पहली नज़र में, “स्लीप डिवोर्स” शब्द सुन कर लगता है कि रिश्ते में परेशानियां चल रही हैं। जबकि पश्चिमी देशों में इस प्रक्रिया को इसलिए अपनाया जा रहा है ताकि अधिक से अधिक लोग अपनी नींद और रिश्तों को बेहतर बनाया जा सके। स्लीप डिवोर्स का तात्पर्य (पति-पत्नी) रोमांटिक पार्टनर आपस में एक साथ बिस्तर साझा करने के बजाय अलग-अलग कमरों में सोने से है। यह आवश्यक हो जाता है कि हम उन तमाम कारणों की जांच परख करें कि आख़िर क्यों पति-पत्नी का अलग बिस्तरों या फिर अलग कमरों में सोना रिश्ते को बेहतर बना सकता है।
एक पुराना चुटकुला है (जो किसी हद तक उस ज़माने की सच्चाई भी बयान करता है)। एक व्यक्ति दूसरे को कहता है – “हमारे घर में दो पलंग हैं। एक पर मेरी माँ और पत्नी सोती हैं और दूसरे पर मेरे पिता और मैं।” तो मित्र जवाब देता है, “यार, पलंग चाहे कितने भी हों, मगर सोया तो तमीज़ से करो!”
एक ज़माना था जब भारतीय पति-पत्नी दिन के उजाले में शायद ही एक दूसरे को देख पाते थे। संयुक्त परिवार में सब एक ही जगह रहते थे। बड़ों के लिहाज़ में पत्नी घूंघट ओढ़े रहती थी। मगर फिर भी बच्चे पैदा हो जाते थे।
फिर परिवारों का विभाजन हुआ और बच्चे महानगरों में आ गये। अब पति-पत्नी एक ही बेडरूम में एक ही पलंग पर इकट्ठे सोने लगे और बच्चे दूसरे कमरे या कमरों में। पति-पत्नी के प्रेम का सूचकांक यही होता कि रात को दोनों एक दूसरे से कितना चिपक कर सोते हैं। कुछ पत्नियां शिकायत करती थीं कि उनका पति चिपक कर नहीं सोता तो कुछ एक पति इस बात से परेशान रहते कि पत्नी रात को दूरी बना कर सोना चाहती है।
दरअसल होता क्या था कि पत्नी सारा दिन घर का काम करके थकी हारी होती और रतिक्रिया के बाद कुछ घंटों की निर्विघ्न नींद चाहती थी ताकि जब वह सुबह उठे तो अगले दिन के युद्ध के लिये तरोताज़ा हो। वहीं कुछ पति भी दफ़्तर की डांट और ओवरटाइम से थके होने के कारण रात के भोजन के पश्चात अपने शरीर को आराम देने चाहता है। इसलिये दोनों के लिये एक दूसरे के साथ चिपक कर सोना ख़ासा कठिनाई भरा होता था।
हम भारतीय बहुत इमोशनल लोग हैं। हर बात में जल्दी से हर्ट भी हो जाते हैं और जल्दी से उत्साहित हो कर नारे भी लगाने लगते हैं। मगर पश्चिमी देशों में हर समस्या को इमोशनल एंगल से नहीं देखा जाता। यहां समस्या को समस्या की तरह जांचा परखा जाता है। इन्हीं हालात से एक नई सोच सामने आई – स्लीप डायवोर्स यानी कि शयनकक्ष तलाक!
पहली नज़र में, “स्लीप डिवोर्स” शब्द सुन कर लगता है कि रिश्ते में परेशानियां चल रही हैं। जबकि पश्चिमी देशों में इस प्रक्रिया को इसलिए अपनाया जा रहा है ताकि अधिक से अधिक लोग अपनी नींद और रिश्तों को बेहतर बनाया जा सके। स्लीप डिवोर्स का तात्पर्य (पति-पत्नी) रोमांटिक पार्टनर आपस में एक साथ बिस्तर साझा करने के बजाय अलग-अलग कमरों में सोने से है। यह आवश्यक हो जाता है कि हम उन तमाम कारणों की जांच परख करें कि आख़िर क्यों पति-पत्नी का अलग बिस्तरों या फिर अलग कमरों में सोना रिश्ते को बेहतर बना सकता है।
सबसे पहला कारण जो समझ में आता है वो हैं ख़र्राटे… यदि पति-पत्नी में से एक रात को ज़ोरदार ख़र्राटे लेता है तो दूसरे की सारी रात बरबाद हो जाती है और दूसरा बंदा रात भर सो नहीं पाता। यदि दोनों में से किसी एक को बार-बार नींद में हिलने की आदत हो और उसके हिलने से दूसरे की नींद में विघ्न पड़ता हो। और तीसरा कारण सुनने में मज़ाक सा लगेगा मगर ठंडे प्रदेशों और देशों में यह एक ठोस कारण है। वो कारण है किसी एक की आदत में रज़ाई अपनी ओर खींच लेने की स्वार्थी आदत। जैसे ही आप रज़ाई अपनी ओर खींचते हैं तो दूसरे की पीठ नंगी हो जाती है और उसे सर्दी लगने लगती है। ज़ाहिर है कि इससे नींद ख़राब होती है।
रात की नींद ख़राब होने से इंसान अगले दिन चिड़चिड़ा रहता है और उसका मूड दिन भर ख़राब रहता है। मगर लगातार कई दिनों तक नींद की कमी से इंसान के स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। सच तो यह है कि बड़े शहरों यानी कि महानगरों में पति-पत्नी दोनों ही नौकरी करते हैं। पत्नी को तो दफ़्तर से वापिस आकर पूरे परिवार का भोजन भी तैयार करना होता है। इसलिये दोनों के लिये रात की गहरी नींद अति आवश्यक है। यदि पत्नी नौकरी ना भी करती हो तो भी उसके लिये घर के अनगिनत काम होते हैं जिसके लिये अच्छी नींद एक टॉनिक का काम करती है।
रिलेशनशिप एक्सपर्ट (रिश्तों कि विशेषज्ञ) एनाबेल नाइट ने एक टीवी कार्यक्रम के कहा कि लोगों ने यह मान लिया है कि जो जोड़े अलग-अलग सोते हैं, वे शादीशुदा जीवन में किसी न किसी परेशानी से गुजर रहे हैं। “लेकिन यह एक दकियानूसी सोच है”।
आजकल हमारी सोच का दायरा कुछ सीमित होता जा रहा है और हम अपनी सुख और सुविधा को लेकर कुछ आत्मकेन्द्रित होते जा रहे हैं। हमारे रिश्ते के भीतर भी हमारी अपनी जरूरतें सबसे आगे हैं। अगर आपको अलग-अलग बिस्तरों में रात को अच्छी नींद की ज़रूरत है, तो यह प्रयोग निश्चित रूप से कुछ कर सकता है। जिन्हें ज़रूरत हो उन लोगों को कोशिश करनी चाहिए।
मगर वहीं पति-पत्नी या मित्र जोड़े को अपने रिश्तों के बीच के अंतरंग पक्ष का भी ध्यान रखना होगा। दोनों को एक दूसरे के लिये समय निकालना होगा वरना अपनापन कम होता जाएगा और एक स्थिति यह भी आ सकती है कि आप कभी साथ-साथ सो ही नहीं पाएंगे।
पहले तो एक बड़े बेड पर दूरी बना कर अलग-अलग रज़ाई या चादर लेकर सोने का प्रयास किया जाए। यदि यह काम ना करे तो एक ही कमरे में अलग-अलग बिस्तर पर सोने की कोशिश की जाए। यदि यह भी असफल हो जाए तो फिर अलग-अलग कमरे में सोने के बारे में सोचा जाए।
जब तक आप अलग-अलग सोने से पैदा होने वाले नुकसान के बारे में सचेत हैं और उन्हें संबोधित करते हैं, तब तक वास्तव में कोई कारण नहीं है कि अलग-अलग बेड पर सोना अद्भुत काम न कर सकता हो। फिर भी यह ज़रूरी हो जाता है कि हम स्लीप डिवोर्स यानी कि अलग-अलग बिस्तरों या कमरों में सोने से हमारे जीवन पर क्या असर डाल सकते हैं। क्या इससे रिश्ते बेहतर होने की संभावना है या रिश्तों में दरार आने की।
जैसा कि ऊपर बताया गया है बहुत से लोग नींद की रुकावट को कम करने के लिए अलग से सोना पसंद करते हैं। जब साथी एक ही बिस्तर में सोते हैं, तो तो ख़र्राटे, हिलना डुलना, और रज़ाई खींचने के अतिरिक्त किसी प्रकार की बीमारी या एलर्जी या फिर गर्भावस्था नींद में ख़लल डाल सकते हैं। इनसे बचने के लिये अलग-अलग सोना सेहत के लिये बेहतर है।
