृष्ण की मण्डली, मुरली, ब्रजमण्डल के संगठन की आवाज़ आपसी सौहार्द आदि पर हरिशंकर शर्मा ने विस्तारपूर्वक कलम चलाई है। बरसाने की होली का अपना विशिष्ट लोकरंग है और यह विशिष्ट प्रकार से खेली भी जाती है। आज जब वैज्ञानिक चेतना के दौड़-भाग भरे युग में मनुष्य अपनी जड़ों से कटता चला गया है, तो स्वाभाविक है कि वह अपने लोकजीवन और लोकचेतना के आनंद और आह्लाद को भी भुलाता चला गया है। आज तो लोकाचार और लोक व्यवहार को पुराने विचारों का कहकर हँसी उड़ाई जाती है। सत्य तो यह है कि ‘कृष्णायन’ ग्राम्यकथा का महाकाव्य है, जिसमें श्रीकृष्ण अपना मातृ ऋण और पितृ ऋण भी चुकाते हैं। लोक, लोकजीवन, लोकसंस्कृति और लोक व्यवहार मानो स्वयं श्रीकृष्ण के रूप में पूर्णतया साकार हो चुका है। ‘भारतीय संस्कृति का चितेरा’ आलेख भी भारतीय संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में लोकजीवन की झाँकी प्रस्तुत करता है। लोकजीवन में आज भी परिवार नामक इकाई का महत्त्व सर्वोपरि है। आमतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी संयुक्त परिवार मिलते हैं। ये संयुक्त और संगठित परिवार संगठित समाज और संगठित राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। ‘कृष्णायन’ में कथावाचक जी ने भी ब्रजमण्डल के ग्रामों में संयुक्त परिवार की प्रथा दर्शायी है। लेखक का आकलन सटीक है,“कथावाचक जी की भारतीय संस्कृति के संपूर्ण अंगों में प्रगाढ़ आस्था थी। परन्तु उसके पारिवारिक मूल्यों एवं मूल्यवान परंपराओं को दृढ़ता से ग्रहण करने पर भी वे आधुनिकता से अप्रभावित नहीं थे। उन्हें युगधर्म की पहचान थी। ऐसी दृष्टि रखने वाला व्यक्ति ही जीवन संस्कृति को परिभाषित कर सकता है। ‘कृष्णायन’ इसका प्रमाण है। कथावाचक ने भारतीय संस्कृति के जो चित्र उकेरे हैं, उसके चित्रण में वे सिद्धहस्त हैं। उन्हें भारतीय संस्कृति का चितेरा कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है।”
लोकजीवन जीवन मूल्यों को समय के सतत् प्रवाह के साथ समाज में सुरक्षित रखता है। लोक की आस्था पुरातन जीवन मूल्यों में ही सांस लेती है। यह वह आस्था है जो जीवन मूल्यों पर आधारित होती है, जीवन मूल्यों को लेकर चलती है और जीवन मूल्यों का ही सर्वत्र प्रचार-प्रसार भी करती है। ‘राधेश्याम रामायण में जीवन मूल्य’ आलेख में हरिशंकर शर्मा ने इन्हीं जीवन मूल्यों को पंडित राधेश्याम जी के सन्दर्भों में रेखांकित करने का प्रयास किया है। राधेश्याम रामायण में राम अलौकिक पुरुष न होकर एक लौकिक पुरुष के रूप में हमारे समक्ष आते हैं। राम का सहज रूप समाज को प्रभावित करता है। शास्त्रों की कसौटी पर तो राम का चरित्र महिमान्वित है ही, साथ ही लोकजीवन की चेतना को भी राम जीवन दान देते हैं। मानव मूल्यों की रक्षा ही मानो उनका परम धर्म है। राधेश्याम कथावाचक ने भी राम के जीवन का व्यावहारिक पक्ष अपनी रामायण के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया है। नैतिकता, सदाचार, अनुशासन जैसे गुण राम को लोक जीवन में प्रसिद्धि प्रदान करते हैं। राम की इसी कथा का लोकभाषा में अर्थात् खड़ी बोली में पंडित राधेश्याम कथावाचक ने अनेक स्थानों पर गायन किया। उनकी गायन शैली में रासलीला, आल्हा, स्वांग, नौटंकी जैसी लोक शैलियाँ भी सम्मिलित रहीं। इसीलिए आज उनकी रामायण घर-घर में प्रसिद्ध है। राम के समक्ष लोक मूल्य ही जीवन मूल्य है। इसीलिए राम नरश्रेष्ठ हैं और मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। राम का जीवन जीवन मूल्यों को पूर्णतया समर्पित है। इसीलिए कथावाचक जी राम के समान ही जीवन में चारों पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का सामंजस्य लाने की बात करते हैं–
तुम सच्चे बनो कर्मयोगी निष्काम करो कर्त्तव्य सदा
निज ज्ञानानल में भस्म करो होतव्य और भवितव्य सदा
इसी क्रम में कथावाचक जी ने अपनी राधेश्याम ‘रामायण’ में रामकथा के माध्यम से कर्मण्यता, राष्ट्रप्रेम, सद्चरित्र, नैतिकता, सदाचार जैसे मूल्यों को अपनाने की शिक्षा दी है। ध्यानपूर्वक देखा जाए तो ये नैतिक मूल्य ही लोकजीवन के मूल्य भी हैं। हरिशंकर शर्मा का निष्कर्ष उचित ही है,“मर्यादा पुरुषोत्तम का चरित्र हमारे लिए आदर्श है क्योंकि वे भारतीय लोक मर्यादा, भारतीय संस्कृति के मानव रत्न हैं। हमारी संस्कृति की जड़ें राधेश्याम रामायण जैसे महाकाव्य में सुरक्षित हैं। भारतीय नवजागरण के काल में यह महाकाव्य समस्त भारतीयों का पथ प्रदर्शक बना और आज भी है।” राधेश्याम कथावाचक लोक कलाकार थे। अपने हारमोनियम और संगतकारों के साथ अनेक-अनेक स्थानों पर उन्होंने रामकथा का गायन किया और लोकचेतना की मंदाकिनी का अजस्र प्रवाह किया। रामायण आध्यात्मिक कथा तो है ही, परन्तु इसके बीज लोकसाहित्य में भी मिलते हैं। इसकी पूर्ण काव्य-संरचना लोकशैली में भी निबद्ध है। सरसता, सरलता, सहजता जैसे गुण लोकजीवन से जुड़कर किसी काव्य को अमर कर देते हैं। रामायण की कथा काव्यरूप में राधेश्याम कथावाचक की लेखनी से लोकभाषा (खड़ी बोली) में प्रसूत हुई। रामायण का गायन उन्होंने लोकशैली में ही किया। साथ ही कथावाचक जी ने रामायण की धार्मिक कथा को सरस रागात्मकता और गीतात्मक माधुर्य भी प्रदान की। उन्होंने रामकथा और कृष्णकथा को युगीन वाणी का चोला पहनाया। इसीलिए उनकी रामायण का और अन्य सर्जन का मुख्य गुण है ‘स्वाभाविकता’ और ’सहजता’। पंडित राधेश्याम कथावाचक समय-समय पर अपनी डायरी भी लिखते रहे थे। वर्ष 1960 की उनकी डायरी तत्कालीन कालखण्ड का एक विस्तृत दर्पण कही जा सकती है। समय का बदलाव, जीवन मूल्यों का तिरोहित होते जाना, धर्म की अपेक्षा धन में अधिक मन लगना, मान्यताओं का बदलते जाना, मानवीय मूल्यों का तिरोहण, प्रभुता का मद आदि कुछ ऐसे तत्त्व हैं जो तत्कालीन डायरी में महसूस किए जा सकते हैं। कथावाचक जी युगधर्म को महत्त्व देते रहे। धर्मयुक्त जीवन लोकजीवन में जीवन जीने की शैली है जो आदर्श का अनुपालन करते हुए संस्कारयुक्त जीवन जीने के लिए अनुप्रेरित करती है। लोक जीवन में प्रकाश और अंधेरा, सत्य और असत्य– सभी का स्थान होता है। शायद यही कारण है कि रामराज्य पर अपनी लेखनी चलाने वाले कथावाचक जी ने ‘रावणराज्य’ जैसा विषय भी सृजन के लिए अपने सामने रखा था। यहाँ हम देखते हैं कि कथावाचक जी की जीवनदृष्टि लोकचेतना के साथ-साथ विश्वचेतना पर भी केन्द्रित है। विश्व राजनीति और भारत पर पड़ने वाले उसके प्रभावों की वे अपनी डायरी में गहराई से समीक्षा करते हैं। यह बात सत्य है कि लोकचेतना से सम्पन्न विचारक विश्वचेतना को भी अपनी सोच और संधान का विषय बनाता है। हरिशंकर शर्मा का निष्कर्ष स्पष्ट करता है,“अपनी डायरी में तत्कालीन राजनीति, प्रशासनिक, सामाजिक और धार्मिक प्रतिरोध को कथावाचक जी ने अभिव्यंजना