पुस्तक: इक्कीसवीं शती की साहित्यिक एम. आर. आई. ( समीक्षात्मक विश्लेषण)
लेखक : डॉ. मधु संधु
प्रथम संस्करण: 2025
मूल्य : 380 रुपये
प्रकाशक : अयन प्रकाशन, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059
डॉ.राकेश प्रेम
पूर्व प्राचार्य, हिन्दू कालेज, अमृतसर, पंजाब.
कथाकार, कोशकार- समीक्षक डॉ. मधु संधु गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर से प्रोफेसर-अध्यक्ष के अपने दायित्व से वर्षों पूर्व निवृत्त हो गई थी, किन्तु रचनात्मक और समीक्षात्मक विवेक की अन्तर्ध्वनि उन्हें निरन्तर सृजनशीलता से जोड़े हुए है जिसकी अभिव्यक्ति ‘ इक्कीसवीं शती की साहित्यिक एम.आर .आई‘ के रूप में हुई है जोकि एक आलोचनात्मक कृति है और अपने कलेवर में बीस साहित्यिक पुस्तकों; पांच उपन्यास, सात कहानी- संग्रह, एक लघुकथा संकलन, चार काव्य संकलन, एक व्यंग्य, एक संस्मरण और एक आलोचना पुस्तक को समेटे हुए है। इसी क्रम में, इससे पूर्व 2014 में ‘साहित्य और संवाद‘ तथा 2024 में ‘साहित्य एवं समीक्षा‘ आलोचनात्मक पुस्तकें सामने आई हैं। यह भी सुखद है कि इसी समय अर्थात् 2025 में डॉ. मधु संधु के मौलिक सृजन पर केन्द्रित एक पुस्तक ‘अंतर्जाल की दुनिया में डॉ. मधु संधु‘ जोकि उनकी शिष्या डॉ. दीप्ति के द्वारा संपादित है, प्रकाशित हुई है। दोनों पुस्तकें अयन प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुई हैं। 2024 में ही डॉ. दीप्ति के द्वारा संपादित तथा शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘सर्जक आलोचक और कोशकार डॉ. मधु संधु‘ भी सामने आई थी। अर्थात् डॉ. मधु संधु लेखक और समीक्षक, दोनों भूमिकाओं में अपने सृजनात्मक कौशल का बखूबी परिचय दे रही हैं। उनका संवेदनशील मन न केवल सृजनात्मक लेखन, बल्कि आलोचनात्मक दायित्व के समय भी सक्रिय बना रहता है जिसे कि ‘ इक्कीसवीं शती की साहित्यिक एम.आर .आई‘ का अवलोकन करते हुए महसूस किया जा सकता है।
एम. आर. आई का उपयोग गहन रोगों की सजग चिकित्सा के क्षेत्र में एक सटीक उपकरण के रूप में किया जाता है जिससे कि सम्बंधित व्यक्ति के संभावित रोग और निरोगी काया की दिशा में विवेक सम्मत दृष्टि से उचित निर्णय लिया जा सके। साहित्यिक रचनाशीलता की जांच- पड़ताल में संवेदनशीलतापूर्ण विवेक किसी कृति की अंतरंगता से हमें जोड़ता हुआ, न केवल कृति की विषय- वस्तु बल्कि रचनाकार की मानसिक पृष्ठभूमि, विचार और चिन्तन, सृजन से जुड़ी हुई दशा और दिशा अर्थात् लेखक के अंतरंग और बहिरंग, भाव और विचार, जीवन- संघर्ष और उससे विकसित भाव- बोध आदि का परिचय देता है। जिससे कि हम न केवल उस रचना से स्वयं जुड़ पाते हैं, बल्कि उसके विवेचन- विश्लेषण से दूसरों को जोड़ पाने में सक्षम हो पाते हैं। इस दृष्टि से डॉ.मधु संधु की विवेचित आलोचनात्मक कृति एक स्वागत योग्य पुस्तक है।