जो लोग अलग-अलग सोते हैं उनका मानना है कि उन्हें लगभग चालीस मिनट से एक घंटा बेहतर सोने को मिलता है। ज़ाहिर है कि इससे शरीर अधिक ताज़ा महसूस करेगा और रिश्ते में बेहतरी पैदा होगी। करीब 53% लोगों का मानना है कि स्लीप डिवोर्स का इस्तेमाल करने से उनकी नींद की क्वालिटी बहुत बेहतर हो गई है।
जब यह तय हो गय कि अलग-अलग सोने से नींद की गुणवत्ता में सुधार हो जाता है तो इससे रिश्तों में भी सुधार होने की प्रबल संभावना है। कम नींद आने से इंसान चिड़चिड़ा हो जाता है और एक दूसरे के साथ लगभग दुश्मनों का सा व्यवहार करने लगत हैं। ख़राब नींद के कारण इन्सान के क्रोध की मात्रा में भी बढ़ोतरी देखी गई है।
अलग-अलग सोने की परेशानी यह भी है कि अलग कमरे की ज़रूरत पड़ती है। हर परिवार के पास अतिरिक्त कमरे नहीं होते हैं। मध्यवर्गीय एवं निम्न-मध्यवर्गीय परिवार तो बहुत मुश्किलों से एक फ़्लैट का जुगाड़ कर पाते हैं, फिर भला आसानी से अलग कमरे का प्रबन्ध कैसे कर पाएंगे। फिर अलग-अलग पलंग और बिस्तर ख़रीदना। यदि गर्मी का महीना है तो दोनों कमरों में एअरकंडीशनर लगवाना। यानी कि अच्छी नींद की कीमत भी भारी पड़ती है।
शयनकक्ष तलाक़ या फिर स्लीप डिवोर्स लेने वाले जोड़ों में से एक चौथाई से अधिक जोड़े अंततः बाद में फिर से बिस्तर साझा कर लेते हैं। उनमें से एक तिहाई से अधिक ऐसे होते हैं जिन्हें एक-दूसरे को याद करना उन्हें एक साथ वापस लाया। यदि आप रात में अपने साथी के साथ गले लगाने के आदी हैं, तो अचानक अकेले सोने से अकेलापन महसूस हो सकता है। इसका असर पति-पत्नी की सेक्स लाइफ़ पर भी पड़ सकता है।
कुछ लोगों के लिए, अकेले सोना उनकी सुरक्षा की भावना को प्रभावित कर सकता है। इससे हल्की नींद आ सकती है क्योंकि वे निगरानी मोड में रहते हैं… नींद में होने के बावजूद हल्की से हल्की आहट भी उनकी नींद उचाट कर देती है। जब एक बिस्तर साथी मौजूद होता है, तो यह आश्वासन मिलता रहता है कि कोई साथ है और इससे अनिद्रा से इन्सान बच पाता है।
पति-पत्नी या पार्टनर्स को याद रखना होगा कि स्लीप डिवोर्स का निर्णय लेने से पहले एक दूसरे के साथ अच्छी तरह स्थितियों का जायज़ा लिया जाए। हर परेशानी का पहले कोई दूसरा हल ढूंढने का प्रयास करना चाहिये फिर वो चाहे ख़र्राटे हों या कोई अन्य समस्या। विशेषज्ञ की राय सहायक सिद्ध हो सकती है। जब सभी तरह के उपाय असफल हो जाएं, उसके बाद ही अलग-अलग सोने का निर्णय लेना चाहिये।
बिल्कुल नया टॉपिक। वैसे मुझे भी अलग सोना ही पसंद है। पूरी जिंदगी में ऐसे ही रही। इसको पढ़े बिना ही। बिना डायवर्स के! शांति पूर्ण जिंदगी थी।
आपकी टिप्पणी हमारे लिए महत्वपूर्ण है भाग्यम जी।
य़ह व्यवस्था है की अवस्था है न कि कोई अन्तिम निर्णयावस्था … इसे गंभीर सामाजिक – पारिवारिक समस्या के रूप में स्वीकारा जाना अनुचित होगा … यह पति और पत्नी की आपसी समझ-बूझ से लिये जानेवाला वो लचीला निर्णय है जिसे कभी भी बदला जा सकता है… मुख्य बात है आपसी सामञ्जस्य … यह स्थिर और स्थायी होना चाहिये। इससे निकलने वाला हर निर्णय कल्याणकारी, आनन्ददायी, आरामदायक व आपसी सम्बन्धों को मधुरता के साथ दृढ़ता भी देनेवाला होगा। अस्तु।
आपने पति पत्नी के रिश्तों के लिए स्लीप डिवोर्स का एक बड़ा फ्रेज गढ़ दिया है, ये वाकई विचारणीय है और एक तलख हकीक़त भी है
हार्दिक आभार आलोक भाई।
हमारा स्लीप डाइवोर्स तो पिछले 12 वर्षों से चल रहा है। गर्मी में पत्नी को इतनी गर्मी लगती है कि उसका एसी तापमान मुझे ठंड से परेशान कर देता है। सर्दी में मुझे बड़ी से बड़ी रजाई अकेले के लिए चाहिए। रति क्रिया में मेनोपॉज के बाद उसकी दिलचस्पी नहीं रही है। तो उसे जरूरत नहीं है। मेरे लिखने से भी उसे कष्ट होता था तो अलग कमरे ही भले। यह अच्छा कांसेप्ट है। भारतीयों को सीखना चाहिए।
