रेखा राजवंशी एक ऐसी रचनाकार हैं, जिनकी सांस्कृतिक चेतना अपनी जड़ों से गहरे तक जुड़ी है, जिनका बहुआयामी व्यक्तित्व किसी परिचय का मोहताज नहीं। हाल ही में उनका लघुकथा संग्रह ‘त्रिशंकु’ प्रकाशित हुआ है। चूंकि रेखा पिछले 25 वर्षों से आस्ट्रेलिया में रहती हैं, इसलिए वहाँ बसे भारतीयों से उनका संपर्क और उनके जीवन-अनुभवों का क्षेत्र बहुत व्यापक है।
त्रिशंकु में कुल 80 लघुकथाएं संकलित हैं, जिनमें भारतीयों के आदर्श, मूल्य, संस्कार, उनकी सामाजिक परिवेशगत समस्याएं आदि का चित्रण बहुत ही सजीव और संक्षिप्त रूप में किया गया है। मुझे सबसे बड़ी विशेषता तथा रोचकता भी इस बात में लगी कि अधिकांश कथाओं में कोरी कल्पना नहीं, अपितु उनका आधार अनुभवों का खुरदुरा धरातल है जो सीधे दिलों-दिमाग को छू लेता है।
विषयों की विविधता मनुष्यता के उत्कर्ष और पतन के अनेक रंग दिखलाती है। ज़मीन पर कब्ज़ा, उत्सव, एक और विराधाभास, बेघर, सोच आदि कथाएं एतिहासिक परिदृश्य पर आधारित है। पियानो की धुन, छोटे की माँ जैसी कथाएं अकेलेपन और टूटते परिवारों की गाथा है जो वर्तमान की एक महत्वपूर्ण समस्या है।
समाज का सबसे प्रमुख घटक परिवार होता है। पारिवारिक संबंधों की विडंबनाएं अंकित करती कहानियाँ है- देवप्रिया का प्रेमी, अपनी दुनिया, प्लेटफ़ॉर्म 26, अनजान रिश्ता आदि। कुछ समय पहले कोविड का आतंक पूरी दुनिया में छाया था। मृत्यु के भय और जीवन-संघर्ष के बीच इंसानियत के कई रूपों को रेखा ने बड़ी मार्मिकता से अभिव्यक्त किया है। इनमें कोविड पॉजिटिव, जय हिन्द, आखिरी इच्छा, कलियुग का रावण, जीजी, अकेली आदि कथाएं लेखिका के स्वभावगत कोमल हृदय का परिचय देती है। वृद्धावस्था की समस्याओं पर केंद्रित कहानियां झुर्रियों वाली दुनिया, किटी पार्टी, कब उठाएगा भगवान, पढ़ते हुए आँखें नम हो जाती हैं।
विदेशों में बसे भारतीयों को जिस बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ता है वह है रंग-भेद। रेखा ने इन अनुभवों को केवल आस्ट्रेलिया की पृष्ठभूमि से नहीं चुना इनमें भारत, चीन, श्रीलंका आदि देशों के गोरे चरित्रों को बखूबी उकेरा है। इसके साथ ही कुछ कथाएं भाषा, विदेशी परंपराओं और परिवेश से समन्वय, प्रेम-संबंधों तथा संघर्षजनित मूल्यों की तलाश भी करती हैं। एक प्रश्न जरूर मन में उठता है कि कुछ कथाओं में एक ओर मानवीय संबंधों के जिस ठहराव, खालीपन, और अकेलेपन की अनुभूतियाँ पाठकों को गहरे तक बांध तो लेती है पर वहीं दूसरी ओर आदमी की – विशेष रूप से भारतीयों की निरीहता की व्यंजक क्यों बन जाती है ? इसके बावजूद रेखा की कलात्मक संप्रेषणीयता उल्लेखनीय है।
पुस्तक के आरंभ में डॉ बलराम अग्रवाल, डॉ रामनिवास मानव, मंजीत ठाकुर एवं स्वयं रेखा के मनोगत इन लघु कथाओं को उच्चस्तरीय तथा विचारणीय श्रेणी में स्थान दिलाते हैं। निष्कर्षत: ये कहानियाँ अपने कथा-लय में घटनाक्रम को संजीदा करती हैं, पात्रों को उनकी कमजोरियों और शक्तियों से समाहित कर उन्हें नए परिवेश में उगने की दृष्टि देती हैं। कथानक वास्तविकताओं की चौखट पर नए रास्ते और नई दिशाओं के संकेत खोजती हैं। लघु-कथा साहित्य जगत में रेखा की कलम का भविष्य निसंदेह उज्ज्वल है।
डॉ मीनाक्षी जोशी
9, ‘मधुरा’, रामायण नगरी, भंडारा- 441904 महाराष्ट्र