आपने पुरवाई पर बहुत-से लेखकों, साहित्यकारों एवं कलाकर्मियों के साक्षात्कार पढ़े हैं। आज हम पुरवाई की उपसंपादक एवं चर्चित लेखिका नीलिमा शर्मा से युवा लेखिका अलका की बातचीत लेकर आए हैं। इस साक्षात्कार में नीलिमा शर्मा ने कहानी-कविता की रचना-प्रक्रिया, बदलते दौर में साहित्य के स्वरूप, साहित्य की राजनीति आदि विभिन्न मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी है। प्रस्तुत है।
प्रश्न – आज की कहानी (या कविता) की पहली शर्त यह है कि वह सहज, सरल, संप्रेषणीय और अर्थबोध युक्त हो। साथ ही विचारों (या बुर्जुआवाद) के अधिकाधिक बोझ से मुक्त हो, ऐसे में कहानी का हेल्दी प्लॉट कैसा होना चाहिए?
नीलिमा शर्मा – कहानी को हमेशा सत्य के करीब होना चाहिए। कहानी का प्लॉट हमेशा अपने आसपास घटी या घट रही घटनाओं से लेना चाहिए ताकि विषय पर पकड़ बनी रहे।( लेकिन उनको हूबहू नहीं लिखना चाहिए अन्यथा रिपोर्ट बन जायेगी।) समाज में जो घट रहा है, उन्हें कहानियों का विषय बनना चाहिए, विषय का चुनाव कर यथा सम्भव रिसर्च की जानी चाहिए/भाषा शैली का ख्याल रखना चाहिए ताकि आज लिखी कहानियां अपने वक्त का ठीक से प्रतिनिधित्व कर सकें। अगर कल्पनाओं का सहारा लेकर गल्प भी लिखा जा रहा है तो वह सत्य प्रतीत होना चाहिए। आप जिस विषय को लिखने में सहज हो उसका चुनाव करना चाहिए। देखादेखी विषय का चयन नहीं करना चाहिए।
प्रश्न – हिंदी साहित्य में दिवंगत होने या पुरस्कृत होने पर ही चर्चा उभरती है, रचना धर्मिता का सतत विकास होता रहे इसके लिए क्या कमी खटकती है?
नीलिमा शर्मा – ऐसा तो नहीं है कि हमेशा दिवंगत लेखक ही पुरस्कृत होते हैं।जीवनकाल में भी लेखकों ने बड़े पुरस्कार और सम्मान प्राप्त किए है।युवा लेखकों को पुरस्कार के प्रलोभन से दूर हो कर सतत लेखन करना चाहिए। सभी संस्थाओं के पुरस्कार देने का पैमाना अलग अलग होता है। दरअसल पुरस्कार ना मिलने को अपने लेखन की कमी ना मान कर सतत श्रेष्ठ रचना लिखने का उपक्रम लेखकों को आगे ले कर जाता है। भीड़ लगाकर असंख्य पुरस्कार जीतने की अपेक्षा न्यूनतम एकल पुरस्कार ज्यादा महत्त्वपूर्ण होते है। अखिर में लेखन की ही चर्चा होती है ।रचनाधर्मिता ही सृजन की आधारशिला बनती है।
प्रश्न – क्या आपको लगता है कि मानवीय संवेदना घोर भौतिक- वादी या कृत्रिम हो गई है और इसने विवश यू करें हमारी संवेदना Status और Reel तक ही कुंदित हो गए है युग की अंधी दौड़ जारी है जिसमे संवेदना की नैसर्गिकता समाप्त होकर दिखावामात्र भर रह गई है।
नीलिमा शर्मा – हर समय काल अपने साथ परिवर्तन लाता है। हम जिस युग में जी रहे हैं, वहां टेक्नोलॉजी हर दिन बदल रहा है। ऐसे में आप आधुनिक भौतिकवादी संवेदनाओं से बच नहीं सकते। यह सच है कि मोबाइल, सोशल मीडिया और रील्स हमारा बहुत अधिक समय लेने लगा है और यह नशे की तरह समाज को अपने गिरफ्त में ले रहा है। मेरा मानना है कि इस समय संवदेनाओं का हृास जरूर हो रहा है, पर यह लंबे समय तक नहीं चलेगा। हर नशे की तरह इस नशे का भी प्रभाव उतरने लगेगा। लेकिन इस समय जरूरत हैअपने आपको इस लत से बचाए रखने की और रचनात्मकता को बनाए रखने की। इस समाज को साहित्य और संवेदनाएं ही नई दिशा दे सकती हैं। हमें अपने युवाओं को वापस साहित्य या नैसर्गिक आदतों की तरफ रुझान पैदा करने के लिए प्रयत्न करने होंगे। बड़े पैमाने पर बच्चों और युवाओं के लिए सेमिनार करने होंगे।उन्हें बताना होगा कि रियल और रील में क्या फर्क होता है। प्रकृति से दूर जाने का मतलब ही है संवेदनहीन हो जाना। हमें रूट स्तर पर कार्य करना होगा। खासकर बच्चों के लिए फोन इन्टरनेट के निर्बाध प्रयोग पर पाबंदी लगानी होगी। संवेदनाएं प्रदर्शित करना सीखना सीखाना होगा।
प्रश्न – क्या साहित्य को राजनीतिक कीचड़ के धूप-छांव-वर्षा से बचाए रखने की जरूरत है। साहित्य और राजनीति का क्या आदर्श रिश्ता होना चाहिए। अंबेडकर आधारित दलित राजनीति क्या दलित साहित्य को प्रभावित करेगी?
नीलिमा शर्मा – राजनीति में उठा-पटक आरंभ से ही होता है। साहित्य पर राजनीति और नेता भी हमेशा हावी रहे हैं। पर हर पीढ़ी ने इसका मुकाबला भी किया है। साहित्य और राजनीति ना एक दूसरे के समांतर हैं ना विरोधी। इसलिए साहित्यकारों को इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए ना ही राजनीति से अपने लेखन को प्रभावित होने देना चाहिए। इस समय दलित साहित्य अपनी भूमिका बहुत अच्छी तरह निभा रहा है और बहुत सशक्त भी है।यहां भी राजनीति हावी है। पर दीर्घ अवधि में यही पाया गया है कि राजनीति से साहित्य को नुकसान नहीं पहुंचता अगर साहित्यकार रचनाधर्मिता को सही से बनाए रखता है।
प्रश्न – जीवन के साथ कहानी का संबंध- विज्ञान जैसा नहीं कि इधर reactant डाला उधर product मिला, जीवन जहाँ रोमांस, कुंठा, हताशा, ईर्ष्या उपलब्धि उत्साह सब कुछ का मिश्रण है। वहीं साहित्य मूल्य- मर्यादा – भावनों की आदर्श अभिव्यक्ति है। विज्ञान में सेंटीमेंट नहीं है। आज जहाँ संबंधों में आदर की कमी है, यह कमी क्या हमारे मूल्यबोध की कमी है?
नीलिमा शर्मा – यह प्रश्न अपने आप में ही भ्रामक है। आज जहां एआई हमारी जिंदगी की हर धारा में शामिल हो गया है, कहा जा रहा है कि जल्द ही वो साहित्य भी रचने लगेगा। लेकिन विज्ञान कभी साहित्य का खाद नहीं बन सका, और ना बन पाएगा। बिना सेंटीमेंट के आप रचना नहीं रच सकते। मानवीय विज्ञान का धर्म अलग है। यह समय बहुत तेजी का है। पिछले सालों में कई पीढ़ियां अपना बोध ले कर आई हैं। इस समय का मूल्यबोध अलग है। आने वाले समय का अलग होगा।
प्रश्न – विश्व फलक पर देखें चाहे वह 5000 वर्ष पूर्व रावण द्वारा सीता अपहरण हो, नौआखाली कश्मीर इजराइल – हमास युद्ध इसी की चिंगारी है. औरतों की इस पीड़ा को कबतक पुरुष समाज हावी रहेगा। Interनैशनल Women Right commission या Unicef जैसी संस्था आगे क्यों नहीं आतीं इस विषय पर आपके क्या विचार हैं ? पुरुष वर्ग अपनी पाश्विकता से कबतक हावी होता रहेगा?
नीलिमा शर्मा – प्रकृति ने जिस वक्त दुनिया को रचा होगा, पुरुष आधिपत्य की बात तब से ही शुरू हो गई होगी। पांच हजार सालों से जो हम देखते आए हैं, वो स्थितियां आज भी नजर आती हैं। खासकर युद्ध के दौरान, जहां सबसे ज्यादा प्रताड़ित औरतें और बच्चे ही होते हैं। औरतें सबसे आसान शिकार होती हैं। लेकिन अगर आप दूसरी तरफ देखें तो विकसित देशों में औरतें पिछले पचास सालों में बहुत सशक्त हुई हैं। वे युद्ध के मोर्चे पर भी जा रही हैं और कुशलता से अर्थोर्पाजन भी कर रही हैं। शिक्षा और आर्थिक स्वावलंब ने औरतों को नई ताकत दी है। अब पहले के मुकाबले महिलाएं अपनी आवाज मुखर करने लगी हैं, घरेलू हिंसा हो या दफ्तर में शोषण, सबका डट कर मुकाबला कर रही हैं। समाज बदल रहा है, धीरे-धीरे। पर इस बदलाव में कई बार धार्मिक उन्मादता, और जड़ समाज सेंध लगाता है। जब तक हम अपने समाज के पुरुषों में यह बदलाव नहीं ला पाएंगे हम औरतों के लिए एक भयमुक्त और समानभावी समाज की कल्पना नहीं कर सकते। लेकिन यह बात भी संज्ञान में रखनी होगी कि शोषित को सत्ता या पावर मिल जाये तो वह पलटकर शोषण ना करे। हाल-फिलहाल का अतुल सुभाष कांड एक अलग कहानी लेकर आया जो बरसों से दबी अनकही थी। भारत की सामाजिक दशा ही ऐसी है कि धर्म और नैतिकता का सहारा लेकर शोषण किया जाता रहा है। स्त्री/पुरुष विमर्श हर राष्ट्र और समाज का दायित्व है कि अपनी सामाजिक व्यवस्था और मूल्यों को समृद्ध करें। WRC या unicef की दखलअंदाजी से बहुत कुछ नहीं बदलेगा।


सुंदर बातचीत। दोनों को अनेक शुभकामनाएं
शुक्रिया kalpna ji
बहुत अच्छा साक्षात्कार, महत्वपूर्ण प्रश्नों के सटीक उत्तर दिए गए। नीलिमा जी के जवाब से मैं पूरी तरह सहमत हूँ, प्रभावित भी।
पुरवाई टीम को बधाई
शुक्रिया lucky
सार्थक संवाद … शुभकामनायें!
शुक्रिया दीदी
बहुत अच्छी और सारगर्भित बातचीत। नीलिमा जी ने विस्तार से सभी उत्तरों के माध्यम से देश दुनिया समाज में व्याप्त विसंगतियों की ओर ध्यानाकर्षण ही नहीं किया, समाधान की ओर इशारा भी किया है। हार्दिक बधाई
अंजू जी धन्यवाद
बहुत महत्वपूर्ण और आज के संदर्भ में अत्यावश्यक बातचीत
धन्यवाद शिवानी
बहुत उम्दा संवाद।जितने अच्छे और पड़ताल करते प्रश्न और वैसे ही व्यवहारिक उत्तर।
आशा है कि भविष्य में भी ऐसे साक्षात्कार प्रकाशित होते रहेगें।
बहुत ही सुंदर सारगर्भित वार्तालाप
उत्तम सम सामयिक साहित्य के विषय पर किए गए प्रश्नों का बहुत ही सधा हुआ सटीक उत्तर
प्रिय अलका एवं प्रिय नीलिमा जी को साधुवाद
धन्यवाद आपका
धन्यवाद suryakant ji
यह जानकर अच्छा लगा कि आप पुरवाई के लिए काम कर रही हैं । निरंतरता बनाए रखें।
धन्यवाद आपका
आप ने प्रश्न उत्तर के पारंपरिक अंदाज़ में बहुत बातें बहुत ही सादगी से बताई हैं और सत्य कहने की चर्चा करते हुए सावधान भी किया है कि कहानी को कहानी ही रहने दिया जाए वह कहीं रिपोर्ट न बन जाए…आपकी बातें नए कलमकारों के लिए बहुत से अच्छे गुरु भी बन सकती है जिससे उनकी।लेखनी में सुधार होगा….
आभार वीर जी
“पुरवाई* पर प्रश्न उत्तर वाले पारंपरिक स्टाइल में आप ने रचनात्मकता से जुडी बहुत सी बातें बताई हैं जो नए लेखकों के लिए जबरदस्त गुर से कम भी नहीं….सत्य के नज़दीक वाली बात कहते कहते कहानी कहीं रिपोर्ट न बन जाए…इस पर आप ने बहुत सादगी से चर्चा की है….वैसे अच्छा हो अलग अलग शहरों//गांवों में इस तरह के विचार विमर्श का ट्रेंड तेज़ हो….!
लेखन का धर्म और लेखक एक नए स्वस्थ समाज का निर्माण करने में सहायक हो सकते जो सभी मतभेदों से ऊपर उठ कर केवल मानवता को समर्पित हों…!
बढ़िया ! सहज बातचीत !
धन्यवाद आपका Manohar
पुरवाई पत्रिका में एक साक्षात्कार छपा है। इस साक्षात्कार में अलका जी ने पुरवाई पत्रिका की उपसंपादिका आदरणीया नीलिमा शर्मा जी से कहानी से संबंधित, दलित विमर्श, साहित्य में राजनीति के प्रवेश से लेकर AI जैसी आधुनिक तकनीक से संबंधित प्रश्न किए हैं। स्त्री विमर्श तो नहीं पर हां स्त्री के अस्तित्व के संबंध में भी प्रश्न पूछे हैं। जिनका जवाब नीलिमा शर्मा जी ने बहुत बेबाकी से दिए हैं। और दुरुस्त आंसर दिए हैं।
कहानी लेखन के संबंध में जो आपने जवाब दिया है वह काबिले-तारीफ है। ऐसा जवाब वही दे सकता है जिसने डूबकर कहानियां लिखी होंगी। नए कहानीकारों को इस साक्षात्कार को पढ़ना चाहिए।
ए आई जैसी तकनीक पर आपकी राय से सहमत हुआ जा सकता है। मानव बुद्धि के आगे ये न टिक पाएंगे। ए आई की लिखी रचनाएं तुरन्त पकड़ में आ रही हैं। संकोचवश किसी से न कहा जाए वह अलग बात है। हम इस बारे में जानते नहीं हैं इस भ्रम को साहित्यकारों को दूर कर लेना चाहिए।
बढ़िया साक्षात्कार के लिए दोनों लेखिकाओं को शुभकामनाएं
धन्यवाद lakhanpal ji
बहुत सुंदर साक्षात्कार।अलका जी ने महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे और नीलिमा जी ने सादगी से सारगर्भित बेहतरीन उत्तर दिए हैं। प्रभावशाली साक्षात्कार के लिए हार्दिक बधाई ।
धन्यवाद दीदी
अलका जी आपने साक्षात्कार में अच्छे प्रश्न उठाये ।
नीलिमा जी ने भी विस्तार से कई बिंदुओं पर उत्तर दिए ।कृतित्व और व्यक्तित्व को जानने के लिए यह विधा उत्तम है।
Dr Prabha mishra
धन्यवाद आपका
विधाओं की श्रेणी में एक नाम साक्षात्कार का भी जुड़ गया है और निश्चित रूप से इसका महत्व समझ में आता है। बड़े-बड़े साहित्यकारों के लिए हुए साक्षात्कार नवलेखन की दृष्टि से रचनाकारों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। जिस विधा में ,जो भी रचनाकार अपनी रुचि रखता है ,उसके लिए साक्षात्कार मार्गदर्शिका की तरह रहते हैं।
पुरवाई में हमने पहले भी दो साक्षात्कार पढ़े हैं।
पहला तो फिलहाल याद नहीं आ रहा, लेकिन दूसरा बराबर याद है- नीलिमा शर्मा जी द्वारा लिया गया पंकज सुबीर जी का साक्षात्कार! निश्चित रूप से इन साक्षात्कारों से पाठक समृद्ध हुए होंगे, हम तो हुए ही।
इस समूह में यह हमारा तीसरा साक्षात्कार है।
नीलिमा शर्मा जी का कहानी संग्रह हमने पढ़ा है,”कोई खुश़बू उदास करती है।”नीलिमा जी एक बेहतरीन कहानीकार हैं। संग्रह की सभी कहानियाँ बहुत अच्छी थीं और शीर्षक कहानी तो बेहद-बेहद मार्मिक है।उस कहानी की खुशबू आज भी याद आने पर उदास करती है। इसलिये उनकी लेखकीय गुणवत्ता से हम परिचित हैं।