राजेश्वर भाई, आपके निजी अनुभवों से सजी स्पष्टवादी टिप्पणी हमारे लिए महत्वपूर्ण है। पाठकों को इससे सीखने को मिलेगा।
य़ह व्यवस्था है की अवस्था है न कि कोई अन्तिम निर्णयावस्था … इसे गंभीर सामाजिक – पारिवारिक समस्या के रूप में स्वीकारा जाना अनुचित होगा … यह पति और पत्नी की आपसी समझ-बूझ से लिये जानेवाला वो लचीला निर्णय है जिसे कभी भी बदला जा सकता है… मुख्य बात है आपसी सामञ्जस्य … यह स्थिर और स्थायी होना चाहिये। इससे निकलने वाला हर निर्णय कल्याणकारी, आनन्ददायी, आरामदायक व आपसी सम्बन्धों को मधुरता के साथ दृढ़ता भी देनेवाला होगा। अस्तु।
घर घर की समस्या पर ऐसा सुलझा हुआ और तलस्पर्शी संपादकीय मैंने कोई और नहीं पढ़ा। आप जिस विषय पर भी लिखते हैं, उसके पीछे एक मुकम्मल सोच, शोध और विजन होती है। यह मैंने बहुत बार पहले भी देखा है। इस दफा भी।अलबत्ता ऐसे बढ़िया, सुलझे हुए और बेबाक संपादकीय के लिए बधाई और आभार।
शैली जी, आपने पुरवाई संपादकीयों की श्रृंखला पर एक सार्थक और अर्थपूर्ण टिप्पणी की है। हार्दिक आभार।
हार्दिक आभार
स्वागत है आपका।
आपने अपने संपादकीय में sleep divorce के गुण दोषों का विश्लेषण मनोवैज्ञानिक तरीके से किया है। हो सकता है शयन कक्ष तलाक या sleep divorce किसी व्यक्ति के लिए शांति पूर्ण नींद या उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए उचित हो लेकिन दूसरे व्यक्ति को पलंग पर साथी की अनुपस्थिति कभी-कभी बैचेन भी कर देती है। यह निर्णय हर व्यक्ति के स्वभाव, सोच और मानसिक स्थिति पर निर्भर है। वैसे भी संबंधों में मिठास के लिए थोड़ा दूर थोड़ा पास का सिद्धांत श्रेष्ठ है।
सुधा जी, आपने संपादकीय के कई पहलुओं पर गंभीर टिप्पणी की है। हम आपके आभारी हैं।
आजकल यह देखने व सोचने से परे की बात हो गयी गांव के हर घर परिवार मे ऍम हो गया, पति पत्नी विचार समझ नहीं पर रहे है
मोनिका बहुत धन्यवाद सार्थक टिप्पणी के लिये।
एक नया नाम और पुरानी परम्परा की पुनरावृत्ति है, लेकिन हालात अलग अलग है। स्लीप डाइवोर्स की नौबत विवाह के कम से कम दस वर्ष बाद नोबत आती है। हमारे यहाँ भी होती है लेकिन यहाँ बेडरूम नहीं बदलते है, एक ही कमरे में रहते हुए भी स्थिति वानप्रस्थ वाली आ जाती है।
जितने कारण आपने गिनाए है अमूमन एक या दो हर दम्पत्ति के बीच होते है। शुरू में सब वैवाहिक जीवन के आरम्भ में सहर्ष समझौता कर लेते हैं लेकिन परिवार में नयी पीढ़ी के आने से समझौते कम होने लगते है। कभी बच्चे के रात में परेशान करने पर पति के फ्लैट में भी अपनी तकिया लेकर ड्रॉइंगरूम में चले जाने से शुरूआत होने लगती है।
परिवार के विखंडन से बेहतर है कि बीच का रास्ता निकाल लिया जाय। एक दूसरे की समस्या को देखते हुए बेबरूम को आधार न बनाया जाय।
रेखा जी आपने वानप्रस्थ के साथ जोड़ कर इस स्थिति को नये ढंग से समझाया है। आपने पति-पत्नी को सकारात्मक सलाह भी दी है। हार्दिक धन्यवाद।
निःसन्देह ये अपनी तरह का एक अलग ही संपादकीय लिखा गया है। विषय जितना अनूठा है, उतना ही इसकी यानी शयन कक्ष तलाक़ की जानकारी (ख़ासतौर से भारतीय कम्युनिटी के लिए) भी नई है। संपादकीय में शामिल भारतीय मानसिकता से जुड़े विविध उदाहरण भी सहज ही इसे विशेष बनाते हैं।
हालांकि मुझे लगता है कि चर्चा में शामिल कई समस्याओं से ग्रस्त होने के बावजूद भी भारतीय जनमानस इस स्लीप डिवॉर्स को अपनाने में स्वयं को न तो सहज महसूस करेगा और न ही इसकी ओर इंटरेस्टड होगा।
बहरहाल एक सुंदर संपादकीय के लिए बधाई आदरणीय तेजेन्द्र सर।
विरेन्द्र भाई, एक सजग संपादक की ज़िम्मेदारी बनती है कि वह जीवन के हर पहलू के बारे में अपने पाठकों को सचेत करता चले। उसी भावना के तहत मैं हर बार कुछ नया लिखने का प्रयास करता हूं। आपको संपादकीय पसंद आया, हार्दिक धन्यवाद।
