पुस्तक करू काल( कविताएं) कवि आचार्य मीन केतन प्रधान प्रकाशक विश्व हिंदी अधिष्ठान,( न्यास )रायगढ़, छत्तीसगढ़ मूल्य ₹200 मात्र आईएसबीएन 978-93- 6175- 349-7
कवि की कल्पना अनूठी और विरल होती है तभी तो वह कवि जैसी श्रेष्ठतम संज्ञा से विभूषित होता है।कविता जैसा सशक्त माध्यम तभी अनुपम होता है जब कविताएं समीचीन संदर्भों और जनों की पीड़ा को उकेर कर समाज को भी संवेदनशील बना दें। समीक्षित कृति करू काल भी इसी ओर इंगित करती है। करू काल यानी कोरोना काल एक भयावह काल खंड जो मानव को बहुत कुछ सिखा कर गया और बहुत कुछ छीन कर भी ले गया और छोड़ गया कड़वी, कसैली यादें जो कम से कम एक या दो पीढ़ियों को तो अवश्य ही कसकती रहेंगी।इसी काल सम काल खंड को कवि ने एक नया शब्द सृजित किया है यथा करू काल।कवि ने अपनी इस कृति को उन सभी लोगों की याद को समर्पित किया है जो इस समय में इस दुनिया से विदा हो गए। इस काव्य संग्रह में कुल सत्तावन कविताएं हैं।इकतीस कविताएं तो करू काल यानी कोरोना पर हो केंद्रित हैं,पिता की महत्वत्ता को दर्शाती पूरी की पूरी उन्नीस रचनाएं हैं। अन्य चार रचनाएं यथा वह, जिंदगी दिमाग में बचपन तिरंगे का भार और महानदी के पुल से। यह कृति विश्व हिंदी अधिष्ठान ,न्यास, रायगढ़ -छत्तीसगढ़ के सौजन्य से प्रकाशित हुई है । यह न्यास काफी समय से हिंदी भाषा, साहित्य के साथ-साथ हिंदी सहित आंचलिक और क्षेत्रीय साहित्य, लोक भाषा, लोक साहित्य -संस्कृति पर शोध कार्यों को प्रकाशित कर चुका है। यही नहीं भारत सहित विश्व के अन्य भाषा साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन करना भी इसके कार्य विशेष में सम्मिलित है। अतः यह न्यास एक राष्ट्रीय स्तर का संस्थान कहा जा सकता है और समीक्षित पुस्तक इसी संस्थान की कार्य योजना के तहत प्रकाशित हुई है। लेखक अपनी बात में महानदी के विषय में बेहद महत्वपूर्ण तथ्यात्मक सूचनाओं देते हैं तथा उसे अपने जीवन के पर्याय के रूप में भी बताते हैं वहीं वे छायावाद के पुरोधा या प्रवर्तक कवि मुकुटधर पांडे के गांव बालपुर का भी जिक्र करते हैं।कवि के अनुसार इस पुस्तक प्रकाशन में यह विचार भी अंतर निहित है की कविता को कविता की शक्ल में देखते हुए खासकर आज के समय में जो कुहासा और बिखरा हुए उसे नई दिशा में ले जाते हुए सार्थकता और जीवन मूल्यों से जोड़ने में सहायक हुआ जा सके। कवि अपनी बात को आगे बढ़ते हुए बताते हैं की करुणा, करुता, कड़वाहट जैसी शब्दों जैसे भावों की ऐसी करू अनुभूति उन्हें पहले कभी नहीं हुई थी और यही कारण है कि संदर्भित काव्य रचना को करू कल या करू कविता के रूप में प्रकाशित किया गया है। इस काव्य संग्रह में करू काल पर केंद्रित रचनाओं की संख्या बहुत अधिक है और इन कविताओं में करु काल की भावनाएं ,भंगिमाएं,करुणा,कड़वाहट स्पष्ट रूप से इन बानगियों में देखी जा सकती है। करू काल- तीस कविता से-
बहुत होता है इतना/ वहां जितना कर रहे/ समंदर पार कर अपनी जड़े फैला रहे। तिनका तैरता/ डूबता आदमी/ उछलता पकड़ता /ऊपर आ जाता। इस करू काल में आदमी पैंतरे बदलता/ कभी यहाँ कभी वहां) कहीं का नहीं रहता। वहीं दूसरी बानगी यहां पर प्रस्तुत है: करू काल- एक कविता से- करू काल में/आगे बढ़ रही 21वीं सदी/ रोज-रोज/ छीना-झपटी पैंतरेबाजी/दल-बल /तख्ता -पलट/ उठा- पटक/ मार -काट लड़ाई भिड़ाई/ बम बारूद दुनिया भर /और भी बहुत कुछ।
इस कृति में करु काल के अतिरिक्त पिता पर भी उन्नीस कविताओं का गुलदस्ता पाठकों को प्रस्तुत किया गया है। हमारे प्रधान मंत्री मोदी जी ने पुष्प के बदले पुस्तकों को देने की बात जो कही थी,प्रतीत होता है कि कवि ने उसे आत्मसात कर पिता की यह रचनाओं से महकता रचना गुच्छ पुस्तक रूप में पाठकों को प्रस्तुत किया है। यूं भी यूं तो समूचे विश्व में पिता का माता की तरह से अद्वितीय स्थान है इस पर भी भारतीय संस्कृति और साहित्य में पिता की तुलना आकाश या सूर्य से की गई और यह दोनों यानी आकाश और सूर्य दोनों ही नियम कानून के पक्के और अनुशासित होते हैं । ठीक उसी प्रकार जैसे पिता के संतान को अनुशासित करने के लिए न जाने क्या-क्या जतन और प्रयत्न करता है। इसी क्रम में कुछ उदाहरण यहां लिखे गए हैं यथा पिता के लिए:
दो वे जो छूट गए पीछे/किसी खोह में/ पुरखे हमारे/ रास्ता बताते रहते। एक मर्म स्पर्शी कविता यथा पिता के रहते : तेरह पिता के रहते / इस कमरे का दरवाजा खुला रहता/ आने वाला हर मेहमान खुद को/ इस घर का हिस्सा महसूस करता,। अब उनके नहीं रहने के बाद/ छूट रहे संगी- साथी /नई रिश्तेदारी के लोग भी /शगुन के लिए नहीं आ रहे /ऐसी टूटी जुड़ती रहती परंपराएं पीढ़ी- दर -पीढ़ी।
कवि का महानदी या उसे पर बने पुल से आत्मीयता और उसके जीवन के पर्याय तक का लगाव वाला समीकरण सा है।उसी महानदी पर बने पुल से वह अपनी मन की बात बड़े ही विरल परन्तु संवेदनशीलता से कहता है, कैसे देखिएगा कुछ ऐसे महानदी पुल से गुजरते/ कई दिनों बाद /आज देखा /ऊपर की ओर/ दूर तक ठहरे, ठेल पानी पर/ बिछी थी,वही नीली चादर थकी थकी सी साँझ /डूबते सूरज की छितराई किरणें पस री थी/ महानदी के वक्ष पर।
यह काव्य संग्रह कोरोना के भूलने वाले काल पर लिखी सार्थक कृति है।यह संग्रह उस काल की भयावहता के साथ साथ पिता की महत्ता और महानदी के माहात्म्य को काव्य रूप में सजगता से पाठकों को रु ब रु कराता है।
समीक्षक
सूर्यकांत शर्मा
पूर्व वरिष्ठ अधिकारी एवं प्रसारण कमी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय केंद्र सरकार दिल्ली आवासीय पता मानसरोवर अपार्टमेंट फ्लैट b1 प्लॉट नंबर 3 सेक्टर 5 द्वारका नई दिल्ली 110075।
आ.श्री तेजेंद्र शर्मा जी
सम्पादक -“ पुरवाई “
मेरी काव्य कृति – “करु काल “ की समीक्षा प्रकाशित करने – के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद । स्थापित समीक्षक श्रीयुत् सूर्यकांत शर्मा जी ( दिल्ली) ने कृति की अन्तर्भावना को अंतरंगीय आत्मीयता से विवेचित किया है। कविताओं के कथ्य , संवेदना और शिल्प -विधान पर उन्होंने समुचित रूप से प्रकाश डाला गया है । कोरोनाकालीन वैश्विक त्रासदी के तात्कालिक और परवर्ती परिस्थतियों को केन्द्र में रखकर किये गये नामकरण “ करु काल “ की प्रासंगिकता पर विद्वान समीक्षक ने युक्तिसंगत अभिमत दिया है।
पूर्व में भी “ महानदी” काव्य संग्रह की प्रकाशित समीक्षा ( समीक्षक श्री सूर्यकांत शर्मा) अकादमिक दृष्टि से उल्लेखनीय रही है। जिसे शोधार्थियों-समीक्षकों द्वारा संदर्भित किया जा रहा है ।
एतदर्थ हार्दिक आभार ।
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित ई पत्रिका “पुरवाई “ में आपने दिलचस्प सम्पादकीय ,समसामयिक सामाजिक-राजनैतिक घटना चक्र पर आधारित दृष्टिकोण, कविता, कहानी, पुस्तक समीक्षा आदि को समाहित करते हुए कीर्तिमान स्थापित किया है ।
इस अंक का सम्पादकीय और साहित्यिक विधाओं का प्रकाशन भी अन्य अंकों की तरह सराहनीय है ।
“पुरवाई “ के उत्तरोत्तर ऊर्ध्वगामी होने की कामनाओं सहित। बहुत आभार ।
—
मीनकेतन प्रधान
भारत
14/12/25
क्षमा चाहता हूं कि विलंब हो गया ।कुछ पारिवारिक परेशानियों इसकी गवाह रही। आपके द्वारा लिखित और स अर्थों में सृजित टिप्पणी जो पुरवाई के पटल पर अंकित है ,पढ़कर मन को बहुत संतोष मिला ,आनंद मिला और लगा कि श्रम अब सार्थक हुआ।
आपका पुनः बहुत-बहुत आभार।
आदरणीय श्री तेजेंद्र शर्मा जी
सम्पादक -“ पुरवाई “
——-
मेरी काव्यकृति “ करु काल “ की समीक्षा प्रकाशित करने – के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद । स्थापित समीक्षक श्रीयुत् सूर्यकांत शर्मा जी ( दिल्ली) ने कृति की अन्तर्भावना को अंतरंगीय आत्मीयता से विवेचित किया है। कविताओं के कथ्य , संवेदना और शिल्प -विधान पर समुचित रूप से प्रकाश डाला गया है । कोरोनाकालीन वैश्विक त्रासदी के तात्कालिक और परवर्ती परिस्थतियों को केन्द्र में रखकर किये गये नामकरण “ करु काल “ की प्रासंगिकता पर विद्वान समीक्षक ने युक्तिसंगत अभिमत दिया है।पूर्व में भी “ महानदी” काव्य संग्रह की प्रकाशित समीक्षा अकादमिक दृष्टि से उल्लेखनीय रही है। जिसे शोधार्थियों-समीक्षकों द्वारा संदर्भित किया जा रहा है ।
एतदर्थ कृतज्ञ हूँ ।
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित ई पत्रिका “पुरवाई “ में आपने दिलचस्प सम्पादकीय ,समसामयिक सामाजिक-राजनैतिक घटना चक्र पर आधारित दृष्टिकोण, कविता, कहानी, पुस्तक समीक्षा आदि को समाहित करते हुए कीर्तिमान स्थापित किया है ।
“पुरवाई “ के उत्तरोत्तर उर्ध्वगामी होने की कामनाओं सहित। बहुत आभार ।
—
मीनकेतन प्रधान
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
14/12/25
आ.श्री तेजेंद्र शर्मा जी
सम्पादक -“ पुरवाई “
मेरी काव्य कृति – “करु काल “ की समीक्षा प्रकाशित करने – के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद । स्थापित समीक्षक श्रीयुत् सूर्यकांत शर्मा जी ( दिल्ली) ने कृति की अन्तर्भावना को अंतरंगीय आत्मीयता से विवेचित किया है। कविताओं के कथ्य , संवेदना और शिल्प -विधान पर उन्होंने समुचित रूप से प्रकाश डाला गया है । कोरोनाकालीन वैश्विक त्रासदी के तात्कालिक और परवर्ती परिस्थतियों को केन्द्र में रखकर किये गये नामकरण “ करु काल “ की प्रासंगिकता पर विद्वान समीक्षक ने युक्तिसंगत अभिमत दिया है।
पूर्व में भी “ महानदी” काव्य संग्रह की प्रकाशित समीक्षा ( समीक्षक श्री सूर्यकांत शर्मा) अकादमिक दृष्टि से उल्लेखनीय रही है। जिसे शोधार्थियों-समीक्षकों द्वारा संदर्भित किया जा रहा है ।
एतदर्थ हार्दिक आभार ।
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित ई पत्रिका “पुरवाई “ में आपने दिलचस्प सम्पादकीय ,समसामयिक सामाजिक-राजनैतिक घटना चक्र पर आधारित दृष्टिकोण, कविता, कहानी, पुस्तक समीक्षा आदि को समाहित करते हुए कीर्तिमान स्थापित किया है ।
इस अंक का सम्पादकीय और साहित्यिक विधाओं का प्रकाशन भी अन्य अंकों की तरह सराहनीय है ।
“पुरवाई “ के उत्तरोत्तर ऊर्ध्वगामी होने की कामनाओं सहित। बहुत आभार ।
—
मीनकेतन प्रधान
भारत
14/12/25
क्षमा चाहता हूं कि विलंब हो गया ।कुछ पारिवारिक परेशानियों इसकी गवाह रही। आपके द्वारा लिखित और स अर्थों में सृजित टिप्पणी जो पुरवाई के पटल पर अंकित है ,पढ़कर मन को बहुत संतोष मिला ,आनंद मिला और लगा कि श्रम अब सार्थक हुआ।
आपका पुनः बहुत-बहुत आभार।
आदरणीय श्री तेजेंद्र शर्मा जी
सम्पादक -“ पुरवाई “
——-
मेरी काव्यकृति “ करु काल “ की समीक्षा प्रकाशित करने – के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद । स्थापित समीक्षक श्रीयुत् सूर्यकांत शर्मा जी ( दिल्ली) ने कृति की अन्तर्भावना को अंतरंगीय आत्मीयता से विवेचित किया है। कविताओं के कथ्य , संवेदना और शिल्प -विधान पर समुचित रूप से प्रकाश डाला गया है । कोरोनाकालीन वैश्विक त्रासदी के तात्कालिक और परवर्ती परिस्थतियों को केन्द्र में रखकर किये गये नामकरण “ करु काल “ की प्रासंगिकता पर विद्वान समीक्षक ने युक्तिसंगत अभिमत दिया है।पूर्व में भी “ महानदी” काव्य संग्रह की प्रकाशित समीक्षा अकादमिक दृष्टि से उल्लेखनीय रही है। जिसे शोधार्थियों-समीक्षकों द्वारा संदर्भित किया जा रहा है ।
एतदर्थ कृतज्ञ हूँ ।
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित ई पत्रिका “पुरवाई “ में आपने दिलचस्प सम्पादकीय ,समसामयिक सामाजिक-राजनैतिक घटना चक्र पर आधारित दृष्टिकोण, कविता, कहानी, पुस्तक समीक्षा आदि को समाहित करते हुए कीर्तिमान स्थापित किया है ।
“पुरवाई “ के उत्तरोत्तर उर्ध्वगामी होने की कामनाओं सहित। बहुत आभार ।
—
मीनकेतन प्रधान
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
14/12/25