Wednesday, February 11, 2026
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प्रकाश मनु का संस्मरण : कन्हैयालाल नंदन – एक बड़े और जिंदादिल संपादक

जब नंदन जी के व्यक्तित्व के अलग-अलग शेड्स की बात चली तो उनकी रूमानियत, जिसे कभी-कभी उनकी तबीयत की रंगीनी भी कह और समझ लिया जाता है—का जिक्र भला कैसे न होता? और यह प्रसंग भी एक तरह से नंदन जी ने ही छेड़ा था। मेरे एक सवाल के जवाब में। उनका कहना था कि अगर सुंदरता बुरी चीज नहीं है, तो भला सुंदर को सुंदर कहना कैसे बुरा हो सकता है? लिहाजा किसी सुंदर औरत को सुंदर कहने में उन्हें कभी परेशानी नहीं हुई। हालत यह कि एक दफे मुंबई में वे गाड़ी में जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक औरत दिखाई थी—असाधारण रूप से सुंदर। उन्होंने फौरन गाड़ी रुकवाई और गाड़ी से उतरकर उस औरत के पास यह कहने के लिए गए कि “आप असाधारण रूप से सुंदर हैं।” और उसके बाद अपनी गाड़ी में आए, बैठे और चल दिए।

जब से लेखन-कर्म की शुरुआत हुई और एक लेखक के रूप में मैंने दुनिया को देखना-जानना शुरू किया, नंदन जी को सर्वत्र अपने आस-पास महसूस किया। पहले परागके बड़े ही जिंदादिल और हरदिल अजीज संपादक के रूप में, फिर सारिका’, ‘दिनमान’, ‘संडे मेल’—हर पत्रिका में अपने एक खास अंदाज में लेखकों और पाठकों को संबोधित करते हुए, और उनसे कुछ-कुछ घरेलू सा रिश्ता बनाते हुए सबके अपने, बिल्कुल अपने कन्हैयालाल नंदन। यानी ऐसे संपादक, जिनसे मन की हर बात कही जा सकती है, खुलकर बतियाया जा सकता है और कभी जी उखड़े तो बेशक झगड़ा भी जा सकता है। जैसे अपने बड़े भाई या उम्र में बड़े किसी दोस्त से। 
सच कहूँ तो मुझे शुरू से नंदनजी एक ठसकेदार पत्रकार के रूप में मोहते रहे हैं और एक लेखक-पत्रकार के रूप में उनका ठेठ हिंदी का ठाट मुझे हमेशा लुभाता रहा। हालत यह थी कि दूर बैठा उन्हें पढ़ता बड़े चौकन्नेपन के साथ, उनके लिखे पर भीतर ही भीतर बहसें और तेज लड़ाइयाँ छिड़ती रहतीं। कभी-कभी मुझे उन पर बेहद गुस्सा आता और कभी वे बहुत प्यारे लगते। लेकिन प्रेम और घृणा के तेज झंझावत के बीच उनसे इकतरफा संवाद साधता हुआ, मैं सचमुच नहीं जानता था कि कभी उनके इतने निकट भी आ पाऊँगा। और उनसे ऐसी प्यार भरी गुफ्तगू मेरी होगी कि ताजिंदगी उसे भुला पाना मेरे लिए असंभव हो जाएगा।
चलिए, उनसे हुई पहली मुलाकात से ही शुरू करते हैं, जिसके बाद दूसरी, तीसरी, चौथी कई मुलाकातें बहुत जल्दी-जल्दी हुईं। और मैं इस सम्मोहक शख्स के जादू की गिरफ्त में आ गया था। हालाँकि इस मुलाकात के लिए उकसाने वाले अभिन्न मित्र और बालसखा विजयकिशोर मानव के जिक्र के बिना तो इसका वर्णन करना बड़ा अटपटा लगेगा। यह तय है कि नंदन जी को उनके संपादक-कर्म, रचनाओं और उनके लेखन से जानता भले ही रहा होऊँ, पर उनसे हुई मेरी शुरुआती मुलाकातों का श्रेय पूरी तरह मानव जी को ही जाता है।

मानव जी उन दिनों दैनिक हिंदुस्तान के साहित्य संपादक थे और खासकर रविवासरीय का काम देखते थे। मानव जी से मेरी मित्रता खासी सर्जनात्मक किस्म की मित्रता थी, जिसमें साहित्य पर लगातार गहरा संवाद भी शामिल था। कहीं-कहीं विचार-भिन्नता भी थी। पर मैं और मानव दोनों ही इसकी कद्र करते थे। इसी निरंतर साहित्यिक संवाद के बीच उन्हें मुझमें न जाने क्या दीख गया कि वे रविवासरीय के लिए मुझसे निरंतर लिखवाने लगे। मेरे लिए यह मित्र की मानरक्षा का भी प्रश्न था। इसलिए जो काम वे मुझे करने को देते, मैं उसमें जान उड़ेलता था। उन्होंने मुझसे काफी-कुछ लिखवाया। और कुछ चीजें तो बेतरह आग्रह और जिद करके लिखवाईं।
इन्हीं में के.के. बिरला न्यास का व्यास सम्मान मिलने पर रामविलास जी से लिया गया इंटरव्यू भी था। इसके लिए पंद्रह-बीस दिन मैंने नए सिरे से और बड़ी ही गंभीरता से उन्हें पढ़ने में लगाए। फिर उनसे जो यादगार और ऐतिहासिक महत्त्व की बातचीत हुई, उसकी खासी धूम मची। मानव जी ने अखबार के पूरे पन्ने पर बड़े आकर्षक कलेवर के साथ उसे छापा। और आश्चर्य, उस पर इतनी सुखद और उत्साहपूर्ण प्रतिक्रियाएँ आईं कि मैं चकित रह गया। 
ऐसी प्यारी जिदें मानव जी की अकसर हुआ करतीं कि मैं उसके आगे लाचार हो जाता। और हर बार जब वह छपकर आता या उस पर उत्साहवर्धक प्रतिक्रियाएँ मिलतीं, हम उसे खुश होकर शेयरकरते थे। वह दिन हमारे लिए किसी उत्सव से कम न होता था।
ऐसा ही काम मानव जी ने उन दिनों मेरे जिम्मे डाला थानंदन जी का एक लंबा इंटरव्यू करना। सुनकर मैं थोड़ा बिदका था, भला नंदन जी का क्या इंटरव्यू होगा? ठीक है, वे पत्रकार हैं और जरा ऊँचे पाये के ठसके वाले पत्रकार हैं, मगर इंटरव्यू तो रामविलास शर्मा का हो सकता है, त्रिलोचन जी का हो सकता है, कमलेश्वर का हो सकता हैऔर भी बहुत से मूर्धन्य लेखकों का हो सकता है। भला नंदन जी से मैं क्या पूछूँगा और वे बताएँगे भी क्या? और उस इंटरव्यू में पढ़ने लायक क्या होगा? कोई गंभीर साहित्य-चर्चा तो होने से रही।
तो अपनी आदत के मुताबिक मैं टालता रहा और मानव जी अपनी आदत के मुताबिक ठकठकाते रहे। फिर एक दिन नंदन जी का फोन नंबर दिया। कहा, “बात करके चले जाओ।
पर मैं थोड़ा झेंपू और थोड़ा अक्खड़ किस्म का ऐसा विचित्र जीव था कि मुझे फोन पर बात करने में भी हिचक हो रही थी। सो मानव जी ने ही बात करके समय ले लिया। बोले, “जाओ, वे इंतजार कर रहे हैं।
तो चलो, ठीक है!के भाव से कुढ़ते-कुढ़ते मैं गया थाकोई भीतरी उत्साह से नहीं। 
उन दिनों कस्तूरबा गाँधी मार्ग पर हिंदुस्तान टाइम्स भवन में तीसरे माले पर नंदन पत्रिका का दफ्तर था, जहाँ मैं काम करता था। पहले माले पर दैनिक हिंदुस्तान का दफ्तर था, जिसमें एक अलग कक्ष में मानव जी बैठते थे। संयोग से उन दिनों संडे मेल का दफ्तर भी कस्तूरबा गाँधी मार्ग पर ही था। हिंदुस्तान टाइम्स भवन के लगभग सामने ही, सड़क के दूसरी ओर। मुश्किल से पैदल पाँच-सात मिनट में वहाँ पहुँचा जा सकता था।
मैं गया, पर कुछ इस तरह कि एक पैर आगे चल रहा था, एक पीछे। अनिच्छा मुझ पर हावी थी, पर मित्र का मन रखने के लिए जा रहा था। फिर जिस तरह का स्वभाव मेरा था, मैं रास्ता चलते सोच रहा था कि बहुत बदतमीजी के दो-चार सवाल मैं पूछूँगा और नंदन जी अपनी संपादकी अकड़ दिखाएँगे तो बस, झगड़ा-टंटा हो जाएगा। और किस्सा खत्म!