इस बार का संपादकीय विषय है ‘स्लीप डिवोर्स’। यह एक मानवीय और आवश्यक विषय है। हमारे दांपत्य जीवन में न जाने कितनी समस्याएं नित आती रहती हैं। बहुत अधिक निकट भी जी के जंजाल से कम नहीं है। थोड़ी दूरियां प्रेम को नवीनता देती हैं। भारत जैसे देश में खासकर ग्रामीण अथवा कस्बाई क्षेत्रों में एक दो बच्चों के जन्म के बाद दंपत्ति की सेज अलग हो जाती हैं। अब जरूर अति विकसित कल्चर या आधुनिकता की होड़ में दंपत्ति एक ही सेज साझा करने लगे हैं। खैर ये तो मेरा अनुभव है। तेजेन्द्र सर ने अपनी संपादकीय में पूरी जांच पड़ताल करके ही इसे पाठकों के सामने रख दिया है। पाठक इस संबंध में क्या सोचते हैं इस पर एक प्रश्नचिह्न भी लगा दिया है। लेकिन आपने अपनी संपादकीय में कुछ भी नहीं छोड़ा है। चारों तरफ़ से घेरकर पाठक को बीच में खड़ा कर दिया है। कुछ प्रश्न बन भी रहे थे पर अंत में आपने उन पर भी अपनी शंका जाहिर कर दी है। पहले का सोचें या अंत वाला। तो मैं यही कहूंगा कि पहले वाली बात को मैं अपनी तवज्जो दूंगा कि जो पहले भारतीय परिवारों में होता था। लेकिन कुछ सुधार के साथ। क्योंकि अब सम्मिलित परिवार नहीं रहे हैं तो वैसा ही परिवार मन में बिठाकर अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित करना चाहिए।
भाई लखनलाल जी, आपने संपादकीय को गहराई से पढ़ा और पकड़ा है। एक सफल संपादकीय वही कहलाएगा जो सब को कुछ ना कुछ दे सके। आपको पहली वाली बात पसंद आई, आप उसी को ग्रहण करें। हार्दिक धन्यवाद।
तेजेंद्र सर क्या ही कहूं आपके बारे में आपके लेखन के बारे में। संपादकीय तो संपादकीय कहानियां इत्यादि हर विधा में आप इतने पारंगत हैं कि मुझे खुद पर गर्व होता है आपको साहित्यिक पिता कहकर। लीक से हटकर लिखा है आपने। नया विषय एकदम हमारे लिए। और दोनों सोच जो आपने दिखाई है संतुलन रखते हुए हर किसी को आपका यह लिखा संपादकीय सोचने पर मजबूर करेगा साथ ही एक नई सोच विकसित करेगा उनमें। बधाई
आपका स्नेह मेरे लिये किसी निधि से कम नहीं है बेटा जी। आपकी पीढ़ी जब पुरवाई के संपादकीय से जुड़ पाती है, तो लगता है कि संपादकीय सफल हो गया। स्नेहाशीष।
यह प्रक्रिया केवल यूरोपीय परिवारों में ही नहीं बल्कि भारतीय परिवारों में विवाह के 15/20 सालों के बाद आम तौर पर देखने को मिलती है, परंतु इसके लिए कोई नाम अबतक नहीं था। अब इसके लिए एक नाम चल पड़ेगा। यह नाम भारतीयों के लिए नया भले ही हो लेकिन प्रक्रिया नयी नहीं। आपने जो कारण बताए हैं, वे सारे यहां भी प्रचलित हैं, मगर बोलता कोई नहीं। हालांकि इसमें कोई असुविधा भी नहीं है, वरन नींद के लिहाजे से बेहतर है। नींद अच्छी हो तो सबकुछ ठीक-ठाक चलेगा, बरना, सब गड़बड़। स्लीप डिवोर्स विषय को लेकर यह संपादकीय वास्तव में एक मनोवैज्ञानिक पहलू को उजागर करता है। इस बात को पति-पत्नी अन्यथा लिए बिना समझदारी से निभाना उचित होगा। एक नए विचार के लिए हार्दिक बधाई। उम्मीद है, अगला संपादकीय एक ओर नए विचार के साथ सामने आएगा। नमस्कार।
जयंत भाई, आपको संपादकीय ने छुआ और आपको पसंद भी आया – इसके लिए विशेष धन्यवाद।
आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं और तनाव के बीच अच्छी नींद भी आकाश कुसुम सी हो गयी है। दाम्पत्य जीवन को लेकर बहुत अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत किया आपने। सादर प्रणाम
रोचक एवं वैचारिक आलेख।
स्लीप डायवर्स पढ़ने पर बेशक नया लगे लेकिन भारतीय कल्चर में पत्नी अधिकतर सास- ननंद के साथ ही सोती है और पति बाहर मंजी पर..,गांव में और छोटे शहरों में अक्सर यही होता है।
अब बॉम्बे..दिल्ली जैसे शहरों की बात करें तो कमरे कम ही होते हैं। हां..आज कल संयुक्त परिवार का विघटन और एकल परिवार में नजदीकियां ज्यादा बढ़ने से प्रेम कम होने लगता है, ऐसे में कुछ समय के लिए दूरी बनाकर रिश्तों में ताजगी लाने के लिए स्लीप डायवर्स अच्छा कंसैप्ट है, इसे ट्राय जरूर करना चाहिए।
नए अंदाज के साथ नई जानकारी प्रदान करने के लिए तेजेन्द्र सर को धन्यवाद
तेजेंद्र जी
नमस्कार
वाह वाह वाह!!!
