Wednesday, February 11, 2026
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सुधा जुगरान द्वारा ‘खाकी में स्थितप्रज्ञ’ की समीक्षा – पारदर्शी तथ्य

जैसे एक मछली पूरे तालाब को गंदा करती है, वैसे ही कुछ स्थितियां आम जनता व पुलिस के विश्वास-सेतु पर भी बन जाती हैं। ऐसी ही स्थितियां वर्तमान परिदृश्य में प्रत्येक क्षेत्र में बन रही हैं। फिर वह,  राजनीति, खेल, फिल्म, साहित्य, चिकित्सा, प्रशासन, चाहे जो भी क्षेत्र हों, ये आम जनता की रोजमर्रा के जीवन के अंग तो हैं पर उसकी पहुंच से दूर है।
इन्हीं क्षेत्रों में जाने के लिए देश का हर युवा प्रयत्नशील भी है और इन्हीं पर विश्वास नदारद  भी है। बात चाहे बाह्य दृश्यों की करें या अंतर्निहित दृश्यों की… भ्रष्टाचार की दुर्गंध पृष्ठ पलटने पर कहीं भी मिल जाएगी। मनुष्य ही है जो  आतंकी भी है, अत्याचारी भी है, दुराचारी भी है, भ्रष्टाचारी भी है और सज्जन भी है, कर्तव्य परायण भी है, बुराई के खिलाफ लड़ने वाला भी है, साधू भी है और साधू भाव वाला भी है।
मतलब कि मानव वही है और भाव अनेक हैं । 
जीवन की किन स्थिति-परिस्थितियों में कौन सा भाव मजबूती पा गया, किसी के मनोभाव का कौन सा पृष्ठ पलट गया, कौन से पन्ने पर अन्तर्दृष्टि स्थिर हो गई, कहा नहीं जा सकता। किस व्यक्ति विशेष, क्षेत्र विशेष से मन संवादहीनता की स्थिति में आ जाए, यह बहुत कुछ स्वयं मानव के हाथ में भी नहीं होता। ऐसा नहीं है कि पुलिस की वर्दी के पीछे गलत आचरण होते ही नहीं हैं या सेना में कुछ लोग गलत आचरण के नहीं होते, लेकिन सेना दूसरी देश की सेना से लड़ कर स्वदेश की रक्षा करती है, इसलिए उस वर्दी के दाग अच्छे दिखाई देते हैं।  वहीं पुलिस अपने ही देशवासियों से अपनी ही जनता को बचाती है। पुलिस का अपनों के खिलाफ, अपनों के लिए युद्ध है, जिसमें हथियार उठाने के अधिकारों पर परिस्थितिजन्य सीमाएं बंधी होने के कारण एक पुलिस  अधिकारी कभी-कभी स्वयं के खिलाफ भी युद्ध वाली स्थिति में आ जाता है।
पुलिस कितना भी अच्छा करे, वह मित्र पुलिस जैसा भाव आम जनमानस के मन में नहीं उपजा पाती है। पुलिस की वर्दी देख अक्सर डर का भाव आम जनता के ह्रदयों में पारित हो जाता है। पुलिस की वर्दी एक अपारदर्शी पर्दा है, आम जनमानस और वर्दी के अंदर के उस आम इंसान के बीच, जिसके कारण विश्वास की दीवार हमेशा पतली, कमजोर व जीर्ण- शीर्ण अवस्था में रहती है। 
उसी अपारदर्शी पर्दे को पारदर्शी बनाती है लेखक व उत्तराखंड के पूर्व डीजीपी श्री अनिल रतूड़ी जी की पुस्तक, ‘खाकी में स्थितप्रज्ञ’। पुस्तक में लेखक की अपनी जीवन-यात्रा के सेवाकाल व व्यक्तिगत दोनों के विषम अनुभवों,  वाकयों व बेशुमार रोंगटे खड़े करने वाले हालातों, मजबूरियों को मजबूती में बदलने वाले जज्बे की अभूतपूर्व दास्तान है। आश्चर्यचकित व हतप्रभ रह जाता है पाठक अनेक अवसरों पर। महिला पाठक अनेक अवसरों पर श्री अनिल रतूड़ी जी की पत्नी राधा मैम, जो स्वयं एक योग्य व लोकप्रिय आईएएस अधिकारी हैं, के मनोभावों व डर को आत्मसात कर लेती हैं। युवा पुलिस ऑफिसर के लिए कभी मां का तो कभी पत्नी का डर अपने अंदर महसूस करती हैं।
जब हम किसी भी साहित्यकार की जीवन-यात्रा या उनकी आत्मकथात्मक रूप से लिखी गई पुस्तक को पढ़ते हैं तो बहुत कम वाकयों को लेकर पाठक की जिज्ञासा बनी रह पाती है, किंतु जब पाठक एक ऐसे साहित्यकार की जीवन-यात्रा के बारे में पढ़ते हैं जो एक काबिल, मजबूत इरादों वाला और कठिन परिस्थितियों में नौकरी कर चुके आईपीएस ऑफिसर की हो या उनके द्वारा आत्मकथात्मक रूप में लिखी गई हो तो एक विलग तरह का भाव पाठक के अंदर समा जाता है। हम उसमें साहित्य नहीं देखते और उसमें मात्र साहित्य के लिए कोई संभावना होती भी नहीं है, क्योंकि वह एक भोगा हुआ यथार्थ होता है जो भी घटनाएं इस पुस्तक में ली गई हैं अधिकतर पाठक उन घटनाओं के समकालीन हैं। उन खबरों को टीवी पर सुना अथवा पेपर में पढ़ा है। वे सभी पाठकों की भोगी व महसूस की हुई घटनाएं हैं। ये सभी घटनाएं, चाहे वे दंगों या कर्फ्यू का वक्त हो या कोरोना काल या फिर उत्तराखंड की 2013 की आपदा, मुंबई के दंगे या सीरियल बम ब्लास्ट की बात हो, यह सब जनता जब भी पढ़ती थी या पढ़ती है वह सिर्फ उन घटनाओं के बाबत जानना चाहती थी  अथवा जानना चाहती है और अक्सर नाकामयाबी का दोष पुलिस के सिर पर मढ देती है। उन सभी घटनाओं के पीछे 24 घंटे ड्यूटी कर रहे छोटा पुलिस कर्मी हो या पुलिस के बड़े अधिकारी, आम जनता उनके बारे में अधिक नहीं सोचती और न ही उस वक्त उनका परिश्रम उसकी सोच या वार्तालाप का विषय बनते हैं। उनके लिए पुलिस, पुलिस होती है और उस पर इल्जाम लगाने के लिए उनके हाथ बंधे नहीं होते। लेखक ने उन सभी अदृश्य परिदृश्यों को अपनी पुस्तक में चित्रित किया है उन सभी परिदृश्यों पर प्रस्तुत पुस्तक लेखक का आंखों देखा हाल, भोगा हुआ यथार्थ,  पाठकों को पुलिस के प्रति एक भिन्न नजरिया,  एक पृथक दृष्टिकोण थमाता है। पाठक-विशेष जनता-प्रतिनिधि के रूप में बहुत कुछ महसूस करता है ।
बहुत जगह पर इस पुस्तक को पढ़ते हुए आंखें नम हो जाती हैं फिर चाहे वह बदायूं के दंगे हो या फिर महेंद्र सिंह टिकैत की बरेली में प्रथम गिरफ्तारी, ये ऐसे वाकये हैं जिनको पढ़कर पिछली घटनाएं चलचित्र की तरह हमारे समक्ष आ जाती हैं। एक पुलिस अधिकारी को भीड़ को थामना भी है, दंगों को रोकना भी है, अपराधियों को पकड़ना भी है पर प्रयास यही रहता है कि वह लाठी फटकार कर ही काम चला ले उन्हें गोली ना चलानी पड़े। अगर मजबूरन गोली चलाने का निर्णय लेना पड़ता है तो एक पुलिस ऑफिसर के ऊपर ऐसी दुधारी तलवार लटकी रहती है कि वह गोली चलाए तो मरे और ना चलाए तो मरे। इंक्वारी बिठा दी जाती है।
युवा ऑफिसर पर शासन-प्रशासन का दबाव रहता है। रतूड़ी जी ने एक जगह लिखा है कि ‘स्वयं को जांच के कटघरे में खड़ा होते देख मैं आश्चर्यचकित था। एक नेक-नियत कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी के समक्ष यह प्रश्न हमेशा बना रहता है कि हिंसक भीड़ पर बल प्रयोग करना है अथवा नहीं और यदि हां तो कब और कितना इसलिए कुछ मझें हुए पुराने पुलिस अधिकारी सामान्यतः हिंसक भीड़ पर भी बल प्रयोग नहीं करते हैं क्योंकि जांच होने पर बल प्रयोग न करने वालों के बचने की संभावना अधिक रहती है करो तो मरो, ना करो तो भी मरो’ 
