Wednesday, February 11, 2026
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प्रेमपाल शर्मा की कलम से – प्रकाश मनु की रामकथा में कथारस छलछलाता है

पुस्तक : फिर आए राम अयोध्या में (रामकथा)
लेखक : प्रकाश मनु
प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स (प्रा.) लि., ओखला इंडस्ट्रियल एरिया, नई दिल्ली
संस्करण : 2024
पृष्ठ : 256
मूल्य ; रुपए 250/-
रामकथा का स्थान केवल हिंदी साहित्य में ही नहीं, विश्व साहित्य में भी अनुपम है। इसके समकक्ष ऐसी ही सर्वांग सुंदर, साहित्य के सभी रसों का आस्वादन कराने वाली कथा विश्व की किसी भी भाषा में आज तक नहीं लिखी गई है। यही कारण है कि जितनी श्रद्धा से अमीरगरीब, गृहस्थसंन्यासी, आबालवृद्ध नर-नारी इस रामकथा को पढ़ते या सुनते हैं, उतने श्रद्धाभक्ति से कदाचित किसी अन्य ग्रंथ को पढ़ते हों। भक्ति, ज्ञान, सदाचार, कर्तव्य, धर्म का जितना प्रचारप्रसार समाज के बीच रामकथा से हुआ है, उतना शायद ही किसी अन्य ग्रंथ से हुआ हो। रामकथा की लोकप्रियता के कारण ही अब तक इस पर सैकड़ों संस्करण और टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं, और नित नए-नए रूप सामने आ रहे हैं। 
आए दिन हमारे बीच रामकथा का एक एक नया संस्करण देखने को मिलता है। इसी कड़ी में शिखर लेखक और कथाकार प्रकाश मनु कीफिर आए राम अयोध्या मेंपुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स प्रा.लि. से प्रकाशित होकर आई है। यहाँ उस बात का उल्लेख करना महत्त्वपूर्ण है कि इस समीक्ष्य पुस्तक में कुछ नवीन विशेषताएँ देखने में आई हैं।
प्रकाशक नरेन्द्र वर्मा जी का वर्षों से मनु जी से आग्रह रहा कि अपनी जादुई कलम से आज के तरुणों के लिए भगवान राम के गौरवमय चरित्र की गाथा लिखें, जिसे पढ़कर वे आनंद विभोर होकर बहुत कुछ सीखें भी। प्रभु रामचंद्र जी का चरित्र अगाध है। बहुत रसमय होने के साथ ही, उनमें ऐसा बहुत कुछ है, जिससे पगपग पर हम सीख ले सकते हैं। इसीलिए रामचंद्र जी भारतीय संस्कृति के महानायक हैं, जिनके थोड़ा सा भी निकट जाते ही हमारे दिलों में उजाला हो उठता है, और हम बाहरभीतर से बदलने लगते हैं। प्रकाश मनु जी ने भी उनकी भावनाओं के अनुकूलफिर आए राम अयोध्या मेंशीर्षक रामकथा लिख डाली। यह रामकथा पूरी तरह एक संयुक्त परिवार की कथा या कहें, कहानी है, जिसमें आदर्श गृहस्थ जीवन, आदर्श राजधर्म, आदर्श पारिवारिक जीवन, आदर्श पतिव्रत धर्म, आदर्श भ्रातृ धर्म, स्त्रीपुरुषों के कर्तव्यों का सुंदर दिग्दर्शन है। आज के तनाव भरे विश्व में शांति स्थापित करने के लिए इससे अच्छा ग्रंथ दूसरा नहीं। 
रामकथा गंगा की तरह पवित्र है। इसका जितना भी पाठ किया जाए, मन उतना ही निर्मल होता जाता है। राम का चरित्र प्रेरणा का अजस्र स्रोत है। बाबा तुलसी ने रामकथा स्वयं नहीं कही, बल्कि भगवान शिव, ऋषि याज्ञवल्क्य और काकभुशुंडि जी को वक्ता बनाकर सुनवाई है। भगवान भोलेनाथ ने बड़े भक्तिभाव से यह रामकथा माता पार्वती को सुनाई, याज्ञवल्क्य ऋषि ने ऋषिमुनियों को तथा काकभुशुंडि ने विष्णु जी के वाहन गरुड़ को यह राम का पावन चरित्र सुनाया। यहाँफिर आए राम अयोध्या मेंपुस्तक में प्रकाश मनु जी अपने किस्सागोई वाले अंदाज में वही रामकथा हमें रस लेलेकर सुना रहे हैं। 
