भारतीय ज्ञान परंपरा का क्षेत्र बहुत विस्तृत है, यह विश्व की सबसे प्राचीन परंपरा है। हमारा पूरा भारत राष्ट्र, भारतीय संस्कृति, परिवार व्यवस्था, वैज्ञानिक परंपरा, साहित्य दर्शन, चिकित्साशास्त्र, अध्यात्म, व्यापार, भक्ति और शक्ति की प्रतीक नारियाँ, सभी राष्ट्रीय जागरण के महानायक, हमारे सभी श्रद्धा के केंद्र आदि महत्वपूर्ण ज्ञान परंपरा के प्रतीक है। भारत की ज्ञानभूमि पर कबीरदास, गुरु नानक देवजी, तुलसीदास, विराट हिंदू साम्राज्य, राष्ट्रीय जागरण के महानायक स्वामी विवेकानंद, गुरु गोबिंद सिंह आदि जैसे महान विचारक, संत, समाज सुधारक हुए। इन सभी ने ज्ञान को प्रमुखता दी। ये सभी ज्ञान लेने और ज्ञान देने में आनंद का अनुभव करते थे।
गुरु गोबिंद सिंह के साहित्य को जीवन का विज्ञान कहा जा सकता है। उनके लिखित साहित्य के द्वारा उनके युग की विषम परिस्थितियों को जाना जा सकता है। “उनके समय पर मुगल शासन अपनी राजनीतिक शक्ति के चरमोत्कर्ष पर था। अपने पिता को बंदी बनाकर, अपने भाइयों को मौत के घाट उतार कर और स्वयं आलमगीर की उपाधि ग्रहण कर औरंगज़ेब को मुगल भारत का सम्राट बने लगभग 8 वर्ष हो चुके थे। दशम ग्रंथ के रचयिता गुरु गोबिंद सिंह का संपूर्ण कार्यकाल औरंगजेब के शासनकाल के अंतर्गत आता है। औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था, उसका प्रत्येक कार्य इस्लाम की शरीयतों के अनुसार संपन्न होता था।” 1 अतः गुरुजी का समय राजनीतिक दृष्टि से अशांति और अराजकता का था। राजनीतिक परिस्थितियों से पूर्णतः अवगत होकर गुरुजी ने खालसा पंथ की स्थापना की और एक नवीन मार्ग का निदर्शन किया।
भारतीय ज्ञान परंपरा को गुरु जी की साधना दृष्टि, सांस्कृतिक दृष्टि, दार्शनिक दृष्टि, धर्म बोध, साहित्यबोध और राष्ट्रबोध के द्वारा समझा जा सकता है। साधना दृष्टि के अंतर्गत भगवती चण्डी का स्मरण विशेष श्रद्धा के साथ किया।
भगवती चण्डी को युद्ध की देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया । देवी की महिमा का वर्णन करते हुए वह कहते हैं कि हो चण्डी तुम संसार के प्राणियों का इस संसार सागर से उद्धार करने वाली हो। दैत्यों का संहार करने वाली हो, जब-जब दैत्यों का पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ जाता है, ब्राह्मण और धर्मात्मा दुखी होने लगते हैं, तब-तब तुम अवतार धारण कर दैत्यों का विनाश और सज्जनों की रक्षा करती हो।
तामसता मत्ता नामक कविता कवि के मन मध्य गुई है।
कीनों है कंचन लोग जगत में पारस मूरत जापु दुही है ।।2
गुरुजी भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार जीवन का मूल तत्व सत्य को मानते हैं। सत्य एक ही है। विद्वान उसे अनेक नाम से पुकारते हैं कोई उसे ब्रह्म कहता है तो कोई उसे आत्मा कहता है तो कोई परमात्मा ।
गुरु जी ने देवी को परमेश्वरी, निराकार, सर्वशक्तिमान आदि अनेक नामों से स्मरण किया है। उनका मानना है की संपूर्ण जीव ईश्वर से ही उत्पन्न होते हैं और ईश्वर में ही विलीन हो जाते हैं। ब्रह्म को महाकाल, राम, रहीम आदि कई नाम से संबोधित करते हुए गुरु जी ने हिंदू-मुस्लिम समन्वय पर बल दिया है।
भारतीय ज्ञान परंपरा को भारतीय संस्कृति में भी देखा जा सकता है। गुरुजी ने सत्य की रक्षा करते हुए शुभ कर्मों से कभी पीछे नहीं हटने और निश्चित रूप से विजय हासिल कर भारतीय संस्कृति को पहचाना। भारतीय संस्कृति के अनुरूप भक्ति और शक्ति का अद्भुत समन्वय चण्डी चरित्र के माध्यम से किया है। चण्डी युद्ध की देवी के रूप में इस देश में युगों से चली आ रही है।
गुरुजी ने भी चण्डी को इस परंपरागत रूप में स्वीकार किया। जिस युग में गुरुजी का आविर्भाव हुआ उस समय हिंदू जनता धर्मांध औरंगजेब के आतंक, अत्याचार, अनीति और अन्याय के कारण दुखी, निराश और हताश थी । उस अन्याय और अत्याचार से मुक्ति पाने का एक ही साधन शेष रह गया था, वह था हिंदुओं द्वारा शक्ति संधान और शक्ति का आह्वान, इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए गुरुजी ने चण्डी को शक्ति रूप माना। भारतीय संस्कृति के मूलाधार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उनके व्यक्तित्व की तरह अनायास ही उनके साहित्य में अभिव्यक्त हुए हैं । धर्म, जाति की संकीर्ण भावना में जकड़ा हुआ नहीं था, अपितु धर्म उनके साहित्य में राष्ट्र धर्म, राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रीय भावना के रूप में देखा जा सकता है । उन्होंने देश और धर्म की रक्षार्थ अत्याचारियों का विनाश करना ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म माना ।
भारतीय ज्ञान परंपरा में भाषा को भी बहुत अधिक महत्व दिया गया है क्योंकि भाषा से अपनी संस्कृति का बोध होता है। सभी भारतीय भाषाएं समान रूप से हमारी राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक अस्तित्व को अभिव्यक्त करती हैं। भाषा हमारे विचारों के आदान-प्रदान का साधन तो है ही साथ ही यह हमारी संस्कृति और संस्कारों की भी संवाहिका है। गुरुजी ने ब्रजभाषा और हिंदी के माध्यम से भारतीय संस्कृति को अभिव्यक्ति दी और अपनी मातृभाषा पंजाबी के माध्यम से भी संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया।
“ब्रजभाषा को संस्कृत का तत्सम शब्द समूह यद्यपि विरासत रूप में युगों से प्राप्त रहा तथापि इसके ग्रहण और सही प्रयोग में ब्रज भाषा कवियों के संस्कारों और उनकी शिक्षा का सर्वाधिक योग्य कहा जा सकता है।”3 भारतीय ज्ञान परंपरा का आधार तप, त्याग, सेवा आदि है। गुरु जी ने भी भारतीय संस्कृति के अनुरूप तप, त्याग और सेवा, साधना को जीवन का लक्ष्य बनाकर देश की रक्षा की और समाज में नवरक्त का संचार किया। उन्होंने हिंदू जाति में युगों-युगों से सोई हुई शक्ति को पहचाना और इस शक्ति का सदुपयोग देवी की स्तुति करते हुए औरंगजेब के विरुद्ध किया।
गुरु जी के समय की सामाजिक व्यवस्था इतनी अव्यवस्थित थी कि सामान्य जन किसी भी दृष्टि से जीवन निर्वाह मानव के रूप में नहीं कर सकता था, एक जागरूक नेता के रूप में गुरु जी ने उन सब अव्यवस्थाओं का भली प्रकार से अध्ययन किया और उनको दूर करने का सफल प्रयत्न भी किया। भारतीय ज्ञान परंपरा जनहित, राष्ट्रीयहित और विश्व कल्याण की रही है। मानवता सभी मानव मूल्यों का आधार रही है। मूल्यों की दृष्टि से गुरुजी के साहित्य को समाज के लिए माना जा सकता है या यूं कहा जा सकता है कि गुरुजी का काव्य समाज से निरपेक्ष नहीं बल्कि समाज सापेक्ष है। उन्होंने समाज में हो रहे विभिन्न राजाओं द्वारा अत्याचारों को देखा ही नहीं स्वयं भी सहा। कट्टरपंथी होने के कारण औरंगजेब ऐसे इस्लामी राज्य की स्थापना करना चाहता था जिसमें गैर मुस्लिम कोई न हो। सभी सहर्ष इस्लाम धर्म को ग्रहण करके मुसलमान बन जाएँ। जिन हिंदुओं ने उनकी इस बात को स्वीकार नहीं किया उन्हें असहनीय यातना दी जाती थी । गुरुजी ने औरंगजेब की दमनपूर्ण कट्टर नीति का विरोध किया। वह अपने युग की इन परिस्थितियों को देखकर चुप नहीं रह सके । उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से अत्याचारी शासकों का विरोध किया व जनता में भक्ति और वीर रस का संचार किया।
गुरूजी ऐसे महामानव के रूप में उभरे जिन्होंने अपने अद्भुत त्याग, संयम तथा साधना के बल पर समाज को एक समान धरातल पर एकत्रित किया । समाज में व्याप्त अनेक प्रकार के आचारिक और मानसिक विकारों को निर्मूल करके आदर्श समाज और आदर्श मानव की संकल्पना की। उन्होंने देवी से याचना की कि हे देवी! मेरी आपसे याचना है कि जब भी शत्रु से युद्ध करना पड़े तो मेरे मन में कभी भी भय न आने पाए और मुझे शत्रु पर विजय पाने का निश्चय और विश्वास बना रहे और जब मेरे जीवन का अंत निकट आ जाए, मेरी आयु समाप्त हो तो मैं उस संयम के साथ युद्ध में लड़ते हुए ही प्राण त्याग करूँ, युद्ध भूमि में ही मेरी मृत्यु हो।
निष्कर्ष रूप से यह कहा जा सकता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने में गुरु गोबिद सिंह जी का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने पीड़ित, शोषित, त्रस्त जनता के स्वर को दृढ़ आधार प्रदान किया। लोगों की सोई हुई भावनाओं को जगा कर, भय को दूर किया । समाज और धर्म में फैली कुरीतियों पर कठोर आघात कर सच्ची मानवता का पाठ जनता को पढ़ाया।
संदर्भ-
- A story of India-W.H. Morland, A.C. Chatterji, pg.241
- चंडी-चरित्र- सं. ओम प्रकाश शर्मा, छंद-4
- रीतिकाव्य की भूमिका – डॉ. नगेंद्र, पृष्ठ-36

डॉ. हरदीप कौर
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग
श्री गुरु नानक देव खालसा कॉलेज,
दिल्ली विश्वविद्यालय
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Email: [email protected]

भारतीय ज्ञान परंपरा के अंतर्गत गुरु गोबिंद सिंह पर लिखा आपका लेख पढ़ा। निश्चित रूप से ज्ञान परंपरा के क्षेत्र में भाषा का बहुत अधिक महत्व है।हालांकि गुरु गोविंद जी के बारे में काफी कुछ पढ़ा हुआ है पर ज्ञान के क्षेत्र में उनकी परंपरा को जानना अद्भुत रहा। चंडी या शक्ति की उपासना वाली बात हमें नहीं पता थी।
निश्चित रूप से उन्होंने अपने अद्भुत त्याग, संयम तथा साधना के बल पर ही समाज को एक समान धरातल पर एकत्रित किया और आदर्श समाज और आदर्श मानव की संकल्पना की।
गुरु गोविंद सिंह जी के लिये लिखे आपके इस लेख से और भी कई चीजें पता चलीं। यह गुरु जी का दुर्भाग्य ही रहा कि उनका समय औरंगजेब के समकालीन था जिसकी कट्टरता से उन्हें लोहा लेना पड़ा।
इस ज्ञानवर्धक लेख के लिये आपको बहुत-बहुत बधाई।
नीलिमा जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ,आपने लेख को इतने अच्छे से पढ़ा और सराहना की ।