Tuesday, March 10, 2026
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एक थी रमरतिया – कहानी – डॉ. रामशंकर भारती

आज से करीब पचास साल पहले की यादों की गठरी खोलता हूँ तो मुझे उसमें अपने पड़ोस के गंथेरा गाँव की अनब्याही बीस-पच्चीस वर्षीया रमरतिया बुआ की जीवंत तस्वीर दिख जाती है। तस्वीर क्या, समूची रमरतिया ही साकार हो उठती हैं… जिसमें उनकी भरी-पूरी गसीली मगर मर्दाना डीलडौल वाली गोरी माँसल देह… पाँवों की पिंडलियों से नीचे तक लटकता लंबा, गोल गले का चार बटन वाला फिरोजी रंग का मरदाना कुर्ता… कमर में सलीके से बाँधी गयी पहलवानों जैसी लुंगी, सुर्ख काले बालों का मूठादार मरदाना जूड़ा, गले में लंबी काली अंगौछी दोनों ओर दो मुँहे साँपसी लटकती लहराती हुई। दाँये हाथ में सात फुटी लंबी नीचट बाँस की साम लगी लाठी, बाँये हाथ की कलाई में चमकदार लोहे का चूरा, गले में मोटे धागेवाली काली चपटी। इसी धागे में बीचोंबीच बँधी एक चमकीली नौकदार ताँवे की चिमटी के साथ लटकती बेलनाकार चाँदी की ताबीज। पाँवों में देशी चमड़े की चर्र-चर्र करतीं मरदानी पनंइयाँ। गजब की ठसकदार चाल।

ठक-ठक करती हुईं। आवाज मीठी मगर कड़कदार मानो रौबीली लंबरदारिन की बोली। काजल भरीं गोल-गोल आँखों में शेरनी-सी चमक। नाक में छोटी लौंग। कानों में चमचमाती छोटी छोटी-चाँदी की बालियाँ। ओंठों पर छितराई सुर्ती खैनी की लालिमा। मोर जैसी खूबसूरत गर्दन मगर छाती पुरुषों की तरह बिल्कुल सपाट। कहीं कोई उभार नहीं। बिल्कुल ऐसी ही बाहरी आकार और भेषभूषा थी रमरतिया की।

रमरतिया ! बडे़-बूढे़ इसी नाम से बुलाते थे उन्हें। हाँ,  गाँव के छोटे बच्चे जरूर उन्हें रमरतिया बुआ ही कहते थे। वो अपने गाँव गंथेरा से हमारे क्योलारी  गाँव आती-जातीं रहती थीं। कभी बप्पू कुम्हार से बर्तन लेने, तो कभी गाँव के बड़े वैद्यजी से अपनी बीमार अम्मा की दवाई लेने और कभी बड़े मोदी की दुकान से घरगृहस्थी के सामान लेने। महीनेभर में चार-छै बार उनका गाँव में आनाजाना ही बना रहता था। रमरतिया का रास्ता गढ़ीवालों के दरवाजे से होकर गुजरता था।जब भी रमरतिया गढ़ीवालों के द्वारे से गुजरतीं तो वहाँ बैठे लोगों को राम-जुहार जरूर करतीं। गढ़ीवालु बूढ़ी धनवबंती बऊ आग्रह करके उसे रोक लेतीं। गलियारे पारकर के ऊँची-ऊँची चौतरियाँनुमा सीढि़याँ चढ़कर रमरतिया कच्ची मिट्टी के चौंतरा पर आकर धम्म से बैठ जाती।

रमरतिया धनबंती को कक्की कहती थी। घना घरोबा-सा था रमरतिया का उन लोगों से। रमरतिया के बोलों में बहुत बतरस भरा था जो महुआ के फूलों की तरह रह-रहकर टपकता था। जो सुने, सो बिलम जाए। रमरतिया की देहयष्टि में गजब का सम्मोहन था। सच कहा जाए तो गहरी नींद में सोए लाजवाब सौंदर्य की मल्लिका थी स्त्रीत्वहीन रमरतिया।

