कृति का नाम – बुंदेलखण्ड के कवि,
प्रधान संपादक – डॉ० प्रमोद कुमार अग्रवाल,
संपादक – डॉ० निहाल चन्द्र शिवहरे।
प्रकाशक – साहित्य भूमि, नई दिल्ली।
मूल्य – ₹650.00
बुंदेलखण्ड सांस्कृतिक-साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रहा है। आदिकवि वाल्मीकि, वेद व्यास, तुलसीदास, केशवदास, पद्माकर, वियोगी हरि, गंगाधर व्यास आदिक से लेकर पुनर्जागरण काल के उद्घोषक राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, डॉ० वृंदावनलाल वर्मा, काली कवि, शिवकेंद्र त्रिपाठी, डॉ० आनंद, प्रकाश सक्सेना, डॉ० रामस्वरूप खरे, डॉ० चंद्ररेखा सिंह, महाकवि अवधेश, सीताराम चतुर्वेदी अटल जैसे अनेकानेक सरस्वती पुत्रों की एक समृद्ध परंपरा बुंदेलखण्ड में विद्यमान रही है। इस सुसमृद्ध परंपरा की श्रृंखला में अनेकानेक नाम और भी वरेण्य हैं, जिनका उल्लेख लेख विस्तार भय के कारण नहीं कर रहा हूँ।
बुंदेलखण्ड की समृद्धशाली साहित्यिक धरोहरों को सँवारने-सहेजने का कार्य जिस प्रकार होना चाहिए वैसा होना अभी शेष है। हालांकि अब इस अभाव को दूर करने के कुआँ रचनात्मक प्रयास प्रारंभ हो चुके हैं। ऐसा ही एक उल्लेखनीय प्रयास साहित्यभूमि, नई दिल्ली ने प्रकाशित ‘बुंदेलखण्ड के कवि’ कविता संग्रह है।
‘बुंदेलखण्ड के कवि’ में सत्तर कवियों की रचनाओं को सम्मलित किया गया है। जिनमें ख्याति प्राप्त कवियों से लेकर अल्पज्ञात कवियों की तक की रचनाओं को भी संकलन में स्थान देकर संपादक मण्डल ने नवोदित कवियों को प्रकाश में लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। संपादकों के इस सार्थक प्रयास के लिए सराहना और साधुवाद मिलना ही चाहिए।
बुंदेलखण्ड के विविध विधाई साहित्य को अज्ञात के धुँधलके से प्रकाश में लाने के कार्य अध्येताओं, शोधार्थियों के साथ ही जनसामान्य के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होंगे। बुंदेलखण्ड के साहित्यकारों ने बुंदेली के अतिरिक्त हिन्दी की अनेक विधाओं में मौलिक लेखन किया है। काव्य साहित्य के अतिरिक्त गद्य साहित्य में कहानी, उपन्यास, निबंध, नाटक, आत्मकथा आदि विधाओं में विपुल लेखन किया है। बुंदेली साहित्यकार डॉ० रामनारायण शर्मा की शोधपूर्ण पुस्तक ‘बुंदेलखण्ड के उपन्यासकार’ विगत वर्षों में आ चुकी है। इसी प्रकार बुंदेलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं आचार्य जानेमाने फिल्म समीक्षक, वरिष्ठ लेखक प्रोफेसर पुनीत बिसरिया ने ‘बुंदेलखण्ड साहित्य उन्नयन समिति’ के माध्यम से बुंदेलखण्ड क्षेत्र के अनेकानेक लेखकों, कवियों की पुस्तकों का निःशुल्क प्रकाशन कराकर अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया है। इसके अतिरिक्त डॉ० पुनीत बिसारिया के संपादन में ‘बुंदेलखण्ड के कथाकार’ का प्रकाशन इस श्रंखला की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
इस कड़ी में अब तीसरा उल्लेखनीय प्रयास डॉ० प्रमोद कुमार अग्रवाल एवं डॉ० निहालचंद्र शिवहरे आदि के संपादन में प्रकाशित ‘बुंदेलखण्ड के कवि’ कविता संकलन प्रकाशित करके किया है। इस कविता संग्रह के संपादन में झाँसी के पाँच दिग्गज जुड़े हैं। प्रधान संपादक हैं पूर्व वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और साहित्यकार डॉ० प्रमोद कुमार अग्रवाल, संपादक हैं पूर्व शिक्षक, बैंकर्स और समाजसेवी व साहित्यकार डॉ० निहाल चन्द्र शिवहरे। वहीं उपसंपादकों में वरिष्ठ कवि साकेत सुमन चतुर्वेदी, शिक्षाविद् डॉ० नीति शास्त्री एवं रंगकर्मी आरिफ शहडोली के नाम संकलन के मुख्य पृष्ठ पर अंकित हैं।
संकलन में बुंदेली के पुरोधा वयोवृद्ध डॉ० रामनारायण शर्मा से लेकर नवोदित कवि यतीश अकिंचन तथा छात्र लेखक गिरजाशंकर कुशवाहा कुशराज की विमर्शीय कविताएँ प्रकाशित हैं।
संपादक मण्डल की इस बात के लिए सराहना की जानी चाहिए कि उन्होंने रचनाकार के बड़े- छोटे के भाव के स्थान पर रचना की गुणवत्ता को ही महत्वपूर्ण मानते हुए अनेकानेक नवोदित कवियों व कवयित्रियों को इस संकलन में स्थान दिया है। संपादकों के इस औदार्यभाव का अभिनंदन। प्रायः देखने में आया है सामूहिक रूप से प्रकाशित होनेवाले अधिकांश संग्रहों में नामचीन कवियों, लेखकों को ही वरीयता दी जाती है। अनेक रचनाकार ऐसे हैं जिन्हें कोई मंच और माध्यम नहीं मिलता जिससे वे अपनी रचनाओं को पुस्तक रूप में प्रकाशित कर समाज के सामने उद्घाटित कर सकें। इस दृष्टि से भी यह संकलन नवोन्मेषी सोच लेकर आया है। मेरा विश्वास है कि बुंदेलखण्ड के कुछ प्रतिनिधि कवियों की कविताओं की उत्कृष्ट बानगी इस संग्रह से मिल सकेगी। इस संग्रह की कविताओं में एक खास बात यह भी है कि प्रेम, श्रृंगार और विरह जैसे पारंपरिक विषयों को छोड़कर प्रकृति संरक्षण, सामाजिक विसंगतियों, राष्ट्रप्रेम जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी इसमें प्रचुर मात्रा में कविताएँ संकलित हैं। इन कविताओं में किसान विमर्श, स्त्री-विमर्श के साथ ही दलित विमर्श पर भी कविताएँ हैं। इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि आज का कवि सामाजिक नाइंसाफियों को किसी भी रूप में स्वीकारने का पक्षधर नहीं है। वह भारत को प्रत्येक दृष्टि से समृद्धशाली देखना चाहता है। उसकी सोच भारत की अखंडता और समृद्धि के लिए समर्पित है। इसीलिए वह अपनी रचनाओं में वृक्षारोपण की बात करता है। जल संरक्षण का आग्रह करता है। नदियों और पोखरों को स्वच्छ बनाने पर जोर देता है। भ्रूणहत्या, शोषण, कदाचार, भ्रष्टाचार, आतंकवाद आदि को अपदस्थ करने की अपनी प्रतिबद्धताएँ दर्शाता है। नाइंसाफियों के खिलाफ आवाज बुलंद करता है। जीवनमूल्यों के संवर्द्धन के पक्ष में तनकर खड़ा होता है। कविता का यही सामाजिक सरोकारी तेवर कवि को समकालीनता से संपृक्त करता है। सच में, यही समकालीन कविता की पहचान भी है।
कविता छांदिक हो या बेछंदी हो, मगर कविता में कविता जैसा कुछ होना जरूर चाहिए।बिंब, प्रतीक,भाषा व छंद-विधान कविता की शिल्पगत बाह्य अलंकारिक विशेषताएँ हैं जबकि सघन संवेदनाएँ, अमोघ अनुभूतियाँ और भावप्रवणताएँ कविता के प्राणतत्व हैं। ऐसी कविताएँ समाज के बीच प्रभाव छोड़ने में सफल होतीं हैं।
इस संकलन में अनेक महत्वपूर्ण और उत्कृष्ट कविताएँ प्रकाशित हैं। डॉ० प्रमोद कुमार अग्रवाल पूर्व में आईएएस तथा अतिरिक्त मुख्य सचिव रह चुके हैं। उनके भीतर संवेदनशील मनवाला साहित्यकार भी है। अंतरिक्ष में कुलाँचें भरता एक कवि भी बैठा है।आँचलिक क्षेत्रों में उद्योग तलाश करता एक उपन्यासकार भी। वैज्ञानिक प्रगति पर गौरव दर्शाती एक उत्कृष्ट कविता इस संग्रह में प्रकाशित है। कविता का शीर्षक है ‘स्वर्णिम अक्षर चांद पर’
तेईस आठ तेईस!