लेकिन बात खत्म नहीं हुई, बात चल पड़ी और एक ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जो बरसोंबरस चला। आज नंदन जी नहीं हैं। उन्हें गुजरे हुए कोई चौदह साल बीत गए। पर उनके लिखे-पढ़े और पुरानी स्मृतियों के जरिए उनसे संवाद तो मेरा आज तक जारी है। और शायद जब तक मैं हूँ, वह जारी ही रहेगा।
अलबत्ता वह इंटरव्यू हुआऔर एक नहीं, कई किश्तों में हुआ। कई दिनों तक लगातार चला। यहाँ तक कि रात को संडे मेलका दफ्तर खत्म होने तक हम बैठे रहते और वापसी में नंदन जी मुझे आश्रम चौक पर छोड़ देते, जहाँ से मुझे फरीदाबाद की बस मिल जाती। आखिरी एक-दो बैठकों में मानव भी इसमें शामिल हुए। कुछ सवाल जो मैं पूछने से कतरा रहा था, उन्होंने पूछे और इंटरव्यू की वार्म्थऔर अनौपचारिकता इससे और बढ़ गई।
वह इंटरव्यू थोड़े संपादित रूप में दैनिक हिंदुस्तान के रविवासरीय में पूरे सफे पर छपा और मुझे उस पर ढेरों प्रतिक्रियाएँ मिलीं। आज भी उसकी चर्चा करने वाले मिल जाते हैं। 
बाद में वह पूरा इंटरव्यू असंपादित रूप में मणिका मोहिनी की पत्रिका वैचारिकी संकलनमें छपा और उस पर ढेरों पत्र और प्रतिक्रियाएँ मिलीं। ज्यादातर लोगों ने पत्र लिखकर या फिर बातचीत में कहा कि नंदन जी का ऐसा जिंदादिली से भरपूर इंटरव्यू हमने नहीं पढ़ा। कुछ लोगों का तो यह भी कहना था कि नंदन जी को पहली बार उन्होंने इस इंटरव्यू के जरिए भीतर से जाना। यानी यह नंदन जी के भीतर के एक और नंदन से मुलाकात थी, जिसे वे अकसर सावधानी से भीतर तहाकर रखते हैं। कम से औरों की तरह छलकाते नहीं फिरते।
और मजे की बात यह है कि वह पूरा का पूरा इंटरव्यू ही नहीं, उस समय की समूची दृश्यावलि—नंदन जी के हँसने, बात करने और गंभीरता या कि गुस्से से प्रतिक्रिया व्यक्त करने का ढंग, सब कुछ ज्यों का त्यों अब भी मेरी आँखों में बसा है। जैसे वह इंटरव्यू न हो, कोई चलती-फिरती फिल्म हो, जिसमें नंदन जी की शख्सियत का एक-एक पहलू, एक-एक भावमुद्रा उभरकर सामने आ जाती है।
वह इंटरव्यू कुछ अरसे बाद मेरी पुस्तक कुछ और मुलाकातेंमें छपकर पाठकों के आगे आएगा। फिर भी जिन्होंने उसे नहीं पढ़ा, उनके लिए नंदन जी के उन जवाबों और भंगिमाओं को प्रस्तुत करना चाहूँगा, जिन्होंने मेरे मन पर सचमुच गहरा असर डाला।
इंटरव्यू की शुरुआत में ही नंदन जी खुल गए। और पूरी बातचीत में उनका यही बेबाक और बेधक अंदाज बना रहा। मेरे इस सवाल पर कि पत्रकारिता में वे क्या करना चाहते थे, नंदन जी ने एकदम देसी लहजे में जवाब दिया कि प्रकाश, मैं चाहता हूँ जिस काम को भी मैं करूँ, उसमें इस तल्लीनता से लग जाऊँ कि फिर उसमें किसी और के करने के लिए कुछ और न बचे। 
फिर उन्होंने एक उदाहरण भी दिया। बोले, अगर मैं धोती निचोड़ने बैठूँ, तो मैं चाहूँगा कि मैं उसकी आखिरी बूँद तक निचोड़ डालूँ, ताकि अगर उसे कोई और निचोड़ने बैठने तो उसमें से एक बूँद भी पानी न निकाल सके। ऐसे ही अगर मैं तबला बजाने बैठूँ, तो मेरी कोशिश यह होगी कि उसमें इतनी कामयाबी प्राप्त करूँ कि अल्ला रक्खा खाँ की छुट्टी कर सकूँ। 
इसी तरह पत्रकारिता के बारे में उनका कहना था कि उनका आदर्श यह रहा कि पत्रकारिता की दुनिया में वे कोई हिमालय बना सकें। 
अगर इस लिहाज से देखें तो बेशक पराग और सारिका के संपादन के जरिए नंदन जी ने साहित्यिक पत्रकारिता की ऊँचाइयों को छुआ, नए मयार कायम किए तथा काफी बड़े और अविस्मरणीय काम किए। संभवतः धर्मवीर भारती की तरह कोई हिमालय वे नहीं बना सके, पर पत्रकारिता की नब्ज पर उनका हाथ था और पत्रकारिता का कोई भी इतिहास उनके जिक्र के बिना पूरा नहीं हो सकता। 
मैं समझता हूँ कि यह उपलब्धि भी कोई छोटी उपलब्धि नहीं है और बहुत से लेखकों, पत्रकारों के लिए यह आज भी स्पृहणीय जरूर होगी। 
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खैर, संडे मेल के दफ्तर में खासे गहमागहमी वाले माहौल में सवालों और जवाबों का यह जो निरंतर सिलसिला चल रहा था, उसके बीच-बीच में फोन तथा दफ्तर के काम भी आ ही जाते थे। नंदन जी जब ऐसे कामों में लगते थे, तो उनमें भी पूरी तरह से लीन हो जाते थे। और फिर बगैर किसी खीज के, उसी तन्मयता से बातचीत की रौ में बहने लगते। संडे मेलके संपादकीय के कुछ पन्ने टाइप होकर उनके सामने आए, तो बड़े मनोयोग से कलम उठाकर वे उन्हें दुरुस्त करते रहे। फिर उन्हें भेजने के बाद मुझसे मुखातिब हुए, “प्रकाश, मैंने भागते-भागते ही पत्रकारिता की है?”
और शायद भागते-भागते ही जिंदगी जी है…?” मैंने उनके जवाब में एक टुकड़ा और जोड़ दिया, जो सवाल की तरह नत्थी हो गया था। नंदन जी को मेरा यह ढंग भा गया। थोड़े उल्लसित होकर बोले, “हाँ, लेकिन इस बारे में मेरी कोशिश यह रहती है कि अगर मैं किसी चीज को समूचा नहीं पा सकता और एक छोटा सा टुकड़ा ही मेरे सामने हैं, तो कम से कम उस टुकड़े को ही संपूर्णता से जिया जाए। अगर मेरे पास पाँच ही मिनट हैं तो मैं सोचूँगा कि उस पाँच मिनट में ही क्या अच्छे से अच्छा गाया-बजाया या जिया जा सकता है। पूरा राग नहीं तो उसका एक छोटा सा टुकड़ा ही सही! उस पाँच मिनट को इस तरह तो जिया ही सकता है कि उस समय मैं सब कुछ भूलकर उसी एक छोटे से टुकड़े या छोटे से काम में पूरी तरह लीन हो जाऊँ।
बातचीत अच्छे और पुरलुत्फ अंदाज में चल रही थी। और नंदन जी के स्वभाव और पत्रकारी जीवन के पन्ने एक-एक कर खुल रहे थे। मुझे अच्छा लग रहा था। खासकर इसलिए कि नंदन जी पूरे मूड में थे और सवालों से टकराने का उनका अनौपचारिक अंदाज और बेबाकी मुझे लुभा रही थी। 
अचानक एक शरारती सवाल कहीं से उड़ता हुआ आया और मेरे भीतर उछल-कूछ मचाने लगा। यह सवाल मेरा नहीं, मेरे एक कवि मित्र महाबीर सरवर का था। यहाँ यह बता दूँ कि महाबीर कबीरी साहस के साथ अपनी बात कहने वाले थोड़े खुद्दार किस्म के कवि-लेखक हैं, जिनका लेखकों और पत्रकारों को देखने-परखने का नजरिया कहीं ज्यादा सख्त और आलोचनात्मक है। उनकी सब बातें मुझे पसंद नहीं आतीं, पर बेशक वे खरे और ईमानदार लेखक हैं। लिहाजा उनकी बातें सुनना मुझे प्रिय है।

 

एक दिन यों ही बातों-बातों में महाबीर ने कहा था नंदन जी ने एक लेखक के रूप में मुझे कभी प्रभावित नहीं किया। हाँ, वे हिंदी साहित्य के सबसे बढ़िया क्रीजदारलेखकों में से एक हैं, उनके कॉलर की क्रीज और टाई को नॉट मुझे कभी गड़बड़ नहीं मिली।
सो नंदन जी जब अपनी गुफ्तगू के पूरे अनौपचारिक रंग में थे, मैंने यह सवाल चुपके से उनके आगे सरकाया। पूछा, “मेरे मित्र की यह टिप्पणी आपको कैसी लगती है?”
सुनकर नंदन जी एक क्षण के लिए थोड़ा रुके। गुस्से की हलकी सी लाली उनके चेहरे पर आई, और आवाज में जरा सी तुर्शी आ गई। लेकिन फिर भी असहज वे नहीं हुए। बोले—
प्रकाश, अपने मित्र से कह देना कि मैंने बहुत गरीबी देखी है, लेकिन अपनी गुरबत को कभी नहीं बेचा और जान-बूझकर दैन्य को कभी नहीं ओढ़ा। अगर मेरे पास एक ही कमीज होगी, तो उसे भी मैं रात में अच्छी तरह धोकर, लोटे से इस्तिरी करके, अगले दिन ठाट से पहनकर दफ्तर जाऊँगा। और किसी को अहसास नहीं होने दूँगा कि इस आदमी के पास एक ही कमीज है।…
और फिर स्वाभाविक रूप से जिक्र इस बात का चल पड़ा कि नंदन जी के बचपन के हालात क्या थे, किस तरह वे पले, बढ़े और पढ़े। नंदन जी ने बताया कि हालत यह थी कि क्लास में नंबर सबसे अच्छे आते थे, लेकिन पिता के पास फीस देने के लिए पैसे नहीं होते थे। पढ़ाई बीच में रोक दी गई और कहीं किसी दुकान पर छोटा-मोटा मुनीमी का काम उन्हें करना पड़ा। उनके एक अध्यापक ने यह देखा, तो उन्हें दुख हुआ। उन्होंने नंदन जी के पिता के पास जाकर कहा, “आपका लड़का इतना होशियार है पढ़ाई में। उसे पढ़ाइए, फीस के पैसे मैं दूँगा।
तो फीस का इंतजाम तो हो गया, लेकिन किताबें…? किताबें खरीदने के पैसे तक उनके पास नहीं थे। किसी तरह किताबें जुटीं और उन्होंने पढ़ाई आगे जारी रखी। गाँव से जिस पुरानी साइकिल पर बैठकर वे शहर जाते थे, उसका पैडल ढीला था और बार-बार निकल जाता था। तब उसके तकुए बार-बार टाँगों में चुभ जाते थे। मेरी दोनों पिंडलियों पर उस तकुए के चुभने के लाल-लाल निशान अब भी है,” कहकर नंदन जी पैंट के पाँयचे थोड़े ऊपर सरकाकर मुझे वे निशान दिखाने लगते हैं।
मैं हिल उठता हूँ और सचमुच नंदन जी की आँखों का सामना करने में मुझे दिक्कत महसूस होने लगती है।
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मुझे खुद पर खीज आती है, मैंने यह बेढंगा सवाल पूछा ही क्यों? लेकिन मेरे भीतर पालथी लगाकर बैठे जिज्ञासु किस्म के इंटरव्यूकार को कोई खेद नहीं। उलटे उसे हलका सा संतोष मिला कि चलो, इसी बहाने नंदन जी के भीतरी व्यक्तित्व के एक ऐसे गुमनाम अँधेरे कोने तक मैं चला गया, जहाँ तक वैसे शायद मेरी आवाजाही होनी मुश्किल थी!
यों अच्छा यह भी लग रहा था कि ऐसे अप्रिय और लगभग बदतमीजी वाले सवाल को भी नंदन जी झेल गए और बगैर ज्यादा असहज हुए झेल गए। इससे नंदन जी के गुरुत्वाकर्षणके प्रभाव को मैंने खुद पर कहीं ज्यादा महसूस किया। 
ऐसा ही एक संजीदा प्रसंग और छिड़ा अज्ञेय जी को लेकर। मैंने नंदन जी से पूछा, “क्या आप कुछ कनफेस करेंगे?…या कि क्या कुछ ऐसे लोग हैं, जिनका आपने जाने या अनजाने दिल दुखाया हो और बाद में इसका गहरा पछतावा रहा हो?” 
