Sunday, May 31, 2026
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डॉ. चन्द्रशेखर तिवारी का नुक्कड़ नाटक – तम्बाकू मुक्त भारत

पात्र-परिचय
मोहन : कॉलेजछात्र (स्वस्थ और जागरूक)।
रवि : कॉलेजछात्र (तम्बाकू का आदी, अन्दर से परेशान)।
सीमा : कॉलेजछात्रा, (जागरूक, संवेदनशील और भावुक)।
अंकल जी : राहगीर (अनुभवी, समाज के प्रति जिम्मेदार)।
छोटी बच्ची (खुशी) : मासूम बच्ची (लगभग 10-12 साल की)।
समूह 1 (जागरूकता समूह) : 3-4 छात्र/छात्राऍं, तम्बाकू के खतरों पर गीत गाने के लिए।
समूह 2 (आम राहगीर) : मूक भूमिकाएँ।
मंच
किसी बाज़ार का चहल-पहल वाला स्थान। एक बेंच, एक कूड़ेदान और एक प्रतीकात्मक “धूम्रपान निषेध” बोर्ड।
(नाटक शुरू होता है। कुछ छात्र-छात्राऍं आते-जाते दिखते हैं। मोहन, सीमा और रवि मंच के केंद्र में आते हैं। रवि अपने हाथ में सिगरेट पकड़े है और उसे सुलगाने की कोशिश कर रहा है। उसके चेहरे पर हल्की-सी बेचैनी दिख रही है।)
दृश्य 1 : धुएँ की जकड़न
मोहन : (रवि का हाथ पकड़कर, चिन्तित स्वर में) रवि! यह क्या कर रहा है? कॉलेज के गेट के ठीक सामने! तुझे पता है न यहाँ सिगरेट पीना मना है!
रवि : (हाथ छुड़ाते हुए, हल्की झुॅझलाहट में) यार मोहन, सुबह-सुबह ज्ञान मत दे। दिमाग भन्नाया हुआ है, बस एक कश और….. सब ठीक।
सीमा : (आँखों में उदासी लिए) रवि! क्या सच में एक सिगरेट से सब ठीक हो जाता है? या ये बस एक और जाल है जो तुम्हें फँसाता जा रहा है? तेरी साँसें क्यों फूलने लगी हैं आजकल? तेरी आँखें क्यों लाल रहती हैं?
रवि : (सिगरेट सुलगाते हुए, धुआँ छोड़ता है) ये सब बस पढ़ाई का स्ट्रेस है, एग्ज़ाम का प्रेशर। ….. और क्या करूँ?
(रवि जैसे ही धुआँ छोड़ता है, एक छोटी बच्ची खुशी, जो अपनी माँ के साथ हाथ पकड़े पास से गुजर रही होती है, खाँसने लगती है। उसकी माँ उसे तुरन्त अपनी ओट में ले लेती है और रवि की ओर तीखी नज़रों से देखती है। खुशी डरकर अपनी माँ के पीछे छिप जाती है।)
सीमा : (दुखी होकर) देखा रवि? तेरा एक कश इस मासूम की साँसों को ज़हर दे रहा है। क्या तेरी खुशी इतनी सस्ती है कि दूसरों की सेहत दाँव पर लगा दे?
रवि : (सिगरेट हाथ में पकड़े, थोड़ा शर्मिन्दा होकर) मुझे… मुझे माफ़ करना। मैंने ध्यान नहीं दिया।
दृश्य 2 : स्वास्थ्य का लोकगीत
(मोहन आगे आता है। पीछे से ‘जागरूकता समूह’ के छात्र-छात्राऍं मंच पर आते हैं। वे लोकगीत की धुन में गाते हैं।)
मोहन : दोस्तो! रवि की तरह बहुत से साथी नहीं समझते कि तम्बाकू का धुआँ सिर्फ लत नहीं, ये तो मौत का बुलावा है! ये हमारी जड़ों को खोखला कर रहा है।
(जागरूकता समूह, लोकगीत की धुन पर गीत गाता है।)
लोकगीत (समूह 1)
(एक धीमी, दर्द भरी धुन में)
धीरे-धीरे, सुन ओ मनवा, क्यों विष का प्याला पीता है?
काहे जीवन को अग्नि लगाये, क्यों पल-पल मरता-जीता है! (कोरस)
अरे ओ साथी, ओ मेरे भाई, ये धुएँ का जाल है भारी,
तेरी साँसें घुटेगी इसमें, हो जायेगी दुनिया खारी!
फेफड़े जलते, दिल घबराता, खून में ज़हर घुलता जाये,
कैंसर जैसी बीमारी फिर, जीवन को तेरे खा जाये।
(कोरस)
अरे ओ साथी, ओ मेरे भाई, ये धुएँ का जाल है भारी,
तेरी साँसें घुटेगी इसमें, हो जायेगी दुनिया खारी!
तेरी ख़ातिर रोता परिवार, अँखियों में आँसू भर आते,
तेरी ज़िद के कारण कितने, अपने भी क्यों सहते जाते?
(कोरस)
अरे ओ साथी, ओ मेरे भाई, ये धुएँ का जाल है भारी,
तेरी साँसें घुटेगी इसमें, हो जायेगी दुनिया खारी!
(रवि सिगरेट को हाथ में घुमाते हुए, उनके गाने को सुनता है। उसके चेहरे पर चिन्ता और पछतावा का भाव झलकने लगता है।)
दृश्य 3 : सपने और धुएँ के बादल
(सीमा रवि के पास आती है, उसके हाथ से सिगरेट लेने की कोशिश करती है। रवि सिगरेट को कसकर पकड़ लेता है।)
सीमा : रवि, याद है बचपन में क्या-क्या सपने देखे थे? डॉक्टर बनने का, इंजीनियर बनने का, माँ-बाप का नाम रोशन करने का? क्या ये धुआँ तुझे उन सपनों तक पहुँचायेगा? या सिर्फ धुएँ के बादल बनाकर उन्हें छुपा देगा?