याद रखी जाएगी सदैव
भारत ने लिखी
चांद की दक्षिणी सतह पर
उस सतह पर
जो अनछुई है
गहराई है, अंधियारी है
स्वर्णिम अक्षरों में
तभी तो इसकी दमक और चमक
निखरी है और अधिक
दूर, बहुत दूर अंतरिक्ष में
जहां न भौगोलिक लड़ाई है
न धर्म, रंग भेद, न जाति
न अमीर गरीब
न राजनीति
…….
कविता का अंतिम चरण अत्यंत महत्वपूर्ण है…
यह तारीख द्योतक है सिर्फ
अथक परिश्रम और आत्मविश्वास की एक ऐसी उपलब्धि जिसने
सभी भारतीयों को
एक सूत्र में बांध दिया
जय चंद्रयान! जय इसरो!
जय भारतीय!
जय जय!!
……….
प्यार सृष्टि का मूलाधार है। सुकवि
साकेत सुमन चतुर्वेदी का एक दोहा उल्लेखनीय है-
नफरत से चलता नहीं, देखो ये संसार। सिर्फ प्यार करता यहाँ, मानव का उद्धार।
……………
डॉ० निहालचंद शिवहरे प्रयोगधर्मी कवि हैं। हाइकु जैसी विधा पर उन्होंने उल्लेखनीय काम किया है। उनके राममय कुछ हाइकु दृष्टव्य हैं-
उमड़े संत
अयोध्या परिधि भी
हुई अनंत
सम्पूर्ण राष्ट्र
लय मय गा रहा
राम की धुन
अयोध्या में ही
विश्व सिमट आया
राम की माया
………..
समाज के बलात्कारी रावणों को धिक्कारतीं पूर्व पुलिस उपाधीक्षक अरुण कुमार हिंगबासिया की ये पंक्तियाँ सोचने को विवश करतीं हैं –
कितनी लंका कितने रावण?
मैं सीता को कहाँ छुपाऊं?
क्या चरित्र है जनमानस का?
किस-किसको दर्पण दिखलाऊँ?
……..
देश की सीमाएँ सुरक्षित रहें। अखंडता और अपराजेयता भारतीय जनमानस का स्वभाव बन गया है। देशप्रेम को समर्पित लोकभूषण पन्नालाल ‘असर’ के चार पंक्तियाँ-
बिगुल बज गया नहीं हटेंगे
धर्म – जाति में नहीं बटेंगे
शंख फूंक दो मिलकर आओ
समता के हलकारे लिख दो
इंकलाब के नारे लिख दो
ऐसे भाव हमारे लिख दो
………..
डॉ० सत्यप्रकाश शर्मा हिंदी, अंग्रेजी एवं संस्कृत साहित्य के प्रतिष्ठित विद्वानों में शुमार हैं। उनकी एक अध्यात्मिक रचना ‘बसंत’ से चार पंक्तियाँ–
रागी मन संत हो गया।
समझ लो बसंत हो गया
कृष्ण का अंत हो गया
समझ लो बसंत हो गया
……….
हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श को लेकर इस समय विभिन्न साहित्य सिरजा जा रहा है। ‘स्त्री’ शीर्षक से डॉ० कुंती हरिराम की कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं –
“औसतन
खुश रहने का नाम है स्त्री
क्योंकि वह जीती है, पलों को
कुपोषण में भी खरपतवार की तरह बढ़ती जाती है।”
…… …
भाई महेंद्र भीष्म देश के सुविख्यात साहित्यकार हैं। उनकी एक समकालीन कविता ‘बेटी बन आना तुम’ इस संग्रह में प्रकाशित है। संवेदनाओं को झकझोरने वाली इस विशिष्ट रचना के लिए मैं कवि को अनेक साधुवाद देता हूँ।
आप भी इस रचना के अंर्तमन में उतरकर उसे पढ़िए –
“धूल पड़ी है खिलौनों पर
साफ कर रहा हूँ, अम्मा!
साथ खेलेंगे, फिर से
अबकी बेटी बन आना तुम….”
……….
