बहुत सुंदर, रोचक अंदाज में आपकी गंभीर कविताए भी मन को गहरे तक प्रभावित करती हैं।चंद्रमुखी रचना में सुंदर परिकल्पना की है आपने ,सचमुच अपनी धरती पर अपने लोगों के बीच जो सुख है, वह कहीं नहीं है। बालकनी में धूप की उष्मा के बीच नानी का पौधों के साथ समय बिताना,उनसे बातें करना अभिभूत करता है।बहुत बहुत बधाई दी,,,पद्मा मिश्रा-जमशेदपुर
पुरवाई के इस अंक में शन्नो जी की तीन कविताएं प्रकाशित हुई हैं। तीनों ही कविताएं अलग-अलग मिजाज की है। ‘प्यार की बूंद’ कविता में कवयित्री का कवि हृदय प्रेम की बूंदों से भावुक हो जाता है। इस कविता में प्रेम सर्वत्र व्याप्त है। यादों में तो दिखता ही है इसके साथ ही जहां -जहां से जीवन गुजरा है वहां-वहां प्रेम के छींटे दिख जाते हैं। वह चाहे घर आंगन हो, बाग उपवन हो या महकता हुआ वसंत हो। प्रेम में सुख-दुख दोनों समाहित होते हैं, दोनों का अपना महत्व होता है। इसीलिए तो कवयित्री ने फूलों के साथ कांटों को भी गले लगाया है। यह कविता कवयित्री के मिजाज से अलग थोड़ी सी गंभीर कविता है।
‘चन्द्रमुखी हुई दुखी’ कविता भारत की उपलब्धि चन्द्रयान मिशन को आधार बनाकर हास्य के रूप में लिखी गई है। इस रचना में कवयित्री ने जिस कल्पना का सहारा लिया है वह अद्वितीय है। मन है, कहां तक पहुंच जाए कुछ कहा नहीं जा सकता है। चन्द्रमुखी रोवर पर सवारी करने चली गई। लेकिन वहां की हालत देखी तो उसके सारे अरमान धूलधूसरित हो गए। कल्पना की ऊंची उड़ानें भी कम मौजू नहीं होती है। इस कविता में कवयित्री का बिंदास अंदाज साफ झलकता है। वे इसके लिए जानी भी जाती हैं।
तीसरी कविता नानी को लेकर रची गई है। बच्चों के लिए नानी सबसे बेहतरीन आसरा होता है। बच्चे उससे अपनी हर बात कह लेते हैं। मजाक करना तो जैसे नानी के हिस्से आया हो। नानी की खाल धूप में झुलस न जाए इसलिए नाती नातिन उसे छाया में बैठने को कहते हैं। पर नानी सयानी है। उसे बुद्धू नहीं बनाया जा सकता है। वह जानती है कि धूप सेंकने से विटामिन डी प्राप्त होती है। इस कविता को भी शन्नो जी ने अपनी मौज में, पूरी मस्ती में लिखी हुई है। संपादक जी एवं कवयित्री दोनों को बहुत बहुत बधाई।
वैसे तो आपको अक्सर ही पढ़ते हैं।कविताएँ बनाना आपके बाएँ हाथ का खेल है शन्नो जी! पर इन संग्रहित कविताओं की बात ही अलग है। प्यार की बूँद कविता बहुत ही मासूम सी माधुर्य भाव से ओतप्रोत कविता है। माधुर्य भाव में करुणा, मर्मस्पर्शिता व आत्मीयता का समायोजन होता है। इसीलिए यह भाव दिल के बड़े करीब रहता है। लड़कियाँ जब अपना बसेरा छोड़ कर आती हैं और दूसरा घर बसाती हैं तो वह खुशबू उनके साथ ही रहती है। स्मृतियाँ गाहे-बगाहे दस्तक देती रहती हैं। आपकी प्यार की बूंदों की कुछ छिड़कन हम तक पहुँची!वह आर्द्रता महसूस हुई।
दूसरी कविता चंद्रमुखी अच्छी कल्पना है चंद्रमा में घूमने की। इसके लिए तो बस एक ही बात कही जा सकती है- *बिना विचारे जो करे,सो पाछे पछताए* और फिर *लौट के बुद्धू घर को आए* वैसे कल्पना की उड़ान अच्छी है। बिना पैसे के घूमने में क्या बुराई!!!