रमरतिया के पुरुषों जैसे हावभाव और पहनावा उसे हँसी और मजाक का पात्र बनाते। लोग उसे देखकर आपस में ठिठोली और गंदे मजाक करने से भी नहीं चूकते।

जब कभी रमरतिया गढ़ीवालों के चौंतरा पर आकार बैठती, मुहल्लाभर के  नासमझ बच्चे विस्मय से उन्हें देर तक टुकुर-टुकुर निहारते और सोचते

“रमतिया बुआ हैं तो औरत, पर आदमी क्यों बनी रहतीं हैं?  इनके स्त्रियोचित गुण कहाँ चले गये हैं ?” ऐसे ही न जाने कितने सवाल बाल मन को घेर लेते। चौंतरा से सटे साठिया कुआँ पर पानी भरतीं नयी-नवेली बहुएँ और दूसरी स्त्रियाँ उन्हें लरजते हुए घूँघट की ओट से टकटकी लगाकर देखतीं, शर्मातीं और मंद-मंद मुसकाते हुए एक दूसरी के कानों में धीरे से खुसफुसाहट करतीं हुईं कहतीं-

“ये रमरतिया तो खसिया (हिजड़ी) है”। पनहारिनें अपने घर पहुँचते ही घरवालों को खबर कर देतीं, सुनते हो! रमरतिया हिजड़ी कुआँवाले चौंतरा पर बैठी है। रमरतिया को देखने टोलाभर जमा हो जाता। गाँव के बिगलैड़ और रड़ुआ टाइप मुसंडे रमरतिया को कामुक नजरों से देखते हुए उन्हें खैनी खिलाने की पेशकशें करते। कुछ मनचले तो पान-बीड़ी खिलाने पिलाने के बहाने रमरतिया को देर तक रोके रहने की जुगाड़ में लगे रहते। वहीं बड़े टोला के बड़े लोग रमरतिया को बड़ी हेय दृष्टि से देखते।

खैनी तंबाकू की शौकीन रमरतिया चुनैटी से तंबाकू निकाल कर उसे हथेली पर धीरे-धीरे देर तक मलती फिर दो-तीन बार पट-पट-पट करती ताली बजाती और ओठों से फुर्र की आवाज करती हुईं मुँह में रख लेतीं। कुछ देर विलमती, लोटाभर पानी चुक्कू से पीती, सबसे बतियाती फिर एक झटके में सामान की गठरी को अछंगा उठाकर सर पर रख लेती और शेरनी जैसी चाल चलती हुई आगे बढ़ जाती अपने गांँव गंथेरा की ओर।

रमरतिया की जिंदगी में ढेर सारे दुःख-दर्द थे। पहले तो जन्म से ही अधूरी देह लेकर धरती पर पैदा हुई, फिर चढ़ती  उम्र में अम्मा उसका साथ छोड़ परलोक चलीं गई। पेट भरने के लिए उसे गैर मर्दों के साथ मेहनत मजदूरी करनी पड़ती, जरा-सी ही बात पर भैया दद्दा की डाँट और भौजी के ताने सहना उसकी जिंदगी के नासूर बन चुके थे। इतना ही नहीं रमरतिया के किसी से हँसने-बतियाने पर गाँवभर में खुसुरफुसुर होती। टोलावालों की नजरें उसे हिकारत से घूरतीं। अधूरी औरत होने की पहाड़ों-सी भारी भरकम पीड़ाओं के नीचे उसे रोज पिसना पड़ता। फिर भी उसे तमाम जिस्मभेदी नज़रों से गुज़रना पड़ता। आदमी में कब शैतान जाग उठे, कुछ कहा नहीं जा सकता। ऐसे ही न जाने कितने घिनौने और भयानक सच थे जो रमरतिया के चारों ओर डरावनी अमावसी काली रात के अँधेरों की तरह घिरे हुए थे। मगर रमरतिया का चरित्र तो ऐसा फौलादी पहाड़ था, जो न टूटने वाला था और न ही किसी तरह की गरमी से पिघलने वाला।

***

कुआँर का उमस भरा महीना था। गाँवभर के किसान अपने खेतों में जुताई करके बुआई की तैयारी में व्यस्त थे। ऐसी ओट के मौके पर रमरतिया के बड़े भाई मंगुआ को तेज बुखार ने खाट पर ही पछाड़ दिया। मंगुआ तिजारी बुखार से तीन दिन से जूझ रहा था। अब खेतों में हल कौन जोते ? खेत की ओट मरी जा रही है। यह यक्ष प्रश्न मुँह बाँए खड़ा हो गया। दद्दा तो बूढ़ा है, टोला में सबको अपनी-अपनी पड़ी है। रमरतिया की भौजी मन्नी पड़ोसी हरजू से मिन्नतें कर आयी है। मगर वह निठल्ला चिलम चढ़ाए ताश के पत्ते फैंटने में मस्त है।

“रमतिया!  अब तू ही कुछ कर, नहीं तो भूखों मरने की नौबत आ जाएगी।”

भौजी मन्नी की हिये की पीर ने रमरतिया को भीतर तक हिला दिया। जैसे-तैसे रात तो सो गयी थी,मगर रमरतिया की आँखों में नींद का नामोनिशान तक नहीं था। जैसे ही भुनसारे मनोरे बसोर के मुरगे ने पहली बाँक लगायी, रमरतिया फड़फड़ाकर उठ बैठी। उसने बिना देर किए अपने बिखरे हुए बालों का गठ्ठर बाँधा। खेत पर पीने के लिए पानी का घैला भरा। रात की बचीं हुईं तीन-चार बासीं रोटियाँ अँगौछे में अटकायीं।पनैठी लेकर बैल खोले और मुँह अँधेरे खेत जोतने चली गयी। रमरतिया खूब दबाकर अपना ढाई बीघा खेत जोते जा रही थी। तभी अचानक बूढ़ी बदिया धम्म से खेत में पसर गयी। रमरतिया ने खेत में पसरे हुए बैल को उठाने की हर संभव कोशिशें की। पनैठी मारी, पूँछ मरोरी, टिटकारी लगाई। मगर उसकी सब जुगतें बेकार चलीं गईं ।

अब क्या करे! क्या न करे का भाव  एक क्षण को उसे डराने वाला ही था, तभी रमरतिया ने आव देखा न ताव खेत में पसरे बैल को अलग कर उसकी जगह खुद लग गई। काँधों पर हल का जुँआ रख लिया और खुद बैल की जगह जुतकर हल चलाने लगी और तब तक हल में जुतती रही जब तक दस बिसवा खेत जोत न लिया।

***

चैत का महीना आ गया था। खरीफ फसल काटी जाने लगी। रमरतिया भी अपने भैया मंगुआ और भौजाई मन्नी के साथ गेहूँ की कटाई कर रही थी। वहीं पास में ही उसका डेढ़ साल का भतीजा अरहर की छाँव में पिछौरा पर सो गया था। तभी पीछे की झाड़ियों से छुपता हुआ जंगली सियार आया और सोते बच्चे को मुँह में दाबकर भागने लगा। छोटा बच्चा जोर से चीखा। भैया मंगुआ चिल्लाया, ओ दैइया रे ! भौजी टेंटुआ फाड़कर रोने लगी तनिक देर में ही हार भर में हाहाकार मच गया ।

तभी रमरतिया बिजली की फुर्ती से हँसिया लेकर सियार के पीछे भागी और तककर हँसिया का ऐसा निशाना मारा जो सीधा सियार के पेट में लगा। सियार गुर्राया, फिर ओऊँ-आऊँ की डरावनी आवाज करके तेजी से भागा। इसी बीच बच्चा उसके मुँह से छूटकर नीचे गिर गया। रमतिया ने दौड़कर भतीजे को उठाया और अपनी छाती से चिपका लिया। उसकी सूखी छाती पुलक उठी। रमरतिया का वात्सल्य उमड़ उठा। कुछ ही देर में भैया-भौजी रोते-डाँपते पास में आ गये। रमरतिया खेत से अरहर की मुलायम पत्तियाँ तोड़कर लायी। उन्हें मसलकर भतीजे के घावों पर लगाया। अगल-बगल के किसान और चरवाहे जुर आये थे। सभी के मुँह से एक ही बात निकल रही थी …

“आज रमरतिया न होती तो बड़ा अनर्थ हो जाता।”

***

बरसात के दिनों में गाँव की हालत बदतर हो चुकी है। न जानवरों को राहत और न इंसानों को सुकून। चारों ओर कीचड़ और गंदगी पटी है। चार रोज से पानी बरस रहा है। माटी के कच्चे घर भरभराकर गिर रहे हैं, छाँव-छ्प्पर बैठ रहे हैं।

भादों की निचाट अँधेरी काली रात। मूसलाधार पानी बरस रहा है। मानो बादल फट गये हों। बिजली की तेज चमक और घड़घड़ाहटें दिल बैठा रहीं हैं। आधी अधूरी गदराई देह लिए रमरतिया जानवरों के बाड़े में खटुलिया पर कथरी बिछाए अकेली लेटी है। वहीं पास ही दूसरी बगल की बखरी में भैया-भौजी मजे से सो रहे हैं।

आधी रात होने को है। तेज बारिश में ठंडी हवाएँ वातावरण में सिहरन पैदा कर रहीं हैं। मगर रमरतिया की अधूरी देह तबे-सी तप रही है, दिल सुलग रहा है। उसे अपनी यौन अक्षमता का बखूबी एहसास हो चुका है। स्त्रियों में होने वाले रजोधर्म के अनुभव से वह पच्चीस साल की उम्र में एक बार भी परिचित नहीं हो पाई। अपनी यौन अक्षमताओं के कारण गाँव में उसकी औकात एक हिजड़ी की ही है। रमरतिया सोचे जा रही है-

“औरत जात कोरे कागज पर लिखी एक ऐसी इबारत है जिसे हर मर्द बार -बार पढ़ना चाहता है। उसकी नजर में औरत केवल एक जिस्म है। एक माँसल और गदरायी देह। भोग का सामान और एक जिंस। इसी भोगवादी सोच ने अनेक बुराइयों को जन्म दिया। समाज की पुरुषवर्चस्ववादी सोच ने अकसर औरतों और मुझ जैसी आधी-अधूरी देहधारियों को अपमानित ही किया है। शोषण करते हुए समाज से बहिष्कृत किया है।”

रमरतिया की जिंदगी दूसरी यौन विकलांग अधूरी स्त्रियों और किन्नरों की तरह ही है। रमरतिया का जीवन एक ऐसी नदी की तरह है जिसके दोनों किनारों पर उपेक्षा, तिरस्कार और बदगुमानी के घने जंगल हैं।अनेक द्वंद्वों, तनावों, अपमानों और जोखिमों को अपने संग-संग लिए हुए वह इस नदी की धार में बहने को विवश है। उसे हर रोज न जाने कितने तेज धारदार, नुकीले और पथरीले-सँकरे यातनाभरे तंग रास्तों से होकर गुज़रना पड़ता है…

***

तभी धम्म! धम्म!! धम्म!!! की तेज आवाजों ने रमरतिया की विचार तंद्रा को तोड़ दिया। किसीके कच्चे घर की भरभराकर गिरने की तेज आवाजों ने रमरतिया को चौकन्नी कर दिया।

पड़ोसिन गुसांइन कक्को की चिल्लाने की आवाजें आ रहीं थी। रमरतिया खटुलिया छोड़कर बखरी से बाहर निकल कर चिल्लायी ,”ओ दैइया ! का गज़ब हो गऔ ? हुलकी परौ जौ बदरा तौ भौतंई अत धरैं। रमरतिया जोर -जोर से भौजाई-भैया को पुकारती है। “का परेई रह्यो है ? गुसांइन कक्को काय नर्रा रयीं हैं? मैं उहीं जात हौं।”