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वैसे तो यह एक सीधीसरल रामकथा है। पर पुस्तक को पढ़ते समय ऐसा लगता है, जैसे हम इसे पढ़ नहीं रहे हैं, बल्कि रोचक अंदाज में मनु जी सामने बैठे हमें रामकथा सुना रहे हैं। इसमें मन का रस है। कहीं से भी डूबो, रस ढुर पड़ता है और वह देर तक हमारे अंदर बहता रहता है, हमें रामकथा के उस सुंदर घाट की ओर खींच ले जाता है; यह वही घाट तो है, जहाँ बाबा तुलसीदास ने चंदन घिसा और प्रभु राम को तिलक लगाया था। ऐसी मनप्राणों में बहने वाली रामकथा लिखी है प्रकाश मनु जी ने।
अपनी भूमिका में प्रकाश मनु जी कहते भी हैं,रामकथा के जाने कितने रंगरूप और दृश्यावलियाँ हैं, कितने उतारचढ़ाव, पर उन सभी का आस्वाद विलक्षण है। यों रामकथा मेरे लिए एक अनंत समुद्र की तरह थी, और इसमें अवगाहन करने का आनंद क्या है, शायद बताना मुश्किल है।
पुस्तक में रामकथा राम के जन्म से प्रारंभ होती है और लंका विजय के बाद राम के राज्याभिषेक पर संपन्न हो जाती है। चारों भाई राजा दशरथ के आँगन में मनोहर बाल लीलाओं से राजाप्रजा, सबका मन मोह ले रहे हैं। उनकी बालछवि पर सब बलिहारी जाते हैं। बालरूप सभी का लुभावना होता है, फिर बाल राम के रूप का तो कहना ही क्या! देखिए, इन पंक्तियों में बालक राम की शिशु क्रीड़ा का कैसा सुंदर वर्णन हुआ है
कभीकभी खेल में ज्यादा मगन होते तो माता कौशल्या के बारबार बुलाने पर भी आते। तब वे उन्हें पकड़ने के लिए दौड़ पड़तीं। आगेआगे राम, पीछेपीछे कौशल्या। बड़ी मुश्किल से पकड़ाई में आते। मां हाथ पकड़कर ले जातीं, तो नन्ही दतियों से हंस पड़ते। माँ रोटी खिलाने लगतीं, तो दोएक ग्रास खाकर फिर दौड़ पड़ते और भाइयों के साथ नएनए आनंददायक खेल खेलने लगते।
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हमें कोई चीज जब बड़ी लंबी साधना के बाद, या फिर जब हम उसकी प्राप्ति की आशा छोड़ चुके होते हैं, तब प्राप्त होती है तो अति प्रिय होती है। हम उसे बहुत सँभालकर और दिल के पास रखते हैं। राजा दशरथ को जीवन की सांध्य वेला में चारचार पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई, तो उनकी खुशी का ठिकाना था। परंतु अभी चारों बालक कुमार अवस्था में ही थे कि अपनी यज्ञरक्षा के लिए ऋषि विश्वामित्र रामलक्ष्मण को माँगने के लिए गए। राजा दशरथ ने दोनों बालकों के बदले में मुनि की हर प्रकार से सहायता करनी चाही, पर विश्वामित्र की एक ही रट कि उन्हें रामलक्ष्मण ही चाहिए। अंततः कुलगुरु वसिष्ठ के समझाने पर दशरथ दोनों पुत्रों को विश्वामित्र के साथ भेजने को राजी हो जाते हैं। 
तब वे अपने दोनों बालकों को सीख देना नहीं भूलते हैं। इन पंक्तियों में राजा दशरथ अपने लाडले रामलक्ष्मण को कैसे समझा रहे हैं, देखें
इस पर राजा दशरथ ने किसी तरह मन को धीरज बंधाकर रामलक्ष्मण को बुलाया। बहुत देर तक उन्हें हृदय से लगाकर समझाते रहे कि उन्हें मुनि विश्वामित्र के साथ वन में जाकर किस तरह रहना होगा। बोले, आश्रम में हर तरह से मुनि की सेवा करके उन्हें प्रसन्न रखना। वहाँ उनके यज्ञ की रक्षा करना। साथ ही मुनि जो भी आज्ञा दें, उसका पूरी तरह पालन करना।” 
आज भी हमारे समाज में जब अपने बालकों को कहीं या किसी के साथ भेजते हैं तो ऐसी ही शिक्षा देकर भेजते हैं।
मुनि विश्वामित्र का यज्ञ संपन्न होने के बाद वे दोनों बालकों राम और लक्ष्मण को सीता जी के स्वयंवर में जनकपुर ले जाते हैं। वहाँ शिवधनुष भंग होने पर परशुराम जी का क्रोधावेष्टित आगमन होता है। लक्ष्मण की उनसे तीखी नोकझोंक होती है, परंतु उम्र का लिहाज तो होना ही चाहिए, विनम्रता को नहीं त्यागना चाहिए, संयम को बनाए रखना जरूरी है। प्रकाश मनु जी की लेखनी से ये कैसी सुंदर पंक्तियाँ निःसृत हुई हैं, विनयी राम कैसे सुंदर शब्दों के साथ सामने आते हैं, देखिए
लक्ष्मण कुछ कहने ही वाले थे, परंतु रामचंद्र जी ने उन्हें संकेत से बरज दिया। फिर परशुराम को ज्यादा क्रोध में देखकर उन्होंने बड़ी विनय के साथ कहा, छोड़िए मुनिवर, पुराना धनुष था, हाथ लगाते ही टूट गया। अब आप इस पर इतना क्रोध कीजिए, या फिर कोई प्रवीण व्यक्ति इसे जोड़ सकता हो, तो बुला लीजिए, ताकि आपका क्रोध शांत हो जाए।” 
रामकथा आखिर एक संयुक्त परिवार की कहानी ही तो है। परिवार में हमेशा खुशियाँ ही नहीं बनी रहती हैं, दुख भी आते हैं। जीवन में उतारचढ़ाव आते रहते हैं, यह प्रकृति का नियम है। सरलता और कुटिलता जीवन में साथसाथ चलती हैं। राम को अतिशय प्यार करने वाली रानी कैकेयी अपने दो वरदानों में राजा दशरथ से राम के लिए 14 वर्ष का वनवास और भरत के लिए राजगद्दी माँगती है। इस पर राम की माता कौशल्या ने किसी को दोष देते हुए क्या कहा। मनु जी की इस रामकथा की ये पंक्तियाँ देखिए
राम को गोद में बैठाकर उन्होंने लाड़ से सिर पर हाथ फेरा और बारबार चूमा। फिर कहा, ‘अब जाओ पुत्र, वन गमन की तैयारी करो।फिर एक क्षण रुककर कहा, पुत्र, यह केवल तुम्हारी ही नहीं, माँ के रूप में मेरी भी परीक्षा है। मुझे बिना विचलित हुए पूरे धीरज के साथ तुम्हें वन जाने के लिए विदा करना होगा। नहीं तो विधाता मेरी दुर्बलता के लिए मुझे क्षमा करेगा।” 
किसी भी परिवार को एकता के सूत्र में बाँधकर रखना, संतान को उच्च संस्कार देना और संकट में भी धैर्य बनाए रखना माताओं के ही वश की बात होती है। राम वनगमन की सूचना सुनकर लक्ष्मण भी अब उनके साथ जाना चाहते हैं, पर माता से आज्ञा लेना जरूरी है। माता सुमित्रा की ये पंक्तियाँ लक्ष्मण के साथसाथ हर गृहस्थ के लिए गौर करने लायक हैं, देखें
सुमित्रा के लिए अपने दुख को सँभालना आसान था, फिर भी अवसर के अनुकूल धीरज धारण करके उन्होंने कहा, बेटा लक्ष्मण, जब रामसीता वन में जा रहे हैं तो अयोध्या में तुम्हारा कोई काम नहीं है। यहाँ का राजमहल भी तुम्हारे लिए काँटों की सेज की तरह है। राम और सीता तुम्हारे मातापिता जैसे हैं। उनकी सेवा करते हुए वन में रहना तुम्हारे लिए स्वर्ग से बढ़कर सुख है।” 