तीसरी कविता ‘नानी और बालकनी’ बहुत अच्छी लगी। नानी से बच्चों का बहुत लाड़ रहता है।नानी बच्चों की जिगरी सहेली की तरह होती हैं। ढलती उम्र में हल्की सी ठंड भी बर्दाश्त नहीं होती है। नानी का बालकनी में बैठना और विटामिन डी की बात करना मन को भा गया।
बेहतरीन कविताओं के लिये आपको बहुत- बहुत बधाइयाँ।
आदरणीया शन्नो जी
पुरवाई में प्रकाशित आपकी तीनों कविताएं अभी-अभी पढ़ीं। वास्तव में आपने बड़े सहज ढंग से सरल शब्दों में अपनी ‘मनकही’ को उद्घाटित कर दिया है। जिंदगी के अनेक रंग बिखरे पड़े हैं आपकी इन रचनाओं में।
बधाई स्वीकारें।
बहुत सुंदर, रोचक अंदाज में आपकी गंभीर कविताए भी मन को गहरे तक प्रभावित करती हैं।चंद्रमुखी रचना में सुंदर परिकल्पना की है आपने ,सचमुच अपनी धरती पर अपने लोगों के बीच जो सुख है, वह कहीं नहीं है। बालकनी में धूप की उष्मा के बीच नानी का पौधों के साथ समय बिताना,उनसे बातें करना अभिभूत करता है।बहुत बहुत बधाई दी,,,पद्मा मिश्रा-जमशेदपुर
बेहद सार्थक,रोचक और सुखकर लगने वाली कविताएं।
चंद्रमुखी कविता बड़ी ही सहज और लीक से हटकर रचना लगी।कहावत का बखूबी इस्तेमाल।
मुबारक हो।
पुरवाई के इस अंक में शन्नो जी की तीन कविताएं प्रकाशित हुई हैं। तीनों ही कविताएं अलग-अलग मिजाज की है। ‘प्यार की बूंद’ कविता में कवयित्री का कवि हृदय प्रेम की बूंदों से भावुक हो जाता है। इस कविता में प्रेम सर्वत्र व्याप्त है। यादों में तो दिखता ही है इसके साथ ही जहां -जहां से जीवन गुजरा है वहां-वहां प्रेम के छींटे दिख जाते हैं। वह चाहे घर आंगन हो, बाग उपवन हो या महकता हुआ वसंत हो। प्रेम में सुख-दुख दोनों समाहित होते हैं, दोनों का अपना महत्व होता है। इसीलिए तो कवयित्री ने फूलों के साथ कांटों को भी गले लगाया है। यह कविता कवयित्री के मिजाज से अलग थोड़ी सी गंभीर कविता है।
‘चन्द्रमुखी हुई दुखी’ कविता भारत की उपलब्धि चन्द्रयान मिशन को आधार बनाकर हास्य के रूप में लिखी गई है। इस रचना में कवयित्री ने जिस कल्पना का सहारा लिया है वह अद्वितीय है। मन है, कहां तक पहुंच जाए कुछ कहा नहीं जा सकता है। चन्द्रमुखी रोवर पर सवारी करने चली गई। लेकिन वहां की हालत देखी तो उसके सारे अरमान धूलधूसरित हो गए। कल्पना की ऊंची उड़ानें भी कम मौजू नहीं होती है। इस कविता में कवयित्री का बिंदास अंदाज साफ झलकता है। वे इसके लिए जानी भी जाती हैं।
तीसरी कविता नानी को लेकर रची गई है। बच्चों के लिए नानी सबसे बेहतरीन आसरा होता है। बच्चे उससे अपनी हर बात कह लेते हैं। मजाक करना तो जैसे नानी के हिस्से आया हो। नानी की खाल धूप में झुलस न जाए इसलिए नाती नातिन उसे छाया में बैठने को कहते हैं। पर नानी सयानी है। उसे बुद्धू नहीं बनाया जा सकता है। वह जानती है कि धूप सेंकने से विटामिन डी प्राप्त होती है। इस कविता को भी शन्नो जी ने अपनी मौज में, पूरी मस्ती में लिखी हुई है। संपादक जी एवं कवयित्री दोनों को बहुत बहुत बधाई।
वैसे तो आपको अक्सर ही पढ़ते हैं।कविताएँ बनाना आपके बाएँ हाथ का खेल है शन्नो जी! पर इन संग्रहित कविताओं की बात ही अलग है। प्यार की बूँद कविता बहुत ही मासूम सी माधुर्य भाव से ओतप्रोत कविता है। माधुर्य भाव में करुणा, मर्मस्पर्शिता व आत्मीयता का समायोजन होता है। इसीलिए यह भाव दिल के बड़े करीब रहता है। लड़कियाँ जब अपना बसेरा छोड़ कर आती हैं और दूसरा घर बसाती हैं तो वह खुशबू उनके साथ ही रहती है। स्मृतियाँ गाहे-बगाहे दस्तक देती रहती हैं। आपकी प्यार की बूंदों की कुछ छिड़कन हम तक पहुँची!वह आर्द्रता महसूस हुई।
दूसरी कविता चंद्रमुखी अच्छी कल्पना है चंद्रमा में घूमने की। इसके लिए तो बस एक ही बात कही जा सकती है- *बिना विचारे जो करे,सो पाछे पछताए* और फिर *लौट के बुद्धू घर को आए* वैसे कल्पना की उड़ान अच्छी है। बिना पैसे के घूमने में क्या बुराई!!!
तीसरी कविता ‘नानी और बालकनी’ बहुत अच्छी लगी। नानी से बच्चों का बहुत लाड़ रहता है।नानी बच्चों की जिगरी सहेली की तरह होती हैं। ढलती उम्र में हल्की सी ठंड भी बर्दाश्त नहीं होती है। नानी का बालकनी में बैठना और विटामिन डी की बात करना मन को भा गया।
बेहतरीन कविताओं के लिये आपको बहुत- बहुत बधाइयाँ।
आदरणीया शन्नो जी
पुरवाई में प्रकाशित आपकी तीनों कविताएं अभी-अभी पढ़ीं। वास्तव में आपने बड़े सहज ढंग से सरल शब्दों में अपनी ‘मनकही’ को उद्घाटित कर दिया है। जिंदगी के अनेक रंग बिखरे पड़े हैं आपकी इन रचनाओं में।
बधाई स्वीकारें।
डॉ० रामशंकर भारती