मधु संधु स्वयं एक संवेदनशील कथाकार और सहृदय कवयित्री हैं जिसकी झलक उनके समीक्षात्मक लेखन में प्रतिबिंबित होती है। पुस्तक में समीक्षित उपन्यासों में उषा प्रियंवदा का ‘अल्पविराम‘ 2019, ‘अर्कदीप्त‘ 2023, अमरीक सिंह का ‘तीर्थाटन के बाद‘ 2019, इला प्रसाद का ‘वह दिन आयेगा ज़रूर‘ 2024 तथा पारुल सिंह का ‘ ऐ वहशते दिल क्या करूँ‘ 2024, सम्मिलित हैं।
‘अल्पविराम‘ ‘सार्थक जीवन की खोज‘ से जुड़ी हुई औपन्यासिक कृति है। नायक शीर्षेन्दु कैंसर से जूझ रहा है। वह जानता है कि वह नायिका शिंजिनी के जीवन में अल्पविराम की तरह है क्योंकि शिंजिनी का जीवन उसके बाद भी प्रवाहित होता रहेगा। उपन्यास अतीत और वर्तमान, दिल्ली, बौस्टन और न्यूयॉर्क के बीच में दिवास्वप्न- सा घटित होता हुआ प्रतीत होता है। ‘अर्कदीप्त‘ की कथावस्तु चाहने और न हो पाने की त्रासदी से जुडी़ है। नायक अर्कदीप्त इसी मानसिकता से जुडा़ है जिसे समीक्षक ने ‘अपनत्व और अस्मिता की खोज‘ कहा है। अर्कदीप्त अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए सौदामिनी और रूपसी रोली के मध्य झूलता रहता है। कथा- विस्तार भारत से जर्मनी, ब्रिटेन और अमेरिका तक हुआ है। ‘तीर्थाटन के बाद‘ उपन्यास स्त्री-जीवन, अस्तित्व और महत्वाकांक्षाओं की खिड़कियों को खोलने वाला उपन्यास है। सुदेश, अपने पति पुरुषोत्तमलाल की मृत्यु के बाद श्रीधर के संपर्क में आती है और अपने सपने फिर से जीना चाहती है जबकि उसके बेटों के पुरुष अहं के लिए यह असह्य है। उपन्यास स्त्री की जीवनाकांक्षा से जुडा़ है। ‘वह दिन आयेगा ज़रूर‘ प्रवासी भारतीयों के जीवन-संघर्ष की गाथा है। तनुजा, पति अर्पित के साथ भारत से अमेरिका पहुँचती है। जहाँकि स्थायित्व के लिए दोनों को लम्बा संघर्ष करना पड़ता है। उनका जीवट काम आता है। उपन्यास में वहाँ के शिक्षा-जगत् की विसंगतियों का लेखा-जोखा है। ‘ऐ वहशते दिल क्या करूँ‘ उपन्यास ‘ओपेन हार्ट सर्जरी‘ से जुडा़ एक संस्मरणात्मक उपन्यास है जिसमें रोगी की मन:स्थिति, डॉक्टर और स्टाफ की भूमिका तथा कामकाजी स्त्रियों से जुड़े हुए प्रश्नों के साथ लेखिका के जीवट की अभिव्यक्ति है। सभी विवेचित उपन्यास स्त्री- जीवन की समस्याओं को परंपरा और आधुनिकता के सन्दर्भ में विश्लेषित करते हुए; नारी के जीवट, स्वतंत्र अस्तित्व, देश- विदेश में उसके जीवन-संघर्ष की गाथा कहते हैं।
समीक्षित कहानी- संग्रहों में सुधा ओम ढींगरा का, ‘चलो फिर से शुरू करें‘ 2024, पंकज सुबीर के ‘जोया देसाई काटेज‘ 2024 तथा ‘खै़बर दर्रा‘ 2025, हंसा दीप का ‘टूटी पेंसिल‘ 2024, दीपक शर्मा का ‘नीली गिटार‘ 2022, अमरीक सिंह दीप का ‘अनारकली के अश्क’ 2024 तथा डॉ.शमीर सिंह का ‘ पूर्णिमा‘ 2025, कहानी- संग्रह सम्मिलित हैं।
‘चलो फिर से शुरू करें‘ में संकलित 10 कहानियाँ अतीत का लेखा-जोखा हैं। पुरुष-उत्पीड़न, नारी- शोषण, सामाजिक समस्याओं और मनोविश्लेषण से जुड़ी कहानियाँ ‘पूर्व दीप्ति और चेतन प्रवाह शिल्प‘ से जुड़ी सक्षम कहानियाँ हैं । ‘जोया देसाई काटेज‘ में 11 लम्बी कहानियाँ संकलित हैं । कोरोना- काल की अमानवीयता, पुरुष अहं, देहराग, दलित विमर्श, यान्त्रिकी आदि विषय- वस्तु से जुड़ी कहानियाँ हमें संवेदनशीलता और संवेदनहीनता से जोड़ती हैं। ‘खैबर दर्रा‘ में ‘अद्भुत किस्सागोई और चिन्तन सूत्र‘ हैं। संकलित 9 कहानियाँ इसकी गवाही देती हैं। यहाँ राजनीति की तिकड़़म, किशोर वय का राग- बोध, सांप्रदायिक दंगे, प्रकृति के विनाश और किन्नर जीवन की व्यथा जैसे विषय हैं जोकि पाठक को बांधने में सक्षम हैं। ‘टूटी पेंसिल‘ प्रौढ़ पात्रों के समस्याग्रस्त जीवन का चित्रण है। संकलन में संकलित 18 कहानियों में से अधिकांश इसी विषय- वस्तु से जुड़ी हुई हैं। मधु संधु के शब्दों में, “ढलती उम्र के वरिष्ठ नागरिकों की चिंताएं- उपलब्धियां, दशा- दुर्दशा, मस्ती- उमंग, ठनक- ठसक अनेक कहानियों में आई हैं।” ‘नीली गिटार‘ में संकलित 29 कहानियाँ पुरुष के आदर्श नायकत्व की परिभाषा को खंडित करती हुईं उसके खलनायकत्व को प्रदर्शित करती हैं। यहाँ बाज़ारवाद, नौकरी पेशा स्त्री के जीवन की दुश्वारियां आदि का चित्रण फ्लैशबैक शैली में हुआ है। ‘अनारकली के अश्क‘ प्रेम- जीवन से जुडी़ हुई 12 कहानियों का संकलन है। लेखक के इस दर्शन के साथ, ” प्रेम का बस एक ही धर्म है, देना। खुद को लुटा और मिटा देना।” “यहाँ यौवन है, ममता, वात्सल्य है, लिव- इन और वासना के चित्र भी हैं। पात्र इतिहास और वर्तमान से जुड़े हैं।” ‘ पूर्णिमा‘ में मानवीय संवेदना की सहजाभिव्यक्ति से जुड़ी 12 कहानियाँ हैं। इनकी विषय- वस्तु आस्था, मानवीय संवेदना, भारत- विभाजन से जुड़ी है। इनमें अमृतसर, लाहौर, पेरिस, वैनकुअर आदि का चित्रण है। डॉ.मधु संधु के शब्दों में, ” यहाँ आसन्न इतिहास भी है और वर्तमान भी, टूटने की वेदना भी और जुड़ने की आकांक्षा भी। “
समीक्षित काव्य -संकलनों में राकेश प्रेम के ‘सूरजमुखी सा खिलता है जो‘ 2021, ‘अस्ति – नास्ति ‘2023, पंकज त्रिवेदी का ‘तुम मेरे अज़ीज़ हो‘ 2024 तथा धर्मपाल महेन्द्र जैन का ‘अधलिखे पन्ने‘ 2024 सम्मिलित हैं।
‘सूरजमुखी सा खिलता है जो’ “सार्थक जीवन-दृष्टि और मूल्य- बोध से जुड़ी हुई रचना है जिसमें, ‘सरल, स्वानुभूत, सहज शैल्पिक क्लिष्टाओं से मुक्त बोधगम्य कवितायें हैं। ‘ कवि के लिए कवि- कर्म आत्मसाक्षात्कार है, संजीवनी है।” ‘अस्ति-नास्ति’ ‘एक दार्शनिक कवि की आध्यात्मिक चिंतन यात्रा है‘, जिसमें प्रकृति, जीव, जगत और मन- चार शीर्षक-उपशीर्षकों में जीवन और जगत की विवेचना है। प्रोफेसर जयप्रकाश इसे ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय‘ कहते हुए, ‘पार्थिवता में देवत्व की तलाश की कविताएँ‘ कहते हैं। ‘तुम मेरे अज़ीज़ हो‘, ‘ मौन मन की मुखर अभिव्यक्ति है‘ जिसमें प्रेम, परिवार , प्रकृति और जीवन- संघर्ष है। संवेदना और जीवनाकांक्षा है। पुरुष मनोविज्ञान का विश्लेषण और सकारात्मक जीवन- दृष्टि है। ‘अधलिखे पन्ने‘ समकालीन परिवेश में मनुष्य की संवेदनहीनता, भाग-दौड़, राजनीति के शोषक चरित्र, पारिवारिक रागत्व और आस्थावादी जीवन- दृष्टि से जुड़ी हुई काव्य-रचना है। इसकी भावभूमि कवि की जन्मभूमि और देश- विदेश है।
समीक्षित कृतियों में रमेश कुमार संतोष का लघुकथा संग्रह ‘ अपने अपने रिश्ते‘, 2023, धर्मपाल महेन्द्र जैन का व्यंग्य-संकलन ‘गणतंत्र के तोते‘ 2023 , सैली बलजीत का संस्मरण-संकलन ‘स्मृतियों के तलघर‘ 2022, तथा हंसा दीप के कथा- साहित्य पर डा. दीपक पाण्डेय और डा. नूतन पाण्डेय के संपादकत्व में, ‘प्रवासी साहित्यकार हंसा दीप का कहानी साहित्य‘ 2023, आलोचना- पुस्तक भी सम्मिलित हैं।
‘अपने-अपने रिश्ते‘ में सामाजिक विसंगतियों, मध्य- निम्न मध्य वर्ग की
दुश्चिंताओं, अलोकतांत्रिक विद्रूपताओं, राजनीतिक तिकड़मों से जुड़ी हुई लघु कथाएँ संकलित हैं। व्यंग्य और विक्षोभ की अभिव्यक्ति लेखकीय सोद्देश्यता को वाणी देती है। सकारात्मक मानवीय दृष्टिकोण का प्रचार-प्रसार लेखक का अभीष्ट है। ‘गणतंत्र के तोते‘ अलोकतांत्रिक और जन -विरोधी व्यवस्था की विसंगतियों पर, ‘हास्यप्रद स्थितियों से दो- चार कराता‘ बेबाक व्यंग्य – संकलन है। इसके केन्द्र में दोगले राजनेता, भ्रष्ट प्रशासन, चाटुकार मीडिया और छद्म साहित्यकार हैं। लेखक विकृतियों की नब्ज टटोलता दिखाई देता है। ‘स्मृतियों के तलघर‘ संस्मरण विधा से जुड़ी हुई रचनात्मक कृति है जिसके दो खण्डों में आत्मीयता से युक्त 13 संस्मरण हैं। कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, महीपसिंह ,रमेश बत्रा, नीरज, सुदर्शन फाकिर, सरोज वशिष्ठ, विजय बटालवी ,पत्नी, बेटी और भाई इसके केन्द्र में हैं। यह पंजाब के हिन्दी कहानीकारों का जीवंत दस्तावेज है। स्मृतियों का तहखाना है। ‘प्रवासी साहित्यकार हंसा दीप का कहानी साहित्य‘ संपादित कृति है। इसमें लेखिका के कथा- साहित्य पर 16 शोधालेख, साहित्यकार पति धर्मपाल महेन्द्र जैन का संस्मरणात्मक आलेख तथा सम्पादक द्वय की भूमिका है। ‘हंसा दीप के कथा-साहित्य में स्त्री-विमर्श, यथार्थ, मनोविज्ञान, आधुनिकता आदि के साथ, ‘जन्मभूमि और प्रवास भूमि – दोनों की सुगंध है।‘ (मधु संधु)
डॉ. मधु संधु मौलिक लेखन के साथ आलोचना के क्षेत्र में भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में सक्षम हुई हैं। भारतीय लेखकों के साथ प्रवासी लेखिकाओं पर उनकी अनेक आलोचनात्मक पुस्तकें हैं। ‘इक्कीसवीं शती की साहित्यक एम. आर. आई’ ( समीक्षात्मक विश्लेषण) में भी देश में सक्रिय रचनाकारों के साथ प्रवासी लेखकों की रचनाएँ इस कृति के केन्द्र में हैं। कृति और कृतिकार की मानसिकता से आत्मीयता उनके विश्लेषण की विशिष्टता है।