Wednesday, February 11, 2026
होमपुस्तकप्रो. प्रवीण कुमार अंशुमान द्वारा प्रो. नंदिनी साहू की पुस्तक 'हिंदू स्टडीज़...

प्रो. प्रवीण कुमार अंशुमान द्वारा प्रो. नंदिनी साहू की पुस्तक ‘हिंदू स्टडीज़ : फाउंडेशन्स एंड फ़्रेमवर्क्स’ की समीक्षा

प्रोफ़ेसर नंदिनी साहू की नवीनतम पुस्तकहिंदू स्टडीज़: फाउंडेशन्स एंड फ़्रेमवर्क्स‘  समकालीन अकादमिक जगत् में एक महत्वपूर्ण एवं समयानुकूल हस्तक्षेप के रूप में सामने आया है। यह कृति एक ओर जहाँ अपने व्यापक आयामों के कारण विश्वकोशीय प्रतीत होती है, वहीं पर दूसरी ओर विश्लेषण की सूक्ष्मता और अकादमिक गंभीरता के साथ अपनी तरह का एक पहला प्रयास है। पुस्तक यह दर्शाती है कि हिंदू धर्म को केवल एक धर्म के रूप में सीमित करना अनुचित है; इसे अधिक उचित रूप से एक बहुस्तरीय ज्ञानव्यवस्था के रूप में समझा जाना चाहिए, जिसमें दर्शन, साहित्य, कला, अनुष्ठान, सामाजिक नैतिकता और जीवित सांस्कृतिक परंपराएँ समाहित हैं।
इस पुस्तक की विशेषता यह है कि लेखिका ने हिंदू स्टडीज़ को वैश्विक बौद्धिक संदर्भों में रखते हुए उसे भारतीय, विशेषकर संस्कृतनिष्ठ और क्षेत्रीय परंपराओं से जोड़ा है। प्रारंभिक अध्याय में वह इस विषय की ऐतिहासिक यात्रा का सुव्यवस्थित विवरण प्रस्तुत करती हैंओरिएंटलिस्ट दृष्टि से संस्कृत के प्रति आकर्षण, इंडोलॉजी और उत्तरऔपनिवेशिक आलोचनाओं से लेकर आज की अंतःविषयी दृष्टियों तक, जिनमें नृविज्ञान, समाजशास्त्र, दर्शन, जेंडर स्टडीज़, पारिस्थितिकी और डिजिटल मानविकी तक की व्यापकता शामिल है। इस प्रकार, वे यह स्पष्ट करती हैं कि हिंदू धर्म किसी संकीर्ण परिभाषा में कैद होकर निरंतर अपनी संभावनाओं का विस्तार करता रहा है।
इस पुस्तक के अध्याय सुनियोजित ढंग से पिरोए गए हैं। वेद, उपनिषद, महाकाव्य और पुराणों से लेकर न्याय, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदांत जैसे दार्शनिक विषयों तक, यह पुस्तक मूल ग्रंथों का गहन और सहज विश्लेषण प्रस्तुत करती है। विशेष उल्लेखनीय है लेखिका का ध्यान केवल शास्त्रीय ग्रंथों पर, बल्कि आलवारनायनार, ओड़िशा के जगन्नाथ संप्रदाय और भक्तिकालीन लोकधाराओं पर भी, जिन्होंने जाति और लिंग की दीवारों को लांघकर भक्ति को लोकतांत्रिक बनाया। इस तरह पुस्तक हिंदू धर्म को स्थिर परंपरा नहीं बल्कि सतत् विकसित होती सभ्यता के रूप में सामने लाती है।
समकालीन प्रश्नों के प्रति इसकी प्रतिबद्धता भी उल्लेखनीय है। प्रोफ़ेसर साहू ने जाति, वर्ग और लिंग के प्रश्नों को भी गहनता से उठाते हुए, एक ओर परंपरा में निहित दमनकारी प्रवृत्तियों का परीक्षण किया है तो दूसरी ओर उसमें विद्यमान मुक्ति की ऊर्जा को भी रेखांकित किया है। धर्म और अहिंसा को पर्यावरणीय नैतिकता से जोड़ते हुए वे हिंदू धर्म की समन्वयकारी दृष्टि को सामने रखती हैं। आधुनिक सुधार आंदोलनों, राजनीति में हिंदू धर्म की भूमिका और वैश्विक प्रवासी समुदायों में हुए रूपांतरणों का विवेचन भी अत्यंत प्रासंगिक है। विशेष रूप सेहिंदू स्टडीज़ और डिजिटल ह्यूमैनिटीज़तथापोस्टट्रुथ युग में हिंदू धर्मजैसे विमर्श पुस्तक को समकालीन अकादमिक परिदृश्य से गहराई से जोड़ते हैं।
इस पुस्तक में एक और विशेष पहलू का संवर्धन किया गया है, और वह है संस्कृत के प्रति उसका उत्सवभाव। भूमिका से ही यह प्रतिध्वनित होता है कि कैसे सहस्राब्दियों से ऋषिमनीषियों ने संस्कृत के आलोक में इस ब्रह्मांडीय ज्ञानआकाश का निर्माण किया। पाणिनि के व्याकरण की परिष्कृत संरचना से लेकर चित्रकाव्य की सृजनात्मकता तक, लेखिका ने संस्कृत की भाषिक, काव्यात्मक और दार्शनिक परंपराओं का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया है। संस्कृत को हिंदू स्टडीज़ के केंद्र में स्थापित करते हुए वे यह सिद्ध करती हैं कि यह केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि वही आधारभूमि है जिसमें समस्त हिंदू चिंतन अंकुरित और विकसित हुआ।
भाषाशैली की दृष्टि से पुस्तक में अकादमिक प्रबलता और काव्यमय संवेदनशीलता का सुंदर संगम है। प्रोफ़ेसर साहू एक ओर आलोचक के रूप में लिखती हैं तो दूसरी ओर एक साधक के रूप में भारत भावभूमि का अवगाहन करती हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि विश्लेषण में जीवन्तता, सौंदर्य और आध्यात्मिक गहराई बनी रहे। यही दृष्टिकोण इसे शोधार्थियों और विद्यार्थियों के साथसाथ सामान्य पाठकों के लिए भी आकर्षक बनाता है।
ऐसे समय में जब हिंदू स्टडीज़ का विमर्श प्रायः अंधभक्ति और विरोध के ध्रुवों में विभक्त हो जाता है, प्रोफ़ेसर साहू की यह कृति संतुलन स्थापित करती है। यह एक साथ आलोचनात्मक भी है और सहानुभूतिपूर्ण भी; व्यापक भी है और सूक्ष्म भी। हिंदू धर्म को वैज्ञानिक, तार्किक, मानवीय और समावेशी ज्ञानव्यवस्था के रूप में प्रस्तुत कर यह पुस्तक बताती है कि समकालीन पाठ्यक्रमों और जनचर्चाओं में हिंदू स्टडीज़ को केंद्रीय स्थान क्यों मिलना चाहिए।
हिंदू स्टडीज़ : फाउंडेशन्स एंड फ़्रेमवर्क्सकेवल हिंदू धर्म का अध्ययन नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञानपरंपरा की विश्वसंवाद में जीवंत उपस्थिति का साक्ष्य भी है। यह कृति भविष्य के शोध और विमर्श के लिए एक स्थायी मानक सिद्ध होगी।
प्रोफ़ेसर प्रवीण कुमार अंशुमान
अंग्रेज़ी विभाग, किरोड़ीमल कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय)
संपर्क: +91 9999851780; [email protected]
RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest