Sunday, April 19, 2026
होमकवितामनवीन कौर पाहवा की कविताएँ

मनवीन कौर पाहवा की कविताएँ

1 – स्नेह का रिश्ता 
वह उस रोज़ मुझे चौराहे पर मिली,
हाथ में पुस्तक और  बेचती पूजा की थाली  ।
पूछा मैंने  इस पुस्तक में क्या लिखा  है ?
बोली इसमें इक जीवन बसा है ।
मेरे माता पिता की तस्वीरें हैं
टेडी मेडी सी कुछ लकीरें हैं ।
कुछ यादों की नन्ही प्यारी बिंदिया हैं ,
देख उसे खो जाती मेरी निंदिया है ।
तब उसने स्नेह से पुस्तक को माथे से लगाया ,
जैसे वही हो उसका सब कुछ , सरमाया ।
फिर पूछा मैंने “क्या  मुझे दिखाओगी ,
और क्या छिपा है इसमें बतलाओगी ।”
तब दो बूँद अश्रु की टपक पड़ी ,
आर्द्र हो वह अचानक बिफर पड़ी ।
सदियों से हम अनाथ  आते और चले जाते हैं,
कौन हैं हम ? क्या दुःख हमें सताते हैं ?
ऐसा जानने की बोलो किसे पड़ी है ?
धूल जब जब भी माथे पर चढ़ी है,
धो डाला तब ही तुरंत जमाने ने,
क्या स्नेह मान मिला उसे किसी बहाने से ।
हाथ बढ़ा कर तब मैंने उसे उठाया,
स्पंदित हो उठी  वह अचंभित नन्ही काया ।
नयन ठिठके, अधर भी  काँप  रहे थे,
जैसे हो कोई स्वप्न, मुझे  वह आंक रहे थे ।
धीरे से उसने वह पुस्तक खोली ,
रूँधे कंठ से टुकड़े टुकड़े शब्दों में बोली
पहली बार मुझे यह स्नेह अपनत्व मिला  है ,
बस यह ही  कुछ इस पुस्तक में लिखा है ।
2 – संवेदना 
यदि तुम छू सको किसी की वेदना
हृदय में हो थोड़ी सी संवेदना
दर्द समझना उन टूटी उम्मीदों का
दो शब्द स्नेह के तुम अवश्य ही कहना ।
जब कोई बिछड़ जाए किसी का अपना
या फिर टूट जाए नन्हा  सा सपना
जब सूने हों दुःख से आँखों के प्याले
विचारों का बवंडर उलझे हों जाले
तपते सूरज से झुलसा हो उसका आनन
तीक्ष्ण शरों से  छलनी हो मन का आँगन
घनघोर घटाएँ विचलित करती हों अंतर्मन
लगने  लगे उसे निरर्थक अपना जीवन ।
तब तुम यदि बन जाओ सच्चे हमजोली
स्नेह अपनत्व से भर सको जो उसकी झोली
तरस नहीं खाना उस पर बस सहृदय बनना
स्नेह भरा। घावों पर मलहम रखना
नई दिशा ग़र दे पाओ उम्मीदों की
राह दिखा दो फिर से नई तदबीरों की
अवसाद मिटा फूलों से उसका जीवन भर दो
करो प्रार्थना ईश्वर से ,उसे ख़ुशियों का वर दो 

मनवीन कौर पाहवा
Mob: 8600017018
RELATED ARTICLES

1 टिप्पणी

  1. आपकी दोनों ही कविताएँ बहुत मार्मिक और अच्छी हैं मनवीन जी!
    स्नेह का रिश्ता सबसे बड़ा रिश्ता होता है। वह किसी भी धर्म ,जाति, वर्ग,उम्र और स्थितियों से परे इंसानियत का रिश्ता होता है। एक कथ्य के माध्यम से आपने इस कविता में अपनी बात रखी है। आपके स्नेह के रिश्ते की मार्मिकता महसूस हुई।
    संवेदनाओं के तार ही स्नेह -बंधन है। जो इस बंधन में बँध जाता फिर वह अलग नहीं हो पाता यह बात सबको समझना चाहिये। दोनों बेहतरीन कविताओं के लिए आपको बहुत-बहुत बधाइयाँ।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest