पुस्तक : फिर आए राम अयोध्या में (रामकथा) लेखक : प्रकाश मनु प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स (प्रा.) लि., ओखला इंडस्ट्रियल एरिया, नई दिल्ली संस्करण : 2024 पृष्ठ : 256 मूल्य ; रुपए 250/-
रामकथाकास्थान केवलहिंदी साहित्यमेंहीनहीं, विश्वसाहित्यमेंभीअनुपमहै।इसकेसमकक्षऐसीहीसर्वांगसुंदर, साहित्यकेसभीरसोंकाआस्वादनकरानेवालीकथाविश्वकीकिसीभीभाषामेंआजतकनहींलिखीगईहै।यहीकारणहैकिजितनीश्रद्धासेअमीर–गरीब, गृहस्थ–संन्यासी, आबाल–वृद्धनर-नारी–नइसरामकथाकोपढ़तेयासुनतेहैं, उतनेश्रद्धा–भक्तिसेकदाचितकिसीअन्यग्रंथकोपढ़तेहों।भक्ति, ज्ञान, सदाचार, कर्तव्य, धर्मकाजितनाप्रचार–प्रसारसमाजकेबीचरामकथासेहुआहै, उतनाशायदहीकिसीअन्यग्रंथसेहुआहो।रामकथाकीलोकप्रियताकेकारणहीअबतकइसपरसैकड़ोंसंस्करणऔरटीकाएँलिखीजाचुकीहैं, और नित नए-नए रूप सामने आ रहे हैं।
अकसरऐसादेखाजाताहैकिकईबारलोगपूर्वग्रहपालेरहतेहैं, बिनामिले, बिनासोचेस्थितियोंकागलतविश्लेषणकरलेतेहैं, नकारात्मकसोचज्यादाप्रभावीहोजातीहै, वास्तविकतासामनेआनेपरबेहदशर्मिंदगीसेदो–चारहोनापड़ताहै।वैसाहीकुछनिषादराजऔरलक्ष्मणजीकेसाथहोताहै, जबवेपूरेलाव–लश्करकेसाथभरतजीकोवनमेंआतेहुएदेखतेहैं।वे घोड़ों की टापों से उड़तीहुईधूलसेहीगलतअनुमानलगालेतेहैं, परनिषादराजइससबकापतालगानेकेलिएभरतजीसेमिलतेहैंतोमनुजीकीकलमसेनिकलीयेपंक्तियाँकिसीकाभीमनपरिवर्तनकरनेवालीऔरसोचनेकोविवशकरनेवालीबनपड़ीहैं।मनका सारा पूर्वाग्रहयहाँ खत्म हो जाता है।देखेंयेपंक्तियाँ—
प्रेमपाल शर्मा जी द्वारा लिखित
समीक्षा बहुत समावेशी और अंतरंग है। प्रकाश मनु सहज अभिव्यक्ति के धनी हैं। संदेश और संवेदन को पाठकों तक पहुंचाने वाली भाषा। प्रेमपाल जी उन सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं को स्पष्ट किया
हार्दिक बधाई
हरि अनंत हरि कथा अंनंता। गोस्वमी तुलसीदास जी का यह कथन अक्शरश: सत्य है कि राम के जितने रुप हैं उतनी ही विविधता है उनके चरित्र में। आदरणीय प्रकाश मनु कृत *आये राम अयोध्या मे* राम के आदर्शों और सहज लीलाओं की सुंदर कथा है और उसको पढने वाला पाठक उसके भाव रस में डूबता चला जाता है।इस कृति पर वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय प्रेमपाल सिंह जी की समीक्षा मन को अभिभूत करती है। मैने स्वयं यह पुस्तक पढी है और राम की कथा कुंभ में स्नेह और भक्ति के रस.में आप्लावित भी हुई हूं ,इसलिए आदरणीय प्रेमपाल जी की भावनाओ को महसूस कर सकती हूं कि उन्हें कैसी अनुभूति हुई होगी। उन्होने हृदय की गहराईयों से राम तत्व को अनुभूत कर रामरस में आकण्ठ डुबकी लगाई है। बहुत ही सहज सरल शब्दों का जादू उनके लेख में चित्रित है।राम का वन गमन ,कैकेई के वरदान और माता कौशल्या का उन्हे वनवास के लिए आज्ञा देना आदि प्रसंगों का सुंदर अनुशीलन किया है।माता सुमित्रा का पुत्र लक्ष्मण को.बिना किसी आपत्ति के भैया और भाभी के.साथ उनकी सेवा में भेजने की अनुमति देना आदि प्रसंग में आदरणीय प्रेम पाल जी ने भावुकतापूर्ण लेखन किया है।सचमुच रामकथा हिदी साहित्य की अमूल्य निधि है।विश्व भर में राम सर्वव्यापी हैं,शाश्वत हैं और विभिन्न भाषाओं में भी मिलती है परंतु जो रसमयता अवधी की रामकथा नें है वो कहीं नहीं है।प्रेम पाल सर लिखते हैं-
भक्ति, ज्ञान, सदाचार, कर्तव्य, धर्म का जितना प्रचार–प्रसार समाज के बीच रामकथा से हुआ है, उतना शायद ही किसी अन्य ग्रंथ से हुआ हो
बहुत सुंदर सृजन, नमन आपकी लेखनी को आदरणीय प्रेमपाल सर ।सचमुच आपने रामकथा को हृदय से महसूस कर आदरणीय प्रकाश मनु सर की भक्ति प्रेम और समर्पण की भावना को जीवंत किया है। सचमुच आपने सिद्ध कर दिया है कि मनु सर की रामकथा में प्रेम रस छलकता है।दोनो को मेरा सादर प्रणाम। अशेष साधुवाद।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
प्रेमपाल शर्मा जी द्वारा लिखित
समीक्षा बहुत समावेशी और अंतरंग है। प्रकाश मनु सहज अभिव्यक्ति के धनी हैं। संदेश और संवेदन को पाठकों तक पहुंचाने वाली भाषा। प्रेमपाल जी उन सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं को स्पष्ट किया
हार्दिक बधाई
हरि अनंत हरि कथा अंनंता। गोस्वमी तुलसीदास जी का यह कथन अक्शरश: सत्य है कि राम के जितने रुप हैं उतनी ही विविधता है उनके चरित्र में। आदरणीय प्रकाश मनु कृत *आये राम अयोध्या मे* राम के आदर्शों और सहज लीलाओं की सुंदर कथा है और उसको पढने वाला पाठक उसके भाव रस में डूबता चला जाता है।इस कृति पर वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय प्रेमपाल सिंह जी की समीक्षा मन को अभिभूत करती है। मैने स्वयं यह पुस्तक पढी है और राम की कथा कुंभ में स्नेह और भक्ति के रस.में आप्लावित भी हुई हूं ,इसलिए आदरणीय प्रेमपाल जी की भावनाओ को महसूस कर सकती हूं कि उन्हें कैसी अनुभूति हुई होगी। उन्होने हृदय की गहराईयों से राम तत्व को अनुभूत कर रामरस में आकण्ठ डुबकी लगाई है। बहुत ही सहज सरल शब्दों का जादू उनके लेख में चित्रित है।राम का वन गमन ,कैकेई के वरदान और माता कौशल्या का उन्हे वनवास के लिए आज्ञा देना आदि प्रसंगों का सुंदर अनुशीलन किया है।माता सुमित्रा का पुत्र लक्ष्मण को.बिना किसी आपत्ति के भैया और भाभी के.साथ उनकी सेवा में भेजने की अनुमति देना आदि प्रसंग में आदरणीय प्रेम पाल जी ने भावुकतापूर्ण लेखन किया है।सचमुच रामकथा हिदी साहित्य की अमूल्य निधि है।विश्व भर में राम सर्वव्यापी हैं,शाश्वत हैं और विभिन्न भाषाओं में भी मिलती है परंतु जो रसमयता अवधी की रामकथा नें है वो कहीं नहीं है।प्रेम पाल सर लिखते हैं-
भक्ति, ज्ञान, सदाचार, कर्तव्य, धर्म का जितना प्रचार–प्रसार समाज के बीच रामकथा से हुआ है, उतना शायद ही किसी अन्य ग्रंथ से हुआ हो
बहुत सुंदर सृजन, नमन आपकी लेखनी को आदरणीय प्रेमपाल सर ।सचमुच आपने रामकथा को हृदय से महसूस कर आदरणीय प्रकाश मनु सर की भक्ति प्रेम और समर्पण की भावना को जीवंत किया है। सचमुच आपने सिद्ध कर दिया है कि मनु सर की रामकथा में प्रेम रस छलकता है।दोनो को मेरा सादर प्रणाम। अशेष साधुवाद।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
वाह, सुंदर बिटिया, बहुत सुंदर। आपने समीक्षा का सार तत्व ग्रहण कर लिया। रामकथा का भी। बहुत ही रसपूर्ण और सार्थक है आपकी टिप्पणी।
जुग-जुग जियो बेटी।
स्नेह, प्रकाश मनु