मधु चतुर्वेदी का उपन्यास “फिर मिलोगी” समकालीन हिंदी साहित्य में उन लोकप्रिय कृतियों में से है, जो मन की परतों को इतने सहज स्पर्श से खोलती हैं कि पाठक कहानी में नहीं, पात्रों की आत्मा में उतरने लगता है। प्रेम, स्मृति, संयोग, बिछोह और आत्मस्वीकृति की यह कथा मौन, ठहराव, और भीतर के संवादों से जीवित होती है।
कहानी की नायिका अपनी भावनाओं की उस दुनिया में रहती है जहाँ प्रेम संयोग भी है और प्रश्न भी ओर संयोग भी। वह कहती है—
“कुछ रिश्ते वक्त से नहीं, दिल में बनी अधूरी जगहों से पैदा होते हैं।”
यह पंक्ति उपन्यास की आत्मा को सटीक रूप में प्रस्तुत करती है। नायिका प्रेम को भोगती भी है और उससे आहत भी होती है, लेकिन उसके भीतर कहीं एक धीमी लौ हमेशा जलती रहती है,उम्मीद की, प्रतीक्षा की, और शायद फिर एक दिनखोजकर मिलने की।लेकिन उस लौ को प्रदीप्त करने जिजीविषा बहुत सुप्त हैंI
उपन्यास का शीर्षक “फिर मिलोगी” केवल एक वादा नहीं, बल्कि एक भावनात्मक ध्वनि है, जो पूरी कथा में गूँजती रहती है,कभी धीरे, कभी तीखी, कभी जीवन को आगे बढ़ाने वाले संबल की तरह। यही स्वर उपन्यास को आत्मदया से दूर और आत्मबोध के निकट लाता है।
मधु चतुर्वेदी का लेखन गद्य और कविता के बीच की उस सुंदर जमीन पर चलता है जहाँ वाक्य सरल होते हैं, पर अर्थ गहरे। कई पंक्तियाँ पाठक को रुक जाने पर मजबूर करती हैं। उदाहरण के लिए—
“यादें कभी पुरानी नहीं होतीं, बस उनकी चुभन तेज़ या धीमी होती रहती है।” यह वाक्य विरह ओर विछोह की संवेदनाओं को बेहद सटीक ढंग से पकड़ता है।
कथानक मेंघटनाओं पर मनोभावों का प्रवाह गहरा है। नायिका का आत्म-संवाद
कथा की दिशा तय करता है। वह अपने भीतर के शोर का सामना करती है, अपने बिखरे हिस्सों को पहचानती है और धीरे-धीरे समझती है कि हर मुलाकात जीवनभर साथ नहीं रहती। इस प्रक्रिया में वह स्वीकार करती है—
“किसी दिन मिलना जरूरी नहीं, किसी दिन समझ आ जाना भी मुलाक़ात ही है।”
उपन्यास की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि प्रेम और विछोह,मित्रता को अतिनाटकीय बनाने के बजाय, लेखक उसे बेहद मनुष्य-सुलभ अनुभव की तरह प्रस्तुत करती हैं। पीड़ा को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाया गया, बल्कि उसके साथ जीने और फिर उससे ऊपर उठने की प्रक्रिया पर अधिक ध्यान है।नायिका कभी-कभीटूटन पर मुस्करा भी देती है, क्योंकि उसे पता है—
“दिल टूटने की आवाज़ बाहर नहीं जाती, पर उसके टुकड़े भीतर नई कहानी लिख देते हैं।”
सहायक पात्रोंकी सहयात्रा संकरी गलियों से साथ साथ है, लेकिन वे कथा के वातावरण को आवश्यक संतुलन देते हैं। रिश्तों में गहराई है, लेकिन कहीं कहीं अनावश्यक विस्तारभी । लेकिन उपन्यास को पठनीय बनाता है।
अंत की ओर कथा एक विशिष्ट परिपक्वता प्राप्त करती है। नायिका भीतर से मजबूत होकर उभरती है।वह अचंभित है तोव्यवहारिक भी I वह अपने अतीत को एक ऐसी कोमलता से देखती है, जिसमें दर्द भी है और कृतज्ञता भी। उपन्यास का अंतिम भाव पाठक के मन में देर तक ठहरता है—