रवि : (शान्त स्वर में, सिगरेट की तरफ देखता है) सपने… हाँ, सपने तो बहुत देखे थे। पर आजकल तो बस यही लगता है कि एक सिगरेट मिल जाये तो बस…
मोहन : (गम्भीरता से) यही तो है रवि! ये लत तुझसे तेरे सपने छीन रही है, तेरी ऊर्जा छीन रही है। सोच, जिस पैसे से तू ये सिगरेट खरीद रहा है, उस पैसे से अपनी पढ़ाई की अच्छी किताबें खरीद सकता है, या अपनी सेहत पर ध्यान दे सकता है।
(अंकल जी मंच पर आते हैं, उन्होंने रवि और बच्चों को गाते हुए देखा है।)
अंकल जी : (रवि को देखते हुए) बेटा! मैंने अपने जीवन में कई नौजवानों को इस लत में खोते देखा है। एक बार ये हाथ पकड़़ ले तो फिर आसानी से नहीं छोड़ती। तुम्हें पता है, तम्बाकू सिर्फ तुम्हें नहीं मारता, ये धीरे-धीरे तुम्हारे परिवार को भी अन्दर से खत्म कर देता है। वे लोग रोज़ तुम्हें घुटते हुए देखते हैं।
रवि : (आँखें नम हो जाती हैं) मेरे माँ-बाप… वे भी बहुत परेशान रहते हैं। मैं जानता हूँ।
दृश्य 4 : संकल्प की अग्नि
(अंकल जी रवि के कन्धे पर हाथ रखते हैं।)
अंकल जी : बेटा, अभी देर नहीं हुई है। जिस दिन तुम खुद से ये कह दोगे कि ‘बस, अब और नहीं!’ उस दिन ही तुम इस लत से आज़ाद हो जाओगे। इच्छाशक्ति सबसे बड़ी ताकत है।
(छोटी बच्ची खुशी फिर से आती है, वह मुस्कुराती है और अपनी माँ की गोद से उतरकर रवि के पास आती है। रवि की तरफ़ देखती है।)
खुशी : (प्यार से) अंकल! आप स्मोक नहीं करना। मेरी मम्मी बोलती हैं, ये गन्दी बात है।
(रवि खुशी की तरफ देखता है, उसकी मासूमियत रवि के दिल को छू जाती है। उसके अन्दर एक बदलाव आता है। वह धीरे से अपने हाथ में पकड़ी हुई अधजली सिगरेट और पैकेट को कूड़ेदान में फेंक देता है। सभी पात्र रवि को देख कर चौंक जाते हैं, फिर प्रसन्नतापूर्वक एक-दूसरे को देखते हैं।)
रवि : (दृढ़ता से, आँसू पोंछते हुए) नहीं खुशी, अब नहीं! आज से, अभी से, मैं इस ज़हर को अपने जीवन से निकाल फेंकता हूँ। मैं अपने माँ-बाप के सपने को पूरा करूँगा।
मोहन : (खुशी से रवि को गले लगाता है) ये हुई न बात, रवि! यह सिर्फ तुम्हारा नहीं, हम सबका संकल्प है।
सीमा : (रवि का हाथ थामती है) हम सब तेरे साथ हैं रवि! तू अकेला नहीं है। जब भी तुझे कमज़ोरी महसूस हो, हमें याद करना।
दृश्य 5 : नये भारत की पुकार
(जागरूकता समूह फिर से आगे आता है, इस बार सभी जोश और उम्मीद के साथ गाते हैं।)
लोकगीत (समूह 1)
(एक तेज़ और उत्साह भरी धुन में)
जाग रे युवा, उठो ओ साथी, नया सवेरा आया है।
तम्बाकू की ज़ंजीरें तोड़ो, स्वस्थ भारत फिर भाया है।
(कोरस)
चलो रे साथी, चलो रे भाई, नया जीवन हम बनायेंगे,
तम्बाकूमुक्त भारत होगा, फिर खुशियाँ मनायेंगे!
न कोई खाँसे, न कोई घुटके, साँसें लें अब आज़ादी से,
स्वच्छ हवा में महके जीवन, खुशियाँ मिलें अब हर बाज़ी से।
(कोरस)
चलो रे साथी, चलो रे भाई, नया जीवन हम बनायेंगे,
तम्बाकूमुक्त भारत होगा, फिर खुशियाँ मनायेंगे!
कसम उठायें, शपथ दोहरायें, नशामुक्त हो अपना गाँव,
हर आँगन में खुशहाली हो, सुख की हर जगह हो छाँव।
(कोरस)
चलो रे साथी, चलो रे भाई, नया जीवन हम बनायेंगे,
तम्बाकूमुक्त भारत होगा, फिर खुशियाँ मनायेंगे!
(सभी पात्र एक साथ आगे आते हैं, उनके चेहरे पर उम्मीद और आत्मविश्वास है। रवि अब मुस्कुरा रहा है।)
मोहन : तो देखा दोस्तो! आज रवि ने एक नयी शुरुआत की है। हम भी मिलकर ऐसे ही बदलाव ला सकते हैं।
सीमा : याद रखिए, एक सिगरेट कम, एक साँस ज़्यादा।
रवि : (जोश के साथ) आओ, मिलकर तम्बाकूमुक्त भारत का सपना पूरा करें!
सभी पात्र एक साथ
“धुआँ नहीं, उजाला चाहिए!
स्वस्थ जीवन का नारा चाहिए!
आओ मिलकर ये कसम खायें,
तम्बाकूमुक्त भारत बनायें!”
(सभी पात्र ‘तम्बाकूमुक्त भारत’ के नारे लगाते हैं और दर्शकों को हाथ हिलाकर विदा करते हैं। नाटक समाप्त हो जाता है।)

