जब नंदन जी के व्यक्तित्व के अलग-अलग शेड्स की बात चली तो उनकी रूमानियत, जिसे कभी-कभी उनकी तबीयत की रंगीनी भी कह और समझ लिया जाता है—का जिक्र भला कैसे न होता? और यह प्रसंग भी एक तरह से नंदन जी ने ही छेड़ा था। मेरे एक सवाल के जवाब में। उनका कहना था कि अगर सुंदरता बुरी चीज नहीं है, तो भला सुंदर को सुंदर कहना कैसे बुरा हो सकता है? लिहाजा किसी सुंदर औरत को सुंदर कहने में उन्हें कभी परेशानी नहीं हुई। हालत यह कि एक दफे मुंबई में वे गाड़ी में जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक औरत दिखाई थी—असाधारण रूप से सुंदर। उन्होंने फौरन गाड़ी रुकवाई और गाड़ी से उतरकर उस औरत के पास यह कहने के लिए गए कि “आप असाधारण रूप से सुंदर हैं।” और उसके बाद अपनी गाड़ी में आए, बैठे और चल दिए।
जब से लेखन-कर्म की शुरुआत हुई और एक लेखक के रूप में मैंने दुनिया को देखना-जानना शुरू किया, नंदन जी को सर्वत्र अपने आस-पास महसूस किया। पहले ‘पराग’ के बड़े ही जिंदादिल और हरदिल अजीज संपादक के रूप में, फिर ‘सारिका’, ‘दिनमान’, ‘संडे मेल’—हर पत्रिका में अपने एक खास अंदाज में लेखकों और पाठकों को संबोधित करते हुए, और उनसे कुछ-कुछ घरेलू सा रिश्ता बनाते हुए सबके अपने, बिल्कुल अपने कन्हैयालाल नंदन। यानी ऐसे संपादक, जिनसे मन की हर बात कही जा सकती है, खुलकर बतियाया जा सकता है और कभी जी उखड़े तो बेशक झगड़ा भी जा सकता है। जैसे अपने बड़े भाई या उम्र में बड़े किसी दोस्त से।
सच कहूँ तो मुझे शुरू से ‘नंदन’ जी एक ठसकेदार पत्रकार के रूप में मोहते रहे हैं और एक लेखक-पत्रकार के रूप में उनका ठेठ हिंदी का ठाट मुझे हमेशा लुभाता रहा। हालत यह थी कि दूर बैठा उन्हें पढ़ता बड़े चौकन्नेपन के साथ, उनके लिखे पर भीतर ही भीतर बहसें और तेज लड़ाइयाँ छिड़ती रहतीं। कभी-कभी मुझे उन पर बेहद गुस्सा आता और कभी वे बहुत प्यारे लगते। लेकिन प्रेम और घृणा के तेज झंझावत के बीच उनसे इकतरफा संवाद साधता हुआ, मैं सचमुच नहीं जानता था कि कभी उनके इतने निकट भी आ पाऊँगा। और उनसे ऐसी प्यार भरी गुफ्तगू मेरी होगी कि ताजिंदगी उसे भुला पाना मेरे लिए असंभव हो जाएगा।
चलिए, उनसे हुई पहली मुलाकात से ही शुरू करते हैं, जिसके बाद दूसरी, तीसरी, चौथी कई मुलाकातें बहुत जल्दी-जल्दी हुईं। और मैं इस सम्मोहक शख्स के जादू की गिरफ्त में आ गया था। हालाँकि इस मुलाकात के लिए उकसाने वाले अभिन्न मित्र और बालसखा विजयकिशोर मानव के जिक्र के बिना तो इसका वर्णन करना बड़ा अटपटा लगेगा। यह तय है कि नंदन जी को उनके संपादक-कर्म, रचनाओं और उनके लेखन से जानता भले ही रहा होऊँ, पर उनसे हुई मेरी शुरुआती मुलाकातों का श्रेय पूरी तरह मानव जी को ही जाता है।

मानव जी उन दिनों ‘दैनिक हिंदुस्तान’ के साहित्य संपादक थे और खासकर रविवासरीय का काम देखते थे। मानव जी से मेरी मित्रता खासी सर्जनात्मक किस्म की मित्रता थी, जिसमें साहित्य पर लगातार गहरा संवाद भी शामिल था। कहीं-कहीं विचार-भिन्नता भी थी। पर मैं और मानव दोनों ही इसकी कद्र करते थे। इसी निरंतर साहित्यिक संवाद के बीच उन्हें मुझमें न जाने क्या दीख गया कि वे रविवासरीय के लिए मुझसे निरंतर लिखवाने लगे। मेरे लिए यह मित्र की मानरक्षा का भी प्रश्न था। इसलिए जो काम वे मुझे करने को देते, मैं उसमें जान उड़ेलता था। उन्होंने मुझसे काफी-कुछ लिखवाया। और कुछ चीजें तो बेतरह आग्रह और जिद करके लिखवाईं।
इन्हीं में के.के. बिरला न्यास का व्यास सम्मान मिलने पर रामविलास जी से लिया गया इंटरव्यू भी था। इसके लिए पंद्रह-बीस दिन मैंने नए सिरे से और बड़ी ही गंभीरता से उन्हें पढ़ने में लगाए। फिर उनसे जो यादगार और ऐतिहासिक महत्त्व की बातचीत हुई, उसकी खासी धूम मची। मानव जी ने अखबार के पूरे पन्ने पर बड़े आकर्षक कलेवर के साथ उसे छापा। और आश्चर्य, उस पर इतनी सुखद और उत्साहपूर्ण प्रतिक्रियाएँ आईं कि मैं चकित रह गया।
ऐसी प्यारी जिदें मानव जी की अकसर हुआ करतीं कि मैं उसके आगे लाचार हो जाता। और हर बार जब वह छपकर आता या उस पर उत्साहवर्धक प्रतिक्रियाएँ मिलतीं, हम उसे खुश होकर ‘शेयर’ करते थे। वह दिन हमारे लिए किसी उत्सव से कम न होता था।
ऐसा ही काम मानव जी ने उन दिनों मेरे जिम्मे डाला था—नंदन जी का एक लंबा इंटरव्यू करना। सुनकर मैं थोड़ा बिदका था, भला नंदन जी का क्या इंटरव्यू होगा? ठीक है, वे पत्रकार हैं और जरा ऊँचे पाये के ठसके वाले पत्रकार हैं, मगर इंटरव्यू तो रामविलास शर्मा का हो सकता है, त्रिलोचन जी का हो सकता है, कमलेश्वर का हो सकता है—और भी बहुत से मूर्धन्य लेखकों का हो सकता है। भला नंदन जी से मैं क्या पूछूँगा और वे बताएँगे भी क्या? और उस इंटरव्यू में पढ़ने लायक क्या होगा? कोई गंभीर साहित्य-चर्चा तो होने से रही।
तो अपनी आदत के मुताबिक मैं टालता रहा और मानव जी अपनी आदत के मुताबिक ठकठकाते रहे। फिर एक दिन नंदन जी का फोन नंबर दिया। कहा, “बात करके चले जाओ।”
पर मैं थोड़ा झेंपू और थोड़ा अक्खड़ किस्म का ऐसा विचित्र जीव था कि मुझे फोन पर बात करने में भी हिचक हो रही थी। सो मानव जी ने ही बात करके समय ले लिया। बोले, “जाओ, वे इंतजार कर रहे हैं।”
‘तो चलो, ठीक है!’ के भाव से कुढ़ते-कुढ़ते मैं गया था—कोई भीतरी उत्साह से नहीं।
उन दिनों कस्तूरबा गाँधी मार्ग पर हिंदुस्तान टाइम्स भवन में तीसरे माले पर ‘नंदन’ पत्रिका का दफ्तर था, जहाँ मैं काम करता था। पहले माले पर ‘दैनिक हिंदुस्तान’ का दफ्तर था, जिसमें एक अलग कक्ष में मानव जी बैठते थे। संयोग से उन दिनों ‘संडे मेल’ का दफ्तर भी कस्तूरबा गाँधी मार्ग पर ही था। हिंदुस्तान टाइम्स भवन के लगभग सामने ही, सड़क के दूसरी ओर। मुश्किल से पैदल पाँच-सात मिनट में वहाँ पहुँचा जा सकता था।
मैं गया, पर कुछ इस तरह कि एक पैर आगे चल रहा था, एक पीछे। अनिच्छा मुझ पर हावी थी, पर मित्र का मन रखने के लिए जा रहा था। फिर जिस तरह का स्वभाव मेरा था, मैं रास्ता चलते सोच रहा था कि बहुत बदतमीजी के दो-चार सवाल मैं पूछूँगा और नंदन जी अपनी संपादकी अकड़ दिखाएँगे तो बस, झगड़ा-टंटा हो जाएगा। और किस्सा खत्म!
