1. कैसे बनती है मां!
—–
मां के बारे में सोचते हुए
याद आती है हजारों बातें
उसका हंसना
उसका रोना
पसीने से लथपथ
लकड़ी वाले चूल्हे को फूंकते
कंधे पर चढ़ाए
गरम-गरम दाल-भात मसल कर खिलाते
डिब्बे में रोटी भुजिया स्कूल के लिए बांधते
बुशर्ट की बटन टांकते
स्वेटर बुनते
पुराने स्वेटर को उघाड़ नया स्वेटर बनाते
खेल धूप कर लौटने तक
आंगन के मोहरी पर नजर गड़ाए
और फिर जीवन-संगिनी के हाथ सौंप कर
अलग हट जाते
याद नहीं मुझे मां की गर्भ में मैं कैसा था
गलत है कि मां केवल गर्भ में रखकर
बच्चे को जन्म देती है
मां तो वह बनती है
उस जैविक प्रक्रिया के बाद ।
2. मां का नहीं होना
जैसे वृक्ष का है
जड़ विहीन हो जाना
नदी का है
जल हीन हो जाना
पक्षी का है
पंख हीन हो जाना
आग का है
तेज हीन हो जाना
वायु का है
गति हीन हो जाना ।
3. मां के नहीं होने से
—–
मां के होने
और नहीं होने के बीच का अन्तर
मां के रहते
कभी समझ नहीं आता
और जब समझ में आता है
मां फिसल जाती है
समय की मुट्ठी से
रेत की तरह।
मुट्ठी से फिसला हुआ रेत
कब लौटा है मुट्ठी में।
अरुण चंद्र राय सम्प्रति : गृह मंत्रालय में वरिष्ठ अनुवाद अधिकारी
दो कविता संग्रह प्रकाशित और चर्चित।
देश की पत्र- पत्रिकाओं में कवितायेँ, लेख आदि प्रकाशित।
मोबाइल : +91-9811721147
ईमेल : [email protected]
माँ पर चाहे जितना भी कहा जाए कम ही रहता है। कभी पूरा होता ही नहीं। आपकी तीनों ही कविताएँ बहुत अच्छी हैं आने वाली पीढ़ी चूल्हे और धुएँ के श्रम से वाकिफ न होगी। यह काल संक्रमण का काल है। संसार बहुत कुछ अतीत में छोड़ने जा रहा है। आने वाली पीढ़ी को विश्वास नहीं हो सकता है पर जो सच ही होगा। पहली कविता से हम ज्यादा वाकिफ हैं क्योंकि उस जीवन को हमने भी जिया है।
पर हम अपने अनुभव से कहते हैं कि वह समय बहुत अच्छा था शारीरिक श्रम जरूर था क्योंकि संसाधन आज की तरह नहीं थे किंतु फिर भी लोगों में प्रेम था सब लोग मिलकर रहते थे। ऐसा नहीं था कि झगड़े नहीं होते थे लेकिन फिर भी तुरंत ही भूल कर सब एक हो जाते थे वह प्रेम और अपनापन आजकल नजर भी नहीं आता ।लोग बहुत सामान्य सी बातों पर भी रूठ जाया करते हैं। आजकल सब कुछ प्रोफेशनल हो गया है यहाँ तक कि सारे रिलेशन भी प्रोफेशनल नजर आते हैं। सारे संबंध केंद्र में पैसा है। माँ तो तब भी वैसी ही थी और आज भी वैसी ही है। लेकिन फिर भी सोच बदल गई। पहले माँ होती थी हर दिन,जीवन का हर पल में , हर क्षण उसके नाम था। लेकिन आज वह एक दिन में सीमित होकर रह गई है।
तीनों ही कविताएँ बेहद मार्मिक हैं।
आपको बधाइयाँ, तेजेंद्र जी का शुक्रिया, पुरवाई का आभार।
बहुत सुन्दर रचनाएँ । माँ पर सुन्दर कविताएँ ।
माँ पर चाहे जितना भी कहा जाए कम ही रहता है। कभी पूरा होता ही नहीं। आपकी तीनों ही कविताएँ बहुत अच्छी हैं आने वाली पीढ़ी चूल्हे और धुएँ के श्रम से वाकिफ न होगी। यह काल संक्रमण का काल है। संसार बहुत कुछ अतीत में छोड़ने जा रहा है। आने वाली पीढ़ी को विश्वास नहीं हो सकता है पर जो सच ही होगा। पहली कविता से हम ज्यादा वाकिफ हैं क्योंकि उस जीवन को हमने भी जिया है।
पर हम अपने अनुभव से कहते हैं कि वह समय बहुत अच्छा था शारीरिक श्रम जरूर था क्योंकि संसाधन आज की तरह नहीं थे किंतु फिर भी लोगों में प्रेम था सब लोग मिलकर रहते थे। ऐसा नहीं था कि झगड़े नहीं होते थे लेकिन फिर भी तुरंत ही भूल कर सब एक हो जाते थे वह प्रेम और अपनापन आजकल नजर भी नहीं आता ।लोग बहुत सामान्य सी बातों पर भी रूठ जाया करते हैं। आजकल सब कुछ प्रोफेशनल हो गया है यहाँ तक कि सारे रिलेशन भी प्रोफेशनल नजर आते हैं। सारे संबंध केंद्र में पैसा है। माँ तो तब भी वैसी ही थी और आज भी वैसी ही है। लेकिन फिर भी सोच बदल गई। पहले माँ होती थी हर दिन,जीवन का हर पल में , हर क्षण उसके नाम था। लेकिन आज वह एक दिन में सीमित होकर रह गई है।
तीनों ही कविताएँ बेहद मार्मिक हैं।
आपको बधाइयाँ, तेजेंद्र जी का शुक्रिया, पुरवाई का आभार।