 

डॉ. चन्द्रशेखर तिवारी
संपर्क – [email protected]
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3 टिप्पणी

  1. आदरणीय चन्द्रशेखर तिवारी जी!

    इस बार पुरवाई लिंक में नाटक को देखकर हमें आश्चर्य हुआ था कि इस बार नाटक !!!! परन्तु हमेशा एक ही विधाओं के चलते यह परिवर्तन अच्छा लगा।पढ़ तो पहले ही लिया था बस लिखने में लेट हुए।

    वर्तमान समय में नुक्कड़ नाटक एक नई विधा के रूप में उभरे हैं। एक ऐसा लघु नाटक जो शहर-शहर गाँव-गाँव में चौराहों और व्यस्त नुक्कड़ों पर अपने अभिनय के आकर्षण से किसी समाजिक दोष को दूर करने के प्रयास में बेहतरीन अदाकारी के साथ जनता को जगाने के लिये जागरूकता अभियान चलाते हैं।

    सिगरेट या बीड़ी जितना अधिक नुकसान पीने वाले को पहुँचाती है उतना ही अपने आसपास खड़े हुए उन लोगों को भी, जो उस धुएँ की सीमा में होता है।

    नशा चाहे शराब का हो, सिगरेट या बीड़ी या फिर तंबाखू का हो शरीर के लिये और जीवन के लिये नुकसानदेह ही होता है।

    इस नाटक का उद्देश्य सिगरेट, बीड़ी और तंबाखू के दुष्प्रभावों को नाटक के माध्यम से अभिनय करते हुए लोगों को दिखाना और बताना है, ताकि लोग समझ सकें कि स्वस्थ व सुखी जीवन के लिये इस बुराई के दुष्परिणाम को समझें और इस लत से बचने का प्रयास करें। नशा -मुक्त हो सकें और स्वस्थ जीवन जी सकें।

    एक जागरूकता समूह के द्वारा अभियान के रूप में यह एक उत्तम प्रस्तुति है।

    *धुआँ नहीं, उजाला चाहिये!*
    *स्वस्थ जीवन का नारा चाहिये !*
    *आओ मिलकर यह कसम खायें*
    *तंबाकू-मुक्त भारत बनायें।*
    वर्ष के अंत में पुरवाई अंक की यह प्रस्तुति हमारे लिये वर्ष भर की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति है।

    हर रचना कोई ना कोई उद्देश्य लेकर चलती है किंतु जो रचना *”सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय* होती है उससे श्रेष्ठ कुछ नहीं होता।
    ऐसा हम सोचते हैं।

    • आदरणीया नीलिमा जी, सादर अभिवादन के साथ कहना चाहता हूॅं कि आपकी इस प्रतिक्रिया को पढ़ने के बाद नि:शब्द हूॅं। इन स्नेहिल शब्दों के सम्मुख ‘गूॅंगे के मीठे फल’ की तरह…..बस, इतना ही कह पा रहा हूॅं कि यह प्रतिक्रिया ‘अमित तोष उपजावै’ से होते हुए ‘सो जाने, जो पावै’ की स्थिति में पहुॅंचा दी है। निश्चित रूप से इस तरह की टिप्पणियॉं लेखक को और अधिक जिम्मेदारी एवं सजगता के साथ कुछ अधिक बेहतर करने और लिखने के लिए प्रेरित एवं उत्साहित करती हैं।

  2. तिवारी जी का नुक्कड़ नाटक बहुत ही सुंदर है। देखा जाए तो तम्बाकू अब पहले से बहुत कम पी जा रही है, सिर्फ भारत मे ही नहीं बल्कि पूरे संसार में।

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