गलियाँ सब सूनी पड़ीं, चौराहे भी शान्त.
बच्चे गए विदेश में, ममता विकल नितांत.
जर्जर होते पट मुंदे, घर सूना दिन- रैन.
है खंडहर होता भवन, ढहने को बेचैन.
औरों की आलोचना, करते हैं भरपूर.
आत्म-मुग्ध होते रहें, रख दर्पण को दूर.
अवसादी फागुन मिला, चिंतित मिला अबीर.
खूनी होली देखकर, व्याकुल हुए कबीर.
संस्कृति निर्वसना मिली, उच्छृंखल परिवेश.
बच्चों को भाता नहीं, अब पुरखों का भेस.


वाह रश्मि।अत्यंत सारगर्भित दोहे साझा किए आपने।
सादर धन्यवाद!
बहुत सार्थक एवम सुंदर दोहे
सादर धन्यवाद!