आज के स्वार्थी संसार में परिवारों को टूटन से बचाए रखने के लिए सुमित्रा जैसी सोच की नितांत आवश्यकता है। दोनों माताओं में से किसी ने भी कैकेयी के कृत्य पर बुराभला तो दूर, कोई कटु शब्द तक नहीं बोला।
गृहिणी की पहली चिंता होती है अपने परिवार की सलामती। इसके लिए वह देवदेवियों और नदियों तक से प्रार्थना करते हुए परिवार की कुशलता की ही कामना करती है। वह घर के हर सदस्य की फिक्र करती है और जब परिवार संकट से गुजर रहा हो तो धैर्य बनाए रखकर वह किसकिस से मनौती नहीं माँगती है। प्रकाश मनु जी की रामकथा में माता सीता की चिंता किन सुंदर पंक्तियों में प्रकट हुई है
सीता जी ने माँ गंगा से प्रार्थना की, हे माँ, जिस तरह मैं पति राम और देवर लक्ष्मण के साथ वन में जा रही हूँ, उसी तरह वहाँ से सकुशल लौटूँ, यह आशीर्वाद दीजिए। लौटकर मैं तुम्हारी पूजा और अर्चना करूँगी।” 
स्वार्थ के वशीभूत होकर माताएँ अपने पुत्र के लिए बड़ेबड़े अनर्थ और छल-कपट करती आई हैं। वे अपने पुत्र को ही बड़ा और सर्वोपरि देखना चाहती हैं, और पुत्रों ने भी ऐसी माता को सिरमाथे पर बिठाया है। उनके कुटिल कृत्यों और षड्यंत्रों में शामिल हुए हैं। ऐसी घटनाओं से इतिहास बहुत बार कलंकित हुआ है, पर रामकथा सबसे अलग है। माता कैकेयी के कृत्य में जरा सा भी सहयोगी रहते हुए भी कुमार भरत को कितना पश्चात्ताप और आत्मग्लानि हो रही है। वह माता कौशल्या के सामने अपने आप को कलंकित महसूस कर रहे हैं। भरत जी द्वारा कही गई ये पंक्तियाँ रामकथा में अमर हो गई हैं
एक क्षण रुककर, भीतर से फूटती रुलाई को किसी तरह रोककर उन्होंने कहा, माँ, मैं सत्य कहता हूँ, अगर मुझे पहले से पता होता कि मेरे कारण अयोध्या में ऐसी भीषण लीला रची जानी है और मेरी माँ ऐसा पापकर्म करेगी तो मैं अपने आप को पहले ही खत्म कर लेता। तब आपको ऐसा दुख का दिन नहीं देखना पड़ता, माँ।
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अकसर ऐसा देखा जाता है कि कई बार लोग पूर्वग्रह पाले रहते हैं, बिना मिले, बिना सोचे स्थितियों का गलत विश्लेषण कर लेते हैं, नकारात्मक सोच ज्यादा प्रभावी हो जाती है, वास्तविकता सामने आने पर बेहद शर्मिंदगी से दोचार होना पड़ता है। वैसा ही कुछ निषादराज और लक्ष्मण जी के साथ होता है, जब वे पूरे लावलश्कर के साथ भरत जी को वन में आते हुए देखते हैं। वे घोड़ों की टापों से उड़ती हुई धूल से ही गलत अनुमान लगा लेते हैं, पर निषादराज इस सबका पता लगाने के लिए भरत जी से मिलते हैं तो मनु जी की कलम से निकली ये पंक्तियाँ किसी का भी मन परिवर्तन करने वाली और सोचने को विवश करने वाली बन पड़ी हैं। मन का सारा पूर्वाग्रह यहाँ खत्म हो जाता है। देखें ये पंक्तियाँ—
फिर भरत उसे बड़े भैया राम का सखा जानकर इतने प्रेम से मिले कि निषादराज की आँखों से आँसू बह निकले। सोचने लगा, अरे यह तो राम के प्रेम में सिर से पैर तक भीगे हुए हैं, इनके तो रोमरोम में राम की पुकार समाई हुई है। ओह! मैंने इनके बारे में क्या सोच लिया था। कितनी बड़ी भूल हो जाती अगर…!”