डॉ निधि अग्रवाल देश की लब्धप्रतिष्ठत कहानीकार हैं। उनके भीतर की कवयित्री भी बहुत संवेदनशील है। इस संकलन में उनकी दो वैचारिक कविताएँ ‘किसके निमित्त’ तथा ‘पिता बनाम पति’, संकलित हैं। प्रेम और प्रेमी को पुकारती ‘किसके निमित्त’ कविता का एक अंश-
“गीतों को देना नया रूप तुम
सपने नहीं उनमें सच्चाई हो
हो जिनके निमित्त नाम उनका लिखो
जो होती हो जग में तो रुसवाई हो
जिसकी अंगड़ाई से जन्मी कविता हृदय
वह प्रेयसी क्यों कविता में सकुचाती रही
जिसमें मेरे लिए न कोई संदेश था
वह कविता क्यों मन को लुभाती रही।”
……….
डॉ० विजय प्रकाश सैनी सामाजिक सरोकारी जनवादी कवि के रूप में पहचाने जाते हैं। उनकी एक रचना है, ‘इतना अंधेरा पहले कभी न था’ उसकी प्रारंभिक पंक्तियाँ आज की व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करती है–
“दूधिया रोशनी में नहा रहे लोग
फिर भी पहचानने में नहीं आ रहे लोग लालटेन युग में रोशनी कम थी, फिर भी एक दूसरे को पहचान लेते थे लोग।”
…….
देवेंद्र भारद्वाज व्यंग्य के वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार हैं। उनकी गीतिका की चार पंक्तियाँ जीवन को झंझावातों से ऊपर उठाकर मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती हैं-
“जीवन के झंझावात से मन,
तुझको नहीं घबराना होगा।
मन की पीर छुपाकर भीतर,
तुझे सदा मुस्काना होगा।
सदा भीड़ में चलने वाला,
गुमनामी में खो जाता है
अपनी राह बनाकर देखो
तेरे साथ जमाना होगा।।”
……..
कवयित्री डॉ० सुमन मिश्रा के गीतों में प्रेम समर्ण के साथ उपस्थित हुआ है। प्रेमानंद की अनुभूति अनिवर्चनीय होकर विरह की असह्य वेदनाओं को विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त करती है। उनके गीत का एक चरण देखिए-
“नेह से तेरे हृदय पर,
मैं नाम लिखकर आ गई।
जब समय तुमको मिले प्रिय,
आईना तुम देख लेना।
उम्र की दहलीज पर प्रिय,
प्रेम पल पल छल रहा है।
भावना का दीप मेरा,
अनवरत ही जल रहा है।।
दृग बिंदुओं से आज मैं,
श्रृंगार करके आ गई….।”
……….
युवा कवि राहुल मिश्रा संवेदनशील रचनाकार हैं। खड़ीबोली में लिखी राहुल मिश्रा की छोटी बह्र की इस ग़ज़ल में सामाजिक बेचैनियों, विद्रूपतायों और जीवनमूल्यों के क्षरण की चिंताओं के अक्स साफ-साफ नजर आते हैं। वे लिखते हैं–
“विद्रूपों में संत कहाँ हैं
अंतस् के अरिहंत कहाँ हैं
मतलब के धागों में उलझे
रिश्ते अब जीवंत कहाँ हैं
थोड़ा ठहरो सांसें भर लो
स्पर्धा का अंत कहाँ हैं।”
———–
‘बुंदेलखण्ड के कवि’ कविता संग्रह में समकालीन कविता के उदाहरण प्रस्तुत करतीं अनेक उम्दा कविताएँ संकलित हैं। कुछ उल्लेखनीय कविताएँ जिनमें निरुपमा वर्मा की ‘हरा रंग’, सृष्टि सिन्हा की ‘चंदा मामा’, डॉ० अंजना सोलंकी की ‘इक दिन’, पंकज अभिराज का गीत ‘ज्यों पथिक भटके मगर’, धर्मेंद्र सारांश की ‘पृथ्वी और जल’ कुशराज की ‘किसान की आवाज, हितेश विश्वा की ‘नमन’, दिनेश शर्मा की लफ्ज़, शरद मिश्रा की ‘अपना परिवार’, वैभव दुबे की ‘बेटी’, संजीव दुबे की ‘चाहें टूटें स्वप्न अनेकों, संजय राष्ट्रवादी की ‘माँ भारती का आशीर्वाद’, सी.वी.राय तरुण की ‘वृक्षारोपण का जुनून’, श्याम शरण नायक की ‘मुझे माता पिता का कर्जदार रहने दो’, रवि कुशवाहा की ‘बुंदेलखण्ड’, देव नायक की ‘देव चिंतन’, ‘आरिफ़ शहडोली की ‘ओरछा धाम’, रवि नायक की ‘धीरे-धीरे बोल रे मनवा’ आदि समसामयिक कविताओं को पढ़कर लगता है बुंदेलखण्ड की कवि दृष्टि अत्यंत समृद्ध और सजग है। उसकी रचनाधर्मिता मानवीय मूल्यों को संजोए हुए है।
इस संकलन में बुंदेलखण्ड के अनेक नामचीन व प्रतिष्ठित कवियों की कविताएँ भी प्रकाशित हैं। जिनमें ब्रजलता मिश्रा, नेमीचंद जैन नैमी, डॉ० नीति शास्त्री, कृष्ण मुरारी श्रीवास्तव सखा, ब्रह्मदीन बंधु, सत्य प्रकाश ताम्रकार, राम बिहारी सोनी तुक्कड़, डॉ० के० के० साहू निर्लिप्त, डॉ० अरविंद असीम, डॉ० सुखराम चतुर्वेदी, डॉ० राज गोस्वामी, संतोष पटैरिया, किशोर श्रीवास्तव, प्रताप नारायण दुबे, हरशरण शुक्ल, संध्या निगम भूषण, जी० पी० वर्मा मधुरेश, संगीता निगम, डॉ० रामकिशोर सोनकिया, भगवान सिंह राही, डॉ० गौरीशंकर उपाध्याय ‘सरल’, डॉ० राजेश तिवारी मक्खन, बाला प्रसाद यादव, प्रगति शंकर, मोनिका पाण्डेय, रमा शुक्ला सखी, अनुपम शर्मा अनूप, बलराम सोनी, विवेक बरसैंया, हरिशंकर वाल्मीकि जैसे अनेक स्थापित कवियों के नाम सम्मलित हैं।
‘बुंदेलखण्ड के कवि’ कविता संग्रह साहित्यभूमि दिल्ली के बड़े प्रकाशक ने प्रकाशित किया है। इसके बावजूद मुद्रण में कुछ प्रूफ़ संबंधी त्रुटियाँ रह गई हैं। इस ओर सचेष्ट रहने की आवश्यकता है।
दूसरी एक बात यह भी कहनी है कि जो रचनाकार इस संकलन में प्रकाशित होने से रह गए हैं, भविष्य में जब कभी ‘बुंदेलखण्ड के कवि’ भाग-2 का प्रकाशन हो तो बुंदेलखण्ड को झाँसी तक सीमित न रखकर उसमें चित्रकूट, बाँदा, हमीरपुर, महोबा, जालौन, ललितपुर जनपदों के अलावा मध्यप्रदेश के दतिया, निवाड़ी, टीकमगढ़ आदि समीपवर्ती जनपदों के रचनाकारों को भी इसमें स्थान दिया जाए तो और भी श्रेयस्कर होगा।
समग्रतः ‘बुंदेलखण्ड के कवि’ संग्रह का प्रकाशन एक स्वागतयोग्य कदम है। हिंदी साहित्य और बुंदेलखण्ड के काव्य साहित्य की दृष्टि से भी इस संकलन का अपना महत्व और उपादेयता सिद्ध होगी।
उत्कृष्ट काव्य संयोजन के लिए संपादक मण्डल को अनेक साधुवाद। संग्रह में जिन कवि- कवयित्रियों की कविताएँ प्रकाशित हुईं हैं, उन सभी को हार्दिक बधाइयाँ।
——–———-

जानदार और शानदार समीक्षा। बुंदेलखंड एक ऐसा क्षेत्र है जिसके रचनाकारों संस्कृति और कार्य संस्कृति पर अभी पाठकों को बहुत कुछ बताया जाना शेष है।
इस प्रयास में यह समीक्षा बहुत ही दमदार बन पड़ी है । इस समीक्षा के लिए आदरणीय रमाशंकर भारती जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं
बुंदेलखंड शौर्य और बलिदान की भूमि रही है। इसका समृद्ध इतिहास आज भी हमारी नसों में खून बनकर उबल रहा है।
यहां के वीरों की गाथा लिखकर लोग साहित्य में यूं ही अमर हो गए हैं और यह निरंतरता आज भी अक्षुण्ण बनी हुई है।
बुंदेलखंड में जिस तरह से वीरता के भग्नावशेष हर जगह बिखरे पड़े हैं वैसे ही यहां साहित्य भी जगह-जगह बिखरा पड़ा है। बस उसे सहेजने की और सहेजकर प्रकाश में लाने की आवश्यकता है।
डॉ रामशंकर भारती जी द्वारा समीक्ष्य पुस्तक ‘बुंदेलखंड के कवि’ में 70 कवियों की कविताएं प्रकाशित हुई हैं। इस पुस्तक के प्रधान संपादक डॉ प्रमोद कुमार अग्रवाल जी है।
डॉ रामशंकर भारती जी ने इस संग्रह की कविताओं पर अपनी गहन दृष्टि का परिचय देते हुए उनका सम्यक विवेचन किया है। इसके साथ ही उन्होंने यह आशा व्यक्त की है कि भूले बिसरे साहित्यकारों को प्रकाश में लाने का *कुआं रचनात्मक प्रयास आरंभ हो गए हैं।* यह वाक्य केवल साहित्यिक जुमलेबाजी नहीं है बल्कि इसकी गूढ़तम स्थिति को इंगित करता है। कुआं एक दो लोग बनवाते थे लेकिन उसका पानी पूरा गांव पीता था। संपादन, प्रकाशन एक दो लोग ही करते हैं पर उसमें लगभग सभी साहित्यकार प्रकाश में आ जाते हैं।
कुआं खोदने वाले मनीषियों में पहला नाम ‘बुंदेलखंड साहित्य उन्नयन समिति’ का नाम प्रमुख है। इस समिति के प्रमुख आचार्य प्रोफेसर पुनीत बिसारिया जी है जो बुंदेलखंड के साहित्यकारों की रचनाओं का निःशुल्क प्रकाशन करवाने में अपनी महती भूमिका निभा रहे हैं। उनका यह भगीरथ प्रयत्न सराहनीय कहा जा सकता है।
और नाम भी हैं जैसे डॉ प्रमोद कुमार अग्रवाल, डॉ निहाल चंद्र शिवहरे आदि नाम इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। बुंदेली साहित्य के लिए यह सुखद है।
रचनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए समीक्षा अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने का यह उत्तम माध्यम कहा जा सकता है। डॉ रामशंकर भारती जी इस काम को बखूबी कर रहे हैं। आशा करता हूं कि आप बुंदेली साहित्यिक यज्ञ में समीक्षा की समिधाएं ऐसे ही डालते रहेंगे।
रचनाधर्मिता को आगे बढ़ाने के लिए पुरवाई पत्रिका के संपादक आदरणीय तेजेन्द्र सर जी को कृतज्ञता ज्ञापित करूंगा जिन्होंने पुरवाई जैसी अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में इसको स्थान दिया। बुंदेलखंड के कवियों को मान दिया।
https://www.thepurvai.com/book-review-by-dr-ramshankar-bharti/
आदरणीय राम शंकर जी!
“बुंदेलखंड के कवि” आपकी समीक्षा पढ़ी। आप सबका परिश्रम महसूस हुआ।
और पूरी पढ़ी है इस बात का विश्वास दिलाते हैं क्योंकि आगे जाकर पुनीत बिसारिया सर के बारे में भी पढ़ा।
उनका काम काबिले तारीफ है वैसे तो आप सभी का परिश्रम प्रशंसनीय है, लेकिन जब कोई एक जाना पहचाना विद्वान वहाँ पर नजर आता है तो उस जगह की महत्ता स्वयं साबित हो जाती है।
यहाँ पुनीत जी के बारे में जानकर और भी अच्छा लगा।
उन्हें भी बधाई हमारी तरफ से।कविताएँ काफी अच्छी लगीं जो आपने उदाहरण में लिखी हैं।
डॉ प्रमोद कुमार अग्रवाल की कविता सहित उदाहरण में दी हुई हर कविता एक नंबर है।
बेहतरीन समीक्षा के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर!
बहुत सुंदर समीक्षा है सर।बुंदेलखंड कै.साहित्य का हिन्दी के लिए अमूल्य योगदान रहा है।सभी का परिचय और उनके साहित्य से साक्षात्कार बहुत अच्छा लगा।एक यशस्वी कवि मंजुल मयंक का नाम शायद छूट गया या विस्मृत कर दिया गया।वे यशस्वी गीतकार, कथाकार कवि थे उनका साहित्य भी बुंदेलखंड का गर्व है।फिल्मो के लिए भी गीत लिखे हैं।हमीरपुर में रहते थे।आपकी सुंदर समीक्षा पढकर उनकी याद आ गई। आपको बहुत बहुत बधाई, शुभ कामनाए सर।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर