आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘कविता क्या है’ में देशप्रेम की चर्चा करते हुए कहा है कि जो देश को जानते नहीं वे देशप्रेम का दावा कैसे कर सकते हैं। देश को जानना देश के भूगोल को- नदियों, पहाड़ों, पठारों, वनस्पतियों को जानना है। इस जानने में देश के विभिन्न भागों के लोगों, उनकी संस्कृतियों, उनके दुखों, दुख से उबरने के उनके प्रयासों के बारे में आत्मानुभूति की तरह जानना भी है। दलित विमर्श के चर्चित अध्येता डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी की पुस्तक ‘केरल में सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य’ पढ़ते हुए इस निबंध की स्मृति स्वाभाविक है। बजरंग जी दलित साहित्य पर पिछले ढाई दशक से सोचते और लिखते रहे हैं। यह पुस्तक उस श्रम की परिणति है। विश्वसनीय स्रोतों की तलाश और विवेकपूर्ण ढंग से उसका उपयोग बजरंग जी के लेखन की विशेषता है। हिंदी में केरल के सामाजिक आंदोलन और दलित उपस्थिति को समझने के लिए यह श्रम अपेक्षित भी था। यह पुस्तक केरल के अतीत से प्रारंभ होकर उसके वर्तमान तक की श्रमसाध्य यात्रा है। इस शोध का विवेकपूर्ण ढंग से किया गया दायित्व एक उद्देश्य की पूर्णता के लिए किए गए अनवरत शारीरिक और मानसिक श्रम का परिणाम है। बार-बार केरल की खर्चीली लंबी यात्रा, साक्ष्य जुटाना, पुस्तकालयों से किताबों की तलाश ,मलयाली पुस्तकों को साथियों की मदद से समझना और लिखना सहज नहीं था। निःसंदेह प्रांतीय या क्षेत्रीय भाषा का दायरा सीमित होता हैं। पर हिन्दी में लिखे जाने से बहुसंख्यक लोग इसे पढ़ सकते हैं। लेखक का यही उद्देश्य रहा कि देश का व्यापक पाठक-वर्ग वहाँ के दलित शोषण की इंतहा से परिचित हो और यह तभी संभव था जब हिन्दी में यह जानकारी उपलब्ध हो। आज के अधिकांश शिक्षित जन प्रकृति के अकूत सौंदर्य से आपूरित केरल के अतीत की उन जातिगत व दासत्व की सामाजिक जटिलताओं के साथ-साथ स्त्रियों के तिहरे शोषण के त्रास की सच्चाई और उसके सामाजिक इतिहास को समझ सकें, उससे परिचित हो सकें । उस कारण को जन-जन तक पहुँचाने और समझाने के लिये एक ऐसी भाषा अपेक्षित थी जो देश के बहुसंख्यक लोगों द्वारा बोली और पढ़ी जाती रही हो। यह किताब केरल को समग्रता में प्रस्तुत करने की दृष्टि से निश्चय ही सफल मानी जाएगी।
किसी ग़ैर दलित का, दलित आंदोलन और दलित साहित्य के प्रति इतना लगाव और रुचि आश्चर्यजनक भी लग सकता है। लेकिन यह भी सच है कि अपने को समस्त जातिगत भेद से परे रखकर अन्याय के विरुद्ध सबका एक साथ आगे आना निहायत जरूरी है। इसी तरह के प्रयासों से हमारा देश मानवता से परिपूर्ण सभ्य समाज के निर्माण की ओर अग्रसर हो सकता है।
केरल के सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य पर लिखना किसी गल्प,लेख या गद्य की अन्य विधाओं की तरह सहज-सरल नहीं जिसे एकांत में टेबल पर बैठ कर कुछ दिनों में पूरा कर लिया जाए। यह चट्टानों के बीच कुँआ खोदने की तरह श्रमसाध्य कार्य था।केरल जैसे सुदूर प्रांत में वहाँ के सामाजिक आंदोलन के इतिहास को ढूँढना नींव से नगर बसाने जैसा कार्य था। अनवरत असंख्य पुस्तकों में उपलब्ध जानकारियों को अनुवादकों के सहयोग से एकत्र करना, समझना और क्रमबद्धता में उसे लिपिबद्ध करना उतना ही कठिन था जितना दृढ़ संकल्प से समुद्र में गोता लगाकर रत्नों की तलाश करना । इस किताब ने हिन्दी भाषा के कोष को समृद्ध कर केरल के बेहद तकलीफदेह सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य को समझने का अवसर दिया है।
केरल की सामाजिक संरचना का इतिहास इतना सुंदर नहीं, जितना आज हमें दिखाई देता है । इसे समझना ऊँची-नीची पहाड़ियों से चढ़ते- उतरते हुए, हर प्रकार के जंगली पशु-पक्षियों से भरे घने जंगलों में पगडंडी की तलाश करते हुए, जातीय त्रास और दासत्व की भूल-भुलैया में चक्कर खाते हुए, उनकी पीड़ा की खाइयों में डूबने उतरने की तरह है।
यहाँ के जाति व्यवहार की जटिलता देखकर विवेकानन्द ने इसे ‘पागलखाना’ कहा था।
इस किताब को पढ़ते हुए कुछ अनजाने अविश्वसनीय रहस्यों से आपका परिचय होगा । जातिवाद को पढ़ते हुए जाति की रेलमपेल आपको चौंका देगी; जैसे भूल भुलैया जैसी रास्तों की उलझन। यहाँ की छुआछूत ऐसी कि दलित (दास) लोग सड़क पर थूक भी नहीं सकते थे। उन्हें थूकने के लिए पुरवा रखना होता था। यह एक मिट्टी का बर्तन होता है, कुछ कुल्हड़ और कुछ खप्पर जैसा।