क्या गजब का विषय चुना है आपने संपादकीय के लिए! हर व्यक्ति की एक तिहाई ज़िंदगी की समस्याएं और समाधान!
इस विषय की अद्भुतता की जितनी प्रशंसा करूं वह कम है!
हमारे यहां एक कहावत प्रचलित है कि अधिक मीठे में कीड़े पड़ते हैं ।पति-पत्नी का हर रोज एक साथ सोना अवश्य शारीरिक और मानसिक रूप से कहीं जीवन की गुणवत्ता में कुछ कमी ला सकता है ,इसलिए कुछ दूरी बनाकर रखना ही चाहिए। मैं एक वरिष्ठ नागरिक हूं और हमारी मित्र मंडली में कई लोगों के मुंह से मैंने यह सुना है कि ‘अब हमें अपने बेडरूम अलग करने हैं’
मुझे अपनी मां की पीढ़ी के लोगों में यह सुनने को कभी नहीं मिला क्योंकि उसे काल में पति-पत्नी के बीच एक ‘सुखद’ दूरी रहती थी!
मेरे विचार से सोने के समय में(बिस्तर में) आने वाली समस्याओं का एक बड़ा कारण यह है कि आजकल ‘प्रेम’ चाहे हो या ना हो दिखावा अधिक होता है! परंतु शरीर के हार्मोन समय के साथ परिवर्तित होते रहते हैं इसलिए शारीरिक आदतों में भी परिवर्तन होना आवश्यक ही है तभी जिंदगी सुखद चलती है।
सनातन शाश्वत जीवन -नीति “अति सर्वत्र वर्जयेत” सदा ही प्रासंगिक रहेगी।
रोचक और लीक से हटकर लिखे गए संपादकीय के लिए बधाइयां।
सरोजिनी जी, आपने तो संपादकीय को समझाने के लिए इतने प्यारे उदाहरण दिए हैं कि संपादकीय को नये आयाम मिल गये हैं। हार्दिक आभार।
सादर नमस्कार सर… इसबार संपादकीय में दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण रिश्ते को सुंदर बनाए रखने का जो विचार आपने दिया है.. यह ग्रहणीय है। आपकी लेखनी हमेशा ऐसे विषयों पर चलती है जिसके बारे में पाठक कभी सोचता भी नहीं।
इस संपादकीय में समस्या भी है और उस समस्या का समाधान भी।
साधुवाद..
अनिमा जी, आपको पुरवाई के संपादकीय पसंद आते हैं और आप लगातार अपनी प्रतिक्रिया भी भेजती हैं; इसलिए हम आपके आभारी हैं।
आदरणीय तेजेंद्र शर्मा जी
सादर नमस्कार
आपने शयन कक्ष तलाक को लेकर बहुत ही महत्वपूर्ण संपादकीय लिखा है। इस लेख के माध्यम से व्यक्तिगत मनोवृतियों कारण पति-पत्नी के बीच उत्पन्न हो रहीं शयन कक्ष तलाक जैसी समस्या को बखूबी रेखांकित किया है। वास्तव में संयुक्त परिवार हों या एकल परिवार सभी में यह समस्या विकलाल रूप धारण कर रही है। मैं इसका भुक्तभोगी रहा हूँ। मेरी खर्राटों के कारण मेरी पत्नी दूसरे कमरे में सोने चली जाती थी। मैंने इसका समाधान खोजा। रात में सोने से लगभग दो तीन-घंटे पहले भोजन करना शुरू किया। इस प्रक्रिया से खर्राटे दूर भाग गए और पत्नी पास आ गई..