संकट के समय में परिवार को एकजुट बनाए रखने के लिए बड़ी दूरंदेशी की जरूरत होती है। किसी को दोष देने से संकट का निवारण नहीं होता है। कुलीन लोग तुरंत कुछ प्रतिक्रिया व्यक्त कर आगे परिवार की एकता पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में सोचते हैं। परिवार में देवरानीजेठानी वाणी का संयम बनाए रखकर ऐसा कुछ नहीं बोलती हैं, जिससे आगे के जीवन में उन्हें शर्मिंदा होना पड़े, या दिल ही मिल सकें। 
कैकेयी ने कितना अनर्थ कर डाला, कि राम युवराज बनतेबनते अयोध्या को ही त्याग वन में चले गए। इतना ही नहीं, कोसल राज्य राजा दशरथ की मृत्यु से अनाथ सा हो गया। इतना सब होने के बावजूद माता कौशल्या ने कैकेयी को दोष दिया, सुमित्रा ने। हाँ, प्रजाजन ने जरूर उसे बहुत बुराभला कहा। प्रजा कुछ भी कह सकती है। 
भरत के साथ जब सब परिवारजन राम को लौटा लाने वन में जाते हैं तो कैकेयी का पश्चात्ताप उस समय सामने आता है, जैसे वह अपने कृत्य की सफाई दे रही हो। देखिए, प्रकाश मनु जी ने अपनी रामकथा में कैसा मन को भिगो देने वाला वर्णन किया है
कैकेयी दुख की प्रतिमूर्ति सी लग रही थी। उसने कुछ कहना चाहा, पर कह सकी। होंठ काँपकर रह गए। फिर धीरे से उसने कहा, राम, मेरे पुत्र, सच मानो, किसी अनीति की छाया ने मुझे ग्रस लिया था। और अब क्या कहूं? हो सके तो मुझे क्षमा” 
मनु जी आगे कैकेई की मनःस्थिति का वर्णन करते हुए लिखते हैं, कैकेयी ने राम के सिर पर हाथ फेरा, आँसू की दो बूंदें उसके नेत्रों से ढुरक गईं।
जब राम की माता कौशल्या ने ही कैकेयी को दोषी नहीं माना तो राम तो करुणा के सागर हैं। वे भला कैसे माँ कैकेयी को अपराधी मान सकते थे। राम पुरुषोत्तम ऐसे ही नहीं कहे जाते। मनु जी की कलम से निकली ये पंक्तियाँ राम के चरित का संपूर्ण सार सामने रख देती हैं, देखिए— 
राम ने फिर से कैकेयी को प्रणाम करके कहा, माँ, तुमसे अधिक प्रिय मेरे लिए कोई और नहीं है। और मैं जानता हूँ कि तुम मुझे कितना प्रेम करती हो। पर शायद विधना को ही कोई खेल खेलना था। इससे हर तरह से मेरा लाभ ही हुआ है। तुम बिल्कुल इसको लेकर कोई सोच करना, माँ।‘” 
पश्चाताप के आँसू में नहाकर बड़े से बड़ा पापी भी शुद्ध मना हो जाता है।
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सत्ता के लिए दुनिया का इतिहास रक्त रंजित होता रहा है। राज सिंहासन पर बैठने के लिए बेटा बाप का कत्ल कर देता है और भाईभाई का, यहाँ तक कि मंत्री अपने राजा का। परंतु रामकथा के राम और भरत के बीच राज सिंहासन कंदुक जैसा बन गया है। राम अपने वचनों और तर्कों से भरत को अयोध्या का राजकाज सँभालने की सीख देते हैं, रघुवंश में वचन को निभाना सर्वोपरि मानते हैं। उधर भरत का हठ है कि राजसिंहासन पर बैठने का अधिकारी तो राजा का बड़ा पुत्र ही होता है, और भैया राम सब प्रकार से योग्य हैं, प्रजा में उनकी स्वीकार्यता भी है, अतः भैया राम अयोध्या लौट चलें और राजकाज सँभालें। 