केरल में जातिगत हिंसा का स्वरूप क्या था? दलित सिर्फ़ लंगोटी ही पहन सकते थे ,उनका अधोवस्त्र अधिक से अधिक घुटने तक हो सकता था, दलित औरतों को कमर से ऊपर वस्त्र पहनने की छूट नहीं थी। उनकी अपनी जमीन नहीं हो सकती थी। वे छप्पर के अलावा और कोई घर नहीं बना सकते थे। उन्हें मुख्य मार्ग पर चलने की सख्त मनाही थी। सड़क के किनारे चलते हुए वे खास तरह की हाँक लगाते रहते थे जिससे उनके उधर से निकलने की सूचना ऊँची जाति वालों को मिलती रहे। अगर कोई वर्णधारी उस रास्ते से गुजरे तो उन्हें सड़क के किनारे की कँटीली झाड़ियों और कीचड़ में कूद जाना पड़ता था कीचड़ में डूब जाने या कँटीली झाड़ियों से शरीर छिल जाने पर मालिकों का अहम खुश होता था। (पृ. 29 )
यह पढ़कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि जातिगत भेदभाव की हद केरल में कहाँ तक थी । यह एक उदाहरण मात्र है, पर जब हम इस किताब को पढ़ेंगे तो और भी कई प्रसंग ऐसे मिलेंगे जो पाठकों को नि:शब्द कर देंगे ।
केरल रेनेसां और ‘श्री नारायण धर्म प्रतिपालन योगम्’ अध्याय हर तरह के परिवर्तन की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है । श्रीनारायण गुरु जी ने इस दलित उत्थान के लिये जो संघर्ष और परिश्रम किया, वह अवर्णनीय है।सदियों से समाज में बैठी रूढ़ियों और परंपराओं की ऐसी गहरी सामाजिक पैठ जो कुरीतियों के रूप में जन- जीवन को मृत्यु पर्यंत पीड़ित करती हो, जानवरों से भी बदतर जीवन जीने के लिये मजबूर करती हो, उस सोच में दखल देना, परिवर्तन लाने की बात सोचना या उस क्षेत्र में काम करने की प्रतिबद्धता एक साहसिक और क्रांतिकारी कदम है।
हम अपने जीवन में, अपने परिवार में या कुटुंब में स्थापित या बनाए गए सामान्य पारंपरिक नियमों को भी सहजता से नहीं बदल पाते फिर समाज से लड़ना सरल नहीं।
और फिर जहाँ की सारी जातीय व्यवस्था, धर्म और दासत्व के ताने बानों से उलझी पड़ी हो उसे सुलझाना ओखली में सिर देने की तरह था।
केरल नवजागरण के एक नायक अय्यनकाली के बारे में पढ़कर यह समझना आसान होगा कि प्रतिभा या गुणवत्ता कबीर की तरह शिक्षा की मोहताज नहीं। इसका मतलब यह भी नहीं शिक्षा जरूरी ही नहीं पर कुछ लोग समय और परिस्थितियों से सीखते हैं और सफलता ,वर्चस्व और प्रसिद्धि ऐसे ही लोगों के आगे राह बनाती चलती है अकबर की तरह। अय्यनकाली की कर्मठता महाराणा प्रताप के समतुल्य है।
बचपन की एक छोटी सी घटना ने अय्यनकाली के बालमन पर गहरा प्रभाव डाला। फुटबॉल खेलते हुए उनकी गेंद एक सवर्ण की छत पर चली गई जिसके कारण मालिक से तो तिरस्कृत होना ही पड़ा किन्तु माता पिता से भी प्रताड़ना मिली। इसी तिरस्कार और प्रताड़ना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।
अय्यनकाली ने चाणक्य की तरह सामाजिक अन्याय के खिलाफ लड़ने का दृढ़ संकल्प लिया ।
अय्यनकाली ने संगठन क्षमता का परिचय देते हुए अपनी जाति (पुलय)के युवकों को इकट्ठा कर एक टीम बनाई ।इसे ‘अय्यनकाली पद’ (अय्यनकाली की सेना) कहा गया। ऊँची जातियों के हमलों के जवाब में अय्यनकाली सेना ने भी प्रति- आक्रमण करना शुरू किया। हिंसा का बदला हिंसा से लिया जाने लगा । पुलय युवकों को मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण देने के लिए अय्यनकाली ने बाहर से गुरुओं को आमंत्रित किया। (पृ.88)
वे सारे सामाजिक भेद -भाव जो जातीय मर्यादाओं में बाँधकर उन्हें समाज से अलग खड़ा करते थे, उनका विरोध करने का उन्होंने निश्चय किया। उन बंधनों से मुक्त होने के लिये प्रतिबंधों को तोड़ आगे बढ़ने का दृढ़ फैसला लिया ।
अय्यनकाली ने सिर्फ अपनी जाति के लिये ही नहीं अन्य साधुजनों (गरीबों, वंचितों) के लिये भी काम किया। उन्होंने एक संगठन ’साधुजन परिपालन संघम्’ की स्थापना की और इसकी शाखाओं का विस्तार किया।
जब हम चर्च और ईसाई धर्म के बारे में सोचते हैं तो हमें लगता है कि यह धर्म हर जगह एक-सा है। यहाँ कोई भेद नहीं है पर वास्तविकता ऐसी नहीं थी। केरल में अपने जातिगत त्रास और दासत्व के संकट से बचने के लिए लोगों ने ईसाई धर्म अपना तो लिया पर भेदों से फिर भी न बच सके। जातीय आधार का प्रभाव चर्च को भी अपने संक्रमण से अछूता न रख सका। सांस्कृतिक अभ्युत्थान के नायक पोयिकयिल योहन्नान धर्म परिवर्तन पर विश्वास करते थे अतः उन्होंने बाइबिल का अध्ययन किया ; किंतु यहाँ भी वास्तविकता के धरातल पर होने वाले जातिगत भेदभाव ने उन्हें आहत किया। बाइबिल पढ़ने के बाद उन्हें बाइबिल की प्रासंगिकता निरर्थक लगी। उनका मानना था कि ईसाई मत यहूदियों का धर्मसंघ है इसमें पुलयों के लिए कुछ भी नहीं है, अतः उन्होंने बाइबिल को जलाने का आव्हान किया।
एस एन डी पी योगम् के प्रयासों से कुछ जागरूकता के चलते वामपंथी आंदोलनों ने निचली जातियों में लोगों की चेतना को जागृत किया। एक अरसे से उत्पीड़न के दंश की पीड़ा ने उससे मुक्ति की राह तलाशी और वह मार्ग उन्हें कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ने में नजर आया।
कम्युनिस्ट शासन और वामपंथी आंदोलन केरल की चर्चा में अनिवार्य संदर्भ है।
1956 में कम्युनिस्ट सरकार के शासन में आने के बाद कर्मचारियों के लिए न केवल प्रोविडेंट फंड दिया अपितु आवास निर्माण का काम अपने हाथों में लिया। अवकाश की सुविधा को नियमित कर श्रमिक हितों की सुरक्षा के लिए समितियों का गठन किया। वह समय स्वतंत्रता आंदोलन का समय था व केरल की आर्थिक व सामाजिक स्थिति भी तेजी से बदल गई थी। साक्षरता ने मार्क्सवादी विचारों को पुष्ट किया। किन्तु केरल की परिस्थितियाँ अब भी अपने लक्ष्य से दूर थीं ।
सत्य तो यह है कि हिन्दुस्तान की जनता उस समय आजादी की लड़ाई के प्रति आंदोलनों में तत्पर थी किन्तु केरल के दलितों के सम्मुख दोहरी आजादी की लड़ाई थी। अंग्रेजों से भी और अपने ही देश में अपने अस्तित्व को नकारने वाली शक्तियों से लड़ाई ।
केरल के दलित साहित्य को जानने के पूर्व उसकी शैली को जानना आवश्यक है। हम भी इस किताब को पढ़कर ही यह जान पाए कि मलयालम भाषा तमिल एवं संस्कृत से कितनी गहरी जुड़ी है। मलयालम की दो प्रारंभिक शैलियाँ हैं पाट्ट और मणिप्रवाल। पाट्ट में तमिल या द्रविड़ श्रोतों से रचना-विधान, शब्द और छंद लिए जाते हैं । इसमें लोक जीवन के श्रम और उससे जुड़े कथ्य प्रधान होते हैं ।पाट्ट ,गीत या लोक गीत को कहते हैं जबकि मणि प्रवाल संस्कृत की ओर झुकी हुई शैली है। श्रृंगारिक विषय इस शैली में ज्यादा है।
हर दलित जाति के अपने-अपने पाट्ट होते हैं। इन पाट्टगीतों में छुआछूत, श्रमिकों की व्यथा, दलित स्त्रियों पर अत्याचार के साथ ही प्राकृतिक चमत्कारों और घटनाओं की व्याख्या भी मिलती है। दलितों का अतीत जिन स्थितियों में बीता ,वही जीवन ,चिंतन और प्रतिरोध इनके सृजन का विषय रहा।
1940 से केरल की सामाजिक परिस्थिति में परिवर्तन स्वरूप दो धाराएं आईं। पहली गांधीवाद एवं दूसरी मार्क्सवाद। गांधीवाद में दलित ‘हरिजन’ है और मार्क्सवाद में ‘सर्वहारा’। कवि-तिलक पंडित करुप्पन को मलयालम का पहला दलित कवि कहा जाता हैं। इनके द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 26 है। ध्रुव चरितम् ,सौदामिनी, पंचवटी ,बालकलेशम् और उद्यान विरुन्न उल्लेखनीय हैं।
सुधारवादी दौर के दूसरे रचनाकारों में मुल्लूर एस. पद्मनाभ मणिक्कर का नाम महत्वपूर्ण है। यह नारायण गुरु के अनुयायी रहे। सामाजिक भेदभाव व जाति -भेद का खंडन इनका विषय रहा ।श्री नारायण गुरु से ही प्रेरित और अद्वैत दर्शन से प्रभावित समतावादी कवियों में एम .पी. अप्पन का नाम भी आता है। इन्होंने प्राकृतिक उपादानों के माध्यम से ऊंच-नीच की मानसिकता का खंडन किया है। संवाद शैली में लिखी कविता में उच्चता के दावे का खंडन बहुत कलात्मक ढंग से किया गया है। संवाद एक राजकुमार और घास की पत्ती के बीच होता है।
विजिला (1981) दलित स्त्री कवियों में चर्चित नाम है। विजिला वाम विचारधारा से जुड़ी रचनाकार हैं। यह दलित स्त्री के अंतर्जगत का सोदेश्य चित्र प्रस्तुत करती हैं। यह चित्र भौतिक असुरक्षा और उससे टकराती इस्पाती बेफिक्री से बना है। उनकी ‘पगडडियों’ नाम की कविता घास काटती हिम्मती महिला उम्माजी से परिचय कराती है। उम्माजी की छींटदार साड़ी और मेहंदी रचे हाथ खतरे का सबब हैं। शिकारी की निगाह इधर घूमी है। पगडंडी पर वही पुराना अंधेरा है। कवयित्री इस अँधेरे को दौड़कर पार करना चाहती है। उसने कभी सपना देखा था कि पगडंडी पर आग लगेगी। विजिला की नजर से वर्ग का सवाल भी ओझल नहीं हुआ। उन्होंने दलित स्त्रियों में भी वर्ग भेद का मुद्दा उठाया। परिवार विजिला की कविताओं का एक केंद्रीय विषय है। उसमें माँ की उपस्थिति बड़ी महत्वपूर्ण है। संबंधों के ताने-बाने में शक्ति और संवेदना के समीकरण माँ से निर्धारित होते हैं। माँ रचनाकार बेटी को कच्ची सामग्री देती है और दृष्टि भी।
युवतर रचनाकारों में प्रवीणा के.पी. (1983) उल्लेखनीय नाम है। प्रवीणा ने अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन विषय में शोध किया है। उनकी कविताएँ वैश्विक संदर्भों का भी संज्ञान लेती हैं। संरचना में विन्यस्त और गतिशील हिंसा, पहचान के क्रम में झलकती जाती है। शब्दों के अर्थ भी उलटते हैं। सज्जनों को देख कर दहशत होती है। देवदूत क्रूरता बरपाते हैं। वास्तविकता का ऐसा प्रकटन सहम कर जा छिपने को बाध्य कर दे। यह स्वाभाविक लगता है लेकिन चेतनशील व्यक्ति अब पलट कर मुठभेड़ करने को तैयार है।
अच्छे लोगों से मैं हमेशा डरी रही हूँ
जब भी मैं सज्जनों को देखती हूँ
मुस्कुराने की कोशिश करती हूँ
या फिर में यह जगह छोड़ देती हूँ
ये फिर भी मुझे ढूंढ़ निकालते हैं
और मेरी तरफ पत्थर उछालते हैं
हम दोनों इसकी वजह नहीं जानते
मैं चलती हूं अपने सत्य के पथ पर
बगल से गुजरते देवदूत मुझे कर देते हैं घायल
और उड़ जाते हैं स्वर्ग की ओर
उनके पंखों पर लगा है खून
और मेरे विचारों में आग।’
रम्या तुरवूर (1984) की रचनाशीलता अपने समकालीनों से भिन्न है। भिन्नता की मुख्य वजह उनकी कविताओं की विशिष्ट अंतर्वस्तु अपनी शैली साथ लिए चलती है। इस लिहाज से रम्या का काव्य मार्ग अपनी संपूर्णता में नवाचारी लगता है। रम्या के यहीं विषाद का एक स्रोत प्रेम है और प्रेम कविताओं में देह की मौजूदगी है। दोनों आपस में जुड़े हुए साथ-साथ चलते हैं। भग्न प्रेम से उपजे विषाद पर कई बार तिक्तता हावी होती है। तब विषाद का आकाशी रंग धुंधला जाता है।
धन्या एम.डी. (1984) चर्चित रचनाकार हैं। उनकी कविताओं की किताब ‘अमिग्दला’ (2014) ने कवियों और आलोचकों का ध्यान आकर्षित किया है। काव्यानुभूति की सघन बनावट और अभिव्यक्ति के अद्भुत मुहावरों के कारण धन्या समकालीन मलयालम कविता में विशिष्ट मुकाम हासिल करने की क्षमता रखती हैं। उनकी कविताओं में यादों का अछोर संसार बसता है। धन्या की कविता चुप्पी की पहचान कराती है। इस चुप्पी में विशाल दुनिया समाई हुई है तो चुप्पी की कल्पना कानों से की जानी है। कान जो सिर्फ सुनते नहीं, देखते भी हैं।
उपरोक्त सभी कवयित्रियों का सृजन मलयालम दलित कविता के उत्तरोत्तर उन्नयन और विस्तार की आश्वस्ति देता है। यह एक ऐसा साहित्यिक सृजन है जिसमें आप क्षेत्र विशेष के सामाजिक आंदोलन ही नहीं बल्कि भौगोलिक व ऐतिहासिक जानकारी से भी समृद्ध होते हैं। एक दुखांत उपन्यास की तरह घटनाएँ आपको विचलित और आक्रोशित करेंगी। दुख शब्द एक होता है। किन्तु सबके अपने-अपने दुखों के अगणित प्रकार और कारणों का वजन कितना और कैसा है, यह जानना महत्त्वपूर्ण है। दो खंडों- सामाजिक आंदोलन और साहित्यिक विकास में नियोजित बजरंग बिहारी की यह किताब वेदना के प्रकारों और कारणों पर प्रकाश डालती है। हम मात्र एक किताब नहीं पढ़ते बल्कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता के अल्पज्ञात पहलू से भी आत्मीयता स्थापित करते हैं। भारतीयता को पुष्ट और प्रखर करने में इस ग्रंथ की महनीय भूमिका का समुचित संज्ञान लिया जाना चाहिए।
आदरणीया नीलिमा करैया जी ने बजरंग बिहारी तिवारी द्वारा लिखित पुस्तक ‘केरल में सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य’ पर विस्तृत समीक्षा लिखी है। इस पुस्तक में केरल राज्य के दलितों की दयनीय स्थिति की पड़ताल की है। वहां की सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक भूमिकाओं पर भी प्रकाश डाला गया है।
केरल में सदियों से दलितों के शोषण के प्रतिकार के रूप में पुलय युवकों (दलित)का संगठित होना दासत्व से मुक्ति का संकेत मात्र नहीं है बल्कि दासता को उखाड़कर फैंकने का संकल्प था। उस समय स्वतंत्रता संग्राम भी चल रहा था। पुलय युवक अंग्रेज और अपनों से दोहरी लड़ाई लड़ रहे थे। उनका उद्देश्य स्पष्ट था। गोरे अंग्रेजों से ही मुक्ति नहीं बल्कि काले अंग्रेजों से भी मुक्ति प्राप्त करनी है।
नीलिमा करैया जी ने पुस्तक के इन बिंदुओं पर गहराई से पड़ताल की है। आपके द्वारा लिखी यह समीक्षा पुस्तक पढ़ने को प्रेरित करती है।
नीलिमा करैया जी समीक्षा के जो बिंदु होते हैं उन पर आपका प्रयास बढ़िया है। आपको बहुत-बहुत बधाई
शुक्रिया सर जी! हमें तो लग रहा था कि कोई भी समीक्षा नहीं पढ़ेगा।आपकी कृपादृष्टि पड़ी। थोड़ी राहत मिली।
पुस्तक सच में पढ़ने लायक है। सामंतवादी सोच सारी सुविधाएं अपने लिए नियत कर स्वयं को भगवान का दूत समझते हैं। क्या अपन सोच सकते हैं कि
*किसी सभ्यता का उत्थान और पतन स्त्रियों की यौनिकता सुनिश्चित करती है*।
क्या ऐसी को प्रथम सम्मान के लायक है जिसे वहाँ तब तालि बांधना कहा जाता था-?
*”बचपन में ही दूल्हे द्वारा लड़कियों के गले में सोने की एक छोटी-सी पत्ती बाँध दी जाती थी।यह लड़की के ‘विवाहित’होने का सबूत था। ब्राह्मण अधिकार संपन्न थे इसलिए वे भी ‘संबंधम्’ के लिए तालि बाँधा करते थे।तालि ब्राह्मण स्त्रियों में नहीं बाँधी जाती थी।इसके लिए सिर्फ नायर स्त्रियाँ ही विहित थीं ‘तालि’ बाँधने के बाद वह स्त्री उनकी पत्नी हो जाती थी; लेकिन उसका औपचारिक पति कोई नायर ही हुआ करता था। एक स्त्री को एक से अधिक ब्राम्हण ‘तालि ‘बाँध सकते थे। यह प्रथा पूरी तरह से ब्राह्मणों के अनुकूल थी। ‘संबंधम्’ से यौनेच्छा की पूर्ति की जाती थी लेकिन उत्पन्न संतान या संतानों का जिम्मा नहीं लिया जाता था। वास्तव में बच्चों पर सिर्फ माँ का अधिकार हुआ करता था; औपचारिक या अनौपचारिक पिता(ओं) का नहीं*
क्या यह ब्राह्मणत्व है?
और जातिगत भेद
क्या कल्पना की जा सकती है कि स्त्रियों को कमर से ऊपर वस्त्र पहनने की मनाही थी।
*” केरल में जातिगत हिंसा का स्वरूप क्या था? दलित लंगोटी ही पहन सकते थे ,उनका अधोवस्त्र अधिक से अधिक घुटने तक हो सकता था, दलित औरतों को कमर से ऊपर वस्त्र पहनने की छूट नहीं थी ,उनकी अपनी जमीन नहीं हो सकती थी, वे छप्पर के अलावा और कोई घर नहीं बना सकते थे ,उन्हें मुख्य मार्ग पर चलने की सख्त मनाही थी, सड़क के किनारे चलते हुए वे खास तरह की हाँक लगाते रहते थे जिससे उनके उधर से निकलने की सूचना ऊँची जाति वालों को मिलती रहे ;अगर कोई वर्णधारी उस रास्ते से गुजरे तो उन्हें सड़क के किनारे की कँटीली झाड़ियों और कीचड़ में कूद जाना पड़ता था कीचड़ में डूब जाने या कँटीली झाड़ियों से शरीर छिल जाने पर मालिकों का अहम खुश होता था।”*
यह पढ़कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं । विश्वास नहीं होता कि यह अपने हिंदुस्तान की गाथा है।
सिर्फ इतना ही नहीं अदालत में भी न्याय की कोई गुंजाइश नहीं थी इन लोगों के लिये।
*”अगर कभी किसी दास को गवाही आदि देने अदालत जाना पड़े, तो वह महकमे द्वारा तय स्थान पर खड़ा होता था। पारंपरिक अदालतों में तब जज और अन्य कर्मचारी सवर्ण हुआ करते थे। न्याय व्यवस्था उन्हें दूषित करने का साहस नहीं कर सकती थी। मर्यादित दूरी पर खड़े पुलयन की आवाज माननीय न्यायाधीश तक मुश्किल से पहुँचती होगी। दोनों के बीच की दूरी पर एक सिपाही खड़ा करके इस समस्या का हल निकाला गया । सिपाही ‘उभय प्रबोधक ‘ संवादी हुआ करता था।”*
व्यवस्थाओं को बनाने वालों ने सारी सुविधाएँ अपने हित में कर ली थीं।
कभी-कभी लगता है कि चुनाव में जातिवाद इतना अधिक मुखर क्यों है लेकिन जब यहां केरल का सामाजिक का आंदोलन पढ़ेंगे तो ऐसा लगता है कि वहाँ से ज्यादा जातिवाद और कहीं भी नहीं।
*”नायरों से नीची जाति वाले को चप्पल, छाता और (खास तरह के )आभूषण पहनने की मनाही थी ; लेकिन जो प्रथा मिशनरियों को बुरी लगी वह थी कमर से ऊपर वस्त्र पहनने पर प्रतिबंध। वक्ष खुले रखने की प्रथा नायर स्त्रियों में थी । नायर स्त्रियाँ वैसे कामचलाऊ कपड़े पहन सकती थीं लेकिन मंदिर के पुजारियों और उच्च वर्णियों के सामने उन्हें अपनी छाती उघाड़नी पड़ती थी । नायर शुद्र थे।”*
जब हमने यह किताब पढ़ी थी तो हम दंग रह गए थे। विश्वास ही नहीं हो रहा था कि अपने भारत देश का एक प्रांत ऐसा भी है, लेकिन शायद यह पूरे दक्षिण भारत की ही कहानी थी बुकर अवॉर्ड में जिस कहानी संग्रह को पुरस्कृतर किया गया उसके बारे में संपादकीय में पढ़कर हमें लगा कि हमें यह समीक्षा यहाँ देनी चाहिये। सिर्फ मुस्लिम स्त्रियों की नहीं बल्कि नीची जाति वाली सभी स्त्रियों की एक सी दशा थी।
बल्कि वहां की मुस्लिम शासक कौन है तू कंपलसरी कर दिया था कि हर घर में बच्चों में से किसी एक को मुसलमान बनाया जाएगा।
शुक्रिया सर जी!समीक्षा को पढ़ने के लिए और भावनाओं को, स्थितियों को समझने के लिये।
। वास्तव में यह पुस्तक शोध का विषय है जो किसी ऐतिहासिक उपन्यास से कम नहीं।
नीलिमा करैया जी, आप जितना डूबकर पढ़ती है उतना डूबकर लिखती भी है। आपने इन प्रसंगों को समीक्षा में विशेष तौर पर उभारा है। इन्हें पढ़कर वितृष्णा होती है। लगता है कि जो बीत गया है उसे न उभारा जाए। फिर सोचता हूं कि ये सब जानना बहुत जरूरी है। क्या पता कोई सिरफिरा फिर से उसी युग में लौटने की जद्दोजहद करने लगे।
इस मामले में मैं अंग्रेजों को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने देश की बहुत सी कुरीतियों को जड़ से खत्म कर दिया। सामाजिक सुधार में उन जैसा दुनिया में कोई नहीं है। इतने साल हम पर शासन किया है तो उन्होंने इसके बदले में दिया भी बहुत है। मेरे ये विचार किसी को ओड लग सकते हैं।
भारतीय समाज की सामाजिक धार्मिक और आर्थिक व्यवस्था ऐसी थी कि हम पर कोई न कोई शासन तो करता ही। अच्छा रहा अंग्रेज बहादुर यहां आ गए और हम पर शासन करने लगे। भारतीय समाज व्यवस्था में एक जाति विशेष को शासन करने का अधिकार था। एक जाति विशेष को धार्मिक आधार पर अन्य लोगों को अछूत घोषित करने का अधिकार था।और ये जातियां बहुत ही दंभी स्वार्थी और आपस में ही लड़ने मरने वाले थे। ऐसी स्थिति में अन्य जातियों की प्रतिभा को आगे आने देने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। आज भी जब देश में कोई समस्या आती है तो इन्हीं के कारण आती है।
जाति व्यवस्था एक तरह का केंसर ही है। अंग्रेजों ने सर्जरी कर दी थी पर एकाध कोशिकाएं अभी भी रह गई हैं। आप इन कोशिकाओं को परिवार वाद के रूप में देख सकती हैं। हमारी मानसिकता भी इस वाद को आगे बढ़ाने में मदद करता है। मेरे हिसाब से जो योग्य है उसी को देश की, समाज की सत्ता को संभालना चाहिए।
शुक्रिया सर जी!
जिसमें थोड़ी भी संवेदनाएँ होती हैं वह प्राणी मात्र के दुख से दुखी होता है। चलने वाले रास्ते में भी देखते हुए चलते हैं कि किसी जंतु पैर न पड़ जाए मंदिर जाते हुए लोग चीटियां पैर न पड़ जाए यह देखते हैं, और वहीं पर कुछ लोग इंसानों के ही साथ इस तरह सलूक करते हैं।
इंसान अपनी सुविधा और अपने आनंद के लिए कितना गिर सकता है! मानवीय करुणा से विरक्त लोगों को हमने इससे भी अधिक क्रूर होते पढ़ा है पर अपने देश में इस तरह की व्यवस्था पर दिल दुखता है।
आपने सच कहा सर जी!
अंग्रेजों ने कई कुप्रथाएँ दूर कीं। पर स्वार्थ सभी पर हावी रहा किसी न किसी रूप में। अगर ऐसा ना होता तो बाइबल को जलाकर चर्च का विरोध ना होता।
धर्म ग्रंथो की सिर्फ पूजा की जाती है उसमें जो लिखा है उसकी और किसी का ध्यान नहीं जाता।
कभी-कभी किसी बात के लिए हमारी सासू माँ भी कहती थीं कि अंग्रेजों का राज ही अच्छा था।
समीक्षा पर संज्ञान लेने के लिए एक बार फिर आपका तहेदिल से धन्यवाद।
विवेकानंद की केरल (उस समय त्रावणकोर) पर की गई टिप्पणी दर्शाती है कि वहाँ की जनता ने किन विषम परिस्थितियों में रहकर सजगता से आत्मसंघर्ष और आंदोलन करते हुए अपना प्रांत परिवर्तित किया है।
समीक्ष्य पुस्तक इसी परिवर्तन को हिंदी पाठकों के सामने लाने का प्रयास करती है।
नीलिमा करैया जी ने समीक्षा लिखकर लेखक का मनोबल मजबूत किया है।
एतदर्थ उन्हें हार्दिक धन्यवाद।
बहुत बहुत आभार आपका अगर आपको ऐसा लगता है तो ।हमने तो सिर्फ सच्चाई को लोगों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।
समस्त सुख सुविधाओं में अपने जीवन को बिताने वाले, जीवन के इस अंधेरे पक्ष की ओर भी देख पाएं ,यह प्रयास सभी को करना चाहिये। यही करने की हमने कोशिश की।
प्रिय नीलिमा जी” सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य” पर बजरंग बिहारी तिवारी जी द्वारा लिखित पुस्तक पर आपकी समीक्षा बहुत ही शानदार ढंग से लिखी गईं है,निश्चित ही यह किताब पाठकों कोपड़ने के लिए प्रेरित करेगी
सर्व प्रथम बजरंग बिहारी जी साधुवाद के महा पात्र हैं जिन्होंने उच्च कुल वर्ग में जन्म लेने बावजूद भी दलितों की दशा स्थिति,उनके शोषण के बारे में संपूर्ण रूप से ,लिखा ओर इस जाती गत शोषण को जो समाज में एक कुष्ठ रोग के समान पल्लवित था ,मानवता के कोई मायने नहीं होते थे ,आपने उसे सबके सामने रखा ,आदि से अंत तक ओर आज तक के तथ्य रखे,,दलितों की खासकर स्त्रियों की स्थिति पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं,यह बात बिल्कुल सत्य हे ,अंग्रेजों ने दलितों को आप i सेवा में रखा हालांकि उनके अपने स्वार्थ थे ,परंतु उन्होंने बहुत हद तक दलितों को इंसान होने का आभास भी करवाया
प्रिय नीलिमा जी अगर अपने बाबा भीमराव अंबेडकर की जीवनी पढ़ी है तो आप जानेंगी की जाती भेद भाव किस चरम पर था
आपको अनंत साधुवाद।
आदरणीया नीलिमा करैया जी ने बजरंग बिहारी तिवारी द्वारा लिखित पुस्तक ‘केरल में सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य’ पर विस्तृत समीक्षा लिखी है। इस पुस्तक में केरल राज्य के दलितों की दयनीय स्थिति की पड़ताल की है। वहां की सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक भूमिकाओं पर भी प्रकाश डाला गया है।
केरल में सदियों से दलितों के शोषण के प्रतिकार के रूप में पुलय युवकों (दलित)का संगठित होना दासत्व से मुक्ति का संकेत मात्र नहीं है बल्कि दासता को उखाड़कर फैंकने का संकल्प था। उस समय स्वतंत्रता संग्राम भी चल रहा था। पुलय युवक अंग्रेज और अपनों से दोहरी लड़ाई लड़ रहे थे। उनका उद्देश्य स्पष्ट था। गोरे अंग्रेजों से ही मुक्ति नहीं बल्कि काले अंग्रेजों से भी मुक्ति प्राप्त करनी है।
नीलिमा करैया जी ने पुस्तक के इन बिंदुओं पर गहराई से पड़ताल की है। आपके द्वारा लिखी यह समीक्षा पुस्तक पढ़ने को प्रेरित करती है।
नीलिमा करैया जी समीक्षा के जो बिंदु होते हैं उन पर आपका प्रयास बढ़िया है। आपको बहुत-बहुत बधाई
शुक्रिया सर जी! हमें तो लग रहा था कि कोई भी समीक्षा नहीं पढ़ेगा।आपकी कृपादृष्टि पड़ी। थोड़ी राहत मिली।
पुस्तक सच में पढ़ने लायक है। सामंतवादी सोच सारी सुविधाएं अपने लिए नियत कर स्वयं को भगवान का दूत समझते हैं। क्या अपन सोच सकते हैं कि
*किसी सभ्यता का उत्थान और पतन स्त्रियों की यौनिकता सुनिश्चित करती है*।
क्या ऐसी को प्रथम सम्मान के लायक है जिसे वहाँ तब तालि बांधना कहा जाता था-?
*”बचपन में ही दूल्हे द्वारा लड़कियों के गले में सोने की एक छोटी-सी पत्ती बाँध दी जाती थी।यह लड़की के ‘विवाहित’होने का सबूत था। ब्राह्मण अधिकार संपन्न थे इसलिए वे भी ‘संबंधम्’ के लिए तालि बाँधा करते थे।तालि ब्राह्मण स्त्रियों में नहीं बाँधी जाती थी।इसके लिए सिर्फ नायर स्त्रियाँ ही विहित थीं ‘तालि’ बाँधने के बाद वह स्त्री उनकी पत्नी हो जाती थी; लेकिन उसका औपचारिक पति कोई नायर ही हुआ करता था। एक स्त्री को एक से अधिक ब्राम्हण ‘तालि ‘बाँध सकते थे। यह प्रथा पूरी तरह से ब्राह्मणों के अनुकूल थी। ‘संबंधम्’ से यौनेच्छा की पूर्ति की जाती थी लेकिन उत्पन्न संतान या संतानों का जिम्मा नहीं लिया जाता था। वास्तव में बच्चों पर सिर्फ माँ का अधिकार हुआ करता था; औपचारिक या अनौपचारिक पिता(ओं) का नहीं*
क्या यह ब्राह्मणत्व है?
और जातिगत भेद
क्या कल्पना की जा सकती है कि स्त्रियों को कमर से ऊपर वस्त्र पहनने की मनाही थी।
*” केरल में जातिगत हिंसा का स्वरूप क्या था? दलित लंगोटी ही पहन सकते थे ,उनका अधोवस्त्र अधिक से अधिक घुटने तक हो सकता था, दलित औरतों को कमर से ऊपर वस्त्र पहनने की छूट नहीं थी ,उनकी अपनी जमीन नहीं हो सकती थी, वे छप्पर के अलावा और कोई घर नहीं बना सकते थे ,उन्हें मुख्य मार्ग पर चलने की सख्त मनाही थी, सड़क के किनारे चलते हुए वे खास तरह की हाँक लगाते रहते थे जिससे उनके उधर से निकलने की सूचना ऊँची जाति वालों को मिलती रहे ;अगर कोई वर्णधारी उस रास्ते से गुजरे तो उन्हें सड़क के किनारे की कँटीली झाड़ियों और कीचड़ में कूद जाना पड़ता था कीचड़ में डूब जाने या कँटीली झाड़ियों से शरीर छिल जाने पर मालिकों का अहम खुश होता था।”*
यह पढ़कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं । विश्वास नहीं होता कि यह अपने हिंदुस्तान की गाथा है।
सिर्फ इतना ही नहीं अदालत में भी न्याय की कोई गुंजाइश नहीं थी इन लोगों के लिये।
*”अगर कभी किसी दास को गवाही आदि देने अदालत जाना पड़े, तो वह महकमे द्वारा तय स्थान पर खड़ा होता था। पारंपरिक अदालतों में तब जज और अन्य कर्मचारी सवर्ण हुआ करते थे। न्याय व्यवस्था उन्हें दूषित करने का साहस नहीं कर सकती थी। मर्यादित दूरी पर खड़े पुलयन की आवाज माननीय न्यायाधीश तक मुश्किल से पहुँचती होगी। दोनों के बीच की दूरी पर एक सिपाही खड़ा करके इस समस्या का हल निकाला गया । सिपाही ‘उभय प्रबोधक ‘ संवादी हुआ करता था।”*
व्यवस्थाओं को बनाने वालों ने सारी सुविधाएँ अपने हित में कर ली थीं।
कभी-कभी लगता है कि चुनाव में जातिवाद इतना अधिक मुखर क्यों है लेकिन जब यहां केरल का सामाजिक का आंदोलन पढ़ेंगे तो ऐसा लगता है कि वहाँ से ज्यादा जातिवाद और कहीं भी नहीं।
*”नायरों से नीची जाति वाले को चप्पल, छाता और (खास तरह के )आभूषण पहनने की मनाही थी ; लेकिन जो प्रथा मिशनरियों को बुरी लगी वह थी कमर से ऊपर वस्त्र पहनने पर प्रतिबंध। वक्ष खुले रखने की प्रथा नायर स्त्रियों में थी । नायर स्त्रियाँ वैसे कामचलाऊ कपड़े पहन सकती थीं लेकिन मंदिर के पुजारियों और उच्च वर्णियों के सामने उन्हें अपनी छाती उघाड़नी पड़ती थी । नायर शुद्र थे।”*
जब हमने यह किताब पढ़ी थी तो हम दंग रह गए थे। विश्वास ही नहीं हो रहा था कि अपने भारत देश का एक प्रांत ऐसा भी है, लेकिन शायद यह पूरे दक्षिण भारत की ही कहानी थी बुकर अवॉर्ड में जिस कहानी संग्रह को पुरस्कृतर किया गया उसके बारे में संपादकीय में पढ़कर हमें लगा कि हमें यह समीक्षा यहाँ देनी चाहिये। सिर्फ मुस्लिम स्त्रियों की नहीं बल्कि नीची जाति वाली सभी स्त्रियों की एक सी दशा थी।
बल्कि वहां की मुस्लिम शासक कौन है तू कंपलसरी कर दिया था कि हर घर में बच्चों में से किसी एक को मुसलमान बनाया जाएगा।
शुक्रिया सर जी!समीक्षा को पढ़ने के लिए और भावनाओं को, स्थितियों को समझने के लिये।
। वास्तव में यह पुस्तक शोध का विषय है जो किसी ऐतिहासिक उपन्यास से कम नहीं।
नीलिमा करैया जी, आप जितना डूबकर पढ़ती है उतना डूबकर लिखती भी है। आपने इन प्रसंगों को समीक्षा में विशेष तौर पर उभारा है। इन्हें पढ़कर वितृष्णा होती है। लगता है कि जो बीत गया है उसे न उभारा जाए। फिर सोचता हूं कि ये सब जानना बहुत जरूरी है। क्या पता कोई सिरफिरा फिर से उसी युग में लौटने की जद्दोजहद करने लगे।
इस मामले में मैं अंग्रेजों को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने देश की बहुत सी कुरीतियों को जड़ से खत्म कर दिया। सामाजिक सुधार में उन जैसा दुनिया में कोई नहीं है। इतने साल हम पर शासन किया है तो उन्होंने इसके बदले में दिया भी बहुत है। मेरे ये विचार किसी को ओड लग सकते हैं।
भारतीय समाज की सामाजिक धार्मिक और आर्थिक व्यवस्था ऐसी थी कि हम पर कोई न कोई शासन तो करता ही। अच्छा रहा अंग्रेज बहादुर यहां आ गए और हम पर शासन करने लगे। भारतीय समाज व्यवस्था में एक जाति विशेष को शासन करने का अधिकार था। एक जाति विशेष को धार्मिक आधार पर अन्य लोगों को अछूत घोषित करने का अधिकार था।और ये जातियां बहुत ही दंभी स्वार्थी और आपस में ही लड़ने मरने वाले थे। ऐसी स्थिति में अन्य जातियों की प्रतिभा को आगे आने देने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। आज भी जब देश में कोई समस्या आती है तो इन्हीं के कारण आती है।
जाति व्यवस्था एक तरह का केंसर ही है। अंग्रेजों ने सर्जरी कर दी थी पर एकाध कोशिकाएं अभी भी रह गई हैं। आप इन कोशिकाओं को परिवार वाद के रूप में देख सकती हैं। हमारी मानसिकता भी इस वाद को आगे बढ़ाने में मदद करता है। मेरे हिसाब से जो योग्य है उसी को देश की, समाज की सत्ता को संभालना चाहिए।
शुक्रिया सर जी!
जिसमें थोड़ी भी संवेदनाएँ होती हैं वह प्राणी मात्र के दुख से दुखी होता है। चलने वाले रास्ते में भी देखते हुए चलते हैं कि किसी जंतु पैर न पड़ जाए मंदिर जाते हुए लोग चीटियां पैर न पड़ जाए यह देखते हैं, और वहीं पर कुछ लोग इंसानों के ही साथ इस तरह सलूक करते हैं।
इंसान अपनी सुविधा और अपने आनंद के लिए कितना गिर सकता है! मानवीय करुणा से विरक्त लोगों को हमने इससे भी अधिक क्रूर होते पढ़ा है पर अपने देश में इस तरह की व्यवस्था पर दिल दुखता है।
आपने सच कहा सर जी!
अंग्रेजों ने कई कुप्रथाएँ दूर कीं। पर स्वार्थ सभी पर हावी रहा किसी न किसी रूप में। अगर ऐसा ना होता तो बाइबल को जलाकर चर्च का विरोध ना होता।
धर्म ग्रंथो की सिर्फ पूजा की जाती है उसमें जो लिखा है उसकी और किसी का ध्यान नहीं जाता।
कभी-कभी किसी बात के लिए हमारी सासू माँ भी कहती थीं कि अंग्रेजों का राज ही अच्छा था।
समीक्षा पर संज्ञान लेने के लिए एक बार फिर आपका तहेदिल से धन्यवाद।
विवेकानंद की केरल (उस समय त्रावणकोर) पर की गई टिप्पणी दर्शाती है कि वहाँ की जनता ने किन विषम परिस्थितियों में रहकर सजगता से आत्मसंघर्ष और आंदोलन करते हुए अपना प्रांत परिवर्तित किया है।
समीक्ष्य पुस्तक इसी परिवर्तन को हिंदी पाठकों के सामने लाने का प्रयास करती है।
नीलिमा करैया जी ने समीक्षा लिखकर लेखक का मनोबल मजबूत किया है।
एतदर्थ उन्हें हार्दिक धन्यवाद।
बहुत बहुत आभार आपका अगर आपको ऐसा लगता है तो ।हमने तो सिर्फ सच्चाई को लोगों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।
समस्त सुख सुविधाओं में अपने जीवन को बिताने वाले, जीवन के इस अंधेरे पक्ष की ओर भी देख पाएं ,यह प्रयास सभी को करना चाहिये। यही करने की हमने कोशिश की।
प्रिय नीलिमा जी” सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य” पर बजरंग बिहारी तिवारी जी द्वारा लिखित पुस्तक पर आपकी समीक्षा बहुत ही शानदार ढंग से लिखी गईं है,निश्चित ही यह किताब पाठकों कोपड़ने के लिए प्रेरित करेगी
सर्व प्रथम बजरंग बिहारी जी साधुवाद के महा पात्र हैं जिन्होंने उच्च कुल वर्ग में जन्म लेने बावजूद भी दलितों की दशा स्थिति,उनके शोषण के बारे में संपूर्ण रूप से ,लिखा ओर इस जाती गत शोषण को जो समाज में एक कुष्ठ रोग के समान पल्लवित था ,मानवता के कोई मायने नहीं होते थे ,आपने उसे सबके सामने रखा ,आदि से अंत तक ओर आज तक के तथ्य रखे,,दलितों की खासकर स्त्रियों की स्थिति पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं,यह बात बिल्कुल सत्य हे ,अंग्रेजों ने दलितों को आप i सेवा में रखा हालांकि उनके अपने स्वार्थ थे ,परंतु उन्होंने बहुत हद तक दलितों को इंसान होने का आभास भी करवाया
प्रिय नीलिमा जी अगर अपने बाबा भीमराव अंबेडकर की जीवनी पढ़ी है तो आप जानेंगी की जाती भेद भाव किस चरम पर था
आपको अनंत साधुवाद।