अकसर ही साहित्यिक घेरे में एक बहस उठती रहती है कि पापुलर लिटरेचर को कैसे देखें। इसी क्रम में कई किताबों का जिक्र आता है। अतिरेक में यह भी चर्चा होती है कि पापुलर लिटरेचर जनजीवन से कटा हुआ शुद्ध पल्प होता है। जब पापुलर लिटरेचर की बात आती है तो कॉमिक्स या ग्राफिक्स भी इसी कैटेगरी में रख दिया जाता है। बहरहाल हमलोग उस बहस में नहीं जा रहे हैं लेकिन यहाँ उस पर बात करने का कारण हाल में पढ़ी गयी किताब है। यह किताब फिक्शन नहीं है बल्कि ‘किसानी की कहानी’ है।
यह एक नानफिक्शन ग्राफिक्स में लिखी गयी किताब है। इस किताब पर बात करने से पहले हम भीमबेटका, अजंता, एलोरा से लेकर तमाम गुफा चित्रों पर थोड़ी बात कर लें।
हिन्दुस्तान के इतिहास से परिचित व्यक्ति का इन गुफा चित्रों से थोड़ा बहुत परिचय जरूर होता है। लेकिन ये क्या केवल कोरे चित्र थे। यह सारे गुफा-चित्र, उसके रंग आज इतिहास के सबसे सशक्त स्रोत के रूप में हमारे सामने हैं। कोई भी कह सकता है कि इन बातों का यहाँ पर जिक्र क्यों हो रहा है। दरअसल ‘किसानी की कहानी’ एक ग्राफिक्स यानी कामिक्स में लिखी गयी किताब है। चित्र और संवाद को बाक्स के भीतर बनाया गया है। आज से तीस साल पहले की पीढ़ी कामिक्स से बखूबी परिचित है। चंदामामा,बिल्लु पिंकी,चाचा चौधरी से लेकर नागराज, सुपरकमांडो ध्रुव जैसे पात्र लोगों की जुबान पर थे। इन कामिक्स की वजह से कितने बच्चों ने सीक्रेट लाइब्रेरी चलायी।
विश्व के विभिन्न देशों में ग्राफिक्स फिक्शन और नान फिक्शन को जोड़ कर बहुत काम हुआ है। 1895-1898 में अमरिकी कार्टुनिस्ट रिचर्ड एफ आउटकाल्ट ने स्लम में रहने वाले एक सामान्य साधारण लड़के ‘यलोकिड’ को दुनिया के सामने लेकर आये। 1930 के बाद से कामिक्स की दुनिया में खास तौर अमरीकी कामिक्स में एक्शन फीगर की भरमार हो गयी। 1938 तक लेखक जैरी सीगेल और कार्टुनिस्ट शस्टर के सुपरमैंन जैसे एक्शन हीरो ही कामिक्स का नाम हो गये। इसका प्रभाव हम भारतीय कामिक्स साहित्य पर भी देख सकते हैं। थोड़ा बहुत फेरबदल बेल्जियम के कार्टुनिस्ट लेखक हर्ज ने एडवेंचर आव टिनटिन में किया है। लेकिन वह भी एक्शन और जासूसी से ऊपर नहीं गया।लेकिन इन सभी कामिक्स ने यह तो तय कर दिया कि कामिक्स का एक बहुत बड़ा पाठक वर्ग है और उसका प्रभाव खासतौर टीन एजर और एंग एडल्ट पर बहुत पड़ता है।
बीसवीं सदी में आर्टी की किताब माउस बहुत ही खास है। लेखक स्पीगलमैन के पिता खुद नाजी जर्मनी के अत्याचारों से बच कर निकले थे। एक होलोकास्ट सरवाइवर की पूरी मानसिकता,उसका पारिवारिक जीवन और बदलते जीवन में फासीवाद का बढ़ता शिकंजा। सबकुछ बहुत ही जीवंत है। इतिहास,रिपोर्ट,आत्मकथा,जीवनी और कहानी आपस में घुलमिलकर एक अलग विधा में तब्दील हो जाते हैं।
चित्र-मूर्तिकला ने कहानियों को जिन्दा रखा है। अन्यथा इतिहास की दमनकारी ताकते उन्हें कभी भी अगली पीढ़ी तक नहीं पहुँचने देती। अब वापस हमलोग ‘किसानी की कहानी’ पर आते हैं। 25 नवम्बर 2020 की कड़कड़ाती ठंड में देश भर के किसानों दिल्ली के बार्डर पर आ गये थे। पूरे मध्यवर्ग को समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या हो रहा है। उसके कुछ ही साल पहले जंतर-मंतर पर किसान अपनी बिवाई पड़ी एड़ियों को घिसते हुए सुदूर दक्षिण से चल कर आये थे। उनके साथ उनके साथियों की हड्डियां थीं। और उसके पहले जायें तो पी साईनाथ जैसे पत्रकारों की खबरें थी जिसमें अनगिनत किसान आत्महत्या कर रहे थे। दिल्ली के बार्डर पर जब किसान आये तो सबसे पहले सरकारे भूल गयीं कि यही किसान लोगों के अन्नदाता है।