दोनों भाइयों को सत्ता के प्रति जरा भी आकर्षण नहीं है। रामकथा में सत्ता सुख का साधन नहीं, प्रजा की सेवा का माध्यम है। ऐसे आदर्श पात्र दुनिया के साहित्य में ढूँढ़े नहीं मिलेंगे। अंततः विद्वानों, गुरु और भाइयों की आपसी सहमति से मध्य मार्ग निकाला जाता है। देखिए, आदर्श रामकथा की ये आदर्श पंक्तियाँ—
सुनकर सभी की निगाहें भरत जी की ओर मुड़ गईं। तब भरत ने विनीत भाव से कहा, भैया, तब मेरा एक अनुरोध आप मान लें। आप अपनी चरणपादुकाएँ मुझे दे दें। वही आपकी निशानी के रूप में राजसिंहासन पर रखी जाएँगी। मैं आपके आज्ञापालक के रूप में अयोध्या के ही निकट किसी स्थान पर, सादा वेश में रहते हुए शासन का जिम्मा सँभालूँगा। अयोध्या का राजपद आपका है, और आपसे ज्यादा कोई इसका अधिकारी नहीं है।…
आपकी ये चरणपादुकाएँ राजसिंहासन पर रखकर मैं आपकी इच्छानुसार और आपके सुंदर आदर्शों के अनुसार राज्य की रक्षा करूँगा। साथ ही मैं आपका वनवास पूरा होने ही अवधि गिनता रहूँगा। 14 वर्ष पूरे होते ही आप आकर यह राजसिंहासन सँभाल लें। अगर इसमें एक दिन का भी विलंब हुआ तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगा।” 
सच ही, भाईभाई के बीच प्रेम की अद्भुत मिसाल हैं चारों भाई। संसार में प्रेम का यह आदर्श दुर्लभ है।
सब प्रकार से ज्ञानीगुनी होते हुए भी राम अपनी भार्या सीता तथा अनुज लक्ष्मण के साथ ऋषिमुनियों के आश्रमों में जाजाकर ज्ञानार्जन करते हैं। राह में मिलने वाले गिरिजनपुरजन को अपने प्रेम से सींचते वन में आगे बढ़ते जाते हैं। रामकथा की यह भली सीख है कि हमें भी अपने सीखने के दरवाजे बंद नहीं कर लेने चाहिए और जीवन में गरीब, दीनदुखी के साथ मधुर वाणी से ही पेश आना चाहिए। दुखियारे को सांत्वना के दो बोल भी कम प्यारे नहीं होते हैं। लेकिन जो स्वभाव से ही दुष्ट प्राणी है, उसकी दुष्टता को नजरंदाज नहीं करना चाहिए, अन्यथा उसकी दुष्टता बढ़ती ही जाती है। भगवान राम ने भी जयंत की दुष्टता को बर्दाश्त नहीं किया, उसकी दुष्टता का दंड उसे दिया। 
रामकथा की सीख है कि मर्यादा को कभी नहीं लाँघना चाहिए, अन्यथा संकट या विपत्ति में फँसने का डर हमेशा बना रहता है। माता सीता ने मर्यादा लाँघी तो भारी मुसीबत में पड़ गईं। आज महिलाओं को बहुत सतर्क रहने की जरूरत है, अन्यथा रावण जैसे छलछद्मी, दुराचारी समाज में चारों ओर फैले हुए हैं। अपने इष्ट की अविचलित होकर एकनिष्ठ साधना करने से उसकी प्राप्ति जरूर होती है। शबरी इसका अच्छा उदाहरण है। समान दुख वाले दो प्राणी अगर मिल जाएँ तो उनकी मित्रता सच्ची और दीर्घजीवी होती है, दोनों एकदूसरे के सहायक बन जाते हैं। भगवान राम और सुग्रीव की मित्रता इसी कोटि की है। 
