Monday, April 20, 2026
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राजेश नरोलिया की कविता – चेहरे

इस शहर में देखे हैं कई लटके उतरे चेहरे।
रोज़ मिल जाते हैं कई तन्हा उदास चेहरे।
ज़रा संभल कर मिलना इस दौर के इंसा से
चिपके हैं उसके चेहरे पे हजारों हज़ार चेहरे।
मैंने क्यों वफाओं की उम्मीद की उससे
तंग दिल थे कुछ हसीन कमसिन चेहरे।
मंज़िलें तो सब को मिल ही जाती यहां
सफर के पहले ही थक कर चूर थे कुछ चेहरे।
जंग तो बिना तलवारों के ही जीत लेते हम
दुश्मनों के साथ थे कुछ मौकापरस्त चेहरे।
इंसानियत यूं नंगी नहीं होती सड़कों पर।
मजलूमों पर ज़ुल्म होते देखते रहे तमाशबीन चेहरे।


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1 टिप्पणी

  1. राजेश जी!

    अभी आपकी कविता पढ़ी -चेहरे।
    अच्छी कविता है आपकी। चेहरे कितने प्रकार के हो सकते हैं, कविता में बेहतर परिभाषित किया।
    बधाई आपको।

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