एक समय था जब बैंक की नौकरी को समाज में प्रतिष्ठा और स्थायित्व का प्रतीक माना जाता था। यह वह दौर था जब युवा वर्ग के लिए बैंक सेवा एक स्वप्निल करियर हुआ करती थी। परंतु समय के साथ बढ़ते कार्यभार, निजी क्षेत्र जैसी लक्ष्य आधारित संस्कृति, और सीमित समय में अनंत कार्य पूर्ण करने की अपेक्षाओं ने बैंकिंग सेवा के आकर्षण को धूमिल कर दिया। आज भी यह पेशा सामाजिक सम्मान अवश्य देता है, किंतु इसके भीतर छिपी संघर्षपूर्ण वास्तविकता बहुत कम लोगों को ज्ञात है। इन्हीं यथार्थों को अत्यंत रोचक और प्रभावपूर्ण शैली में उजागर करता है श्री दीपक गिरकर का नवीनतम उपन्यास “एक बैंक मैनेजर की डायरी”। यह रचना न केवल एक बैंक अधिकारी के व्यावसायिक जीवन की गहराइयों को उकेरती है, बल्कि उसके व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक संघर्षों का जीवंत दस्तावेज भी प्रस्तुत करती है।
श्री दीपक गिरकर स्वयं भारतीय स्टेट बैंक के सेवानिवृत्त सहायक महाप्रबंधक रहे हैं तथा एक कुशल समीक्षक, व्यंग्यकार और साहित्यकार के रूप में भी जाने जाते हैं। बैंकिंग जगत के उनके गहन अनुभव, सामाजिक दृष्टि और लेखकीय कौशल का समुचित संगम इस उपन्यास में दिखाई देता है। “अम्मा” उनके पूर्व प्रकाशित उपन्यास के बाद यह उनकी रचनात्मक यात्रा का दूसरा महत्वपूर्ण पड़ाव है। इसके अतिरिक्त उनकी चर्चित पुस्तक “एनपीए – एक लाइलाज बीमारी नहीं” बैंकिंग क्षेत्र की गहरी समझ का परिचायक है।
उपन्यास एक डायरी के रूप में लिखा गया है, जो 6 जून 1977 से प्रारंभ होकर कई दशकों की बैंकिंग यात्रा को समेटता है। इसमें नायक के रूप में एक बैंक अधिकारी के अनुभवों के माध्यम से उस दौर की बैंकिंग संस्कृति, श्रमिक राजनीति, भ्रष्टाचार, और मानवीय संवेदनाओं का विस्तृत चित्रण किया गया है। प्रारंभिक पृष्ठों में ट्रेड यूनियन नेताओं, विशेषतः कामरेड गिरीश उर्फ़ भैया जी, की दबंगई और शाखा प्रबंधकों पर उनके प्रभाव का यथार्थ चित्र सामने आता है। लेखक ने दिखाया है कि किस प्रकार ऐसे नेता अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए बैंकिंग व्यवस्था को पंगु बनाते थे। डायरी के विभिन्न पृष्ठों पर उस कालखंड के सामाजिक और आर्थिक परिवेश की झलक मिलती है। चाहे वह 1978 की कपड़ा मिल मजदूर हड़ताल हो, 1984 का विवाह प्रसंग हो, या 1992 के हर्षद मेहता कांड का प्रभाव। इन घटनाओं के माध्यम से लेखक ने समय, समाज और संस्था, तीनों के अंतर्संबंधों को बड़ी कुशलता से पिरोया है।
नायक का चरित्र संवेदनशील, कर्मनिष्ठ और नैतिक मूल्यों पर अडिग दिखाई देता है। भ्रष्टाचार, दादागीरी और दबावों के बीच भी वह अपनी ईमानदारी को बनाए रखता है। ग्रामीण शाखा में वसूली के दौरान उजागर हुआ फर्जी ऋण प्रकरण, या भैया जी की मनमानी के विरुद्ध उसका संघर्ष, शाखाओं का एनपीए जीरो करना इत्यादि प्रसंग नायक की दृढ़ता और प्रबंधन कौशल को दर्शाते है। उपन्यास के माध्यम से लेखक केवल बैंकिंग जगत का ब्यौरा नहीं देते, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का संदेश भी देते हैं। बेरोजगार युवकों के लिए बैंक कर्मचारियों द्वारा “प्रगति क्लासेस” जैसी नि:शुल्क पहल का वर्णन समाज सेवा की प्रेरक मिसाल है। नायक का पारिवारिक जीवन, विवाह प्रसंग और एलएफसी यात्राओं के वर्णन में एक घरेलू आत्मीयता और मानवीय ऊष्मा का अहसास होता है। गोवा, बेंगलुरु, ऊटी आदि स्थलों का यात्रा-वर्णन इतना सजीव है कि पाठक स्वयं उस यात्रा का सहभागी बन जाता है।
लेखक की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और संवादधर्मी है। उन्होंने बैंकिंग जैसे तकनीकी क्षेत्र के सूक्ष्म पहलुओं को भी ऐसे प्रस्तुत किया है कि सामान्य पाठक के लिए भी वे रोचक बन जाते हैं। पुस्तक में बैंकों से संबंधित कई रोचक किस्से हैं। श्री गिरकर की लेखनी में अनुभव का गाम्भीर्य, संवेदना की प्रखरता और व्यंग्य की महीन धार तीनों का सुंदर संगम दिखाई देता है। भैया जी की कुतिया से संबंधित प्रसंग तो हमारी प्रशासनिक और सामाजिक व्यवस्था पर एक तीखा व्यंग्य बनकर उभरता है। “एक बैंक मैनेजर की डायरी” केवल बैंक कर्मियों के लिए उपयोगी पुस्तक नहीं है, बल्कि यह हर उस व्यक्ति के लिए पठनीय है जो संस्था, ईमानदारी और मानवीय संघर्षों को समझना चाहता है। यह उपन्यास बैंकिंग जगत के पीछे छिपे जीवन-संघर्ष, नैतिक द्वंद् और मानवीय मूल्यों का दर्पण है। अपनी विशिष्ट प्रस्तुति, सजीव भाषा और जीवन के निकट विषयवस्तु के कारण यह पुस्तक निश्चय ही संग्रहणीय है।