लेकिन बात खत्म नहीं हुई, बात चल पड़ी और एक ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जो बरसोंबरस चला। आज नंदन जी नहीं हैं। उन्हें गुजरे हुए कोई चौदह साल बीत गए। पर उनके लिखे-पढ़े और पुरानी स्मृतियों के जरिए उनसे संवाद तो मेरा आज तक जारी है। और शायद जब तक मैं हूँ, वह जारी ही रहेगा।
अलबत्ता वह इंटरव्यू हुआ—और एक नहीं, कई किश्तों में हुआ। कई दिनों तक लगातार चला। यहाँ तक कि रात को ‘संडे मेल’ का दफ्तर खत्म होने तक हम बैठे रहते और वापसी में नंदन जी मुझे आश्रम चौक पर छोड़ देते, जहाँ से मुझे फरीदाबाद की बस मिल जाती। आखिरी एक-दो बैठकों में मानव भी इसमें शामिल हुए। कुछ सवाल जो मैं पूछने से कतरा रहा था, उन्होंने पूछे और इंटरव्यू की ‘वार्म्थ’ और अनौपचारिकता इससे और बढ़ गई।
वह इंटरव्यू थोड़े संपादित रूप में ‘दैनिक हिंदुस्तान’ के रविवासरीय में पूरे सफे पर छपा और मुझे उस पर ढेरों प्रतिक्रियाएँ मिलीं। आज भी उसकी चर्चा करने वाले मिल जाते हैं।
बाद में वह पूरा इंटरव्यू असंपादित रूप में मणिका मोहिनी की पत्रिका ‘वैचारिकी संकलन’ में छपा और उस पर ढेरों पत्र और प्रतिक्रियाएँ मिलीं। ज्यादातर लोगों ने पत्र लिखकर या फिर बातचीत में कहा कि नंदन जी का ऐसा जिंदादिली से भरपूर इंटरव्यू हमने नहीं पढ़ा। कुछ लोगों का तो यह भी कहना था कि नंदन जी को पहली बार उन्होंने इस इंटरव्यू के जरिए भीतर से जाना। यानी यह नंदन जी के भीतर के एक और नंदन से मुलाकात थी, जिसे वे अकसर सावधानी से भीतर तहाकर रखते हैं। कम से औरों की तरह छलकाते नहीं फिरते।
और मजे की बात यह है कि वह पूरा का पूरा इंटरव्यू ही नहीं, उस समय की समूची दृश्यावलि—नंदन जी के हँसने, बात करने और गंभीरता या कि गुस्से से प्रतिक्रिया व्यक्त करने का ढंग, सब कुछ ज्यों का त्यों अब भी मेरी आँखों में बसा है। जैसे वह इंटरव्यू न हो, कोई चलती-फिरती फिल्म हो, जिसमें नंदन जी की शख्सियत का एक-एक पहलू, एक-एक भावमुद्रा उभरकर सामने आ जाती है।
वह इंटरव्यू कुछ अरसे बाद मेरी पुस्तक ‘कुछ और मुलाकातें’ में छपकर पाठकों के आगे आएगा। फिर भी जिन्होंने उसे नहीं पढ़ा, उनके लिए नंदन जी के उन जवाबों और भंगिमाओं को प्रस्तुत करना चाहूँगा, जिन्होंने मेरे मन पर सचमुच गहरा असर डाला।
इंटरव्यू की शुरुआत में ही नंदन जी खुल गए। और पूरी बातचीत में उनका यही बेबाक और बेधक अंदाज बना रहा। मेरे इस सवाल पर कि पत्रकारिता में वे क्या करना चाहते थे, नंदन जी ने एकदम देसी लहजे में जवाब दिया कि “प्रकाश, मैं चाहता हूँ जिस काम को भी मैं करूँ, उसमें इस तल्लीनता से लग जाऊँ कि फिर उसमें किसी और के करने के लिए कुछ और न बचे।”
फिर उन्होंने एक उदाहरण भी दिया। बोले, “अगर मैं धोती निचोड़ने बैठूँ, तो मैं चाहूँगा कि मैं उसकी आखिरी बूँद तक निचोड़ डालूँ, ताकि अगर उसे कोई और निचोड़ने बैठने तो उसमें से एक बूँद भी पानी न निकाल सके। ऐसे ही अगर मैं तबला बजाने बैठूँ, तो मेरी कोशिश यह होगी कि उसमें इतनी कामयाबी प्राप्त करूँ कि अल्ला रक्खा खाँ की छुट्टी कर सकूँ।”
इसी तरह पत्रकारिता के बारे में उनका कहना था कि उनका आदर्श यह रहा कि पत्रकारिता की दुनिया में वे कोई हिमालय बना सकें।
अगर इस लिहाज से देखें तो बेशक ‘पराग’ और ‘सारिका’ के संपादन के जरिए नंदन जी ने साहित्यिक पत्रकारिता की ऊँचाइयों को छुआ, नए मयार कायम किए तथा काफी बड़े और अविस्मरणीय काम किए। संभवतः धर्मवीर भारती की तरह कोई हिमालय वे नहीं बना सके, पर पत्रकारिता की नब्ज पर उनका हाथ था और पत्रकारिता का कोई भी इतिहास उनके जिक्र के बिना पूरा नहीं हो सकता।
मैं समझता हूँ कि यह उपलब्धि भी कोई छोटी उपलब्धि नहीं है और बहुत से लेखकों, पत्रकारों के लिए यह आज भी स्पृहणीय जरूर होगी।
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खैर, ‘संडे मेल’ के दफ्तर में खासे गहमागहमी वाले माहौल में सवालों और जवाबों का यह जो निरंतर सिलसिला चल रहा था, उसके बीच-बीच में फोन तथा दफ्तर के काम भी आ ही जाते थे। नंदन जी जब ऐसे कामों में लगते थे, तो उनमें भी पूरी तरह से लीन हो जाते थे। और फिर बगैर किसी खीज के, उसी तन्मयता से बातचीत की रौ में बहने लगते। ‘संडे मेल’ के संपादकीय के कुछ पन्ने टाइप होकर उनके सामने आए, तो बड़े मनोयोग से कलम उठाकर वे उन्हें दुरुस्त करते रहे। फिर उन्हें भेजने के बाद मुझसे मुखातिब हुए, “प्रकाश, मैंने भागते-भागते ही पत्रकारिता की है?”
“और शायद भागते-भागते ही जिंदगी जी है…?” मैंने उनके जवाब में एक टुकड़ा और जोड़ दिया, जो सवाल की तरह नत्थी हो गया था। नंदन जी को मेरा यह ढंग भा गया। थोड़े उल्लसित होकर बोले, “हाँ, लेकिन इस बारे में मेरी कोशिश यह रहती है कि अगर मैं किसी चीज को समूचा नहीं पा सकता और एक छोटा सा टुकड़ा ही मेरे सामने हैं, तो कम से कम उस टुकड़े को ही संपूर्णता से जिया जाए। अगर मेरे पास पाँच ही मिनट हैं तो मैं सोचूँगा कि उस पाँच मिनट में ही क्या अच्छे से अच्छा गाया-बजाया या जिया जा सकता है। पूरा राग नहीं तो उसका एक छोटा सा टुकड़ा ही सही! उस पाँच मिनट को इस तरह तो जिया ही सकता है कि उस समय मैं सब कुछ भूलकर उसी एक छोटे से टुकड़े या छोटे से काम में पूरी तरह लीन हो जाऊँ।”
बातचीत अच्छे और पुरलुत्फ अंदाज में चल रही थी। और नंदन जी के स्वभाव और पत्रकारी जीवन के पन्ने एक-एक कर खुल रहे थे। मुझे अच्छा लग रहा था। खासकर इसलिए कि नंदन जी पूरे मूड में थे और सवालों से टकराने का उनका अनौपचारिक अंदाज और बेबाकी मुझे लुभा रही थी।
अचानक एक शरारती सवाल कहीं से उड़ता हुआ आया और मेरे भीतर उछल-कूछ मचाने लगा। यह सवाल मेरा नहीं, मेरे एक कवि मित्र महाबीर सरवर का था। यहाँ यह बता दूँ कि महाबीर कबीरी साहस के साथ अपनी बात कहने वाले थोड़े खुद्दार किस्म के कवि-लेखक हैं, जिनका लेखकों और पत्रकारों को देखने-परखने का नजरिया कहीं ज्यादा सख्त और आलोचनात्मक है। उनकी सब बातें मुझे पसंद नहीं आतीं, पर बेशक वे खरे और ईमानदार लेखक हैं। लिहाजा उनकी बातें सुनना मुझे प्रिय है।


प्रकाश मनु सर आपके इस संस्मरण को पढ़ कर आदरणीय नंदन जी की यादें ताज़ा हो गईं। मुझे उनका स्नेह बहुत दशकों तक मिला। वे एक इंदु शर्मा कथा सम्मान में शामिल होने मुंबई भी आए थे। उन्हें दिनमान, संडे मेल और गगनांचल के दिनों में लगातार मिला। दरअसल मैं एअर इंडिया में फ़्लाइट परसर था और प्रधानमंत्री की उड़ान पर हमेशा तैनात रहता था। नंदन जी भी एक पत्रकार के रूप में बहुत सी उड़ानों में शामिल हुआ करते थे। आपके संस्मरण ने उनकी यादें ताज़ा कर दीं।
बहुत-बहुत आभार भाई तेजेंद्र जी। बेशक, जैसा आपने कहा और उनके निकट रहकर महसूस भी किया, नंदन जी का व्यक्तित्व एकदम छा जाने वाला था। उनमें जो प्यार का खुलूस और गरमजोशी थी, वह बीच की सारी दीवारें खत्म कर देती थी, और आप उनके साथ बहते चले जाते थे। इसलिए जब आप उनके साथ बैठे हों, तो समय का कुछ होश नहीं रहता था।
नंदन जी से लिया गया मेरा इंटरव्यू भी इसीलिए एकदम निराला है, जिसमें उनसे हुई मुलाकात के धड़कते हुए लम्हे आज भी महसूस होते हैं। वह इंटरव्यू किसी मेरी फाइल में अटका पड़ा है। आपकी इतनी उत्साह भरी प्रतिक्रिया देखकर मन हो रहा है, उसे भी थोड़ी धूप दिखाऊं।
अलबत्ता, नंदन जी पर यह संस्मरण लिखते समय लग रहा था, भाई तेजेंद्र जी, कि मेरे भीतर स्मृतियों का एक झरना सा फूट पड़ा है। मैं लिख नहीं रहा, बल्कि कलम खुद-ब-खुद दौड़ रही है। आज आपके लिखे शब्द पढ़कर लग रहा है, मेरा यह संस्मरण लिखना सकारथ हो गया। आभार भाई तेजेंद्र जी। बहुत-बहुत आभार!
मेरा स्नेह,
प्रकाश मनु
बहुत दिलचस्प संस्मरण है॥ नंदनजी के व्यक्तित्व को गहराई से उजागर हुआ यह उनके जीवन को बहुत संवेदनशीलता के साथ छूता है। प्रकाश मनु एक सिद्ध हस्त इंटरव्यूकार हैं।उनके तमाम संस्मरण इसके गवाह हैं।
वाह, क्या बात है। एक बार मैंने जो इसे पढ़ना शुरू किया, तो फिर बिना समाप्त किए रुक नहीं सका। आपने अत्यंत आत्मीयता से इसे लिखा है। पढ़कर नंदन जी जीवित चित्र सा खींच गया सामने।
आपका यह संस्मरण निश्चय ही नंदन जी को जानने–समझने का महत्वपूर्ण उपक्रम है।उनको इतनी आत्मीयता से याद करने को लिए आपको हार्दिक शुभकामनाएं।