इसी सिलसिले में अज्ञेय जी का जिक्र आया था। नंदन जी ने बताया कि उनकी एक बुरी आदत है कि जिसे वे बेहद चाहते हैं, वे उसके बारे में भी जान लेना चाहते हैं कि वह व्यक्ति उन्हें उसी भाव से चाह रहा है या नहीं? अज्ञेय जी से उनकी निकटता थी और अकसर फोन पर लंबी बातचीत होती थी। जाहिर है, ज्यादातर फोन नंदन जी ही करते थे। पर एक दिन अपनी इसी दुष्टइच्छा से प्रेरित होकर उन्होंने खुद फोन न करने का निश्चय किया। और ऐसा एक नहीं, कई दिनों तक चला।
खुद नंदन जी के लिए ये बहुत भारी दिन थे। एक-एक दिन बहुत मुश्किल से कट रहा था। अंदर खासी उथल-पुथल मची हुई थी। पर वे जबरन अपने को रोके हुए थे। 
फिर कई दिनों बाद अचानक एक दिन अज्ञेय जी का फोन आया, “नंदन जी हैं?” 
हाँ, भाई जी, मैं बोल रहा हूँनंदन जी ने कहा। और अज्ञेय जी ने फोन करने का एक छोटा सा बहाना यह निकाला कि नंदन जी, असल में मैं यह जानना चाहता हूँ कि इस शब्द को आपके यहाँ क्या कहते हैं…?” और फिर बोले, “मुझे चिंता हुई, आपका स्वास्थ्य तो ठीक है न!” 
इस पर नंदन जी को पछतावा हुआइतना गहरा पछतावा कि वे जीवन भर उसे भूल नहीं पाए। 
प्रकाश, अपनी इस भूल के लिए मैं आज तक खुद को माफ नहीं कर पाया कि मैंने अज्ञेय जी जैसे आदमी की परीक्षा लेनी चाही थी, कि कहीं मेरा उनके प्रति प्रेम इकतरफा ही तो नहीं! इस चीज के लिए मैं आज तक खुद को माफ नहीं कर पाया।…” 
कहते-कहते नंदन जी का गला रुँध जाता है। फिर एकाएक वे भावनाओं की तेज बाढ़ में बह जाते हैं और उनका सारा चेहरा आँसुओं से भीग जाता है।
इसके बाद दो-तीन मिनट कुछ ऐसे गीले, व्यग्र और उदास थे कि मैं चुपचाप हक्का-बक्का सा उनकी ओर देख रहा था। इसके अलावा न कुछ सोच पा रहा था, न कुछ पूछ पा रहा था। आखिर नंदन जी ने रूमाल निकालकर आँखें पोंछी और खुद ही जैसे भीतर का पूरा जोर लगाकर उस हालत से उबरते हुए कहा, “अच्छा प्रकाश, पूछो…आगे पूछो।
एक इंटरव्यूकार के रूप में मेरी बड़ी चाहत थी कि उस इंटरव्यू में नंदन जी के व्यक्तित्व के अलग-अलग शेड्स और मूड्स शामिल हों। तो सामने जो था, वह भी तो उनके व्यक्तित्व का एक असाधारण पहलू ही था न! मैं जिसे अपनी स्मृति के कैमरे की आँख में कैद कर लेने की कल्पना तक नहीं कर सकता था। मगर फिर मैं इस कदर असहज क्यों था? सचमुच इंटरव्यू को आगे बढ़ाना फिर उस दिन मेरे लिए संभव नहीं रहा। जल्दी से अपने सवालों को समेटकर चला आया।
हाँ, जब नंदन जी के व्यक्तित्व के अलग-अलग शेड्स की बात चली तो उनकी रूमानियत, जिसे कभी-कभी उनकी तबीयत की रंगीनी भी कह और समझ लिया जाता हैका जिक्र भला कैसे न होता? और यह प्रसंग भी एक तरह से नंदन जी ने ही छेड़ा था। मेरे एक सवाल के जवाब में। उनका कहना था कि अगर सुंदरता बुरी चीज नहीं है, तो भला सुंदर को सुंदर कहना कैसे बुरा हो सकता है? लिहाजा किसी सुंदर औरत को सुंदर कहने में उन्हें कभी परेशानी नहीं हुई। हालत यह कि एक दफे मुंबई में वे गाड़ी में जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक औरत दिखाई थीअसाधारण रूप से सुंदर। उन्होंने फौरन गाड़ी रुकवाई और गाड़ी से उतरकर उस औरत के पास यह कहने के लिए गए कि आप असाधारण रूप से सुंदर हैं।और उसके बाद अपनी गाड़ी में आए, बैठे और चल दिए।
शायद इसी रंगीन तबीयत के कारण नंदन जी प्रेम के किस्से या फिर अफवाहें ही निरंतर हवा में फैलती रही हैं। लेकिन कब यहाँ रुक जाना चाहिए, यह तय करने में शायद उन्हें कभी कोई परेशानी नहीं हुई। इसका बहुत कुछ श्रेय उनकी पत्नी को भी जाता है, जिनसे वे बेपनाह प्रेम करते थे।
बातचीत की रौ में बहते हुए उन्होंने बताया था कि जिस दिन उनकी पत्नी खुश न रहे या जिस दिन उनकी पत्नी का प्रेम उन्हें हासिल न हो, उस दिन को जीने की वे कतई इच्छा नहीं रखते। उनकी पत्नी ही है जो उन्हें सँभालती है, समझती है और उनकी इतनी परवाह करती है।
फिर बातों-बातों में उन्होंने बताया कि, “यहीं, जहाँ आप बैठे हैंहिंदी की एक प्रसिद्ध कथा लेखिका बैठी थी। और उसने आँखों में गहरा विश्वास भरकर मुझसे पूछा था, ‘अच्छा नंदन, तुम दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार किसे करते हो?’ उसे भ्रम था कि शायद उसका नाम मेरी जुबान से निकलेगा। पर मेरा जवाब था कि अपनी पत्नी को, जिसके बगैर मैं एक दिन भी जीने की इच्छा नहीं रखता।
बाद में अनौपचारिक बतकही में नंदन जी ने उस कथा लेखिका का नाम भी बताया था। पर मैं नहीं समझता, कि मुझे इसका जिक्र करना चाहिए।
[4]
बहरहाल नंदन जी के व्यक्ति और पत्रकार के समूचे ग्राफ को समेटता हुआ यह इंटरव्यू तीन-चार मुलाकातों के बाद पूरा हुआ। मैंने टाइप कराकर उनके पास पहुँचाया तो उसी शाम को उनका फोन आया, “इंटरव्यू बहुत अच्छा है प्रकाश। मुझे आश्चर्य है, तुमने सारी बातें जस की तस कैसे लिख दीं, यहाँ तक कि बातचीत का मेरा अंदाज भी उसमें आ गया है। 