जो महिलाओं पर बलपूर्वक दुराचार करता है, उन पर हिंसा करता है, उनका मानमर्दन करता है, भगवान राम कहते हैं कि वह दुष्ट दंड का अधिकारी है, उसे जीने का अधिकार नहीं होना चाहिए। बालीवध पर भगवान राम ने क्या कहा, देखिए ये पंक्तियाँ
उस पर राम ने उत्तर दिया, सुनो बाली, जो दूसरे की पत्नी पर लोलुप निगाह डालता है, उसे मैं क्षमा नहीं कर सकता। मेरी नजरों में वह अधम और घोर अपराधी है। उसका वध करने में मैं कोई दोष नहीं मानता।
इस संसार में कुछ भी बेकार और तुच्छ नहीं है। बूँदबूँद से घड़ा भर जाता है। छोटीछोटी शक्ति और प्रयासों से विराट शक्ति खड़ी होकर असंभव कार्य भी संभव हो जाता है, बस सामूहिक और सात्विक प्रयास धैर्यपूर्वक करते रहना चाहिए। वानरभालुओं की सीमित शक्ति से समुद्र लाँघने और समुद्र पर सेतु बनाने का असंभव कार्य संभव हो गया। सामूहिक शक्ति अपार होती है। इतना ही नहीं, रावण जैसे दुर्जेय राक्षस को पराजित कर उसके किए का दंड उसे मिला। सामर्थ्य और ताकत का घमंड कभी नहीं करना चाहिए। बुरे कर्मों का अंत भी बुरा ही होता है। यह रामकथा की बहुत बड़ी सीख हमारे लिए है।
कोई हमारे बुरे दिनों में, संकट के समय में किसी भी प्रकार की सहायता करता है तो उसके उपकार को नहीं भूलना चाहिए, कभी भी कृतघ्न नहीं होना चाहिए। लंकाविजय के बाद भगवान राम अपने सहायकों को नहीं भूलते हैं। अयोध्या में उनका समुचित सम्मान कर उनका आभार व्यक्त कर यथायोग्य उपहार देकर उन्हें विदा करते हैं। 
रामकथा सिखाती है कि हमारे अपने जीवन में क्या करणीय है, क्या ग्रहणीय है। सीख और शिक्षा देने वाला इससे आदर्श ग्रंथ दूसरा नहीं है। रामकथा पुनःपुनः पठनीय है, जितनी बार भी पढ़ें, इसका पारायण करें, एक नया रूप सामने आता है, इसीलिए तो मैं कहता हूँरामकथा: नितनित रूप नयौ। रामकथा को कितनी ही बार पढें, इससे ऊब नहीं होती है, इसमें मन गहरे पैठता है, रमता है। यह रामकथा तनमन दोनों को निर्दोष बना देती है। 
प्रकाश मनु जी जैसा बोलते हैं, वैसा ही लिखते हैं, उनकी भाषा रोजमर्रा की सहजसरल भाषा है, इसीलिए तो उनकी इस रामकथा में कथारस छलछलाता है, मन को अंदर तक भिगो देता है। इस तरह प्रकाश मनु जी की यह सुंदर पुस्तकफिर आए राम अयोध्या मेंपुनःपुनः पठनीय है। रामकथा का आत्मीय आनंद लेना है तो इसे जरूर पढ़ना चाहिए। इस पुस्तक की एक प्रति हर घर में जरूर होनी चाहिए।
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प्रेमपाल शर्मा
जी
-326, अध्यापक नगर, नांगलोई, दिल्ली-110041,
दूरभाष : 9868525741
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3 टिप्पणी

  1. प्रेमपाल शर्मा जी द्वारा लिखित
    समीक्षा बहुत समावेशी और अंतरंग है। प्रकाश मनु सहज अभिव्यक्ति के धनी हैं। संदेश और संवेदन को पाठकों तक पहुंचाने वाली भाषा। प्रेमपाल जी उन सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं को स्पष्ट किया
    हार्दिक बधाई

  2. हरि अनंत हरि कथा अंनंता। गोस्वमी तुलसीदास जी का यह कथन अक्शरश: सत्य है कि राम के जितने रुप हैं उतनी ही विविधता है उनके चरित्र में। आदरणीय प्रकाश मनु कृत *आये राम अयोध्या मे* राम के आदर्शों और सहज लीलाओं की सुंदर कथा है और उसको पढने वाला पाठक उसके भाव रस में डूबता चला जाता है।इस कृति पर वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय प्रेमपाल सिंह जी की समीक्षा मन को अभिभूत करती है। मैने स्वयं यह पुस्तक पढी है और राम की कथा कुंभ में स्नेह और भक्ति के रस.में आप्लावित भी हुई हूं ,इसलिए आदरणीय प्रेमपाल जी की भावनाओ को महसूस कर सकती हूं कि उन्हें कैसी अनुभूति हुई होगी। उन्होने हृदय की गहराईयों से राम तत्व को अनुभूत कर रामरस में आकण्ठ डुबकी लगाई है। बहुत ही सहज सरल शब्दों का जादू उनके लेख में चित्रित है।राम का वन गमन ,कैकेई के वरदान और माता कौशल्या का उन्हे वनवास के लिए आज्ञा देना आदि प्रसंगों का सुंदर अनुशीलन किया है।माता सुमित्रा का पुत्र लक्ष्मण को.बिना किसी आपत्ति के भैया और भाभी के.साथ उनकी सेवा में भेजने की अनुमति देना आदि प्रसंग में आदरणीय प्रेम पाल जी ने भावुकतापूर्ण लेखन किया है।सचमुच रामकथा हिदी साहित्य की अमूल्य निधि है।विश्व भर में राम सर्वव्यापी हैं,शाश्वत हैं और विभिन्न भाषाओं में भी मिलती है परंतु जो रसमयता अवधी की रामकथा नें है वो कहीं नहीं है।प्रेम पाल सर लिखते हैं-
    भक्ति, ज्ञान, सदाचार, कर्तव्य, धर्म का जितना प्रचार–प्रसार समाज के बीच रामकथा से हुआ है, उतना शायद ही किसी अन्य ग्रंथ से हुआ हो
    बहुत सुंदर सृजन, नमन आपकी लेखनी को आदरणीय प्रेमपाल सर ।सचमुच आपने रामकथा को हृदय से महसूस कर आदरणीय प्रकाश मनु सर की भक्ति प्रेम और समर्पण की भावना को जीवंत किया है। सचमुच आपने सिद्ध कर दिया है कि मनु सर की रामकथा में प्रेम रस छलकता है।दोनो को मेरा सादर प्रणाम। अशेष साधुवाद।
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

  3. वाह, सुंदर बिटिया, बहुत सुंदर। आपने समीक्षा का सार तत्व ग्रहण कर लिया। रामकथा का भी। बहुत ही रसपूर्ण और सार्थक है आपकी टिप्पणी।

    जुग-जुग जियो बेटी।

    स्नेह, प्रकाश मनु

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