इस शहर में देखे हैं कई लटके उतरे चेहरे।
रोज़ मिल जाते हैं कई तन्हा उदास चेहरे।
ज़रा संभल कर मिलना इस दौर के इंसा से ।
चिपके हैं उसके चेहरे पे हजारों हज़ार चेहरे।
मैंने क्यों वफाओं की उम्मीद की उससे ।
तंग दिल थे कुछ हसीन कमसिन चेहरे।
मंज़िलें तो सब को मिल ही जाती यहां ।
सफर के पहले ही थक कर चूर थे कुछ चेहरे।
जंग तो बिना तलवारों के ही जीत लेते हम ।
दुश्मनों के साथ थे कुछ मौकापरस्त चेहरे।
इंसानियत यूं नंगी नहीं होती सड़कों पर।
मजलूमों पर ज़ुल्म होते देखते रहे तमाशबीन चेहरे।