पुस्तक : ज़िंदगी के सफ़र में आनंद बख़्शी के गीत
लेखिका : संगीता बिजित
प्रकाशक : अद्विक पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड नई दिल्ली।
मूल्य : ₹400 मात्र
कुल पृष्ठ : 208
आईएसबीएन नंबर : 978-93 -493 62-63-5
गीतों और गीतकारों की अपनी दुनिया है।कभी कुछ जीवन के संघर्षों,विघ्न -बाधाओं,उतार- चढ़ाव से प्राप्त होता है।कभी यह परिवार, गुरु और प्रारब्ध से भी प्राप्त होता है।संभवतः आनंद बख़्शी ऐसे व्यक्तित्व रहे जिन्हें उपरोक्त वर्णित दोनों ही समीकरणों से वो सब मिला कि उनके साढ़े तीन हजार गीतों में से मात्र दस गीतों को आत्म सात कर दो सौ पृष्ठ की पुस्तक ही सृजित हो गई!?
पुस्तक की लेखिका के जीवन में गुजरते अनुभवों की तपिश से ये चुनिंदा गीत आज स्वीकार्य मूल्य वर्धिता के साथ पुस्तक में विद्यमान हैं। समीचीन संदर्भ को देखें तो इस पुस्तक के सृजन में सोशल मीडिया का आधार भी दृष्टिगोचर होता है।लेखिका का अपने जीवन के दुरूह संघर्षों में रहना,लड़ना,हताशा निराशा के बीच झुलना और संगीत का हवा के झोंके की मानिंद आना और फिर आनंद बख़्शी साहब के गीतों के श्रवण करने की आदत जो कि लेखिका को सिक्किम की
मस्त वादियों में रेडियो से सुनने को मिली। उन्हीं गीतों का लेखिका के व्यक्तित्व को समय समय पर प्रभावित करना और फिर अचानक ही आनंद बख़्शी साहब के सुपुत्र राकेश आनंद बख़्शी का लेखिका को फोन करके उसे उत्साहित कर लेखन को ओर प्रवत्त करना,कुछ ऐसे प्रकरण हैं जो युवा पाठकों के अतिरिक्त आम जन को भी भाएंगे।
लेखिका ने इस पुस्तक को किस्सा गोई या दास्तान गोई के रूप में बड़े ही दिलचस्प अंदाज़ में पेश किया है।आनंद बख़्शी के हजारों गीतों में से दस गीत चुनकर उनके इर्द-गिर्द जीवन दर्शन को बुनना निश्चय ही प्रशंसनीय है।लेखिका ने गीतों की व्याख्या करते-करते, इसमें पौराणिक आख्यानों को भी बखूबी शामिल किया है कुछ प्रख्यात विभूतियों के जीवन के संघर्षों के उदाहरण भी हैं, समसामयिक घटनाक्रम भी पिरोए गए हैं।यही कारण है कि यह एक विविधतापूर्ण पुस्तक बन पड़ी है। पुस्तक की भूमिका बहुआयामी सर्जक एवं प्रसिद्ध प्रसारण कर्मी डॉक्टर लक्ष्मी शंकर वाजपेयी जी ने लिखी है।उन्होंने लिखा है कि लेखिका ने जिस सहजता से बातचीत की शैली में किस्सा गोई का आनंद देते हुए पूरी किताब लिखी है,वह बार-बार रसूल हमज़ातोव की कालजयी किताब ‘मेरा दागिस्तान’की याद दिलाती है। हिंदी में इस किताब का आना भी एक विशेष उपलब्धि है क्योंकि इतने विशाल विराट फिल्म उद्योग पर अच्छी कृतियों का सर्वथा अभाव है।उन्होंने प्रकाशक तथा आनंद बख़्शी जी के सुपुत्र राकेश आनंद बख़्शी जी को भी विशेष धन्यवाद दिया है क्योंकि इन्हीं दोनों की प्रेरणा के कारण लिखकर इस किताब को लिख पाई।
पुस्तक में चुनिंदा दस गीत यथा, दुनिया में तो रहना है तो कम कर प्यारे/अरे! रे!अरे! ये क्या हुआ/शीशा हो या दिल हो आखिर टूट जाता है/ लिखने वाले ने लिख डाले/ फूलों का तारों का सबका कहना है,एक हज़ारों में मेरी बहना है/ ज़िंदगी का हर कदम एक नई जंग है /नहीं सामने यह अलग बात है /मुश्किल बड़ा यह प्यार है/ तुम बेसहारा हो तो/ तू आत्मा मैं परमात्मा।इन्हीं गीतों को अलग अलग अध्यायों में प्रासंगिक कथनों, किस्सों,कहानियों,आप बीती,जग बीती, बत कही अंदाज़ में रोचकता और कौतूहल के धागे से एक सुंदर सी किताब को बुना गया है।कहीं कहीं प्रूफ रीडिंग की कोताही ज़ाहिर होती है पर ख़लती नहीं है।
आनंद बख़्शी साहब के सपुत्र राकेश आनंद बख़्शी ने दो शब्द की परंपरा को निभाते हुए, आनंद बख़्शी साहब के व्यक्तित्व- कृतित्व के बारे में बहुत ही सारगर्भित और संक्षिप्त अंदाज़ में सार्थक बातें कही हैं। जिससे युवा पाठक समझ सकते हैं कि आनंद बख़्शी क्या थे?! यदि हम राकेश आनंद बक्शी की बात को संक्षेप में कहें तो उनके अनुसार उन्होंने 99 संगीतकारों और 250 से अधिक निर्देशकों के साथ कार्य किया, अपने 42 साल से ज्यादा लंबे कार्यकाल में 630 से ज्यादा फिल्मों के लिए लगभग 3,500 गाने लिखकर, वह तीन दशक से ज्यादा समय तक शीर्ष के दो गीतकारों में से एक बने रहे। पुस्तक का आखिरी अध्याय यथा स्त्रियों के सशक्तिकरण के लिए अपने गीत से आत्म- प्रेम का संदेश देते गीतकार आनंद बख़्शी बेहद प्रभावपूर्ण बन पड़ा है।स्त्री के विभिन्न रूपों यथा माता, महादेवी आदि पराशक्ति, बहन,प्रेमिका/ पत्नी और बेटी पर उनके द्वारा सृजित गीतों को पढ़कर पाठक एक अलग दुनिया में चले जाएंगे। हिन्दी भाषा के पाठकों को यह पुस्तक रूपी सौगात देने के पश्चात ,अब इक्कीस जुलाई को ही अंग्रेज़ी भाषा में पुस्तक का लोकार्पण से समूचा देश आनंद बख़्शी के गीतों से सराबोर होगा।कुल मिलाकर एक अच्छी और संग्रहणीय पुस्तक है जो आपके बुकशेल्फ पर स्थाई रूप से रह सकती है।