Wednesday, February 11, 2026
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रेखा श्रीवास्तव की लघुकथाएँ

1 – उपेक्षित
पापाजी,
          आज मम्मी की कॉल आई थी कि आप चाहते हैं कि अपना पैसा हम लोगों के नाम करना चाहते हैं।  अब ये सब जो मैं कहना चाहती हूँ, वह कॉल से संभव नहीं है। 
          मैं आपके बेटे के सपने को तोड़ने वाली थी क्योंकि दस साल बाद आप पूरे मन से बेटे के स्वागत की तैयारी में बैठे थे और जब वह टूट गया तो आप दोनों ने मुझे बेमन से स्वीकार कर लिया। चाचाजी के जोर डालने पर मुझे घर में जगह मिलीं।
          आप बहुत अच्छा कमाते थे, पर आप दीन हीन ही दिखाते थे। पैसा ही आपका कर्म और धर्म था। अगर चाचा होते तो हम कुछ बने ही होते। हर जगह हम बहनें चाचा के साथ गए। कोई भी एंट्रेंस देना हो, इंटरव्यू देना हो या नौकरी पर जाना हो। 
          हमारी भी इच्छा थी कि हमारे पापा हमें प्यार करें और हमारे साथ रहें। 
          मुझे वह दिन याद है कि पढ़ाई के दौरान दीदी के अवसाद में चले जाने पर आप नहीं बल्कि चाचा मम्मी को लेकर वहाँ गए थे और उन्हें वहाँ से लेकर आए थे, उनका इलाज करवाया था।
          मेरी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए दोनों बहनों पर दबाव डाला गया था कि मैंने तुम लोगों को पढ़ाया है, अब इसकी जिम्मेदारी तुम लोग उठाओ। उनके अहसान से मैं आजतक मुक्त नहीं हो पायी। दीदी लोग पहले से नौकरी करने लगी थी तो उन लोगों ने अपनी शादी का खर्च खुद उठा लिया। जब मेरी शादी के लिए दोनों बहनों से फिर आर्थिक सहायता की माँग की गई, तो मेरा मन आत्महत्या करने का हो रहा था।
          मैं तब कमाती नहीं थी और आपने मेरे लिए एक अभिशाप साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपनी शादी में मैंने जरूरी जरूरतों के लिए  अपनी सहेलियों से पैसा लिया था, जिसे अपनी कमाई से बहुत बाद में चुकाया।
            अब मेरे लिए आपके उस संचित धन की कोई आवश्यकता नहीं है। आप एक पिता होने के नाते फर्ज की इति धन देकर देना चाहते हैं तो क्षमा चाहती हूँ , मेरा बचपन आपकी इस सोच की बलि चढ़ गया।
             बस इतना ही, पैसा मेरे सिसकते बचपन और अब तक की घुटन का इलाज नहीं बन सकता।
आपकी बेटी
दिव्या
2 – क्षरण!
             “अरे ये क्या , हम क्या थे और क्या हो गये ?”
             “तुम हो कौन भाई , इस तरह क्यों बोल रहे हो?”
             ” भाई मैं संस्कार और संस्कृति हूँ सृष्टि के साथ साथ आये थे हम , धीरे धीरे आदमी को जंगली से सभ्य बनाया था
             “आपको कष्ट क्या है?” समाज बोला
            ” कष्ट ये है कि आज से चार पीढ़ी पहले हमने सुखशान्ति से जीते परिवार, गाँव देखे थे। वे हमारी छाया में ही पल रहे थे। हर इंसान एक रिश्ते से बँधा था, ऊँचनीच और जातिपाति से नहीं। भूखा कोई मरता था, जो मालिक थे पेट भरने को अनाज देते थे। नाम तो लेना ही नहीं था, काकाकाकी, भैयाभौजी, दादादाई ही कहते रहे, जाने कौन छोटा और कौन बड़ा।
          “इसमें क्या बड़ी बात, आदमी पढ़ेगा लिखेगा तो इज्जतदार बनता है और फिर अपने स्तर के लोगों से ही मेलजोल रखता है।समाज ने दलील दी  
          “वहीं से तो क्षरण हुआ हमारा, जो हमें इज्जत देते थे और उनके बच्चे शहर पढने गये तो संस्कार छान कर लिए यानी पिता से कम ग्रहण किये पढ़ाई लिखाई की हनक गई। गाँव से जुड़े तो रहे। यहीं रहकर नौकरी कर ली।” 
         “फिर क्या हुआ? गाँव में ही रहे न। औरों को भी शिक्षित किया।समाज उस बदलाव को अब भी नहीं समझ पाया  
         संस्कार ने गहरी साँस ली और चलने को हुआ तो समाज बोला -“पूरी बात तो करते जाओ।” 
        “लंबी गाथा है सुनोगे, अभी दो पीढ़ी बाकी है। तीसरी पीढ़ी के बच्चे जल्दी ही शहर निकल गये पढ़ाई के लिए, कभी तीज त्यौहार गये तो बहुत है। हमें वे उतना ही ले पाये जितना यहाँ रहे। दूसरी पीढ़ी से भी कम, अपने
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1 टिप्पणी

  1. संस्कार और समाज की वार्ता.., वाकई कई परम्परा और मनुष्य जाति में हो रहे व्यावहारिक बदलाव को दर्शाती है ।जिन्हे हम उत्थान कह रहे है कही हमे पतन की ओर तो नही ले जा रही ! विचारणीय विषय है। बहुत बहुत साधुवाद…..

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