साक्षात्कार से- कहानी/कविता लेखन संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी जो हमें महसूस हुई-
-कथानक या विषय हमें अपने आसपास से ही तलाशना चाहिये किंतु घटना का ज्यों का त्यों वर्णन नहीं करना चाहिये क्योंकि वह रिपोर्ट का रूप ले लेती है।
-विषय पर पूरी तरह से जाँच-पररखकर, विचार करके,अनुभव के साथ लेखन शुरू करना चाहिये।
-सत्य को प्रभावशाली तरीके से कहने की कला आनी चाहिये।
-यह जरूरी है कि रचना अपने समय का प्रतिनिधित्व करे।
-लेखकों को पुरस्कार के प्रलोभन से दूर रह कर सतत लेखन करना चाहिये क्योंकि रचना- धर्मिता ही सृजन की आधारशिला बनती है।
-काल की चाल के साथ दौड़ते हुए भी सतर्क रहने की आवश्यकता है नए प्रलोभनों से स्वयं को बचाकर रचनात्मकता को बनाए रखने की आवश्यकता है क्यों कि समाज को साहित्य और संवेदनाएँ ही नई दिशा दे सकते हैं।
-सुधार की दृष्टि से रूट स्तर पर कार्य करना होगा ताकि बच्चे साहित्य से जुड़ सकें उसका महत्व समझ सकें।
-राजनीति से साहित्य नहीं हो सकता साहित्य से राजनीति भले ही लोग करें। राजनीति साहित्य के न समानांतर है न विरोधी।
-यह सूत्र वाक्य लगा-
*विज्ञान कभी साहित्य की खाद नहीं बन*
*सकता।”*
-भावनाओं की आर्द्रता के बिना साहित्य सृजन नहीं हो सकता।
-अगर शोषण हुआ है तो उससे शोषण करने का अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।
-सामाजिक व्यवस्था का सुधार और जीवन मूल्यों को संरक्षित करना जरूरी है।
बेहतरीन साक्षात्कार रहा अलका जी का। उन्होंने बहुत सोच- समझ कर प्रश्न चयनित किये और नीलिमा जी ने बहुत सधे शब्दों में गंभीर,आवश्यक और संतुलित उत्तर दिये जो नए लेखकों के लिए या युवा लेखकों के लिए निश्चित ही पथ प्रदर्शक का काम करेंगे।
इस बेहतरीन साक्षात्कार के लिये पुरवाई का बहुत-बहुत और तहेदिल से आभार तो बनता है।
धन्यवाद आपका
————- साहित्यिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन से जुड़ा एक ज्ञानवर्धक साक्षात्कार !! प्रश्न और उत्तर दोनों सार्थक हैं। समसामयिक समस्याओं की भी बीच – बीच में अच्छी चर्चा है। इस महत्वपूर्ण साक्षात्कार से इस विधा की उपयोगिता पता चलती है।
शुक्रिया
बहुत सरल,सुंदर। प्रभाव छोड़ने वाला साक्षात्कार !
यह पुरवाई में साक्षात्कार का प्रवेश अच्छी पहल है । इसके लिए आप दोनों को साधुवाद ।
सभी प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर देकर ,संवादों में स्पष्टता को स्थापित किया है ।
सच में,जिसमें सहजता हो उन्हीं विषयों पर कलम सशक्त रूप से चलती है और प्रभावित करती है ।
साहित्य में राजनीति से बचना बहुत महत्वपूर्ण है अन्यथा कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ राजनीति अपने पाँव नहीं पसारती ।
अपने आसपास की कहानी लिखना भी बहुत महत्वपूर्ण है ,इससे कहानी केवल हवा में ही नहीं झूमती ,मन के भीतर चिंतन का पनपना वास्तविकता को जीना है । हम सबके चारों ओर घटनाओं के रूप में कहानियाँ बिखरी पड़ी हैं । साहित्य में कुछ बातें गढ़ने के लिए कुछ कल्पनाओं का सहारा लेना स्वाभाविक है किन्तु वास्तविक घटनाओं पर ,जहाँ आवश्यक हो वहाँ कल्पना करके बात को ऐसे आगे बढ़ाना लेखकीय कौशल है । समर्थ साक्षात्कार के लिए पुन:अतीव साधुवाद !
Thanks didi