प्रदान की है। पुनर्जागरण की सुधारवादी प्रवृत्ति आपकी डायरी में शुरू से अंत तक मिलती है। समय और समाज को आईना दिखाती कथावाचक की डायरियाँ लोकजीवन, आक्रोश, आक्रमण, आतंक, अस्वीकार से जूझ रहे समाज के पथ प्रदर्शक की भूमिका में हैं। सुधारवादी जनआंदोलन की पृष्ठभूमि से अलग करके उनकी डायरियों को नहीं पढ़ा जा सकता। डायरियों में निहित बोधगम्यता की आवश्यकता केवल मनुष्य को ही नहीं, सम्पूर्ण राष्ट्र और समाज को है। कथावाचक जी रामायण और नाटकों तक ही प्रासंगिक नहीं थे। वे अपनी डायरियों में भी प्रासंगिक हैं और रहेंगे।”
राधेश्याम जी ने अनेक ग़ज़लों का सृजन भी किया है। उनकी ग़ज़लों में लोकजीवन के अनेक रंग प्राप्त होते हैं। कई बार यह भी हुआ है कि उनके अनेक गीतों को भी ग़ज़लों का नाम दे दिया गया है। समाज में जो कुछ घटित हो रहा है, उसे पंडित राधेश्याम की ग़ज़लें बेबाकी से बयां करती हैं। उस दौर में भक्तिपरक ग़ज़लों का लेखन कुछ ही लोगों ने किया, जिनमें से एक राधेश्याम कथावाचक भी रहे। परन्तु कथावाचक जी की ग़ज़लों का उचित मूल्यांकन आज तक नहीं हो पाया है। पंडित राधेश्याम कथावाचक ‘रामायण’ और ‘कृष्णायन’ के साथ ही अनेक नाटकों के रचयिता भी थे। उनके अनेक नाटक पारसी रंगमंच के संसार में अत्यधिक प्रसिद्ध रहे हैं। श्रवण कुमार, उषा-अनिरुद्ध जैसे पौराणिक नाटक उस समय के उनके प्रसिद्ध आध्यात्मिक नाटक थे। नाटक आज भले ही पढ़ा जाए और रंगमंच का हिस्सा हो, एक समय भारतवर्ष में लोकनाट्य मण्डलियाँ स्थापित थीं जो जगह-जगह पर अपने स्वांग, लघु नाटिकाएँ, नाटक, नुक्कड़ नाटक आदि प्रदर्शित किया करते थे। जनता इनसे सीधे जुड़ी होती थी। ये नाटक धार्मिक और सामाजिक चेतना भी जगाते थे। पंडित राधेश्याम कथावाचक के नाटकों में ‘लोकभाषा- नीति,धर्म, समय और समाज’ एक लंबा आलेख है जिसमें लेखक ने राधेश्याम जी के महत्त्वपूर्ण नाटकों को लोकसाहित्य और लोकभाषा की दृष्टि से अवलोकित किया गया है। राधेश्याम जी ने उस समय प्रचलित उर्दू भाषा में भी नाटक लिखे और उर्दू भाषा की शब्दावली का प्रयोग अपने अन्य नाटकों में भी पूरी शिद्दत के साथ किया। कथावाचक जी का ‘परिवर्तन’ नाटक सामाजिक नाटक है जिसमें लोकजीवन की अनेक समस्याओं को भी उठाया गया है। इसी प्रकार रोहिलखण्ड की लोक संस्कृति को अपने ‘मशरिक़ी हूर’ नाटक में उन्होंने अलग ही रंग दिया है। लोकसाहित्य से सम्बंधित अनेक मुहावरे, कहावतें, लोक में प्रचलित शब्द आदि उनके नाटकों के भाव सौन्दर्य को बढ़ाते हैं। इसी क्रम में राधेश्याम जी ने अपने समय में फिल्मी पटकथाएँ भी लिखी थीं। धन्ना भगत, उद्धार, आज़ादी, श्रीसत्यनारायण फिल्मों की पाण्डुलिपियों से यह बात देखी जा सकती है। परन्तु फिल्मों के सम्बंध में कथावाचक जी के विचार सकारात्मक नहीं थे। वे फिल्मों को भारतीय संस्कृति को पाताल की ओर ले जाने का रास्ता मानते थे। एक लोकधर्मी रचनाकार यह चिन्ता जायज ही थी कि नकली दृश्यों और संस्कारविहीन कहानियों के दुष्प्रभावों से हमारा समाज अपनी जड़ों से कटता चला जा रहा है।
राधेश्याम कथावाचक की लोकचेतना को गहराई से जानने-समझने के लिए पुस्तक उपयोगी है। आध्यात्मिकता और धार्मिकता के साथ ही किसी रचनाकार के सामाजिक संदेश और लोकतत्त्व की सार्थकता को यहाँ महसूस किया जा सकता है।
डॉ. नितिन सेठी
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