“विदाई हमेशा अंत नहीं होती… कभी-कभी वह आगे बढ़ने के लिए सबसे जरूरी शुरुआत होती है।”
यह अंत न आशावाद का शोर मचाता है, न निराशा का बोझ छोड़ता है। यह बस जीवन जैसा है—अपनी सरल, सच्ची, धड़कती हुई लय में। जीवन चलने का नाम हैं हम उम्मीद के सहारे जीते हैं लेकिन जरूरी नहीं जब उम्मीद पूर्णता को प्राप्त हो बिल्कुल वैसी हो जैसी हमने उम्मीद की थी I उम्मीद मिलने की हैं फिर मिलने की हैं,फिर उम्मीद दुबारा न मिलने की भी हैं I
कुल मिलाकर, “फिर मिलोगी” केवल प्रेम-विरह ओर मित्रता की कहानी नहीं, बल्कि एक स्त्री की उस अंतर्यात्रा की कहानी है, जिसमें वह टूटती भी है और पुनर्जीवित भी होती है। मधु चतुर्वेदी ने मानवीय भावनाओं को अत्यंत सूक्ष्मता और गहराई से चित्रित किया है। यह उपन्यास उन सभी पाठकों के लिए उपहार है जो शब्दों में भावनाएँ नहीं, भावनाओं में जीवन खोजते हैं।
इसके कुछ उद्धरण पाठक के मन में लंबे समय तक गूंजते रहते हैंI
“ज़िंदगी वही है जो बच जाती है….रिश्तों के चले जाने के बाद भी।”
यह उपन्यास पठनीय है I युवा मन और हॉस्टल में गुजारे दिनों की यादों को याद करते दिल इस पुस्तक को बहुत पसंद करेंगे I भाषा में तरलता हैI लेखिका घटनाओं को रोचक तरीके से शब्दों में गूंथना अच्छे से जानती हैं I लेखिका को बहुत बहुत शुभकामनाएं
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उम्मीद की तरह लौटना तुम
कविता संग्रह
पंकजसुबीर
शिवना प्रकाशन
पंकज सुबीर की संवेदनाओं से भरी सधी हुई काव्य-यात्रा हैं Iउनकी नई काव्यकृति “उम्मीद की तरह लौटना तुम” पढ़ते ही मन में सुमित्रानंदन पंत की वे सरल और गहरी पंक्तियाँ याद आती हैं…
“वियोगी होगा पहला कवि / आह से उपजा होगा गान…”
इन पंक्तियों की तरह ही इस संग्रह में भी दर्द, भावनाएँ और जीवन की सच्चाई बहुत सहज ढंग से सामने आती है।
यह पुस्तक केवल कविताओं का संग्रह नहीं है, बल्कि मन की गहराई, रिश्तों की गर्माहट और जीवन की समझ से भरा एक अनुभव है। पंकज जी की कविताएँ उन भावों को छूती हैं जो हर इंसान के जीवन में किसी न किसी मोड़ पर आते हैं…विरह, स्मृति, प्रेम,मित्रता और भविष्य की छोटी-सी पर सच्ची उम्मीद। उनकी कविताओं में यह सब किसी दिखावे या भारीपन के साथ नहीं, बल्कि बहुत शांत और सरल ढंग से व्यक्त होता है।
संग्रह की सबसे मार्मिक कविताएँ वे हैं, जिन्हें कवि ने पिता के जाने के बाद, उस गहरे खालीपन में लिखा है, जिसे शब्दों में पिरोना आसान नहीं होता। लेकिन पंकज जी इन कविताओं में कोई शोर या रोना-धोना नहीं रचते। उनके यहाँ पीड़ा मौन बनकर आती हैI ऐसा मौन, जो दिल को भारी नहीं करता, बल्कि मन को शांत करता है। पिता की कमी को महसूस करते हुए भी कवि एक ऐसी भाषा गढ़ते हैं जो दुख को संभालने में मदद करती है। इन कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि शोक केवल आँसू नहीं, बल्कि अपने भीतर लौटने का एक अवसर भी हो सकता है।
इसी तरह शहरयार और गौतम को समर्पित कविताएँ भी बहुत आत्मीय लगती हैं। इन रचनाओं में कवि अपने प्रियजनों को याद करते हुए बड़े प्यार से उन्हें याद करता है। यहाँ स्मृति बोझ नहीं लगती, बल्कि एक तरह की उष्मा देती है,जैसे कोई अपने किसी बहुत अपने से धीरे-धीरे बात कर रहा हो। इन कविताओं में रिश्तों की सच्चाई और गहराई महसूस होती है, और यह भी कि प्रेम किसी जेंडर मात्र सेनहीं होता और यह समय के साथ खत्म नहीं होता, बल्कि और स्थिर हो जाता है।
पंकज सुबीर की कविताओं में प्रेम का स्वर भी बहुत शांत और परिपक्व है। यहाँ प्रेम कोई ऊँचे-ऊँचे बयान या बड़े शब्दों में नहीं आता। वह छोटी-छोटी बातों में, सरल भावों में और रोज़मर्रा की संवेदनाओं में दिखाई देता है। प्रेम उनके यहाँ एक विश्वास की तरह हैI हौले से टिक जाने वाला, बिना दिखावे का।
इस संग्रह की एक बड़ी खूबी यह है कि इसमें सोच और भावना दोनों का संतुलन दिखाई देता है। उनकी कविता न बहुत भारी लगती है, न बहुत हल्की। वह एक ऐसी जमीन पर खड़ी है जहाँ दिमाग और दिल दोनों अपनी-अपनी जगह बनाए रखते हैं। भाषा बिलकुल सहज हैI जिसे पढ़ने में कोई कठिनाई नहीं होती, लेकिन पढ़ने के बाद भी उसका असर मन पर बना रहता है।
पंकज सुबीर की कविताएँ पाठक को अपने भीतर की दुनिया में झाँकने का मौका देती हैं। यह संग्रह पाठक को बार-बार रुककर सोचने के लिए प्रेरित करता है कि स्मृति क्या होती है, रिश्तों की असली ताकत क्या होती है, प्रेम कैसे समय के साथ बदलता है, और आशा कैसे सबसे कठिन पलों में भी हमारे साथ रहती है।
इसी वजह से “उम्मीद की तरह लौटना तुम” सिर्फ एक काव्य-संग्रह नहीं लगता; यह एक यात्रा बन जाता है,अपने भीतर की यात्रा। हर कविता जैसे आपको हाथ पकड़कर भीतर की किसी नई, शांत जगह तक ले जाती है। इनमें कोई ऊँचे भाव नहीं, कोई नाटकीयता नहीं; बस उतनी ही बातें, जितनी मन धीरे-धीरे सुनना चाहता है।
अंत में, इस संग्रह को पढ़कर यह साफ़ महसूस होता है किमूलतः उपन्यासकार कहानीकार गजलकार पंकज सुबीर ने जीवन के बहुत कठिन पलों को भी आशा और अर्थ में बदल दिया है। उनकी हर कविता दिल में उतरती है और वहीं एक लंबी, गहरी साँस की तरह ठहर जाती है। और फिर उसी साँस से उम्मीद बनकर लौट आती है।
“उम्मीद की तरह लौटना तुम” उन पाठकों के लिए भी है जो कविता कम पढ़ते हैं, और उन लोगों के लिए भी जो कविता की दुनिया में लगातार रहते हैं। दोनों ही इसे पढ़कर अपने मन में कुछ न कुछ नया, शांत और अच्छा महसूस करेंगे।
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प्रेम एक पालतू बिल्ली
कहानी संग्रह
डॉ निधि अग्रवाल
राजकमल प्रकाशन
डॉ निधि अग्रवाल पेशे से एक चिकित्सक हैं लेकिन प्रतीत होता है कि शरीर विज्ञान के साथ- साथ उन्होंने मनोविज्ञान की भी पढ़ाई की है | उनका पहला कहानी संग्रह ‘ अपेक्षाओं के बियाबान’ एक चर्चित संग्रह रहा और उनके कहानी कौशल की हर तरफ चर्चा रही |उसके बाद उनका कविता संग्रह, उपन्यास प्रकाशित हुआ, लेकिन उनकी कहानियां एक अलग ही स्वाद सुगंध और भाषा कौशल लेकर पाठकों के समक्ष आती और कथानक की पथरीली पगडंडियों से गुजरते हुए अनेक बीहड़ पार करते हुए ,रोमांचकारी और मार्मिक संवेदनाओं के समंदर में नौका चलाते हुए, रोलरकोस्टर पर चीखे ,आंसुओं निकालते हुए अंत में एक सुगम सड़क पर उतार देती हैं | पाठक विस्मित होकर देखता ही रह जाता है और यह कथायात्रा उसके मन में अंकित हो जाती है |पाठक फिर अगली यात्रा के ऐसे ही अनुभव लेने के लिए अगली कहानी के पन्ने पलटना शुरू कर देता हैं |
निधि अग्रवाल के नवीनतम कहानी संग्रह ” प्रेम एक पालतू बिल्ली” की कहानियाँ जीवन के किसी पुराने स्टोर रूम मेंरखेपुराने बक्से को बिना चाबी के ही खोल देती हैंIजिसके खुलने पर उदासी, यादें, भय, सिसकियां और भीतर की सिहरन एक साथ गट्ठर बनाकर रखी हैं |इन सब भावनाओं को लेकर निधि एक ऐसी कोथली बुनती हैं जो बाहर से जितनी भीउलझी सिलवट भरी दिख रही होती हैं अंदर से उतनी ही ऊष्मा लिए भी है,जो जीवन के सर्द मौसम में अगर निग ( warmth)देता है तो गर्म मौसम में रेशमी अहसास भी|
निधि की कहानी में विषाद किसी हार के मिलने पर या किसी के खो जाने का नहीं है बल्कि उस संघर्ष का हैं, जो मनुष्य अपने भीतर अपने आप से अपने भीतर के अंधेरे से अपने छिपे एहसासों से लगातार करता है |उनके पात्रों के भीतर एक कोलाहल हैं और हर कोलाहल आवाज नहीं करता है |
निधि की कहानियों में चुप्पी की भी एक भाषा है, एक बैचेनी है। हर कहानी मन के ऐसे ऐसे बियाबान जंगल से गुजरती हैजहां पात्र आत्मालाप में लीन होते हैं लेकिन उनके पात्र हार नहीं सकते | चिकित्सक जिंदगी देती है , दर्द से मुक्ति दिलाती है तो उनके पात्र भी कह सुनकर, चीखकर, रोकर सवाल उठाते हैं और अंततः जिद करके खड़े रहते हैं | उनकी कहानियों के पात्रों के जीवन सहज नहीं हैं | उनके जीवन के अनुभव में जोखिम हैं, बैचेनी है, और पुकार हैं | उनकी दुनिया के रंग कहीं डार्क हैं(शैतानी तुरही) तो कहीं ग्रे( पांचवे पुरुष की तलाश) तो कहीं एकदम बिखरे हुए ( प्रेम एक पालतू बिल्ली ) |
नैतिक अनैतिक की परवाह किए बिना वे मनुष्यता की बात करना चाहती हैं | उनकी पात्रों की लड़ाई बाहरी कम भीतरी ज्यादा हैं | अपराध अकेलापन और पाप बोध लेकिन फिर भी कहीं कहीं एक कोमल आहट भी कि जिंदगी अब भी खूबसूरत हैं | प्रेम को साधा जा सकता हैंअनेक विषमताओं के बावजूद भी|
“पांचवे पुरुष की तलाश” रिश्तों ओर प्रेम के बदलते दृष्टिकोण को पकड़ते पकड़ते हुए भी कहीं छूट जाती डोर है | आधुनिक जीवन की उतावली, अधीरता, असंयमिता जटिलता को बखूबी उकेरने का प्रयास किया गया हैं |
“शोकपर्व” मेरी प्रिय कहानी रही है |यह लंबे समय तक स्मृतियों मेंजीवित रहने वाली कहानी है |तांत्रिकों ओझाओं के बनने की प्रक्रिया के पीछे के काले सच को उघाड़ती कहानी में विश्वास और अविश्वास की महीन लकीर पर एक साधारण इंसान ठिठका खड़ा रह जाता है |
“प्रेम एक पालतू बिल्ली” एक मनोवैज्ञानिक कहानी हैजहाँ पात्र हैं कुछ और लेकिन बन कुछ और जाते हैं | पात्रों के बनने उलझने की प्रक्रिया में यह कहानी पाठकों को विस्मित करती हैं |
” शैतानी तुरही” एक ऐसी कहानी जिसका परिवेश जब भीतर उतरता है तो मन कहीं घने जंगल में इस तरह खो जाता हैं कि उसकी देहपर चुभते कांटे , दर्द, टीसउसे महसूस नहीं होते लेकिन जब अंत तक पाठक पहुंचता है तो जैसे कोई धीमा सा जहर उसके भीतर प्रवेश कर चुका होता है और उसकी आत्म लहुलुहान महसूस करने लगती है ( मुझे लगता है यह शीर्षक कहानी होनी चाहिए थी )
‘ लाल जुराबों में कैद बसंत’ भाई बहन के रिश्ते पर भाई की नजर से अनोखी कहानी | जरूरी नहीं कहानियों के पात्रदैहिक प्रेम में हो या अवैध रिश्तों में या नफरत के रिश्तेमें या पति पत्नी | स्नेह के रिश्ते पर भी यहएक खूबसूरत कहानी मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखी गई हैं |
उनकी इस पुस्तक में कुल 14 कहानियां हैं|हर कहानी की अपनी शेल्फ लाइफ है!लेकिन हर कहानी में एक धुएं की लकीर जरूर है जो इंगित करती है कि कहीं भीतर सुलगती आग हैं | कहानियों में आत्मा की जिरह है जिसे पात्र अपनी उदासियों भय और पराजयके साथ जोखिम लेने की जिद्दी प्रवृति से करते हैं | अपनी रूह से आर्तनाद करता वह खामोश दिखता पात्र है| मनुष्यता की तलाश में भटकता पात्र अपनी जिजीविषा से उस पल की तलाश भी करना चाहता हैं जहां वह जी सके |यह संग्रह पढ़ने के साथ महसूस करने के लिए हैं | जरूरी नहीं आप इससंग्रह को एक बार मेंया एकनिश्चित अंतराल में पढ़ जाए | यह संग्रह व्हिस्की की तरहबर्फ डालकर गिलास कोबार बार घुमाकर ,नमकीन या पनीर का एक पीस मुंह में डालकर स्वाद बदलने के क्रम में दुबारा घूंट भर दुबारा उसी स्वाद पर लौटने की क्रिया हैं |जरूरी नहीं किइस संग्रह की कहानियाँ सबको पसंद आए I यह लिमिटेड एडिशन वाली शराब की तरह की कहानियाँ हैं, जिनका स्वाद जल्दी से जुबान पर चढ़ता नहीं हैं जब चढ़ जाता हैं तो उनको इसी तरह की कहानियाँ अपने मी टाइम में पढ़ने की हुड़क होती हैं I इस पुस्तक कोघूंट घूंट कर टुकड़े में जिया /पढ़ा जा सकता हैं |
यह कहानियाँ समय लेकर लिखी कहानियां हैं, जिन्हें मेहनत के साथ , भाषा शिल्प का अनूठा तड़का लगाकरपरोसा गया हैं| न जाने कितनी बार इन कहानियों के पात्रों ने उनके घर की मुंडेर पर उछल कूद मचाई होगी | न जाने कितनी बार इनके तकिएनम किए होंगे | इसलिए जब आप इन कहानियों की संवेदना को देखते पढ़ते हैं तो यह पन्ने पर उकरे शब्द नहींशब्दचित्र बनकर अंकित हो जाते हैं |
कहानीकारकहानी कौशल के साथ साथ सोशलमीडिया कौशल से संपूर्णपरिचित है। सोशल मीडिया पर उनकी कई कहानियांउपलब्ध हैं | इसलिए उनका यह कहानी संग्रह बहुत लोगो द्वारा पढ़ा जा रहा हैं | उनको भविष्य में आने वाली पुस्तकों के लिए बहुत बहुत बधाई | उनका यह कहानी संग्रह राजकमल प्रकाशन से आया हैं| उनका कहानी संग्रह राजकमल से आना चाहिए उनके कई खास मित्रों के साथ मेरी जैसी उनकी कहानियों की फैन का भी आग्रह था | उनको बहुत बहुत बधाई |
हमने पुस्तक चर्चा के अंतर्गत आपके द्वारा लिखी तीनों पुस्तकों की समीक्षाओं को पूरा पढ़ा।समीक्षा की दृष्टि से किसी एक पुस्तक की समीक्षा करना भी काफी मेहनत का काम होता है और आपने
तीन पुस्तकों-उपन्यास, कहानी संग्रह और कविता संग्रह को यहाँ समीक्षित किया है।यह काबिले तारीफ है।
आपको पढ़ना भी भाषा-लेखन की दृष्टि से समृद्ध होना ही होता है।
अगर आपने लिखा है तो निश्चित रूप से तीनों ही पुस्तकें पढ़ने योग्य होंगी।
पढ़कर हमने जो महसूस किया-
उपन्यास- *फिर मिलोगी*
मधु चतुर्वेदी
उपन्यास के जितने भी उदाहरण आपने इसमें दिए हैं उनमें से कुछ महत्वपूर्ण कथ्य हैं सूत्र- वाक्य की तरह। पढ़कर ध्यान एक पल वहाँ ठहरता है। जैसे –
“यादें कभी पुरानी नहीं होतीं, बस उसकी चुभन तेज या धीमी होती रहती है।”
“किसी दिन मिलना जरूरी नहीं, किसी दिन समझ आ जाना भी मुलाकात ही है।”
“दिल टूटने की आवाज बाहर नहीं जाती, पर उसके टुकड़े भीतर नई कहानी लिख देते हैं!”
“विदाई हमेशा अंत नहीं होती, कभी-कभी वह आगे बढ़ाने के लिए सबसे जरूरी शुरुआत होती है।”
“जिंदगी वही है जो बच जाती है…… रिश्तों के चले जाने के बाद भी!”
सभी एक अच्छे कोटेशन की तरह लगे।
कविता संग्रह- *उम्मीद की तरह लौटना तुम*
पंकज सुबीर
हमें इसके शीर्षक ने सबसे अधिक आकर्षित
किया।
जब बात उम्मीद कीऔ तरह लौटने की, की जाती है तो यह एक विस्तृत फलक की बात करता है।भाव संवेदनाओं के एक-एक टाँके आत्मा और प्राणों से बुनता हुआ भावों की सतह पर बुनता है।
जितना पंकज जी को हमने अभी तक पढ़ा है, और उसके माध्यम से उन्हें जाना है पंकज जी निश्चित रूप से एक संवेदनशील हृदय इंसान हैं।
जहां तक हम याद आ रहा है पिछले वर्ष दिल्ली पुस्तक मेले के पश्चात ही उनके पिताजी का देहावसान हुआ था।
और शहरयार जी को तो वो पुत्रवत् मानते हैं
रिश्ते दोनों ही स्थिति में पिता पुत्र के हैं।
उम्मीद जीवन में ऑक्सीजन की तरह है। ऊर्जा की तरह तरोताजा रखती है। जीवन के हर पल में, विशेष तौर से दुख में, वियोग में, निराशा में, उम्मीद प्राणवायु की तरह है।
कुछ काव्य पंक्तियाँ भी पढ़ने को मिलतीं तो अच्छा लगता।
कहानी संग्रह- *प्रेम एक पालतू बिल्ली*
शीर्षक पढ़कर चेहरे पर एक मुस्कान आ गई
शोकपर्व कहानी निश्चित थी प्रभावशाली होगी ऐसा लगा।
पंकज सुबीर जी के अतिरिक्त हम दोनों को फिलहाल तो नहीं जानते हैं ,लेकिन आपके माध्यम से जान पाए।
पंकज जी से पहली बार कविताओं के रूप में परिचय हुआ। उन्हें उनके उपन्यास में पढ़ा है- रुदादे सफर और उनकी कई कहानियाँ भी पढ़ी हैं। आपको पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि निश्चित ही काव्य संग्रह भी काफी मार्मिक होगा,क्योंकि इसमें पिता की बात है, रिश्तों की बात है।
तीनों ही रचनाकारों को हमारी तरफ से बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ।
इस पुस्तक चर्चा के लिए आपका शुक्रिया।
नीलिमा जी!
हमने पुस्तक चर्चा के अंतर्गत आपके द्वारा लिखी तीनों पुस्तकों की समीक्षाओं को पूरा पढ़ा।समीक्षा की दृष्टि से किसी एक पुस्तक की समीक्षा करना भी काफी मेहनत का काम होता है और आपने
तीन पुस्तकों-उपन्यास, कहानी संग्रह और कविता संग्रह को यहाँ समीक्षित किया है।यह काबिले तारीफ है।
आपको पढ़ना भी भाषा-लेखन की दृष्टि से समृद्ध होना ही होता है।
अगर आपने लिखा है तो निश्चित रूप से तीनों ही पुस्तकें पढ़ने योग्य होंगी।
पढ़कर हमने जो महसूस किया-
उपन्यास- *फिर मिलोगी*
मधु चतुर्वेदी
उपन्यास के जितने भी उदाहरण आपने इसमें दिए हैं उनमें से कुछ महत्वपूर्ण कथ्य हैं सूत्र- वाक्य की तरह। पढ़कर ध्यान एक पल वहाँ ठहरता है। जैसे –
“यादें कभी पुरानी नहीं होतीं, बस उसकी चुभन तेज या धीमी होती रहती है।”
“किसी दिन मिलना जरूरी नहीं, किसी दिन समझ आ जाना भी मुलाकात ही है।”
“दिल टूटने की आवाज बाहर नहीं जाती, पर उसके टुकड़े भीतर नई कहानी लिख देते हैं!”
“विदाई हमेशा अंत नहीं होती, कभी-कभी वह आगे बढ़ाने के लिए सबसे जरूरी शुरुआत होती है।”
“जिंदगी वही है जो बच जाती है…… रिश्तों के चले जाने के बाद भी!”
सभी एक अच्छे कोटेशन की तरह लगे।
कविता संग्रह- *उम्मीद की तरह लौटना तुम*
पंकज सुबीर
हमें इसके शीर्षक ने सबसे अधिक आकर्षित
किया।
जब बात उम्मीद कीऔ तरह लौटने की, की जाती है तो यह एक विस्तृत फलक की बात करता है।भाव संवेदनाओं के एक-एक टाँके आत्मा और प्राणों से बुनता हुआ भावों की सतह पर बुनता है।
जितना पंकज जी को हमने अभी तक पढ़ा है, और उसके माध्यम से उन्हें जाना है पंकज जी निश्चित रूप से एक संवेदनशील हृदय इंसान हैं।
जहां तक हम याद आ रहा है पिछले वर्ष दिल्ली पुस्तक मेले के पश्चात ही उनके पिताजी का देहावसान हुआ था।
और शहरयार जी को तो वो पुत्रवत् मानते हैं
रिश्ते दोनों ही स्थिति में पिता पुत्र के हैं।
उम्मीद जीवन में ऑक्सीजन की तरह है। ऊर्जा की तरह तरोताजा रखती है। जीवन के हर पल में, विशेष तौर से दुख में, वियोग में, निराशा में, उम्मीद प्राणवायु की तरह है।
कुछ काव्य पंक्तियाँ भी पढ़ने को मिलतीं तो अच्छा लगता।
कहानी संग्रह- *प्रेम एक पालतू बिल्ली*
शीर्षक पढ़कर चेहरे पर एक मुस्कान आ गई
शोकपर्व कहानी निश्चित थी प्रभावशाली होगी ऐसा लगा।
पंकज सुबीर जी के अतिरिक्त हम दोनों को फिलहाल तो नहीं जानते हैं ,लेकिन आपके माध्यम से जान पाए।
पंकज जी से पहली बार कविताओं के रूप में परिचय हुआ। उन्हें उनके उपन्यास में पढ़ा है- रुदादे सफर और उनकी कई कहानियाँ भी पढ़ी हैं। आपको पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि निश्चित ही काव्य संग्रह भी काफी मार्मिक होगा,क्योंकि इसमें पिता की बात है, रिश्तों की बात है।
तीनों ही रचनाकारों को हमारी तरफ से बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ।
इस पुस्तक चर्चा के लिए आपका शुक्रिया।