गो कि मजे की बात यह है कि उस इंटरव्यू का एक भी शब्द मैंने लिखा न था। सिर्फ आमने-सामने की अनौपचारिक बतकही थी, जिसका एक-एक शब्द मैंने बाद में ज्यों का त्यों कागजों पर उतार दिया था।
बाद में एकाध जगह उन्होंने कलम भी चलाई और कुछ जवाबों की तुर्शी को थोड़ा कम किया। जब आज की पत्रकारिता के सनसनी भरे दौर और सस्तेपन की ओर मैंने उनका ध्यान खींचा तो उन्होंने बदले हुए समय और पाठकों की बदली हुई रुचियों का वास्ता देकर कहा था, “आज अगर गणेशशंकर विद्यार्थी होते तो वे भी बदल गए होते।मैंने इसी को इंटरव्यू का शीर्षक बनाया ता। लेकिन आश्चर्य, इस वाक्य को बाद में उन्होंने हटा दिया। तो फिर इंटरव्यू का शीर्षक भी मुझे बदलना पड़ा।
अलबत्ता बरसों पहले हुए उस इंटरव्यू को मेरे जिन पाठकों ने पढ़ा है, वे अच्छी तरह समझ सकते हैं कि नंदन जी जिस चीज को जीते हैं, उसे पूरी जिंदादिली, खूबसूरती और तन्मयता से जीते हैं, लिहाजा वह चीज यादगार बन जाती है। अगर उन्होंने सवालों के कामचलाऊ या औपचारिक जवाब दिए होते या कुछ सवालों के जवाब देने के बाद घड़ी देखनी शुरू कर दी होती, तो न तो वह इंटरव्यू ऐसा होता कि उसका इतना लंबा जिक्र छिड़ता और न मैं नंदन जी के इतने निकट ही आ पाता।
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बीच के एक छोटे से अंतराल के बाद नंदन जी से मेरी मुलाकातों का अगला दौर शुरू हुआ था सन् 1993 में, जब विजयकिशोर मानव रविवासरीयसे अलग हो गए थे। 
इस बीच दैनिक हिंदुस्तान में ऊपरी स्तर पर बहुत कुछ बदला था। मानव जी ने रविवासरीय को एक शानदार ऊँचाई दी थी, इसके बावजूद उन्हें हटाना जरूरी समझा गया, क्योंकि वे हाँ-छाप नहीं थे। होना भी नहीं चाहते थे। और मानव जी नहीं थे तो मुझे रविवासरीय में लिख पाने की वह स्वतंत्रता मिलनी तो मुश्किल थी, जो मानव जी के होते मुझे हासिल थी। इसके बिना लिखने की मेरी कोई इच्छा भी न थी। जो भी लिखूँ, उसमें मेरे मन की सच्चाई और हृदय का पूरा वेग हो, बस, यही चीज मुझे लिखने के लिए उकसाती थी। और इसमें मैं किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार करने के लिए राजी नहीं था।
मानव जी मेरी स्थिति समझ रहे थे। उन्होंने दो-एक बार कहा, आप नंदन जी से क्यों नहीं मिलते? अब तो वे आपको अच्छी तरह जानते हैं। संडे मेल में आप उसी तरह लिख सकते हैं, जैसे यहाँ रविवासरीय में लिख रहे थे। पर मैं टालता रहा।
आखिर थोड़े अंतराल के बाद नंदन जी से फिर से मुलाकात का सिलसिला शुरू हुआ। हालाँकि इस बार भी उत्प्रेरक बने मानव ही। वही नंदन जी के पास मुझे ले गए। और वहाँ जाकर उन्होंने जो पहला वाक्य कहा, वह मुझे अब भी याद है, “भाईसाहब, मैं अपने मित्र को आपके सुपुर्द करके जा रहा हूँ। अब यह आपके लिए लिखेंगे। मैंने इनसे यही कहा है कि ये आपमें और मुझमें कोई फर्क न समझें।” 
उस दिन के बाद से नंदन जी के साथ संबंधों में एक नया आयाम जुड़ासंपादक और लेखक वाला रिश्ता। नंदन जी के संपादक के रूप में मैंने कई तरह की प्रचारित बातें सुनी हैं, लेकिन उनके संपादक के साथ मेरा संबंध सचमुच गरिमायुक्त और शानदार रहा। मैंने उन्हें लेखकों को अपने विचार प्रकट करने की पूरी स्वतंत्रता देने वाला एक बड़ा संपादक ही पाया। उन्होंने कभी किसी से हिसाब-किताब बराबर करने के लिए मेरा इस्तेमाल नहीं करना चाहा और न कभी अपने संबंध मुझ पर थोपने चाहे। यहाँ तक कि बहुत बार उनके मित्रों की किताबों पर मैंने लिखा और बेतरह कठोरता के साथ लिखा। लेकिन उन्होंने एक भी शब्द संपादित किए बगैर उसे छापा। 
इस बारे में अजित कुमार के संस्मरणों की पुस्तक निकट मन में पर लिखे गए मेरे लंबे आलोचनात्मक लेख और उस पर कई अंकों तक चली बहस खुद में एक इतिहास बन गई। ऐसे ही चार खंडों में छपे राजेंद्र यादव जी के संपादकीयों के संचयन पर मैंने बहुत मेहनत करके लेख लिखा था, अंधी गली में भटकता विचारों का काफिला, जिसे नंदन जी ने संडे मेल के दो अंकों में बड़ी धूमधाम के साथ छापा था। लेख में मैंने न सिर्फ राजेंद्र जी के वैचारिक अंतर्विरोधों को पकड़ा था, बल्कि चीजों को जबरन सनसनीखेज और नकारात्मक बनाने की उनकी प्रवृत्ति पर भी गहरी चोट की थी। 
राजेंद्र जी के कहानीकार का मैं काफी प्रशंसक था। उनसे मेरा किसी किस्म का कोई मन-मुटाव न था। बल्कि मैं एक तरह से उनका सम्मान ही करता था। पर कुछ समय से वे हंस के संपादकीयों के जरिए जिस तरह की उत्तेजक बहसें, सेक्स और देहवादी विचारों को आगे बढ़ा रहे थे, उसे मैं अच्छा नहीं समझता था। लेख में उसी पर चोट थी, बल्कि कहना चाहिए, बड़ी करारी चोट थी। मैं नहीं समझता कि हिंदी का कोई और संपादक उसे इस ढंग से छाप और प्रचारित कर सकता था। इस लिहाज से कम से कम हिंदी पत्रकारिता का कोई और शोमैननंदन जी के मुकाबले का नहीं है, यह मैं पूरे यकीन के साथ कह सकता हूँ।
उन्हीं दिनों मैं पत्रकारिता पर केंद्रित अपने उपन्यास यह जो दिल्ली हैपर काम कर रहा था। उपन्यास पूरा हुआ तो मैंने नंदन जी से कहा, “आप पत्रकार हैं और यह पत्रकारिता पर लिखा गया उपन्यास है। एक तरह से दिल्ली में पत्रकारिता के मेरे दस वर्ष के अनुभव इस किताब में किसी न किसी रूप में आए हैं। तो मेरी इच्छा है कि आप इसे पढक़र अपनी बेबाक राय दें। उसी को मैं इस किताब में भूमिका के रूप में शामिल कर लूँगा।
उपन्यास की पांडुलिपि मैंने नंदन जी के पास छोड़ दी थी। उसे जिस तल्लीनता के साथ उन्होंने पढ़ा, उस पर अपनी बेबाक प्रतिक्रिया, यहाँ तक कि कई बढ़िया सुझाव भी दिए, वह सब मेरे लिए एक न भूलने वाला अनुभव है। यह जो दिल्ली हैपढ़कर जो पत्र उन्होंने मुझे लिखा था, वही उपन्यास की भूमिका के रूप में छपा है और उसी को नंदन जी ने संडे मेल के एक संपादकीय के रूप में बड़ी प्रमुखता के साथ छापा था। यहाँ तक कि यह जो दिल्ली हैके भी कई अंश संडे मेलमें धारावाहिक छपे और खासी धूमधाम के साथ छपे। इसके अलावा बीच-बीच में वहाँ थोड़ा-बहुत लिखने का सिलसिला तो चल ही रहा था। 
मेरे लिए सबसे खुशी की बात यह थी कि एक लेखक के रूप में नंदन जी ने मुझे पूरी आजादी दी थी। उनका हर बार यही कहना होता था, “मैं खुद को तुम पर थोपना नहीं चाहता, क्योंकि ऐसा करने का मतलब तो तुम्हारी हत्या होगी। इसके बजाय मैं चाहता हूँ कि जो तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ है, वह सामने आए।
यही नहीं, वे मेरी कितनी चिंता करते थे, यह भी मुझसे छिपा न रहा। एक छोटी सी घटना याद आ रही है। उस दिन मैं संडे मेल में उनसे मिलने गया था। बातों-बातों में काफी देर हो गई। शाम को दफ्तर बंद होने के बाद उन्होंने मुझे अपनी गाड़ी में ही बैठा लिया, ताकि मुझे आश्रम तक छोड़ दें। वहाँ से फऱीदाबाद की बस मिल जाती थी। रास्ते में उनसे बातें चल पड़ीं। अचानक बहुत भावुक होकर मैंने कहा, “नंदन जी, मेरी इच्छा है कि मैं आपके साथ काम करूँ! जिस दिन आप कहेंगे, मैं हिंदुस्तान टाइम्स की अपनी नौकरी छोड़कर आ जाऊँगा।
इस पर नंदन जी ने मेरी भावुकता पर विराम लगाते हुए कहा, “नहीं प्रकाश अभी संडे मेलके हालात इतने अच्छे नहीं है। जिस दिन हो जाएँगे, तभी मैं तुमसे कहूँगा।
उस दिन उनकी यह बात मुझे बहुत प्रिय नहीं लगी थी। पर उसके कुछ महीने बाद ही संडे मेल के बंद होने की खबर मिल गई। तब नंदन जी की कही हुई बात पर मेरा ध्यान गया और मैंने मन ही मन उन्हें शुक्रिया कहा। इसलिए कि संडे मेल में जाने पर मैं बीच अधर में ही लटक जाता, जबकि अभी मेरी गृहस्थी कच्ची थी और बच्चे बहुत छोटे थे। ऐसे में संडे मेल में जाता तो उसके बंद होने पर, कोई नई नौकरी खोज पाना मेरे जैसे सीधे-सादे, भावुक और पूरी तरह गैर-दुनियादार आदमी के लिए आसान नहीं था।
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संडे मेलबंद होने के बाद भी नंदन जी से जब-तब मुलाकातें होती रहीं। और हर बार मैंने उनकी आँखों में वही गहरे विश्वास से लबालब कौंधती हुई मुसकान पाई, जिसने उनके साथ मानवीय रिश्ते की ऊर्जा को कभी छीजने नहीं दिया। 
एक बार प्रगति मैदान में पुस्तक मेले में उनसे मुलाकात हुई और मैंने उन्हें बतायाकि राजकमलसे यह जो दिल्ली हैका पेपर बैक संस्करण आ गया है, तो उन्होंने बेहद प्रसन्नता और संतुष्टि प्रकट की थी। ऐसी कई मुलाकातें मुझे एक के बाद एक याद आ रही हैं। लेकिन मैं उनसे किसी लंबी और अंतरंग मुलाकात की प्रतीक्षा में था। इसका मौका भी जल्दी मिल गया, कानपुर यात्रा में, जो एक तरह से मेरी पहली साहित्यिक यात्रा थी।
मैं रामदरश जी के आग्रह पर एक लेखक सम्मेलन में भाग लेने के लिए कानपुर गया था और उसमें दिल्ली से रामदरश जी के अलावा हिमांशु जोशी, महीप सिंह, प्रदीप पंत और नंदन जी शामिल हुए थे। जिस राजधानी एक्सप्रेस से हमें जाना था, उसके एक कंपार्टमेंट में मैं रामदरश जी और महीपसिंह थे, नंदन जी और जोशी जी अलग कंपार्टमेंट में थे। मैं रामदरश जी के साथ वाली सीट पर था। 
थोड़ी देर के लिए मैं बाहर टहलने के लिए निकला। लौटा तो देखा, मेरी सीट पर नंदन जी जमे हैं। मजे में रामदरश जी से बतिया रहे हैं।
मैंने खुश होकर कहा, “यह तो अच्छा हुआ नंदन जी। मैं आपसे मिलने के लिए बहुत उत्सुक था।  
तो ठीक है, फिर तो मैं यहीं रह जाता हूँ। कहते-कहते नंदन जी के होंठों पर बड़ी प्रफुल्लित मुसकान सज गई। बोले, टीटी से कहूँगा कि मेरी सीट यहाँ शिफ्ट कर दे। वहाँ किसी और को भेज दे।
टीटी मान जाएगा?” मैंने विस्मय से आँखें पटपटाईं, वे आम तौर से नहीं मानते?”
हाँ, मगर कहने वाले नंदन जी हों तो भला वे क्यों नहीं मानेंगे? जरूर मान जाएँगे राजा। नंदन जी विनोद भाव से हँसे।
वे अपने पूरे मूड में थे। उस दिन कंपार्टमेंट के पीछे वाली कुछ सीटें खाली थीं। हम लोग वहीं जाकर बैठे और गाड़ी चल दी। टिकट चेकर आया तो मैंने उसे बताया कि नंदन जी की सीट बगल वाले कंपार्टमेंट में है, लेकिन ये हमारे साथ ही बैठेंगे। इसमें कहीं कुछ दिक्कत तो नहीं है?
वह नंदन जी को पहचानता था। मुसकराता हुआ बोला, “नहीं साहब, आप लोग ठाट से बैठिए।और चला गया।
उस दिन दिल्ली से कानपुर तक की यात्रा में नंदन जी के मुख से इतनी कविताएँ, इतने गीत सुने और इस कदर झूम-झूमकर, लहर-लहरकर और आत्मिक आनंद से ऊभ-चूभ होकर वे उसे सुना रहे थे कि शब्द भले ही याद न रहे हों, लेकिन नंदन जी की वे मुद्राएँ और अदाएँ, मस्ती और बाँकपन मैं तो सात जन्मों तक नहीं भूल सकता। जो कविताएँ उन्होंने सुनाईं, वे सिर्फ उनकी ही नहीं थीं, उनके प्रिय मित्रों की भी थीं। और वे इस कदर तल्लीन होकर सुना रहे थे कि उन कविताओं की भीतरी शक्ति और अर्थ खुल-खुल पड़ते थे।
उस दिन पहली बार मैंने यह जाना कि नंदन जी इतना अच्छा गाते भी हैं और इतना अच्छा जमते और जमाते भी हैं। बीच-बीच में कुछ हलके-फुलके प्रसंग याद आते तो वे भी झूमते-झामते संग चल पड़ते। हर पल छेड़-छाड़, मस्ती और हास्य-विनोद की गुदगुदी। 
थोड़ी देर बाद महीप सिंह उठकर उधर आए, तो उन्हें भी खींच लिया गया। और फिर एक नई लौ, एक नई शरारत का शरारा! मालूम ही नहीं पड़ता था कि हम गाड़ी में यात्रा कर रहे हैं या किसी अंतरंग घरेलू गोष्ठी में बैठे हैं।
उसी यात्रा में जब महीपसिंह फिर से उठकर अपनी दूरस्थ सीट पर चले गए और रामदरश जी कुछ निंदासे होकर अपनी सीट पर ऊँघने लगे, मैंने मौके का फायदा उठाकर बातचीत के कुछ छूटे हुए सूत्रों को लेकर फिर से चर्चा छेड़ दी। और देखते ही देखते यह चर्चा गंभीर और गफिन होती गई। बहुतेरे आगे-पीछे के प्रसंग और संदर्भ भी इससे जुड़ते चले गए। इसमें नंदन जी की नेपाल यात्रा का प्रसंग भी था, जिसमें खुद को मुख्य धारा का कवि मानने वाले बहुत से कवि फीके पड़ गए थे और नंदन जी की कविताओं ने श्रोताओं का मन मोह लिया था।
जब वे हॉल से उठकर जा रहे थे तो मुख्य धारा के एक चर्चित कवि ने, जो शराब में बुरी तरह धुत थे और डगमगा रहे थे, नंदन जी की और उँगली उठाकर कहा, “नंदन जी, आपमें पोटेंसी तो बहुत है, लेकिन जरा खुद को थोड़ा सँभालिए!कहते-कहते मुख्य धारा के कवि लडख़ड़ाकर गिर गए।
इस पर नंदन जी ने सिर्फ इतना ही कहा, “ठीक है, लेकिन फिलहाल तो पहले आप खुद को सँभालिए।
बिना कुछ कहे, करारी चोट कैसे की जा सकती है, यह नंदन जी से सीखना चाहिए।
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फिर जाने कैसे जैंनेद्र जी का प्रसंग छिड़ गया। उनके उस इंटरव्यू की चर्चा होनी लगी, जिसमें उन्होंने पत्नी बनाम प्रेमिकाविषय पर अपने विचार प्रकट किए थे। और बाद में आलोचना होने पर सारा इल्जाम नंदन जी पर धरकर मुकर गए थे। इस पर नंदन जी का जो जवाब धर्मयुगमें छपा था, मुझे याद था। हालाँकि इसके पीछे की बहुत सी स्थितियाँ जो मुझे पता नहीं थीं, वे उस दिन मालूम पड़ीं और नंदन जी की खुद्दारी भी।
उनकी यही खुद्दारी चितकोबरा प्रसंग में भी उभरकर आई। मृदुला गर्ग के उपन्यास चितकोबरा पर प्रतिक्रिया के रूप में जैनेंद्र जी के कहे पर विवाद छिड़ जाने पर, बहुत से लेखकों ने ताने मारने और व्यंग्य कसने शुरू कर दिए थे। पहले तो नंदन जी चुपचाप सुनते रहे। लेकिन फिर उनके भीतर का ठसके वाला पत्रकार जागा और उन्होंने कहा, “जैंनेद्र जी, एक लेखक के रूप में मैं आपका बेहद सम्मान करता हूँ। और व्यक्तिगत रूप से आप मुझे जो भी चाहे, कह लें। मैं बुरा नहीं मानूँगा। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया प्रकाशन के संपादक का एक सम्मान है। उसका आप इस तरह से अपमान करें, यह ठीक नहीं है।
और उन्होंने जैनेंद्र जी का भरपूर सम्मान करते हुए भी अपने उस ठसके को निभाया और पूरी दबंगी से निभाया। यह जानते हुए भी कि जैनेंद्र जी के साहू शांतिप्रसाद जैन से संबंध हैं और अच्छे, घनिष्ठ संबंध हैं, उन्होंने अपनी जिद में कोई कमी नहीं आने दी। इसलिए कि यहाँ उनकी जिद एक व्यक्ति नंदन की जिद न होकर, एक पत्रकार या संपादक के स्वाभिमान की जिद थी। 
इसी चर्चा में सर्वेश्वरदयाल सक्सेना और रघुवीर सहाय जी से जुड़े कुछ ऐसे मार्मिक प्रसंग भी छिड़ गए कि मेरी आँखें आर्द्र हो गईं। अपने जीवन के आखिरी चरण में सर्वेश्वर जी जब थोड़े निराश हो चले थे, नंदन जी ने पराग पत्रिका के संपादक के लिए उनके नाम को आगे बढ़ाया, और अपने प्रयत्नों में सफल भी हुए। यह बात सर्वेश्वर जी को पता चली तो उन्होंने नंदन जी के प्रति गहरी कृतज्ञता प्रकट की थी। इसी तरह रघुवीर सहाय नंदन जी को ज्यादा पसंद नहीं करते थे। पर एक छोटे से प्रसंग में जब उन्होंने नंदन जी की अपने प्रति अतिशय विनय और सम्मान की भावना देखी, तो वे अवाक रह गए। यह उनके लिए लगभग अप्रत्याशित था।
नंदन जी जब ये प्रसंग सुना रहे थे, तब उनके चेहरे पर कोई अभिमान नहीं, बल्कि साहित्य और साहित्यकारों के लिए गहरे आदर और विनम्रता का ही भाव था। मानो इन बड़े और समर्पित साहित्यकारों के लिए कुछ करके, वे स्वयं ही कृतार्थ हो रहे हों। यों भी, मैंने कई बार महसूस किया कि बड़े साहित्यकारों के आगे झुकना उनके स्वभाव में था, और इसमें उन्हें बड़ा आत्मिक सुख मिलता था।
इससे नंदन जी के व्यक्तित्व का एक बिल्कुल अलग पहलू मेरी आँखों के आगे आया, जिसे भूल पाना मेरे लिए कठिन है।
नंदन जी की कविताओं की भी खासी धूम रही है। वे कवि सम्मेलनों में छा जाने वाले कवियों में से थे। श्रोता मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते थे। उनकी कविताओं की दो पुस्तकें छपी हैं और स्वयं उनके मुख से भी उनकी कुछ बेहतरीन कविताएँ सुनने का मुझे सौभाग्य मिला है। इनमें ईश्वर को संबोधित एक कविता तो मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा। तो भी नंदन जी की छवि मेरी आँख के आगे एक लेखक नहीं, पत्रकार की ही ठहरती है। वे कविताएँ लिखते हैं, लगातार लिखते आए हैं और बुरी तो हरगिज नहीं लिखते। लेकिन तो भी वे मुझे जितने बड़े पत्रकार लगते हैं, उतने बड़े कवि नहीं। ये मूलत: पत्रकार ही हैं और पत्रकारों की जो बड़ी पीढ़ी हमने देखी है, उसकी आखिरी और महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में उन्हें हमेशा आदर के साथ याद किया जाएगा।
