Saturday, August 8, 2026
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संजय मासूम की तीन ग़ज़लें

संजय मासूम मूलतः एक हिन्दी पत्रकार थे जो टाइम्स ग्रुप से एक लंबे अर्से तक जुड़े रहे। फिर पत्रकारिता को अलविदा कहते हुए वे मुंबई के मुख्यधारा के हिन्दी सिनेमा के साथ एक संवाद लेखक, पटकथा लेखक और गीतकार की हैसियत से जुड़ गये। उनका नाम मुंबई की बहुत बड़ी हिट फ़िल्मों के साथ किसी ना किसी रूप से जुड़ा है जैसे कि – आशिकी-2, काबिल, कृष, कृष-3, गुंडे, जन्नत-2, राज़-3, इंडियन और वेब सीरीज़ आश्रम। संजय मेरे छोटे भाई समान मित्र रहे हैं। उन्होंने पुरवाई के पाठकों के लिये अपनी तीन ग़ज़लें विशेष रूप से भेजी हैं। इन्हें आप सबके साथ साझा करते हुए हमें गर्व की अनुभूति हो रही है।

1.
शाम ग़ायब है, सहर ग़ायब है ।
मेरे पुरखों का नगर ग़ायब है ।।
ये जली बस्तियाँ बताती हैं ।
अब दुआओं से असर ग़ायब है ।।
इल्म ना राम, ना रहीम को है ।
कैसे दोनों ही का घर ग़ायब है ।।
दोस्त सोचो ! तिलिस्म किसका है ।
धड़ तुम्हारा, मेरा सर ग़ायब है ।।
डर का दर्शन समझ ना पाए तुम।
देखो, हर आँख से डर ग़ायब है।।
2.
मुझमें सहरा बाक़ी है ।
उसमें दरिया बाक़ी है ।।
इश्क़ में मर के देख लिया।
इश्क़ में जीना बाक़ी है ।।
बोल रहा है पिंजरा भी ।
मेरा उड़ना बाक़ी है ।।
सभी मुखौटे हैरां हैं।
मेरा चेहरा बाक़ी है ।।
जब उसके दीदार हुए।
बस वो लम्हा बाक़ी है ।।
राजा-रानी ख़ुश तो हैं ।
लेकिन क़िस्सा बाक़ी है ।।
जब तक चिड़ियाँ ज़िंदा हैं।
तब तक दुनिया बाक़ी है ।।
काँटे तो उग आये हैं ।
गुल का खिलना बाक़ी है ।।
3.
अनदेखा, अनजाना सा डर आता है,
जब मेरी बस्ती में रहबर आता है!
नई इमारत देख के आँखें खुश तो हैं,
याद मगर अब भी वो खंडहर आता है !
बारिश की बूँदें जब प्यास बढ़ाती हैं,
नदियों के नज़दीक समंदर आता है !
नाम-घरौंदे होते हैं जिस तट पर, क्यों?
लौट-लौट कर वहाँ समंदर आता है !
छोड़ के जो जाता है, तनहा करता है ,
यादों में वो ही क्यों अक्सर आता है !
सब कुछ दिख कर भी जब नहीं दिखाई दे
धीरे-धीरे ऐसा मंज़र आता है !
मंज़िल को कुछ दूर उठा ले जाता है !
जब भी कोई मील का पत्थर आता है
संजय मासूम
संपर्क – +91 98200 34538
Email – [email protected]
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3 टिप्पणी

  1. वाह आफरीन हैं तीनों की तीनों ग़ज़ल।
    किसी को ग़ज़ल लिखने का गुर सीखना हो तो साहब ने तीन नज़ीर पेश कर दी है।छोटे छोटे मगर मानीखेज सतरें।
    पुरवाई पत्रिका परिवार और संपादक को दिली मुबारकबाद।आपकी वजह से यह पढ़ने को मिली हैं।

  2. आदरणीय संजय जी!
    आपकी तीनों ही गज़लें अच्छी लगीं।हम अक्सर कहते रहे हैं कि ग़ज़ल का व्याकरण हम नहीं जानते पर रूह से निकली भावनाएँ दिल में दस्तक देती हैं । पहली ग़ज़ल मार्मिक है।इससे सांप्रदायिक दुर्भावनाओं की गंध आती है।साम्प्रदायिक दुर्भावनाओं में ऐसे लोग नुकसान उठाते हैं जिनका उन सब से कोई वास्ता ही नहीं होता है। और दोनों ही पक्षों का नुकसान होता है। कुछ शेर जो अच्छे लगे-
    इल्म ना राम ना रहीम को है।
    कैसे दोनों ही का घर ग़ायब है।।

    जब तक चिड़ियाँ ज़िंदा हैं।
    तब तक दुनिया बाक़ी है ।
    तीसरी ग़ज़ल पूरी ही बहुत अच्छी लगी। बेहतरीन ग़ज़लों के लिये आपको बधाइयाँ

  3. भाई संजय मासूम की ये ग़ज़लें हमारे समाज का जीवंत दस्तावेज हैं। उन्होंने बड़ी संजीदगी और साफगोई से हमारे चारों ओर छितराए विद्रूप को बखूबी उजागर किया है। मुझे लगता है संजय मासूम की ये ग़ज़लें नाइंसाफियों का एक मुकम्मल बयान है। अपसंस्कृतिमूलक व्यवस्था को लेकर संजय के भीतर जो आग धधक रही है, उसका उनवान भी हैं।
    मैं कोई ग़ज़लगो नहीं हूँ लेकिन गजलों का एक दुरस्त पाठक जरूर हूँ। उस नाते कह सकता हूँ कि संजय जी की इन ग़ज़लों में दरिया की रवानी है, फूलों पर मड़राती-अठखेलियाँ करतीं तितलियों के लहुलूहान जख्मी पंख हैं। दूर कहीं फिरकापरस्ती की आग में जलती हुई बस्तियों की आग की लपटें हैं… और …और ….*धड़ तुम्हारा, मेरा सर गायब है।*

    डॉ० रामशंकर भारती

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