नाम – टापुओं पर पिकनिक (उपन्यास); लेखक – प्रबोध कुमार गोविल; पृष्ठ संख्या – 351; मूल्य – ₹500/-; आवरण चित्र – प्रवेश सोनी,कोटा, राजस्थान। प्रकाशक – किताबगंज प्रकाशन, गंगापुर सिटी, राजस्थान।
अधिकांश कथाकारों की दबी अभिलाषा उनके उपन्यास पर फिल्म बनते देखने की होती है और उसके लिए आवश्यक तत्वों को समेटकर रोचकता बरकरार रखना पहली शर्त है। अगर किसी भी पन्ने पर इसमें जरा भी खलल पड़े, कहानी टूटती नजर आए, बस समझ लीजिए कि गई भैंस पानी में। दूसरी शर्त संवादों का संदर्भित होने के साथ-साथ सरल किंतु आकर्षक, चुटीला, स्पष्ट एवं आम आदमी की भाषा शैली में होना है, न कि कठिन, परिष्कृत, अलंकृत, क्लिष्ट उपमाई शब्दावली से भरी हुई। तेजी से बदलते घटनाक्रमों का रोमांचक होने के साथ निरंतरता बनाए रखना तीसरी महत्वपूर्ण शर्त है। हालांकि गोविल जी का यह उपन्यास इन सभी चुनौतियों पर खरा उतरता है और शायद जल्द ही पटकथा में रूपांतरित हो फिल्माया भी जाए परंतु कहां मैं इन शर्तों को गिनाने के कवायद में फंस गया।
शीर्षक ‘टापुओं पर पिकनिक’ से आपको इसके कथानक व कथ्य के बारे में भले कोई खास जानकारी हासिल न हो, परंतु जब आप कहानी के अंत तक पहुंचेंगे तभी इसकी सार्थकता से रूबरू होंगे और स्वीकार करने को विवश होंगे कि इससे बेहतर और कोई शीर्षक हो ही नहीं सकता था। यद्यपि आरंभ में ही इसे पांच किशोर किशोरियों के मित्र मंडली का नाम बताकर बरगलाने की कोशिश की गई है पर आखिरी के पन्नों में ही इस शीर्षक के औचित्य का खुलासा होता है, जब आर्यन अपने डॉक्टर पिता सहित पूरे अंतरराष्ट्रीय गिरोह, जो अंग प्रत्यारोपण को गलत तरीके से व्यवसाय बनाकर अंगों के आयात निर्यात में संलग्न हो पूरी मानवता को शर्मसार कर रहा था, के सफाए के लिए इसी टापू पर पिकनिक की आड़ लेता है। मेरी नजर में यह एक मंजे हुए उपन्यासकार का पाठक को अंत तक बांधे रखने के लिए किया गया अनूठा प्रयोग है।
अनूठा और मजेदार पहलू यह भी है कि पाप का अंत करने को उद्यत आर्यन और उसकी टोली कोई आदर्श चरित्रवान नहीं दिखलाई देते हैं बल्कि हर तरह की सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ते नजर आते हैं। लेकिन इन सामाजिक लक्ष्मण-रेखा के उल्लंघनों को आधुनिकता के नाम पर आज के नवयुवक-नवयुवतियों में व्याप्त सामान्य प्रवृत्तियों के रूप में चित्रित किया गया है बिना किसी लेखकीय टिप्पणी के। आर्यन का अपने पिता के द्वारा की जा रही व्यवसायिक आपराधिक गतिविधियों के कारण उनसे नफरत करते हुए स्वयं को प्रतिफल में मदिरा के अति सेवन के साथ सामान्य भाषा में बर्बादी के कगार तक पहुंचा देना पुत्र द्वारा पिता को आंतरिक चोट दे एक तरह से न्याय करने का प्रयास माना जा सकता है परंतु इसे आदर्श बना प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। इसी तरह के कुछ विरोधाभासों को प्रस्तुत कर पाठकों को उन पर गौर करने पर मजबूर कर देता है यह उपन्यास।
भाषा और विन्यास पर विस्तृत चर्चा करने से बचते हुए मैं इसे संक्षिप्त रखता हूं। अंत में आदरणीय गोविल जी को इतना अच्छा उपन्यास मुझे पढ़ने का सौभाग्य प्रदान करने के लिए आभार प्रकट करता हूं। साथ ही हार्दिक बधाई के साथ ढेरों शुभकामनाएं कि जल्द ही इस पर आधारित कोई फिल्म या टीवी धारावाहिक बने और दर्शकों द्वारा काफी पसंद किया व सराहा जाए।

