उपन्यास – नटनी
लेखक – रत्नकुमार सांभरिया
प्रकाशक – सेतु प्रकाशन, नोएडा
मूल्य – 375 रुपये मात्र, पृष्ठ -251
समीक्षक
कंवल भारती
2025 में प्रकाशित रत्नकुमार सांभरिया का उपन्यास ‘नटनी’ पंचायतीराज पर केन्द्रित है। उपन्यास भाषा और शिल्प की दृष्टि से जितना बेजोड़ है, उतनी ही बेजोड़ इसकी कहानी है, ऐसी गुंथी हुई, कहीं झोल नहीं। उपन्यास इस तथ्य को रेखांकित करता है कि भारतीय समाज, जो लोकतान्त्रिक नहीं हो सका, उसका मुख्य कारण गाँवों का सामन्ती ढांचा है। इस ढाँचे को तोड़े बगैर समाज लोकतान्त्रिक नहीं हो सकता। इसे तोड़ने का काम इस ढाँचे से पीड़ित लोग ही कर सकते हैं। उपन्यास रज्जो के माध्यम से गाँव के वर्णवादी सामन्ती ढाँचे को तोड़ने का एक सफल प्रयास करता है।
ग्राम स्वराज की अवधारणा गांधी की देन थी, पर यह कहना ज्यादा सही होगा कि पूरा हिन्दू तन्त्र ही गाँवों में वर्णव्यवस्था का राज बनाए रखना चाहता था, जो पंचायतीराज के बिना मुश्किल था। ग्राम स्वराज, अर्थात सत्ता के विकेन्द्रीयकरण के समर्थक जितना गांधी और द्विज नेता थे, उतने ही डॉ. अम्बेडकर उसके प्रबल विरोधी थे। उनका मत था कि भारत के गाँव हिन्दू वर्णव्यवस्था के वर्किंग प्लांट हैं। उनमें केवल दो राष्ट्र हैं, एक शासक और दूसरा शासित। शासक सिर्फ अत्याचार करता है, हुक्म देता है, और शासित उसे सहन करता है और सदैव सिर झुकाए रहता है। अम्बेडकर ने कहा कि अगर सत्ता का विकेन्द्रीयकरण हुआ, तो गाँवों की शासन-सत्ता द्विजों के हाथों में आएगी, जो वर्णव्यवस्था के अनुसार शासन करेंगे।
हिन्दू वर्णव्यवस्था एक निरंकुश समाज-व्यवस्था है, जिसमें एक वर्ण का काम केवल अत्याचार करना है। यह दुनिया की सबसे अनोखी अवैज्ञानिक व्यवस्था है, जिसमें ब्राह्मण धर्मगुरू है, बनिया व्यापारी है और ठाकुर (क्षत्रिय) अत्याचारी है। यह आश्चर्यजनक विद्रूप है कि ठाकुर जाति को अत्याचार करने के सिवा कोई दूसरा काम मनुस्मृति ने दिया ही नहीं। इसलिए चारों वर्णों में ठाकुर को ही हथियार रखने का अधिकार दिया गया। डॉ. अम्बेडकर ने लिखा है कि यह हथियार ठाकुर को वर्णव्यवस्था के खिलाफ शूद्रों के विद्रोह को दबाने के लिए दिया गया था। इसके विरोध में यह कहना झूठ होगा कि क्षत्रिय राजा-महाराजा थे। भारत में सभी वर्णों के राजवंश हुए हैं। बहुत कम क्षत्रिय राजवंश हुए हैं, और जो हुए हैं, उनका कोई सम्बन्ध वर्तमान क्षत्रिय जाति से नहीं है। मनु की स्मृति में जो क्षत्रिय जाति है, उसे गाँव की सीमा की रक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी। सीमा के बाहर अन्त्यजों (अछूतों) और शूद्रों की बस्तियाँ थीं। मनु को उन शूद्रों से विद्रोह का भय था। इसलिए मनु ने उनको सिर उठाने से रोकने के लिए प्रतिरक्षा के लिए क्षत्रिय वर्ण का निर्माण किया था। इस बिनाह पर क्षत्रिय जाति ने भारत की अछूत और शूद्र जातियों पर जितने अत्याचार किए हैं, दुनिया के किसी कोने में किसी जाति ने इतने अत्याचार नहीं किए। ठाकुरों के अत्याचारों की संख्या लाखों में नहीं, करोड़ों में हो सकती है। दलित बस्तियों में आग लगाना, दलितों को जिन्दा जला कर मारना, दलित औरतों के साथ बलात्कार करना, उन्हें कोल्हू में पिलवाना, उनके हाथ काटना, नंगा करके घुमाना, उनके मुँह पर पेशाब करना, जूतियों में पानी पिलाना, मल खिलाना, उनके कुओं में जहर डालना, उनसे बेगार कराना, उन्हें जूते पहन कर चलने से रोकना, उनके बच्चों को पढ़ने से रोकना, उनको घोड़ी पर चढ़ने से रोकना, उन्हें मूंछें रखने पर मारना, उनको बरात निकालने से रोकना, उन्हें पेड़ से बांध कर, उल्टा लटका कर मारना, उनका सामाजिक बहिष्कार करना, कौन सा जुल्म नहीं है, जो उन्होंने न किया हो। इन सारे जुल्मों का मकसद दलितों का मानमर्दन करके उन्हें सिर उठाने के काबिल न छोड़ना था। हालांकि वे दलितों का संहार करने में तो सफल हुए, लेकिन वर्णव्यवस्था के खिलाफ दलितों के विद्रोह को नहीं रोक सके।
ठाकुर वर्णव्यवस्था में दोयम दर्जे का नागरिक है, पर जालिम और हिंसक प्रवृत्ति में उसकी गिनती पहले नम्बर पर होती है। जहाँ-जहाँ इस जाति का वर्चस्व है, वहाँ-वहाँ सामन्तवाद है, वहाँ-वहाँ न सामाजिक परिवर्तन हुआ, और न लोकतंत्र कायम हुआ है। ‘नटनी’ उपन्यास में कीलपुर गाँव में इसी प्रवृत्ति के सामंत जिगरसिंह का कई पुश्तों से राज चल रहा है। जब तक ग्राम-पंचायतों में आरक्षण नहीं था, तब तक उनको कोई फर्क नहीं पड़ता था। पर जैसे ही ग्राम-पंचायत के चुनावों में महिलाओं, दलितों और पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान हुआ, उनकी सत्ता डोल गई। इसका तोड़ भी उन्होंने निकाल लिया। वे अपने घर के किसी वाल्मीकि-चमार नौकर को प्रधानी या सरपंची के लिए खड़ा कर देते थे, और सत्ता अपने हाथ में रखते थे। इसमें भी वे पढ़ा-लिखा नहीं, अनपढ़ को चुनते थे। उपन्यास में जिगरसिंह कहता है—‘पढ़ा-लिखा गुर्राता है, अंगूठा टेक मुट्ठी का रहता है।’(पृष्ठ 79)
जिगरसिंह जात्याभिमानी होने के साथ-साथ निम्न जातियों से छुआछूत भी करता है। मजाल है कोई शूद्र उसके सामने कुर्सी पर बैठ जाए। लेकिन पंचायत चुनाव में दलित-ओबीसी का आरक्षण उसकी गले की फांस बन गया। जात्याभिमानी इतना बड़ा कि पिछले चुनाव में सामान्य सीट होते हुए भी उसने अपने कारिंदे शोभालाल कुम्हार की घरवाली मीनादेवी को चुनाव में उतार दिया था, क्योंकि उसके मुकाबले में देवीसिंह यादव खड़ा हो गया था। एक यादव का जिगरसिंह के मुकाबले खड़ा होना, उसके लिए अपमानजनक था। मीनादेवी सरपंच बनी, पर नाम की। सरपंची जिगरसिंह की हवेली में ही रही। उपन्यास में एक बानगी है —
‘स्वाधीनता दिवस या गणतन्त्र दिवस पर शाला प्रांगण में झंडारोहण का ग्राम स्तरीय आयोजन होता। गाँव की सरपंच मीनादेवी नए कपड़ों में मंच पर खड़ी जरूर हो जाती, पर झंडे की डोर छूने की हिम्मत नहीं होती। जिगरसिंह डोर खींचता और झंडा लहराने लगता। जिगरसिंह की कनखी उठती, वह चबूतरे से नीचे उतर कर दर्शकों में बैठ जाती। भीगी बिल्ली जैसे। सरपंच की हैसियत से मुख्य अतिथि के रूप में जिगरसिंह मंच पर बैठता। जिला प्रमुख, मुख्य कार्यकारी अधिकारी अथवा विकास अधिकारी के दफ्तर का काम पड़ता, जिगरसिंह कीलपुर सरपंच की हैसियत से मौजूदा होता। मीनादेवी को उस वक्त साथ ले जाया जाता, जब उसकी मौजूदगी और दस्तखत साँस जितने अनिवार्य होते। आवश्यक कागजों पर साइन करने के बाद वह चुपचाप बाहर आ बैठती थी।’ (पृष्ठ 9)
इस बार सरपंच की सीट अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित थी।यह जिगरसिंह के लिए और भी बड़ी फांस बन गई थी। जिगरसिंह को खबर मिली कि धनराज बलाई की बेटी लाजोदेवी सरपंच की उम्मीदवार है। जिगरसिंह को अपने प्राण सूखते महसूस हुए। उसने हवेली के नौकर सबल से पूछा, ‘वही लड़की है न, जिसका पति आतंकियों से लड़ते मरा ?’
‘हाँ, हुकुम। देस पे सहीद हो गयो।’
उसके मन में खार उतर आई—‘शहीद हुआ! अरे मर गया। चमार मरता है, शहीद नहीं होता। मैंने तो उसकी प्रतिमा गाँव के किसी चौराहे पर नहीं लगने दी। रखी होगी, उसी के घर, ओने-कोने।’ (पृष्ठ 25)
दलितों के प्रति इतनी घृणा रखने वाला जिगरसिंह धनराज बलाई से बात करके उसकी बेटी को हवेली की ओर से उम्मीदवार बनना भी चाहता है। वह धनराज को हवेली बुलाने के लिए सबल से कहता है। संयोग से सड़क से गुजरते हुए धनराज पर सबल की नजर पड़ जाती है। वह आवाज देकर उसे हवेली में बुला लेता है। उपन्यास में इस अवसर का दृश्य इस प्रकार है—
‘धनराज खुर्रे पर चढ़ा और अपने डेढ़ हाथ जोड़ता जिगरसिंह के सम्मुख आ खड़ा हुआ। डेढ़ हाथ। चार साल पहले अनाज निकालने वाली मशीन में उसका कलाई तक आधा हाथ कट गया था। खुद का दर्प सहेजते हुए जिगरसिंह ने कहा—‘धनराज बैठ।’
‘धनराज ने इधर-उधर देखा। उसे न खाली कुर्सी दिखाई दी, न मूढ़ा पड़ा नजर आया। जात्याभिमान उसे नीचे बैठाने को आमादा था। स्वाभिमान अपने बूते डटा था। जात्याभिमानी की ‘मैं’ छोटी जाति के आदमी का जमीन पर बैठना शास्त्रोक्त है। जमीन पर बैठा आदमी न मुँहजोरी कर पाता है, न आँख से आँख मिला कर बात कर सकता है। पालतू की भाँति नीचे की ओर देखता ‘जी-जी’ किए जाता है।
‘लाजो के सरपंच पद के लिए खड़े होने की तुमुल घोषणा के बाद धनराज जज़्बाती हुआ जाता था। खड़े-खड़े इंतज़ार करने के पश्चात उसके पैर लौट पड़ने को हुए।
‘रुक।’ जिगरसिंह ने सबल की ओर निगाह की—‘मूढ़ा उठा ला भीतर से।’ उसकी मजबूरी मैल थी। मैल, दोमुँहापन। गरज अपनी है, मूढ़े पर बैठाना होगा।
सबल ने एक मूढ़ा उठाया और धनराज के सामने लाकर रख दिया—‘बैठो।’
‘जिगरसिंह ने विवशता का घूँट गटकते हुए कहा—‘लड़की चुनाव लड़ रही है सरपंच का ? मैंने तो तुम्हें इसलिए याद किया, लड़की पढ़ी-लिखी है। हवेली की ओर से चुनाव में खड़ा कर देते हैं उसे, यह तो तुम भी खूब जानते हो कि हवेली का उम्मीदवार हारा नहीं, आजतक।’
‘धनराज उसकी तिकड़म ताड़ गया। वह लपक कर उठ खड़ा हुआ और दायाँ हाथ हिला कर तपाक से बोला—‘ना साब, ना। गाम का बिसबास को गलो ना दबाऊँगो मैं। अपने दम पे चुनाव लड़ागां। हारां चाहे जीतां।’ और यह कह कर वह सहज मन चला आया था।
‘जिगरसिंह की आक्रोश और हिकारत भरी दृष्टि मूढ़े पर रह गई। सबल की ओर गर्दन घुमा कर ताकीद की—‘इस मूढ़े को उठा कर दूसरी ओर रख आ। प्रभु मेहतर उठा ले जायेगा। हाँ, हाथ जरूर धो लेना, साबुन से।’ (पृष्ठ 27-29)
धनराज से मात खाने के बाद, जिगरसिंह का ध्यान हवेली के मेहतर प्रभुलाल वाल्मीकि की बहू फूलकुमारी की ओर गया। उसने प्रभुलाल से बात की। पर प्रभुलाल ने बोल दिया कि वह खुद ही बहू को समझा कर विश्वास में ले लें। इसके लिए जिगरसिंह को प्रभुलाल के घर जाना पड़ता है। मरता क्या नहीं करता। वह सबल को लेकर मेहतरों की बस्ती की ओर निकलता है। रास्ते में बलाइयों और यादवों के पक्के और भव्य मकानों को देख कर उसे आश्चर्य होता है। ऐसे ही शानदार मकान मेहतरों के थे। प्रभुलाल वाल्मीकि का तीन मंजिला मकान देख कर वह अवाक रह जाता है। उसके मन में विचार चलता है—‘कहाँ गई वह जन्मजात दरिद्रता ? कहाँ गए दड़बानुमा घर ? कहाँ गए सूअरखूड़ी ? कहाँ गई, उठती बास-बू ? कर्मों के फल वाला शास्त्रोक्त सूक्त निराधार है।’ लेखक ने यहाँ ठीक ही उस सवर्ण मानसिकता को दर्शाया है, जो दलित जातियों को दीनहीन अवस्था में कच्चे घरों में ही देखने की आदी हो चुकी है।
प्रभुलाल की बहू फूलकुमारी तीसरी मंजिल पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रही थी। जिगरसिंह उसके सामने उसे हवेली की ओर से सरपंच का चुनाव लड़ाने का प्रस्ताव रखता है। फूलकुमारी अंग्रेजी में पूछती है—‘व्हाट मीन्स ऑफ़ हवेली?’ जिगरसिंह को झटका लगता है। वह उसे समझाने की कोशिश करता है, पर फूलकुमारी की समझ में कुछ नहीं आता है। फूलकुमारी यह कह कर उसके प्रस्ताव को ठुकरा देती है कि उसे पॉलिटिक्स में कोई इंटरेस्ट नहीं है। यहाँ एक दिलचस्प घटना होती है। प्रभुलाल मूढ़े को उठा कर लाता है और जिगरसिंह से मनुहार करता है—‘साब बिराजो।’ जिगरसिंह की आँखों से चिंगारियाँ निकलने लगीं। उसने आँखें निकाल कर मन ही मन कहा—‘बेवक़ूफ़ मेहतर, धनराज बलाई की छूत तुझे दी, तू उसी पर मुझे बैठाना चाहता है।’
दुनिया जिगरसिंह से बेखबर थी, और जिगरसिंह दुनिया से बेखबर था। गाँव में उसके खिलाफ विरोध पैदा हो गया था। धनराज बलाई और फूलकुमारी की ‘ना’ सुनकर उसकी परेशानी बढ़ गई थी। उसे कोई मनवांछित एससी महिला उम्मीदवार नहीं मिल रही थी, जिसे वह हवेली की ओर से चुनाव लड़ाता। जिगरसिंह की पत्नी शीतलदेवी उसकी परेशानी को समझते हुए जिगरसिंह से कहती है कि ‘इसमें क्लेश जैसी क्या बात है ? वंचितों को भी सत्ता-सुख भोगने दो। वे भी लोकतंत्र के मायने समझें।’ पर जिगरसिंह इस मिट्टी का कहाँ था, जो वंचितों की सत्ता को स्वीकार करता। उसके लिए राजनीति और सत्ता मछली के लिए जल और किसान के लिए खेत जैसी थी। वह सत्ता के बिना नहीं रह सकता था। तब शीतलदेवी उसे अपनी बहू को चुनाव लड़ाने का सुझाव देती है।
यह बहू नटनी रज्जो है, जो एक बार अपने पिता के साथ रस्सी पर चलने का तमाशा दिखाने के लिए कीलपुर गाँव आई थी। रस्सी पर चलते हुए संतुलन बिगड़ जाने से वह बांस सहित नीचे गिर गई थी। पैर में मोच आ गई थी। जिगरसिंह का छोटा बेटा शमशेर सिंह तमाशा देख रहा था। वह रज्जो की सुन्दरता पर मोहित हो गया। वह दौड़ कर अपने घर से मरहम की डिबिया ले आया, और उसे लगाने की कोशिश करने लगा, पर रज्जो ने उसके मन को ताड़ कर खुद ही उसके हाथ से मरहम लेकर लगा लिया था। परन्तु शमशेर सिंह रज्जो के प्रेम में इस कदर पागल हो गया था कि वह अपना घर छोड़ कर उसके डेरे जाकर रज्जो और उसके पिता दोनों को शहर ले जाता है। फिर उसने उससे विवाह कर लिया था। उसने रज्जो को पढ़ाया-लिखाया। उसके प्रयास से उसने हाईस्कूल, इंटर, बीए करने के बाद पोलिटिकल साइंस में एमए कर लिया था। शमशेर सिंह ने रज्जो का नाम भी बदल कर रीता सिंह कर दिया था। कहीं फार्म भरने के लिए उसने रीतासिंह का अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र, राशनकार्ड और गाँव की वोटर लिस्ट में नाम भी लिखवा दिया था। उपन्यास रेखांकित करता है कि अगर अपर कास्ट संवेदनशील हो, तो निस्संदेह एक खूबसूरत समाज बन सकता है।
शमशेर सिंह एक कम्पनी में प्रबंध निदेशक है। अपनी पुश्तैनी हवेली छोड़ कर शहर में शानदार बंगले में रहता है। रज्जो से उसके दो बच्चे हैं—एक बेटा और एक बेटी। जिगरसिंह याद करता है, जब शमशेर सिंह विवाह के बाद अपनी पत्नी को लेकर उसका आशीर्वाद लेने के लिए हवेली में आया था, तो उसका हाथ सीधे बन्दूक पर गया था। लेकिन वे दोनों जान बचाकर भाग गए थे। इससे पूर्व भी जिगरसिंह एक रात नटनी के डेरे में जाकर आग लगा आया था। संयोग से उस वक्त डेरे में कोई नहीं था।
शीतलदेवी ने जिगरसिंह की समस्या हल कर दी थी। जिस नटनी को जात्याभिमानी जिगरसिंह फूटी आँख नहीं देखना चाहता था, उसी को अब वह सरपंच के रूप में हवेली की आन बनाने को तैयार हो गया था। वह रज्जो की सहमति लेने और उसे बुलाने के लिए अपने बेटे शमशेर सिंह के घर जाता है और शमशेर सिंह के सामने रज्जो को सरपंच बनाने का प्रस्ताव रखता है। शमशेर सिंह रीता से बात करता है। वह सरपंच का चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो जाती है, पर अपनी शंका भी व्यक्त करती है कि अगर वह जीत भी गई, तो सरपंची तो वे ही करेंगे। तब शमशेर सिंह उससे कहता है—‘रीता, राजनीति में सवा सेर होना होता है। बाज भी बनना पड़ता है। मरी मछलियाँ ही पानी के बहाव के साथ बहा करती हैं। जिन्दा मछलियाँ लहरों को लाँघती अपना हौसला दिखाती हैं।’ रीता सिंह को सूत्र मिल जाता है। उसमें राजनीतिक महत्वाकाँक्षा जाग जाती है। वह सोचने लगी कि अगर गाँव की सत्ता उसके हाथ में आ जाएगी, तो वह पंचायत भवन में बैठ कर ग्रामीणों की समस्याएँ सुना करेगी।’(पृष्ठ 89)
जिगरसिंह ने रीता सिंह का परचा दाखिल करवाया। उसके बाद उसे वापस शहर भेज दिया। जिगरसिंह के आदमी ही रीता सिंह का प्रचार करते रहे। जिगरसिंह एक अख़बार के पत्रकार को घी की पीपी देकर यह झूठी खबर छपवा देता है कि रीता सिंह ने रथ पर बैठकर प्रचार किया, और वाल्मीकि बस्ती में उसका भारी स्वागत हुआ। गाँव के लोगों में इस पर चर्चा होने लगी कि कहाँ रथ घूमा ? किसने देखा रथ ? कौन बैठा था रथ में ? खबर झूठी है। जिगरसिंह को इस खबर का दुष्प्रभाव होता महसूस हुआ। वह तुरंत शमशेर सिंह को फोन करके रीता सिंह को गाँव बुला लेता है। जिगरसिंह खबर को सच बनाने के लिए रथ का प्रबंध करता है। रीता सिंह रथ में बैठती है। जिगरसिंह साथ चलता है, पैदल-पैदल। गाँव के लोगों ने देखा। शीतलदेवी ने छत से देखकर ऊपर की ओर हाथ जोड़े—‘कुदरत तेरी माया, कभी धूप कभी छाया। एक समय ज़मीन पर बिछी इसकी चादर पर रुपया, दो रुपया डाल दिया करती थी मैं। आज हवेली की बहू है, और सरपंच का चुनाव लड़ रही है।’
रथ गाँव में घूमता हुआ वाल्मीकि चौपाल पर पहुँचता है। प्रभु मेहतर की अध्यक्षता में कार्यक्रम होता है। पहले जिगरसिंह का भाषण हुआ—‘भाइयो और बहनो! हवेली न जातपांत में विश्वास करती है और न छुआछूत मानती है। हमने नट जाति की लड़की को हवेली की बहू स्वीकार किया। न सिर्फ बहू स्वीकार किया, बल्कि हवेली की ओर से सरपंच के पद के लिए भी उतार दिया।’ मंच पर बैठी रीता सिंह ने मन में कहा, ‘बिना पेंदे का लोटा।’ उसी वक्त प्रभु मेहतर की बहू फूलकुमारी ट्रे में पानी के गिलास लेकर आई। उसने एक गिलास जिगरसिंह की ओर बढ़ाया। उसने गिलास नहीं लिया। रीता सिंह उसके मन के हेय को ताड़ गई थी।
उसके बाद रीता सिंह ने भाषण दिया। उसने कहा—‘जैसा मेरे ससुर जी ने बताया कि मैं हवेली की बहू हूँ। मैं हवेली की ही नहीं, कीलपुर गाँव की बहू हूँ। पंचायत भवन गाँव के लोकतंत्र का आशियाना है। वह ग्राम सचिवालय के रूप में संचालित होगा। भवन पर झंडा फहराया जायेगा। वहीं से अभाव-अभियोग सुने जायेंगे।’ जिगरसिंह का दिल धड़का—‘अगर बात पर कायम रही, तो लेने के देने पड़ जायेंगे।’ रीता सिंह ने आगे कहा—‘आप बखूबी जानते हैं कि मैं नट जैसी छोटी जाति से आती हूँ। जंगलों में पड़े डेरों में रही हूँ। मेरी काया में गरीबी के कांटे भीष्म पितामह के शरीर में धंसे बाणों की भांति चुभे हैं। गाँव का एक भी आदमी ऐसा कष्ट न उठाए। मैं विश्वास दिलाती हूँ कि गाँव के प्रत्येक व्यक्ति की अस्मिता और हर महिला की निजता की सुरक्षा होगी। एक भी घर ऐसा नहीं होगा, जिसमें शौचालय नहीं हो। मैं आत्मबल और जज्बे के साथ रस्सी पर चढ़ी हूँ। उसी यकीन और हौसले के साथ मेरा हर कदम गाँव की उन्नति की ओर होगा।’
रीता सिंह का भाषण सुन कर, जहाँ गाँव वालों ने तालियाँ बजाईं, जिगरसिंह की साँसें ऊपर-नीचे हो रही थीं। वह सोच रहा था कि अगर यह सरपंच बन गई, और अपनी जुबान पर रही, तो उसका जीवन मरण हो जायेगा।
भाषण खत्म होने के बाद पत्रकारों ने रीता सिंह से सवाल किए, जिनके उसने प्रभावशाली जवाब दिए। एक पत्रकार ने पूछा—‘गाँव के दामाद निर्भय सिंह कश्मीर में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हुआ था। उसकी प्रतिमा भी बनकर आ गई थी। पर वह हठधर्मिता के कारण गाँव के चौराहे पर नहीं लग पा रही है।’ रीता सिंह ने उत्तर देते हुए कहा—‘यह बात मैंने सुनी थी कि ग्राम पंचायत ने शहीद निर्भय सिंह की प्रतिमा महज इस कारण नहीं लगने दी कि वह बलाई जाति से थे। देश के लिए मरने वाले की न कोई जाति होती है और न कोई धर्म होता है। अगर मैं चुनाव जीत गई, तो सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर दस दिन में शहीद निर्भय सिंह की प्रतिमा पंचायत भवन के सामने चौराहे पर लगेगी।’ गाँव के लोगों की तालियाँ बजीं, पर जिगरसिंह के भीतर लपटें निकलीं—‘कतई बगावती हुई जाती है, नटनी।’
जिगरसिंह ने हवेली के पीछे वोट पाने के मकसद से शराबियों के लिए शराब का बन्दोबस्त किया हुआ था। वहाँ दिनभर शराबी शराब पीते, उल्टियाँ करते, वहीं पड़े रहते थे। बदबू और शराबियों की गाली-गलौज की आवाजें रीता सिंह के कमरे तक आ रही थीं। शीतलदेवी भी उन शराबियों से परेशान थी। रीता सिंह को बर्दाश्त नहीं हुआ, तो वह बैग से रस्सी निकाल कर उसका कोड़ा बनाकर बाहर जाकर उन शराबियों पर पिल पड़ी। मार खाकर जहाँ सारे शराबी भागे, वहाँ शराब देने वाले लोग भी पेटियाँ उठाकर भाग खड़े हुए। शीतलदेवी बहुत खुश हुई। पर जिगरसिंह ने सिर पकड़ लिया। मीनादेवी ने कहा— ‘इससे वोट कटेगा।’ रीता सिंह ने जवाब दिया—‘मैं जीतूँ चाहे हारूँ, मुझे शराबियों के वोट नहीं चाहिए।’ एक पत्रकार यह सब देख रहा था। उसने इसे रीता सिंह के चुनाव-प्रचार के खबर की सुर्खी बना दिया। इस घटना ने गाँव की महिलाओं पर अच्छा असर डाला। उसकी स्थिति और भी मजबूत हो गई।
हवेली के सामने एक ब्राह्मण बुढ़िया का परिवार रहता था, जो जिगरसिंह के जुल्म से शहर पलायन कर गया था। वह परिवार वोट डालने के ख़ास मकसद से गाँव आया हुआ था। वह ख़ास मकसद था हवेली को शिकस्त दिलाना। अगले दिन रीता सिंह मीनादेवी को लेकर डोर-टू-डोर प्रचार के लिए निकलती है, तो सबसे पहले वह उसी ब्राह्मण बुढ़िया के पैर छूकर उसका आशीर्वाद लेती है। बुढ़िया बोली—‘तू चुनाव जीत जा बेटी, हम फिर गाँव आ बसे।’
गाँव में रीता सिंह के घर-घर जाकर प्रचार करने से गाँव वालों पर अच्छा प्रभाव पड़ा। परिणामत: वह सरपंच का चुनाव जीत गई। जिगरसिंह वार्ड नम्बर तीन से पंच के लिए खड़ा था। उसे सिर्फ तीन वोट मिले। वह अपनी करारी हार पर बिलख उठा। रीता सिंह जीत का प्रमाणपत्र लेकर हवेली नहीं गई, पंचायत भवन गई। वह पशुओं का बाड़ा बना होने से गंधा रहा था। दीवारों का प्लास्टर गिर गया था। उसमें उल्लुओं और चमगादड़ों का वास था। रीता सिंह ने चौकीदार को रुपये देकर उसकी साफ़-सफाई कराने और रंगरोगन करवाने की हिदायत दी। हवेली की बहू रीता सिंह का विजयी होकर ग्राम पंचायत भवन की ओर प्रस्थान करना हवेली के खिलाफ कदम था। रीता सिंह ने चार्ज लेने के बाद अपने सभी वायदे निभाए। पंचायत भवन के सामने चौराहे पर शहीद निर्भय सिंह की प्रतिमा स्थापित करवाई। पंचायत भवन का फर्नीचर जो हवेली में था, रीता सिंह ने अधिकारियों और पुलिस के माध्यम से उसे भी वापस मंगाया। जिगरसिंह के खिलाफ ग्राम सचिव ने ही एफआईआर लिखवाई। कैशबुक और अन्य अभिलेख भी हवेली में थे, वे सब मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने कब्जे में ले लिए। उनकी जांच कराई गई, जिनमें तमाम अनियमित्ताएं थीं। जिगरसिंह की सत्ता को उसकी बहू ने ही, जिसे वह नीच जाति की कहकर छूत मानता था, ध्वस्त कर दी थी। हवेली का खौफ खत्म हो गया था। बुढ़िया का परिवार गाँव में फिर से बस गया था। जिगरसिंह को पक्षाघात हो गया था। वह अब न जिन्दे में था, न मरे में।
रत्नकुमार सांभरिया पहले दलित उपन्यासकार हैं, जिन्होंने समाज में हाशिए पर ढकेल दिए गए एक ऐसे समुदाय को अपनी कहानी के केंद्र में रखा है, जो अब तक दलित-विमर्श में चर्चा से बाहर रहा है। यह उपेक्षित समुदाय नट या नटनी जाति का है, जो जनता के बीच रस्सी पर चल कर तमाशा दिखा कर लोगों से रुपया दो रुपया प्राप्त करके अपनी रोजीरोटी कमाता है। ये खानाबदोश जीवन जीते हैं। सरकारों ने भी इनके पुनर्वास पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया। जब जीवन ही खानाबदोश है, तो जमीन-जायदाद और पढ़ाई-लिखाई भी नहीं। इस समुदाय के दर्द को महसूस करना तो अलग, उसकी कला की भी कद्र नहीं की गई।
उपन्यास में एक अंतर्कथा चलती है। जब जिगरसिंह के साथ रज्जो यानी रीता सिंह सरपंची का परचा दाखिल करने के लिए कीलपुर गाँव जा रही होती है, तो रास्ते में पड़ने वाली एक ही नाभिनाल जैसे दो पहाड़ों के बीच से कल-कल बहती रुपारेल नदी ने उसका ध्यान खींच लिया था। उसे दादा झूंपा द्वारा सुनाई कहानी याद आ गई थी। एक राजा था, उसने घोषणा करवाई, जो इन दो पहाड़ों की चोटियों से बंधी रस्सी पर, इस पहाड़ से उस पहाड़ चलकर अपना हुनर दिखाए, वह आधा राजपाट पायेगा। यह काम कोई नटनी ही कर सकती है, वजीर ने कहा था। ढिंढोरा पिटवाया गया। आधा राजपाट आधा राजमहल मिलेगा, यह सपना लेकर एक नटनी रूपा इस साहस के लिए तैयार हो गई थी। सौ हाथ ऊपर बंधी रस्सी, सौ हाथ नीचे बहती नदी, दोनों हाथों में थमे लम्बे बाँस से अपना संतुलन बनाए रस्सी पर पग-पग चलती नटनी निर्बाध अपने लक्ष्य की ओर बढ़ी जाती थी। दूसरे पहाड़ की चोटी से महज चार कदम दूर थी नटनी, कि राजा धोखा कर गया। उसने सेनापति को बर्बर संकेत दिया। सेनापति की तलवार बेरहमी से खूँटी से बंधी रस्सी पर पड़ी। हाथ में बाँस लिए रूपा अपनी काया और सपने समेत नदी में समा गई थी। उपन्यासकार ने लिखा है, ‘राजा कई कलाओं का ज्ञाता होता है। उसमें एक कला दगा भी है।’ वह नदी रूपा के नाम से ही विख्यात हो गई।
रत्नकुमार सांभरिया ने ‘नटनी’ उपन्यास में आज के बदलते समाज को चित्रित किया है। इसमें सामन्ती जीवन-मूल्यों और नए सामाजिक विचारों के बीच टकराहट है, जिसमें सामन्तवादी मूल्यों और अहम को टूटता हुआ दिखाया गया है। इसमें कीलपुर गाँव के माध्यम से गाँवों की बदलती हुई तस्वीर दिखाई गई है, जहाँ दलित उस दीनहीन अवस्था में नहीं हैं, जैसा कि अक्सर मुख्यधारा की कहानियों में दिखाया जाता है। कीलपुर में दलित जातियों की बस्तियाँ कच्चे घरों की नहीं हैं, बल्कि उनके मार्बल के फर्श वाले दुमंजिले-तिमंजले शानदार मकान हैं। वे अशिक्षित नहीं हैं, शिक्षित हैं। बलाई जाति की लाजोदेवी भी पढ़ी लिखी है और मेहतर समाज की बेटी फूलकुमारी फर्राटे की अंग्रेजी बोलती है। सभी वर्गों के लोगों में आत्मसम्मान, स्वाभिमान और समानता की लोकतान्त्रिक भावना है।
इस उपन्यास के नारी पात्रों में जो परस्पर प्रेम और संवेदनशीलता मिलती है, वह उल्लेखनीय है। कुम्हार जाति की मीनादेवी, नटनी रीतासिंह, बलाई समुदाय की लाजोदेवी और मेहतर जाति की फूलकुमारी में एक बहनापा सा है, जो आज के जातिवादी हिन्दू समाज में असम्भव लगता है। जिगरसिंह जैसे जात्याभिमानी की पत्नी शीतलदेवी तक विपरीत स्वभाव की है। उसमें नटनी के प्रति भी समानता का भाव है और वह निम्न वर्गों के प्रति मानवीय विचार भी रखती है। गाँव में ब्राह्मण बुढ़िया भी बलाई जाति की लाजोदेवी और नटनी रीता सिंह को अपने ही बराबर अपनी चारपाई पर बिठाती है। रत्नकुमार सांभरिया के स्त्री पात्र परिवर्तन में विश्वास करते हैं। गाँव में जातिवाद और अस्पृश्यता सिर्फ जिगरसिंह तक ही सीमित है, शेष समाज में उसका प्रभाव दिखाई नहीं देता है। यह परिवर्तन उपन्यास की विशेषता है।
उपन्यास में सबसे महत्वपूर्व चरित्र शमशेर सिंह का है। उसने नटनी रज्जो के साथ प्रेम विवाह ही नहीं किया, बल्कि उसे उच्च शिक्षा दिला कर और उसे राजनीति में लहरों को चीर कर अपना रास्ता बनाने की दिशा देकर असल मायने में सामाजिक पुनर्निर्माण का काम भी किया। शमशेर सिंह जिगरसिंह का पुत्र है, पर उसकी सोच और वैचारिकी आधुनिक है। अगर भारत में जातिवाद और निम्न वर्गों का दमन अभी बना हुआ है, तो इसलिए कि सवर्ण जातियाँ परिवर्तन नहीं चाहतीं। दलित विमर्श अक्सर इस बात पर जोर देता है कि इस देश की मुख्य समस्या अपर कास्ट है। उसका मानना है कि जब सामाजिक परिवर्तन के लिए अपर कास्ट कटिबद्ध होगी, तो जातिवाद भी खत्म होगा और एक लोकतान्त्रिक मानवीय समाज का निर्माण भी होगा। बाबासाहेब डा. अम्बेडकर ने अपनी महत्त्वपूर्ण कृति ‘जाति का विनाश’ में अंतरजातीय विवाह और भोज को आवश्यक माना है। उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया है कि जातिविहीन हो जाने के बाद ही हिन्दू समाज में ऐसी शक्ति पैदा होने की आशा है, जो एक नए संवेदनशील समाज का निर्माण कर सके। यदि इस सिद्धांत से हम ‘नटनी’ उपन्यास का अवलोकन करें, तो शमशेर सिंह और नटनी के अंतरजातीय विवाह के माध्यम से रत्नकुमार सांभरिया ने हिन्दू समाज में एक जातिविहीन नई शक्ति के सपने को मूर्त रूप दिया है। दलित साहित्य में यह पहला उपन्यास है, जिसमें जात्याभिमानी सामन्ती जिगरसिंह पराजित होता है और परिवर्तनवादी शक्तियों की विजय होती है। समाज का प्राचीन ढांचा टूटता है और नए का निर्माण होता है।