कितनी बड़ी दुविधा एक पुलिस ऑफिसर के सामने ऐसे मौकों पर होती है जहां उन्हें तुरंत निर्णय लेना है। वह निर्णय उनकी नौकरी पर भी आफत ना बने और वह जिस काम के लिए वहां पर है वह भी हो जाए। यह एक मुश्किल घड़ी होती है जिस तरह से रतूड़ी जी ने लिखा है कि बिना खाए पिए, 24 घंटे से ऊपर  बिना सोए, कई दिनों तक बहुत कम नींद लेकर वह अपने काम में डटे रहते थे। ना उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता किया और न ही अपनी सुविधाओं के लिए समझौतावादी रुख अपनाया।
उत्तराखंड की मुख्य सचिव व अनिल रतूड़ी जी की पत्नी राधा रतूड़ी जी ने इस पुस्तक की प्रस्तावना लिखी है। उनके शब्दों में, ‘जब हम किसी व्यक्ति को अत्यंत करीब से जानते हैं तो अपने निजी संबंधों के कारण, उक्त व्यक्ति के विषय में निष्पक्ष आंकलन करना कठिन हो जाता हैवे आगे लिखती हैं हालांकि अनिल रतूड़ी जी से निजी संबंध होने के कारण मुझे यह लाभ भी है, कि इस पुस्तक में वर्णित घटनाओं से मैं पूरी तरह वाकिफ हूं
बहुत सच्चाई से राधा जी यह बात लिखती हैं। रतूड़ी जी ने अपनी भूमिका में लिखा है कि साढे तीन दशक के कार्यकाल में मैंने भिन्न-भिन्न चुनौतियों का सामना किया है, इस पुस्तक में मैने चुनिंदा घटनाओं का ही उल्लेख किया है। लेखक की अपनी बातअगर पुस्तक को पढ़ने के बाद पढ़ी जाए तो उनकी बात पाठक अधिक प्रखरता से महसूस करता है।
1990 में जब वे एएसपी बरेली के पद पर थे, उस वक्त दो संप्रदायों की भीड़ के बीच में पहुंच कर, पुलिस बल की संख्या कम होने के कारण वे उनकी आपसी हिंसा रोकने के लिए लगातार पिस्टल से हवाई फायर करते हुए इधर से उधर दौड़ते रहे। अंधेरा होने के कारण उसी दौरान वे एक खुले सीवर के मैनहोल में गिर गये। दिल दहलाने वाला वाकया है। ऐसे एक नहीं अनेकों वाकये, जब जीवन ने उनकी किस्मत पर विजय लिखी और मृत्यु को पराजित किया। रतूड़ी जी के दृढ़संकल्प व क्षमता ने कई मर्तबा उनके विरोधियों को भी उनकी प्रशंसा करने के लिए मजबूर किया।
एक साल में कई तबादले, बच्चे के जन्म पर भी पत्नी के साथ न रह पाने की मजबूरी, नवविवाहित जीवन के आरंभिक दिनों में भी थोड़े से सुकून की इच्छा भी बस ह्रदय की दुआओं तक ही सीमित रह जाती थी। कई मौकों पर हतोत्साहित हो जाना, आखिर पुलिस की वर्दी व एक सख्त पुलिस ऑफिसर के अंदर भी तो एक आम इंसान के रूप में एक पिता था, जो अपनी नवजात बच्ची पर स्नेह बरसाना चाहता था, एक पति था जो अपनी नवविवाहिता पत्नी के संग चंद मृदुल क्षण व्यतीत करना चाहता था, एक बेटा था जो अपने पिता की आकस्मिक मृत्यु पर खुद को ठीक से आंसू बहाने का समय भी न दे पाया। 
क्योंकि कर्तव्यनिष्ठ रतूड़ी जी के समक्ष उनका कर्तव्य पूरे वजूद व चीख के साथ हर वक्त खड़ा हो जाता था।
बाबरी मस्जिद के टूटने के बाद फैले दंगो पर नियंत्रण के दौरान देसी पिस्टल से निकले छर्रों का छाती पर लगे बॉडी प्रोटेक्टर में धंस जानाएक घटना में, एक विस्फोट से उनकी एंबेसडर कार के पिछले हिस्से के लोहे में छेद हो जाना और एक लोहे के टुकड़े का उनके हेलमेट से टन से टकरा जाना, 24 घंटों के अंदर दो बार इन दो मौतों की गलबहियाँ करके जीवित निकल जाने जैसी घटनाएं पाठकों के मस्तिष्क में विगत के साथ आगत को लेकर भी एक दहशत बरपाती है। राज्यपाल महोदय के ना कहने के बावजूद आरोपी के विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल कर देना रतूड़ी जी की दृढ मानसिक क्षमता को दिखाती है।