मुझे याद है, एक दफा यों ही बातों-बातों में मैंने उनसे पूछा था, “आपके जीवन का सबसे बड़ा सपना क्या है?” सुनकर उन्होंने कहा, “एक ऐसा अखबार निकालना, जिसमें मेरी पूरी टीम मेरे साथ हो और अपने ढंग से काम करने और कुछ कर दिखाने की पूरी छूट हो। मेरा खयाल है कि वह हिंदी का एक अनोखा अखबार होगा। पर वह चल कितना पाएगा, कह नहीं सकता।कहते-कहते एक शरारती हँसी उनके होंठों से छलक पड़ी थी।
नंदन जी गंभीर होकर जितनी अगंभीरबातें और अगंभीर होकर जितनी गंभीर बातें कर लेते हैं, वैसी सामर्थ्य वाले हिंदी में शायद बहुत कम लेखक मिलेंगे। और आप माने न मानें, मुझे तो यह भी एक बड़े पत्रकार के रूप में उनके सफल होने का एक राज लगता है। उनका यह अंदाज ऊपर से थोड़ा हुआ नहीं, कहीं भीतर से आता है और इससे उनके कहे में एक अलग ताकत और पुख्ताई आ जाती है। 
मैंने अकसर देखा है, यों ही खेल-खेल में, वे आम जीवन का एक मामूली सा शब्द उठा लेते हैं, मगर जब वह उनकी भाषा की रवानगी में शामिल होता है तो फिरकनी की तरह नाचने लगता है और कुछ ऐसा कह जाता है, जिसे किताबी लोगों की किताबी भाषानहीं कह पाती। यही नंदन जी का ठेठ हिंदी का ठाटहै, जिससे उनके लिखे गद्य में एक अलग गूँज पैदा हो जाती है। जरिया नजरियाके रूप में लिखे गए नंदन जी के तमाम संपादकीय और टिप्पणियाँ इसी वजह से बार-बार पढ़े जाने की माँग करती हैं।
नंदन जी और गुच्छों के रूप में मौजूद आज के तमाम पत्रकारों के बीच असली फर्क ही यही है। लोग कहते हैंतमाम लोग कहते हैं, पर उनके कहने का कोई अलग अंदाज नहीं होता। मगर नंदन जी के पास बात तो थी ही, बात कहने का एक बिल्कुल अलग अंदाज भी था, जो उन्हें हिंदी के पत्रकारों की एक दुर्लभ होती बिरादरी की बड़ी प्रमुख और महत्त्वपूर्ण कड़ी साबित करता था।
देश की आजादी के बाद हिंदी के पत्रकारों की जो दो-तीन पीढ़ियाँ सबसे अधिक सक्रिय, जिम्मेदार और कर्मशील रही हैं, उनमें नंदन जी निश्चय ही शिखरस्थ पत्रकारों में हैं। यह दीगर बात है कि टाइम्स आफ इंडिया के मालिकों से संबंधों को लेकर, नंदन जी के बारे में जब-तब कुछ गलतफहमियाँ और अटपटी किंवदंतियाँ भी कानों में पड़ जाती थीं। वे कितनी सही, कितनी गलत हैं, मैं कह नहीं सकता। पर अगर वे सही हैं, तो भी एक शिखरस्थ पत्रकार होने की उनकी हैसियत को इससे चुनौती नहीं मिलती। सच तो यह है कि वे अपना प्रतिमान आप थे।
हिंदी में व्यक्तिवहीन पत्रकारों की अपरंपार भीड़ के बीच नंदन जी को एक ऐसे बड़े पत्रकार के रूप में याद किया जाना चाहिए, जो अंत तक निरंतर अपनी धमकबनाए रहे। साथ ही, जिसके लेखन और संपादन-कर्म के पीछे उसका ठोस व्यक्तित्व, स्वाभिमान और ठेठ हिंदी का ठाटहै। और संपादक की इन बड़ी उपलब्धियों के पीछे एक सदाबहार शख्स और शख्सियत की निरंतर सक्रियता को भी चीन्हा जा सकता है।
कभी बातों-बातों में नंदन जी ने मुझे अपना एक बड़ा राजबताया था कि जीवन के हर पड़ाव पर उन्हें एक राजदार व्यक्ति की जरूरत हमेशा रही है, जिसे वे सब कुछ कहकर मुक्त हो सकें। यहाँ इसमें सिर्फ इतना जोड़ना और काफी है कि किसी राजदारको खोजता हुआ नंदन जी का यारबाशऔर हरफनमौला व्यक्तित्व ही, उन्हें इतना बड़ा जिंदादिल और असाधारण पत्रकार बनाता है।
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प्रकाश मनु
545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
मो. 09810602327
ईमेल – prakashmanu334@gmail.com
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5 टिप्पणी

  1. प्रकाश मनु सर आपके इस संस्मरण को पढ़ कर आदरणीय नंदन जी की यादें ताज़ा हो गईं। मुझे उनका स्नेह बहुत दशकों तक मिला। वे एक इंदु शर्मा कथा सम्मान में शामिल होने मुंबई भी आए थे। उन्हें दिनमान, संडे मेल और गगनांचल के दिनों में लगातार मिला। दरअसल मैं एअर इंडिया में फ़्लाइट परसर था और प्रधानमंत्री की उड़ान पर हमेशा तैनात रहता था। नंदन जी भी एक पत्रकार के रूप में बहुत सी उड़ानों में शामिल हुआ करते थे। आपके संस्मरण ने उनकी यादें ताज़ा कर दीं।

  2. बहुत-बहुत आभार भाई तेजेंद्र जी। बेशक, जैसा आपने कहा और उनके निकट रहकर महसूस भी किया, नंदन जी का व्यक्तित्व एकदम छा जाने वाला था। उनमें जो प्यार का खुलूस और गरमजोशी थी, वह बीच की सारी दीवारें खत्म कर देती थी, और आप उनके साथ बहते चले जाते थे। इसलिए जब आप उनके साथ बैठे हों, तो समय का कुछ होश नहीं रहता था।

    नंदन जी से लिया गया मेरा इंटरव्यू भी इसीलिए एकदम निराला है, जिसमें उनसे हुई मुलाकात के धड़कते हुए लम्हे आज भी महसूस होते हैं।‌ वह इंटरव्यू किसी मेरी फाइल में अटका पड़ा है। आपकी इतनी उत्साह भरी प्रतिक्रिया देखकर मन हो रहा है, उसे भी थोड़ी धूप दिखाऊं।

    अलबत्ता, नंदन जी पर यह संस्मरण लिखते समय लग रहा था, भाई तेजेंद्र जी, कि मेरे भीतर स्मृतियों का एक झरना सा फूट पड़ा है। मैं लिख नहीं रहा, बल्कि कलम खुद-ब-खुद दौड़ रही है। आज आपके लिखे शब्द पढ़कर लग रहा है, मेरा यह संस्मरण लिखना सकारथ हो गया। आभार भाई तेजेंद्र जी। बहुत-बहुत आभार!

    मेरा स्नेह,
    प्रकाश मनु

  3. बहुत दिलचस्प संस्मरण है॥ नंदनजी के व्यक्तित्व को गहराई से उजागर हुआ यह उनके जीवन को बहुत संवेदनशीलता के साथ छूता है। प्रकाश मनु एक सिद्ध हस्त इंटरव्यूकार हैं।उनके तमाम संस्मरण इसके गवाह हैं।

  4. वाह, क्या बात है। एक बार मैंने जो इसे पढ़ना शुरू किया, तो फिर बिना समाप्त किए रुक नहीं सका। आपने अत्यंत आत्मीयता से इसे लिखा है। पढ़कर नंदन जी जीवित चित्र सा खींच गया सामने।

  5. आपका यह संस्मरण निश्चय ही नंदन जी को जानने–समझने का महत्वपूर्ण उपक्रम है।उनको इतनी आत्मीयता से याद करने को लिए आपको हार्दिक शुभकामनाएं।

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