‘किसानी की कहानी’ का शायद वही ट्रिगर प्वाइंट है। इसमें किसानों की व्यथा और शहरी मध्यवर्ग की उससे ऊब साफ दिखती है। कैसे वह भूल चुका है कि किसी भी स्थिति में कोई पैसा नहीं खायेगा। वह फल,सब्जी और अनाज ही खा सकता है। और यह सब उगता है,इसे कोई उगाता है। यह किताब सोरित गुप्तो ने अपनी बेटी पिउ के अठ्ठारवें जन्मदिन पर भेंट की है। वह पूरी किताब को दो हिस्सों मे बांटते हैं। हर अध्याय के शुरूआती हिस्सों में वह अपनी बेटी से बातें करते हैं। वह उन्हें विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से किसानों के मुद्दे पर लेकर आते हैं। पहले हिस्से में वह अपनी बेटी के छोटे से अनुभव को विस्तार देतें हैं और दूसरे हिस्से में कामिक्स स्ट्रिप व संवाद के माध्यम से इतिहास,रिपोर्ट और उससे जुड़े तथ्य साझा करते हैं। दोनों हिस्सों की खासियत यह है कि वह नहीं भूलते कि उनका पाठक वर्ग कौन है। पहला चित्र ही ‘हम भारत के किसान’ का है। जो कि 2004 में ‘द हिन्दु’ में छपी पत्रकार पी साइनाथ की रिपोर्ट का हिस्सा है। उस चित्र में ही भारत के किसान की त्रासदी है जिसमें कर्ज का जाल,बीमारी,मौत और हताशा का पूरा खाका है। यह चित्र सिर्फ एक परिवार का नहीं है। पूरे देश के ज्यादातर किसानों की हालत का है।
एक बाक्स में बड़े ही रोचक तरीके से अपने बाजूओं को फड़काता किसान बताता है कि कभी कृषि क्षेत्र से देश की आय में 75 प्रतिशत तक का योगदान था लेकिन वही दूसरी स्ट्रिप में एक अधमरा कमजोर किसान बताता है कि 70 प्रतिशत आबादी जिस किसानी में लगी है, वहां से देश की आय मात्र 17 प्रतिशत होती है। अगले दृश्य में अर्ध-गोलार्ध में बड़े पलायन का दृश्य है। गाँव से हर दिन 25 हजार किसान खेती छोड़कर मजदूरी करने शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। इसी अध्याय में एक चौकोर बाक्स में अनगिनत पांव लटके हुए हैं। यह पढ़ने वाले को रोक देता है। वह ठहर कर उन लटके पैरों को देखने लगता है जो आत्महत्या करते किसानों की दारूण गाथा है।
यहां से पूरी किताब का एक टोन सेट हो जाता है। हर अध्याय का नाम भारत के डाक टिकट पर छपा है उसी से जुड़ा चित्र अपने आप में एक कमेन्टरी है। एनीमेशन से पहले लेखक फिर से अपनी बेटी से बातें करता है। वह मिथक तोड़ता है कि भारत शुरू से एक कृषि प्रधान देश रहा है। यह हिस्सा बहुत ही जरूरी है क्योंकि इसी से उपनिवेशवाद के कारण भारत की दुर्दशा पर महत्वपूर्ण बात होती है। ढ़ेढ़ सौ साल की अंग्रेजों की गुलामी ने खेती को,किसानी को कैसे तोड़ा-तबाह किया इस पर शायद ही चर्चा होती है। ‘किसान बने नहीं किसान बनाए गए’। लार्ड क्लाइव के मुर्शिदाबाद शहर के संस्मरण वाले बाक्स जिक्र है कि यह शहर सम्पन्नता और वैभव में लन्दन शहर के बराबर है। उन्नीसवीं सदी में अंग्रेजों ने इस देश पर कब्जे के साथ ही इसके कल-करधे,कारखाने को तबाह करना शुरू कर दिया। मुर्शिदाबा,आगरा,ढ़ाका,लखनऊ जैसे शहरों से उजाड़ कर लोगों को वापस गांवों में ठेल दिया गया। अंग्रेजों की नीतियों के प्रति दुर्भाग्यवश हमारे यहाँ एक मुलामियत का भाव रहा है। उपनिवेशवाद को एक दुश्मन के रूप में देखने के बजाय दुश्मन को अर्वाचीन तरीके से ढ़ूढ़ने का चलन है। यहां लेखक ने अंग्रेजी सरकार की नीतियों और भारतीय साहूकारों का अंग्रेजों का पिठ्ठु होना बड़े ही सरल तरीके से दिखाया है। इसके दो स्ट्रिप जिसमें महाजन अंग्रेज सरकार की मूर्ति के पीछे छुपा है और दूसरा जिसमें उसने अंग्रेजी सरकार का झंडा पकड़ा है और उसकी जयकार कर रहा है, बहुत ही मारक हैं। इसी बात को तथ्य के रूप में यूं समझा जा सकता है कि एम.एल.डार्लिंग की रिपोर्ट ‘पंजाब पीजेंट इन प्रपैरिटी एंड डेट’ के अनुसार सन् 1868 से 1911 के बीच महाजनों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई थी।
अगला अध्याय आजादी के बाद की समस्याओं से जुड़ा है जिसमें विभिन्न राज्यों की भूमि सुधार नीतियों पर चर्चा हुई है। इसी के साथ किन राज्यों ने भूमि सुधार को लागू करने में चालाकी की और किन राज्यों ने कमोबेश उसे लागू किया इसका विवरण है। इसके अलावा खाद्न्न संकट से निपटने के लिए किस तरह की योजनायें आयी उसका जिक्र है। इसी में बहुत ही रोचक ढ़ंग से अमरीका ने किस तरह भारत को पहले अनाज पर रोक लगायी और फिर किस तरह का अनाज निर्यात किया उसका प्रसंग है।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली की शुरूआत और फिर उसके बाद धान को लेकर भारतीय वैज्ञानिक डा.रिछारिया के माडल और राकफेलर और फोर्ड फाउंडेशन के सहयोग से बने आई. आर. आर. आई के मॉडल का अंतर साफ दिखायी देता है। डा.रिछारिया ने धान की 19 हजार प्रजातियों को इकठ्ठा किया था। वह इस काम को उन्होंने मात्र बीस हजार रूपये और आठ लोगों की टीम जिसमें दो छात्र और छह किसान थे अंजाम दिया। व्यक्तिगत तौर मुझे ये प्रसंग इतना प्रेरणास्पद लगा कि हमारे हीरो के तौर हमें डा.रिछारिया के बारे में क्यों नहीं बताया गया। आखिर हरित क्रांति का इतना महिमामंडन क्यों हुआ। यह सही है कि उस समय की तात्कालिक जरूरत सभी का पेट भरना था। लेकिन तथ्यों को बहुत नजदीक से जानने के बाद समझ आता है लेकिन अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर बीजों और खेती को नियंत्रित करने का भी काम हो रहा था। डा. बोरलॉग को कृषि वैज्ञानिक डा. स्वामीनाथन ने भारत बुलाया। उसी सलाह पर कृषि क्षेत्र में बदलाव हुए लेकिन उससे अमीर किसानों का पूरा जीवन बदल गया और दूरगामी तौर पर गरीब किसान और उर्वर भूमि दोनों की हालत क्षरित हो गयी।
उस पूरी तात्कालिक जरूरत और अमरीकी दबाव का नतीजा हम सब देख रहे हैं। जमीन की उवर्रता का दोहन,कीटनाशक और खाद के चलते कैंसर जैसी बीमारियों का महामारी के तौर पर होना और भूजल का लगातार नीचे गिरते जाना। इन सबका नतीजा कर्ज के बोझ के रूप किसानों पर पड़ा।
इस किताब की खूबी है नयी आर्थिक नीतियों के बाद किस तरह किसानों की हालत और बदहाल हुई उस पर बेबाकी से चर्चा। हिंसक दांत लिए सूदखोर महाजन की वापसी वाला चित्र नयी आर्थिक नीतियों से बहुत उत्साहित है। भारतीय खाद्य निगम का नीजिकरण, किसानों को कर्ज देने वाली सरकारी संस्थाओं को सीमित करना,बीज और खाद पर से सब्सिडी लगातार कम होना। सबकुछ किसानों को खुले बाजार के चंगुल में फंसाने के लिए काफी हैं।
किसानी की कहानी बंगाल से लेकर सभी राज्यों में जिस तरह किसानों से उपजाऊ जमीने छीन कर कारपोरेट को दी गयी और उन पर अत्याचार हुआ। उसको यंग एडल्ट को बताती है। सोरित गुप्तो अपने आखिरी अध्याय में आते आते उस समस्या पर बात करते हैं जो कि साम्राज्यवादी लूट के चलते पूरी दुनिया झेल रही है। ग्लोबल वार्मिंग जिसके लिए साधारण किसान जिम्मेदार नहीं हैं लेकिन खेती ओलावृष्टि,अति बारिश या सूखे की शिकार होती है। अपनी बेटी को किसानों की दास्तान बताते बताते लेखक वापस उसी ट्रिगर प्वाइंट पर लौटते हैं कि आखिर ये किसान क्यों दिल्ली के चारो ओर आकर इकठ्ठा हो गये।
किताब के अंत में अपनी बेटी से पिउ से लेखक पूछते हैं कि मान लो कोई सब्जी,फल,अनाज उगाने वाला नहीं है। कोई मसाला,गुड़,तेल का उत्पादन करने वाला नहीं है। तब क्या होगा। गौरतलब है कि किसानी की कहानी उनकी बेटी पिउ सुन रही है और कवर पर स्त्रियां धान रोप रही हैं। पूरी किताब में जिस बात का जिक्र नहीं है वह बहुत ही साफगोई से स्थापित हो गयी है। वह है कि किसान का जेंडर सिर्फ पुरूष नहीं है दूसरा यह कहानी एक लड़की सुन रही है। यानी किसानी के सरोकार और संवेदना का जेंडर सिर्फ पुरूष नहीं है। यह एक ऐसी मुद्रा है जिसमें एक लम्बी बहस का निचोड़ है।
तकरीबन बीस से बाइस साल पहले वीडियो गेम्स के माध्यम से एक टोपोग्राफी तैयार करके एंग-एडल्ट को यहां बम गिराओ, वहाँ बम गिराओ की ट्रेनिंग शुरू की गयी थी। उस पूरे संवेदनहीन एनीमेंशन की ट्रेनिंग का नतीजा सामने है। इसी के साथ एंग-एडल्ट की दुनिया में जापानी कॉमिक्स मांगा का भी दखल हुआ। लेखक इस पूरे परिदृश्य से वाकिफ हैं। उन्होंने नयी पीढ़ी के ही टूल और तरीके को उनसे बात करने के लिए चुना है। इसके लिए साधुवाद देना स्वाभाविक है। किताब का लेखन और चित्रांकन प्रसिद्ध कार्टुनिस्ट सोरित गुप्तो ने किया है। यह किताब अभी हाल में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।
सविता पाठक
जन्म 2.8.1976 जौनपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ है। शिक्षा विभिन्न शहरों से हुई है। हिन्दी की कई प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में लेख और कहानियाँ प्रकाशित। इसके अलावा सविता अनुवाद करती है।
डा आंबेडकर की आत्मकथा वेटिंग फार वीजा का अनुवाद। क्रिस्टीना रोसोटी की कविताओं के अलावा कई लातीं अमरीकी कविताओं का अंग्रेजी से अनुवाद। पाखी के सलाना अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित। वीएस नायपाल के साहित्य पर शोध।
कहानी संग्रह ‘हिस्टीरिया और अन्य कहानियां’ लोकभारती प्रकाशन। हाल में ही प्रकाशित उपन्यास ‘कौन से देस उतरने का’ लोकभारती प्रकाशन से आया है जिसकी काफी चर्चा हुई। फिलहाल सविता पाठक दिल्ली विश्वविद्यालय के दीनदयाल उपाध्याय कालेज में अंग्रेजी साहित्य का अध्यापन करती हैं।