Wednesday, March 25, 2026
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डॉ शोभा स्वप्निल की कविता – साइकिल

याद है न तुम्हें—
जब पहली बार
मेरे हैंडल को थामा था तुमने,
आँखों में चमक थी
और सपनों में उड़ान।
मेरी पतली देह पर
तुम्हारे विश्वास का भार था,
तुम पैरों से नहीं—
अपनी उमंगों से मुझे चलाते थे।
मैं चुपचाप
तुम्हारे हर सफ़र की साक्षी बनी,
धूल भरी पगडंडियों से लेकर
शहर की चकाचौंध तक—
तुम्हें गिरने नहीं दिया।
तुम्हारी थकान को
अपनी गति में समेट लेती,
बदले में माँगती क्या थी?
बस थोड़ा सा तेल,
थोड़ी सी छाँव,
और तुम्हारा अपनापन।
पर समय बदला—
और तुम भी…
तेज़ रफ्तार के मोह में
तुमने मुझे पीछे छोड़ दिया,
शोर करते इंजनों के बीच
मेरा मौन तुम्हें सुनाई न दिया।
मैं कोने में पड़ी रही—
जंग लगती यादों के साथ,
कभी आँगन, कभी पिछवाड़े,
फिर एक दिन
किसी अनजाने हाथों में सौंप दी गई।
पर देखो—
इतिहास फिर करवट ले रहा है,
ईंधन की आँच में
जेबें हल्की हो रही हैं,
और… सांसें भी…
अब फिर तुम्हें
मेरी याद आ रही है न?
मैं आज भी यहीं हूँ—
बिना धुएँ के,
बिना शोर के,
तुम्हारी सेहत की सच्ची साथी।
तुम लौट आओ—
मैं फिर चल पड़ूँगी,
उसी स्नेह, उसी समर्पण के साथ…
क्योंकि मैं
सिर्फ एक साइकिल नहीं—
तुम्हारी सादगी का
भूला हुआ अध्याय हूँ।

डॉ शोभा स्वप्निल खंडेलवाल
परिचय
बी.एड., पी एच. डी.(हिंदी)
प्राकृतिक चिकित्सा में साढ़े चार वर्ष डिग्री, बी. जे.
जन्म स्थान – देहरादून 
निवास – मुम्बई 
प्रकाशित पुस्तकें – तीन काव्य संग्रह 
20 से अधिक साझा संकलनों में भागीदारी 


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