रमरतिया तेज बरसते पानी में भींगती हुई पड़ोसिन गुसांइन कक्को के घर जा पहुँची। मूसलाधार बरसात और अँधेरी रात में हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। गुसांइन कक्को की पौर से उठतीं कराहें  तेज बरसते पानी के साथ बरसतीं और बाहर बहकर निकल जातीं। रमरतिया ने हिम्मत करके टूटी हुई दीवार लाँघी और भीतर का दृश्य देखकर चीख पड़ी। गुसांइन कक्को की खटिया के ऊपर छप्पर गिरा पड़ा है। आले में ढिबरी की लौ फड़फड़ा रही है। कक्को का कमर से नीचे का हिस्सा छप्पर से बुरी तरह दबा हुआ है। वह गुसांइन कक्को के पास जाकर उन्हें दिलाशा देती है। भींगा हुआ छप्पर उठाने हटाने की भरसक कोशिश करती है। मगर पानी से भींगा बजनदार छप्पर टस से मस नहीं होता है।

शोरगुल सुनकर टोला के लोग भी आ गये हैं। सभी मिलकर छप्पर हटा देते हैं। कक्को बुरी तरह डाँप रहीं है। रमरतिया उन्हें गोद में भरकर दूसरी बखरी में ले जाती है। टोला के लोगों के जाने के बाद रमरतिया बरोसी में कंडों की आग जलाकर गरम कपड़े से कक्को की चोटें सेंकती है। गुंसाइन कक्को को खूब आराम मिल रहा है। थोड़ी देर बात कक्को रमरतिया से अपने घर जाने को कहतीं हैं। रमरतिया गुसांइन कक्को बखरी में आराम से लिटाकर अपने घर की ओर लौटने लगती है। अँ

धेरी गली से जैसे ही वह अपने घर ओर मुड़ती है तभी पहले ही घात लगाए बैठे गुसांइन कक्को के परिवार के ही हवस के भेड़िये रंपा और कल्ला रमरतिया पर हमलावर हो जाते हैं। रंपा और कल्ला रमरतिया का मुँह दबाकर  उसे गाँव के बाहर नदी के किनारे खींच ले जाकर उसकी कोमल और गदराई देह को जमकर लूटते -खसोटते हैं। मर्दानगी दिखाते हुए रमरतिया की आधी-अधूरी देह के साथ ब्लात्कार करते हैं। रमरतिया के बेसुध हो जाने पर उसकी गला दबाकर हत्या कर देते हैं और लाश को उफनाती नदी में बहा देते हैं।

अगले दिन सबेरे-सबेरे जिंदा रमरतिया की नदी की बाढ़ में बह जाने की मरी हुई खबरें गाँवभर में जोरशोर से तैर रहीं हैं।

 

***

साँझ से हो रही मूसलधार बरसात अब थम चुकी है।

भोर का सूरज भूरे घने बादलों से निकलने की जद्दोजहद कर रहा है। वहीं एक ओर आकाश में रमरतिया की नंगी देह चीखती हुई साफ-साफ लटकती नज़र आ रही है।

 

डॉ० रामशंकर भारती
बी-67 दीनदयाल नगर,
झाँसी (उ.प्र.) 284003
मोबाइल- +91 9696520940
ईमेल-  [email protected]

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3 टिप्पणी

  1. डॉ रामशंकर भारती जी की एक थी रमरतिया कहानी पढ़कर मन उद्वेलित हो गया। विकलांगता तो शाप है ही लेकिन मानसिक विकलांगता उससे भी बड़ा अभिशाप है। रमरतिया जैसा पात्र लाखों में एक होता है। सही कहा गया है कि कुदरत किसी के सिर पर सींग लगा दे तो उसे उन सींगों के साथ जीना पड़ता है। रमरतिया जी तो रही थी। पूरी ठसक के साथ, अपने अभिशप्त जीवन के साथ।
    भारती जी आपने कहानी की शुरुआत में रमरतिया का जो शारीरिक और मानसिक चित्रण किया है उसमें रमरतिया का व्यक्तित्व खिल उठा है। पाठक उसके साथ-साथ चलने लगता है। पाठक को लगता है कि रमरतिया आगे कुछ न कुछ करेगी।
    करती भी है- भतीजे की रक्षा, हल की जुताई, गोसाइयन काकी की सहायता। वह अपने आधे-अधूरेपन के साथ खुश दिखती है पर लोगों की बातें उसे आंसती रहती है।
    कहानी हर दृष्टि से उत्कृष्ट है। वह चाहे उसका कहानीपन हो, या पात्र का मजबूत होना। इस कहानी की भाषा और संवाद पात्रानुकूल है। अंत बहुत मार्मिक है।
    ऐसे दुर्लभ पात्र पाठक के मस्तिष्क में स्थायी रूप से पैठ बना लेते हैं। अगर हम इसे विकलांग विमर्श के अंतर्गत रखना चाहें तो इस विमर्श की यह अनूठी कहानी है। भारती जी बढ़िया कहानी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई। उत्कृष्ट कहानी चयन के लिए पुरवाई के संपादक जी को भी बहुत-बहुत धन्यवाद ।

  2. डॉ रामशंकर भारती की एक थी रमरतिया कहानी को मनोयोग से पढ़कर जो महसूस किया वहीं लिख रहे हैं . भारती जी को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं
    कहानी का शिल्प सफल और सुगठित है.
    आप और लखन लाल पाल दोनों इसे विकलांग विमर्श में रखना चाहते हैं किंतु हमारे मतानुसार यह कहानी किन्नर विमर्श के अंतर्गत आती है . विकलांग जिन्हें मोदी जी ने दिव्यांग कहा है, उसमें वह व्यक्ति अपना
    स्त्रीत्व या पुरुषत्व बरकरार रखता है अर्थात उसकी प्राकृतिक पहचान अक्षय रहती है.
    आज समाज में असंख्य रमरतिया हैं जिन्हें संभलना हमारा फर्ज है. हम मंगल कार्य में ऐसे लोगों को ससम्मान बुलाते हैं किंतु किसी नुक्कड़ पर या सफर में उनसे सामना हुआ तो क्या करते हैं यह कहने की जरूरत नहीं है.
    अभी अभी इसका आगाज़ हुआ है और रचनाकार भारती जी की कहानी एक कड़ी के रूप में उभर जाएगी इसी आशावाद के साथ –
    अभी तो गुलिस्तां ने आंखें खोलीं है
    अभी समय लगेगा बहार आने में

  3. बहुत ही मार्मिक कहानी है। कुछ भी कहो किन्नरों का जीवन अभिशप्त ही रहता है। ईश्वर क्यों नहीं सबको स्वस्थ जीवन देता?
    कितनी हिम्मती थी! सियार के मुख से भतीजे को छुड़ा लाई मेहनती थी, बैल की जगह खुद जुत गई। आम औरतों से शरीर से ही अलग नहीं थी बल्कि अपने कर्मों से भी अन्य सभी की अपेक्षा श्रेष्ठ थी।
    जिस घर के लोगों को उसने बचाया उसके घर के ही लोग उसके लिये अभिशाप बन गये।
    वैसे उसमें ताकत तो थी कि वह उनसे जूझ पाती। संभवतः यह उसकी कल्पना से परे था। और फिर बारिश के कारण वहाँ की स्थिति भी अच्छी नहीं थी। शायद इसलिए वह इस तरफ से असावधान रही और यह दुर्घटना हो गई।
    संसार में नर पिशाचों की कमी नहीं। वाकई समय बहुत खराब चल रहा है।
    क्षणिक दैहिक सुख के लिए इंसान किसी की जान लेने में भी नहीं हिचकता।
    कुछ पुरुषों के कुकृत्य समस्त पुरुष जाति को कलंकित कर देते हैं।
    दुखान्त कहानी तकलीफ दे जाती है। पर प्रभावशाली कहानी के लिए आपको बधाई।
    प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का शुक्रिया।
    पुरवाई का आभार।

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