Wednesday, February 11, 2026
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किताबें जो आजकल पढ़ी गईं…!

कहानी संग्रह
मिडिल क्लास मंचूरियन
जयंती रंगनाथन 
राजपाल पब्लिकेशन 
मिडिल क्लास मंचूरियन जयंती रंगनाथन का एक कहानी-संग्रह है, जिसमें भारतीय मध्यवर्ग के जीवन को रोज़मर्रा की स्थितियों, मानसिक द्वंद्व और सामाजिक व्यवहार के माध्यम से चित्रित किया गया है। इस संग्रह की कहानियाँ किसी बड़े घटनाक्रम पर नहीं, बल्कि उन छोटे-छोटे क्षणों पर केंद्रित हैं, जिनसे मध्यवर्ग का पूरा जीवन निर्मित होता है। पुस्तक का शीर्षक ही एक सार्थक रूपक है। जैसे मंचूरियन भारतीय स्वाद के अनुसार बदला हुआ विदेशी व्यंजन है, वैसे ही आज का मध्यवर्ग भी परंपरा और आधुनिकता के बीच एक मिला-जुला स्वरूप है। लेखिका ने इसी मिश्रित पहचान को कहानियों के माध्यम से उकेरा है।
इस संग्रह की कहानियों में नौकरीपेशा जीवन, आर्थिक दबाव, सामाजिक अपेक्षाएँ, रिश्तों की औपचारिकता, अकेलापन और दिखावे की संस्कृति जैसे विषय उभरकर आते हैं। पात्र बहुत बड़े या असाधारण नहीं हैं—वे हमारे आसपास के सामान्य लोग हैं, जिनकी चिंताएँ पाठक की अपनी चिंताओं से मेल खाती हैं।
 पहली ही कहानी “चौथा मुसाफिर”  में जयंती के कहानी कौशल को बखूबी समझा जा सकता हैंI रहस्य रोमांच से भरी इस कहानी के अंत में पाठक सोच में डूबा रह जाता है कि आखिर यह चौथा मुसाफिर ……  रहस्य की परत देर तक पाठक के मन के भीतर द्वंद्व करती रहती हैं I “काली टाई वाली औरत”  कहानी में  एक आम घर की कहानी मां बेटियों के संवाद ओर खंभे पर लगे विज्ञापन से पढ़कर  फोन के व्यसन को  छुड़ाने के लिए काली टाई वाली  औरत को बुलाना ..एक अलग ही तरह की कहानी हैं जिसमें माध्यम वर्गीय आधुनिक भारतीय परिवार के संघर्ष  को दिखाया हैं I  “लाइन के बाहर”  कहानी एक बहन द्वारा  सारे घर परिवार को सम्हालते हुए अपनी इच्छाओं का दमन करना , चाहते हुए भी अपनी दैहिक मानसिक  आवश्यकताओं को दरकिनार करके भाई के सामने कहना कि मैने अपनी इच्छाओं का दमन करना सीख लिया यानी आज भी स्त्री अपनी लाइन के बाहर नहीं निकलती हैं, आज भी संकोच संस्कार  कहीं न कहीं आड़े आते हैं I  शीर्षक कहानी “मिडिल क्लास मंचूरियन” अदभुत है , एक पिता अपने ही बेटे के कुकर्म को कैसे  ढकता है कैसे एक पति अपनी ही पत्नी की  अवैध संतान को  पालता हैं I वह जानता हैं कि उसकी पत्नी ने किसकी संतान को जन्म दिया तब भी बलात्कारी के पिता की जी जान लगाकर सेवा करता हैं I   यह कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ती हैं रोमांचक लगती हैं | “मन रे”  कहानी एक किशोरी  के मनोविज्ञान  को दर्शाती कहानी जो माता पिता के संबंधों को किस चश्में से देखती हैं पाठक खुद पढ़ेंगे तो उस कहानी को भूल नहीं पाएंगे I “  रोमा का भाई” हो या ” स्ट्रगलर” दोनों कहानियां पाठकों को अपने कथ्य के  प्रवाह में बहा ले जाती हैI ” जिंदगी से भागा हुआ” कहानी आज की कहानी हैं जिसे हर माता पिता के साथ हर युवा को पढ़ना चाहिए I अपनी आकांक्षाओं या सपनों का प्रत्यारोपण बच्चों   को कितना बोझिल बनाता हैं उनके कोमल मस्तिष्क पर इसका क्या प्रभाव पड़ता हैं I मार्मिक कहानी हैं I 
जयंती रंगनाथन की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और संवादधर्मी है। वे अनावश्यक दार्शनिकता या भारी शब्दावली से बचते हुए बात को सीधे पाठक तक पहुँचाती हैं। व्यंग्य उनकी कहानियों की एक महत्वपूर्ण विशेषता है, पर यह व्यंग्य कटु नहीं, बल्कि आत्मीय है, जो मुस्कराते हुए सच से रूबरू कराता है। जिंदगी के कटु सत्यों से परिचय कराती उनकी कहानियों से पाठक  जुड़ जाते  हैं I 
यह संग्रह विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मध्यवर्ग को न तो महिमामंडित करता है, न ही उपहास का विषय बनाता है। लेखिका उसे उसकी संपूर्ण मानवीय जटिलताओं के साथ प्रस्तुत करती हैं। कई कहानियाँ पाठक को यह महसूस कराती हैं कि वह अपनी ही कहानी पढ़ रहा है। मध्यवर्गीय जीवन की मानसिक बनावट, सामाजिक दबाव और रोज़मर्रा की सच्चाइयों को संवेदनशीलता और व्यंग्य के संतुलन के साथ प्रस्तुत करता है। यह पुस्तक हल्की-फुल्की होते हुए भी भीतर तक असर छोड़ती है और पाठक को सोचने पर विवश करती है।
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कविता संग्रह 
लड़की कैक्टस थी
वियोगिनी ठाकुर 
शुभदा बुक्स 
वियोगिनी ठाकुर का कविता-संग्रह “लड़की कैक्टस थी” समकालीन हिंदी कविता में स्त्री-अनुभव की एक सशक्त, संवेदनशील और साहसी अभिव्यक्ति है। यह संग्रह किसी एक कथा या भाव तक सीमित नहीं रहता, बल्कि स्त्री के भीतर और बाहर चल रहे संघर्ष, प्रेम, पीड़ा, स्वाभिमान और आत्मबोध को बहुस्तरीय रूप में सामने रखता है।
इस संग्रह की कविताएँ सजावटी भाषा या कृत्रिम भावुकता का सहारा नहीं लेतीं। यहाँ भाषा सीधी, सहज और अनुभवजन्य है, लेकिन प्रभाव गहरा है। “लड़की कैक्टस थी” शीर्षक कविता ही पूरे संग्रह की वैचारिक धुरी बन जाती है। कैक्टस का प्रतीक उस स्त्री का है जो कठोर परिस्थितियों में जीती है, काँटों से घिरी रहती है, दूसरों को चुभती है, पर भीतर से जीवन-रस से भरी होती है और समय आने पर फूल भी खिलाती है। यह स्त्री न दया चाहती है, न सहानुभूति वह केवल अपना अस्तित्व स्वीकार कराए जाने की आकांक्षा रखती है। यहाँ कैक्टस मात्र एक उपमा नहीं, बल्कि स्त्री की जीवन-स्थिति का प्रतीक बन जाता हैजो तपती रेत में भी जीना जानती है, पानी बचाती है और समय आने पर फूल खिलाती है। कविता में भाव आता है कि स्त्री की कठोरता उसकी असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि आत्मरक्षा है।
जैसे एक स्थान पर भाव उभरता है—
“काँटों से ढका होना
उसकी क्रूरता नहीं
उसका बचाव था”
इस संग्रह की कविताओं में प्रेम भी पारंपरिक रूप में नहीं आता। प्रेम यहाँ आत्मसम्मान से टकराता है, समझौते से इंकार करता है और बराबरी की माँग करता है। कवयित्री प्रेम को त्याग नहीं, बल्कि चेतना का विस्तार मानती हैं। कई कविताओं में प्रेम की असफलता के बावजूद आत्मसम्मान की रक्षा प्रमुख है…
“मैं टूट सकती हूँ
लेकिन झुककर
बिखरना मुझे नहीं आता”
पीड़ा इस संग्रह का स्थायी भाव है, लेकिन वह विलाप में नहीं बदलती। पीड़ा बार-बार लौटती है….
“सिर्फ चेहरे बदलते हैं
नाम बदल जाते हैं
पीड़ा फिर-फिर लौटती है
ठीक उसी रूप में”
यह पंक्तियाँ केवल व्यक्तिगत दुख की नहीं, बल्कि स्त्री के सामूहिक अनुभव की प्रतीक बन जाती हैं। समाज, रिश्ते और व्यवस्था सब बदलते हैं, पर स्त्री की पीड़ा का स्वरूप लगभग वही रहता है। स्त्री-चेतना की दृष्टि से यह संग्रह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यहाँ स्त्री न तो देवी है, न बेचारी वह एक सोचती, प्रश्न करती और निर्णय लेती हुई मनुष्य है।  वियोगिनी लिखती हैं
“मनुष्य के भीतर का प्रेम
वह नहीं कर पाता आविष्कृत
प्रेम करने का
कोई नया ढंग”
यह पंक्ति आधुनिक समाज की भावनात्मक दरिद्रता पर तीखा प्रश्न खड़ा करती है।भाषा की बात करें तो वियोगिनी ठाकुर की भाषा सधी हुई, सहज और प्रभावशाली है। न तो शब्दों का अनावश्यक बोझ है, न अलंकारों की दिखावटी सजावट। प्रतीक कैक्टस, काँटे, फूल, रेत, प्यास अपने आप में पूरी कथा कह देते हैं।यह कविता-संग्रह भाव, शिल्प और विचार तीनों स्तरों पर सशक्त हैI  वियोगिनी ठाकुर की कविताओं में स्त्री केवल पीड़िता नहीं है, बल्कि प्रश्न करती हुई, प्रतिरोध करती हुई और अपने निर्णयों की जिम्मेदारी उठाती हुई दिखाई देती है। प्रेम यहाँ समर्पण से अधिक आत्मसम्मान से जुड़ा है। वियोग, स्मृति, देह, अकेलापन, सामाजिक पाखंड और स्त्री की आंतरिक स्वतंत्रता ये सभी विषय कविताओं में स्वाभाविक रूप से आते हैं। खास बात यह है कि कवयित्री स्त्री-विमर्श को नारे में नहीं बदलती, बल्कि अनुभव में ढाल देती है।
इस संग्रह की कई कविताएँ पाठक को भीतर तक झकझोरती हैं क्योंकि वे किसी कल्पनालोक की नहीं, बल्कि जिए गए यथार्थ की उपज हैं। कहीं स्त्री का मौन बोलता है, कहीं उसका विद्रोह, तो कहीं उसका थककर भी न टूटना। “लड़की कैक्टस थी” एक ऐसा कविता-संग्रह है जो चुपचाप पाठक के भीतर उतरता है, उसे असहज करता है, प्रश्न देता है और देर तक साथ बना रहता है। यह संग्रह स्त्री को समझने की नहीं, उसे सुनने की ज़रूरत पर ज़ोर देता है।
यह संग्रह उन पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है जो स्त्री को सहानुभूति की वस्तु नहीं, बल्कि चेतन, सक्षम और आत्मनिर्भर मनुष्य के रूप में पढ़ना चाहते हैं।“लड़की कैक्टस थी” केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि स्त्री-अस्मिता का सशक्त वक्तव्य है जो चुपचाप चुभता भी है और देर तक याद भी रहता है।
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उपन्यास 
 अमीरन 
 एकता अमित व्यास 
सभ्या प्रकाशन 
एकता अमित व्यास का उपन्यास “अमीरन” मुख्यतः दो स्त्री पात्रों के इर्द-गिर्द घूमते हुए भी, अपने विस्तार में हमारे आसपास मौजूद असंख्य स्त्रियों की सामूहिक कथा बन जाता है।यह उन महिलाओं का आख्यान है जो बाहरी रूप से सामान्य जीवन जीती प्रतीत होती हैं, पर भीतर निरंतर संघर्षरत रहती हैं। वे विवाह को अपनी नियति मानकर स्वीकार करती हैं और अनजाने ही अपने भीतर की सहज, खिलखिलाती स्त्री को शांत कर देती हैं।पति के व्यवहार को अपनी ही कमी समझकर बार-बार अवसर देना, बच्चों की परवरिश में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर देना और फिर भी भीतर से धीरे-धीरे रिक्त होती जाना यह सब “अमीरन” की कथा को अत्यंत यथार्थपरक बना देता है।
 “दुनिया में कोई किसी का नहीं होता। हमें अपनी खुशी खुद ढूँढनी पड़ती है और सहेजनी पड़ती है। जीवन में परेशानियाँ आती रहेंगी, उनसे निपटना खुद ही सीखना पड़ेगा।” यह वक्तव्य उसकी मानसिक संरचना और जीवन-दृष्टि को स्पष्ट करता है। यह कथन आत्मरक्षा की एक प्रक्रिया भी है, जहाँ पात्र परिस्थितियों से उपजे दर्द को तर्क और स्वीकार के माध्यम से सहने का प्रयास करता है।
“अमीरन” के माध्यम से एकता अमित व्यास हमारे आसपास की महिलाओं के जीवन अनुभवों को स्वर देती हैं,उनके सपनों, इच्छाओं, त्याग और टूटन को। यह उपन्यास स्त्री के भीतर चलने वाले संवादों को उजागर करता है, जहाँ वह समाज, परिवार और स्वयं के बीच संतुलन साधने की कोशिश करती है। लेखिका ने स्त्री जीवन की छोटी-छोटी खुशियों और गहरे दुःखों को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ उकेरा है, जिससे पाठक सहज ही अपने परिवेश की स्त्रियों को इन पात्रों में पहचान लेता है।
उपन्यास में स्त्रियों के आपसी रिश्तों—माँ-बेटी, बहनें, सास-बहू को भी गहराई से चित्रित किया गया है। ये संबंध केवल प्रेम या त्याग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें ईर्ष्या, अपेक्षाएँ, सहयोग और तनाव भी समान रूप से उपस्थित हैं। कहीं स्त्रियाँ एक-दूसरे का संबल बनती हैं, तो कहीं सामाजिक दबावों और संस्कारों के कारण उनके बीच टकराव भी दिखाई देता है। यही जटिलता इस उपन्यास को जीवन के बहुत निकट ले आती है। ईर्ष्या, धोखा, अवसरवादिता, बेवफाई जैसे भाव साफ साफ उनके पात्रों के चरित्रों में नज़र आते हैं I अमीरन की कहानी अपने अस्तित्व और पहचान की तलाश की कहानी है। वह परंपरागत मूल्यों और आधुनिक सोच के बीच संतुलन साधने का प्रयास करती है, पर यह संतुलन सहज नहीं है। उसका संघर्ष निजी होते हुए भी सामाजिक स्तर पर महत्वपूर्ण हो उठता है, जिससे यह उपन्यास नारीवादी दृष्टि से विचारणीय बन जाता है। यह पाठक को यह सोचने पर विवश करता है कि स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की राह कितनी कठिन है और इसकी कीमत क्या-क्या चुकानी पड़ती है।
उपन्यास की भाषा सरल, प्रभावशाली और भावनात्मक है। संवादों में स्थानीयता और जीवन की सच्चाई झलकती है, जो पात्रों को जीवंत बनाती है। कहीं-कहीं पात्रों की मुलाकातें या घटनाएँ अविश्वसनीय प्रतीत होती हैं, पर यहीं लेखक सच और विश्वास के बीच की महीन रेखा को रेखांकित करती हैं,हर वह बात जो घटित होती है, आवश्यक नहीं कि उसी रूप में सत्य भी हो।
भावनात्मक दृश्यों का चित्रण इतना सशक्त है कि पाठक स्वयं को अमीरन की यात्रा का सहभागी अनुभव करता है। प्रतीकों और बिंबों का प्रयोग कथा को अतिरिक्त गहराई देता है। स्वयं “अमीरन” नाम ही उसके जीवन के विडंबनापूर्ण सौंदर्य और संघर्ष का प्रतीक बन जाता है।कुल मिलाकर, “अमीरन” एक ऐसा उपन्यास है जो हमारे आसपास की महिलाओं के जीवन, उनके संघर्षों और उनकी आंतरिक दुनिया को संवेदनशीलता और ईमानदारी के साथ सामने लाता है। यह केवल एक कथा नहीं, बल्कि समाज में स्त्री की स्थिति पर एक विचारोत्तेजक दस्तावेज है, जो पाठक को देखने, समझने और सोचने की दृष्टि देता है।
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नीलिमा शर्मा 
उपसंपादक
पुरवाई.कॉम 
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4 टिप्पणी

  1. क्या शानदार उपन्यास, एक महिला के अंतर्मन की व्यथा से जूझना, स्वयं की लडाई स्वयं से…. जीवन के उतार चढ़ाव से जूझती अपने अस्तित्व को खोजती और एक सशक्त महिला का सफ़र…….बहुत बधाई एकताजी

  2. भोर की राम राम
    पुरवाई की टीम एवं नीलिमा जी बहुत-बहुत धन्यवाद आपने “अमीरन” के अनछुए पहलुओं पर चर्चा की।

  3. उपन्यास : अमीरन
    लेखिका: एकता व्यास

    अमीरन नारी के अंतर संघर्ष की एक गहन और संवेदनशील यात्रा का मार्मिक साहित्यिक दस्तावेज़ है।
    यह उपन्यास एक स्त्री के मन में चल रहे द्वंद्व, पीड़ा और आत्मसंघर्ष को अत्यंत सशक्त रूप में अभिव्यक्त करता है।

    अमीरन केवल एक पात्र नहीं, बल्कि हर उस महिला की आवाज़ है जो अपने अस्तित्व और पहचान की खोज में निरंतर संघर्षरत है। यह रचना एक महिला के दर्द का उसकी अपनी अंतरात्मा से किया गया आत्मीय संवाद प्रतीत होती है।

    उपन्यास में स्त्री की चुप्पी, सहनशीलता और अंतर्निहित शक्ति को बड़ी संवेदनशीलता के साथ उकेरा गया है।

    सुश्री एकता जी ने एक स्त्री की स्वयं से साक्षात्कार की प्रक्रिया को अत्यंत खूबसूरती और गहराई से मूर्त रूप दिया है।

    भाषा सरल होते हुए भी भावनाओं से परिपूर्ण है, जो पाठक को भीतर तक छू जाती है।

    अमीरन नारी मन की परतों को खोलते हुए आत्मबोध और आत्मसम्मान की ओर ले जाने वाला एक सार्थक उपन्यास है।
    कुछ पंक्तियाँ
    वह चुप रही, पर टूटी नहीं,
    हर आँसू ने उसे लिखना सिखाया।
    अंतर्मन की गहराइयों में उतरकर,
    उसने स्वयं को फिर से पाया।

    दर्द से संवाद करती अमीरन,
    खामोशी में भी स्वर भरती है।
    सहने की आदत ने नहीं,
    स्वयं की खोज ने उसे गढ़ती है।

    यह कथा नहीं, चेतना है,
    नारी मन का सजीव संसार।
    हर स्त्री की आँखों में झलकता,
    अमीरन का मौन, एक दर्द निहित है l
    सीमा शर्मा

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