कुछ बातें जो पाठक को स्वाभाविक रूप से स्पर्श करती हैं  जैसे, राधा जी का एक आईएएस ऑफिसर होने के बावजूद पति के हर कदम पर साथ रहना व साथ देना, नौकरी से छुट्‍टी लेकर पति के साथ चले जाना, कई मर्तबा रतूड़ी जी का परिवार होने के बावजूद मजबूरी के कारण तनाव की हालत में भी अकेले रहनामारूति 800,  नन्हीं सी बेटी की पढ़ाई के लिए हॉस्टल में डाल देना, बहुत बार अपने परिवारिक जीवन के स्थायित्व के लिए चिंतित होना, पाठक को कहीं अपने आस-पास की जद्दोजहद लगती हैं।
 इसलिए जब रतूड़ी जी की पोस्टिंग 4 वर्ष के लिए राष्ट्रीय पुलिस अकादमी हैदराबाद के लिए हुई तो एक पुलिस अधिकारी ने ही नहीं अपितु रतूड़ी जी के जीवन की आपाधापी से गुजरता पाठक भी एक सुकून की सांस लेता है। हालांकि उस दौरान की भी अपनी तरह की कठिनाईयां रहीं लेकिन सुकून भरे पल भी रहे। नवदंपत्ति ने अपनी गृहस्थी सजाई। परिवार के सदस्यों को एकदूसरे का साथ मिला। यह भी पता चला कि किस प्रकार प्रशिक्षु ऑफिसर आउट-डोर प्रशिक्षण से बचने के लिए अस्वस्थता का झूठा सर्टिफिकेट लगा कर अस्पताल में भर्ती हो जाते हैं। रतूड़ी जी ने ऐसे दो प्रशिक्षुओं से कहा कि, “ठीक है आप दोनों अस्पताल में दाखिल हो जाएं। हम गृह मंत्रालय भारत सरकार को आपके विषय में आख्या भेज रहे हैं कि जब तक आप चिकित्सीय रूप से स्वस्थ न हो जाएं। तब तक आपको प्रशिक्षण में शामिल न किया जाए यह सुनकर प्रशिक्षु भौंचक्के रह गए और प्रशिक्षण में शामिल हो गए। मतलब की यहां भी रतूड़ी जी की दृढ़ता काम आयी।
रतूड़ी जी के एसएसपी मेरठ के कार्यकाल के दौरान अनुसूचित जाति के लोग उनसे इतने जुड़ गये कि तबादले पर न जाने देने के लिए उनकी ट्रेन के सामने लेट गए, उन पर फूल बरसाने लगे। उनसे तबादले पर न जाने का निवेदन करने लगे। पुस्तक का यह अंश पढ़कर पाठक का ह्रदय भी प्रसन्न हो जाता है। लगा रतूड़ी जी के समस्त लगन व कर्मठता का सिला मिल गया। आम जनता का ऐसा स्नेह बहुत कम अधिकारियों को नसीब होता है। 
रतूड़ी जी भले ही एक सख्त व सिद्धांतवादी पुलिस अधिकारी रहे हैं, लेकिन उनकी ईमानदारी व संवेदनशील ह्रदय हर पहलू में झलकता है। चाहे तो एक पुलिस ऑफिसर के रूप में देखें या एक लेखक के रूप में या फिर एक इंसान के रूप में। दोनों पतिपत्नि उत्तराखंड की जनता के लिए आशीर्वाद की तरह हैं। प्रत्येक महीने के दूसरे शनिवार को उनके घर फुलवारीमें स्थानीय साहित्यकारों का जो मजमा उनके स्नेह-आमंत्रण पर जुटता है, उसकी गूंज दूर-दूर तक पहुंच गयी है। वे  दूसरे लेखकों की पुस्तकों पर चर्चा आयोजित करते हैं। इसके लिए राधा जी व अनिल जी का साहित्य के प्रति समर्पण व संवेदनाएं पूरी तरह परिलक्षित होती है। दोनों आदरणीयों की अपने-अपने पदों को भूल कर साहित्य और साहित्यकारों को बचाने की उनकी यह मुहिम भविष्य में और भी रंग लाएगी। साधुवाद। 
समीक्षक- सुधा जुगरान
दिव्या देवी भवन
16 ई, ई. सी. रोड़
देहरादून- 248001
उत्तराखंड
मोबाइल- 9997700506


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