शयन कक्ष तलाक जैसी समस्या के कारण पति-पत्नी के बीच अवसाद, चिंता, चिड़चिड़ापन,आपसी टकराव आदि उत्पन्न हो जाते हैं जिसका गहरा प्रभाव दांपत्यजीवन को कुप्रभावित करता है।
अतःशयनकक्ष तलाक समस्या के प्रति गंभीर होने की जरूरत है और इस संपादकीय को भी बार-बार पढ़ने की आवश्यकता है ।
भाई शर्मा जी को मौलिक लेख के लिए हार्दिक साधुवाद।
संपादकीय वही अहम होता है जो आम फ़हम हो पर अहम मुद्दे पर केंद्रित हो और सभी से संबद्ध हो।कहना या लिखना आसान है पर शब्दों में ढाल कर रोचक बना कर प्रस्तुत करना दूसरी बात।यही हुआ है स्लीप डाइवोर्स के रूप में जो आज कभी अलगाव तो कभी स्लीप डिसऑर्डर या फिर साइलेंट किलर बीमारियों यथा रक्त चाप,बेचैनी ,मानसिक अवसाद या किसी नए शब्द तलाशती बीमारी में परिलक्षित हो रहा है।
भारत में यह समस्या पहले कतई नहीं थी,तब संयुक्त परिवारों का दौर था।आज सबसे अधिक हो गई है ।पिछली सदी के शांत संतुष्ट और सुखी समाज आज पश्चिमी सभ्यता के दुर्गुणों पर आसक्त हो,दुखी समाज का नमूना या आईना बनता जा रहा है। वो दिन दूर नहीं जब पाश्चात्य सभ्यताएं हमें अंगूठा दिखाते हुए हमारा उपहास करेंगी और कहेंगीं
देसी गधा पूरबी चाल
सार्थक संपादकीय पर रोचकता के रस से सराबोर।
संपादक और पुरवाई पत्रिका को साधुवाद।
भाई सूर्य कांत जी, आपने संपादकीय को गहराई से समझते हुए अपनी सार्थक टिप्पणी के साथ पाठकों को भी नया संदेश दिया है।
हटकर विषय… विचारणीय
धन्यवाद संगीता जी।
साहित्य से अलग हट कर आपने एकदम व्यावहारिक टॉपिक उठाया है सर। पढ़ने में ही बहुत रोचक और अच्छी सीख देने वाला है। इस परिस्थिति में हम भी जूझ रहे हैं हमारे मोहतम रात भर सोते में कुलबुलाते रहते हैं इसलिए हमने नींद के लिए अलग सोना शुरु कर दिया। वो भी ख़ुश हम भी ख़ुश। असल में स्लीप डिवोर्स कोई समस्या नहीं बल्कि किसी समस्या का समाधान है। बस इसमें डिवोर्स शब्द हटा कर कोई ख़ूबसूरत शब्द जोड़ दिया जाए तो यह कहने सुनने में भी अच्छा लगेगा।
तबस्सुम, तुम्हारी टिप्पणी में बहुत अपनापन महसूस होता है। दरअसल मर्ज़ की दवा का नाम ही अजीब होता है – टेरामाइसिन, टेट्रासाइक्लिन, कई बार तो दवा का नाम ही काम कर जाता है। पश्चिमी देशों में मर्ज़ की दवा ढूंढने में प्रेक्टिकल होना आवश्यक है। फिर भी तुम्हारी सलाह का ख़्याल रखा जाएगा भविष्य में।
आदरणीय हर बार की तरह इस बार भी आपके संपादकीय ने नई सोच समाज में विकसित करने का प्रयास किया है । आपने वैवाहिक जीवन के सच को जाँच परखने के साथ साथ उसके मनोवैज्ञानिक विश्लेषण को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है । अक्सर तलाक़ का कारण पति पत्नी में अनचाहे समय अंतरंग संबंध बनाने को ही लेकर होता है। पश्चिमी दुनिया में तो फिर हमारे पास यह सुविधा होती है कि हम समय पर घर आ जाते है। पर भारत में आप ने से पाँच तक की ड्यूटी नहीं कभी-कभी न चाहते हुए भी अपने बॉस के कहने पर निर्धारित समय से अधिक समय तक काम करते है जिसके कारण पहले ही मन खिन्न होता है और ऐसे में घर पर जा कर रात को भी चैन की नींद न सो सके तो पूरा परिवार समस्याओं से घिर जाता है। जिसका असर बच्चों पर भी बहुत पड़ता है जो उनके मानसिक विकास के लिए सही नहीं है । ऐसे में आपका का यह नया विकल्प ढूँढना बहुत सार्थक है। जब पति पत्नी एक दूसरे को समझ यह रास्ता अपनाएँगे तो मुझे लगता है कि उनके साथ साथ परिवार में कम तनाव और झगड़े या चिड़चिड़ापन आएगा जिससे परिवार में भी एक स्वस्थ व ख़ुशी का महोल रहेगा । परिवार में एक दूसरे से बात करने के अवसर पैदा होंगे ।क्योंकि अक्सर झगड़े आपसी वार्तालाप को रोक देते हैं जिसके कारण बहुत सारी ग़लतफ़हमी पैदा होती है जो किसी भी रिश्ते को तोड़ने का पहला कारण है । इसलिए क़ानूनी तलाक़ लेकर परिवार तोड़ने से बेहतर है बिस्तर का तलाक़ लेकर खुद को व परिवार को जोड़ना बेहतर है। बहुत सार्थक सम्पादकीय के लिए अनेकों साधुवाद ।
ऋतु, तुम्हारी इस टिप्पणी ने भारत और पश्चिमी देशों की स्थितियों का सही आकलन किया है। पुरवाई के पाठकों को तुम्हारी यह टिप्पणी अवश्य पढ़नी चाहिये।
सुपर से ऊपर भ्राता श्री
Bless you Kapil!
आदरणीय तेजेंद्र जी! आज का संपादकीय हमारे लिए अकल्पनीय और अप्रत्याशित रहा। हम दोनों शब्दों का अर्थ भी जानते थे लेकिन समझ नहीं पा रहे थे कि इसका मतलब क्या है?
यह बात तो बिल्कुल सही है कि डिवोर्स शब्द सुनते से ही अलग होने वाली बात ही समझ में आती है किंतु स्लीप जुड़ा हुआ था इसलिए हमको समझ में नहीं आया कि क्या लफड़ा है? हैडिंग पढ़कर माथे पर बल पड़ गए अब क्या गड़बड़ हुई? विदेशों में कुछ ना कुछ अजूबे होते ही रहते हैं। कभी कब्र खरीदी जाती है, बेची जाती है, कभी जन्नत की टिकट बुक होती है; फिर पढ़ने पर खुलासा हुआ तो हँसी भी आई। पर वर्तमान के संदर्भ में विषय की गंभीरता भी महसूस हुई। चुटकुला तो सुना हुआ था काफी पहले पर कई सालों बाद दोबारा सुनकर मनोरंजक लगा। आपके संयुक्त परिवार का उदाहरण तो हमारे ससुराल की घटना समान है शादी होकर आए तो हमारी जेठानी ने बताया की डेढ़ 2 महीने तक पता ही नहीं था कि पति कौन से हैं। लट्ठे जैसी मोटी साड़ी, बिजली शहर में ही नहीं थी, दिन में लंबा एक हाथ का घूंघट, गरीबी वाला माहौल था तो मिट्टी के तेल की चिमनी रात को ज्यादा देर नहीं जला सकते थे। बुआ सास का एक छत्र राज था। चारों सास ही बहुत डरती थीं बहुओं की क्या बिसात।शादी का आटा तक घर में हाथ चक्की में पिसता था। भारत में तो वह समय ऐसा था ही नहीं की इतना सब कोई सोचता। किसी के दिमाग में भी नहीं होगा। यह सब वर्तमान समय की देन है जहाँ पति और पत्नी दोनों बराबरी से नौकरी करते हैं तो सामञ्जस्य जरूरी है। सामान्यतः बच्चे होने के बाद स्थितियाँ बदल जाती हैं।साथ सोना हो नहीं पाता । तू आदत हो भी जाती है।यह बात सही है कि भारत की संस्कृति इमोशनल ज्यादा है किंतु पश्चिमी देशों में समस्या को समस्या की तरह देखा जाता है, इसीलिए इस तरह के हालात बने। अब समस्या लग रही है तो निदान ढूँढना ही पड़ेगा ना! नींद गड़बड़ होने के आपके सारे कारण जायज़ हैं। जबकि पर्याप्त नींद बहुत ज्यादा जरूरी है। वैसे तो एक बिस्तर पर भी अलग- अलग सोया जा सकता है पर सब स्थितियों पर निर्भर है। आपने हर संपादकीय की तरह इस संपादकीय में भी सारे गुण दोष और उपाय सब बता दिए हैं इसलिए कहने को कुछ रह नहीं जाता। इतनी बारीकी से पड़ताल की है आपने कि सब सिर्फ अपने हाल ही सुना सकते हैं बाकी सब संपादकीय पढ़ें अपनी समस्या को समझें और उसके अनुरूप जो निदान इसमें दिया गया है उस पर विचार करें। इसमें समस्या और निदान सब दिये हैं। एक और अभूतपूर्व संपादकीय के लिए आप वाकई बधाई के पात्र हैं सर जी। और पुरवाई का आभार तो बनता ही है।
आदरणीय नीलिमा जी, आपने जिस विस्तार से संपादकीय पर टिप्पणी लिखी है, हमारे पाठकों को संपादकीय को समझने में ख़ासी सहायता मिलेगी। आपको विषय और निर्वाह पसंद आया, हार्दिक धन्यवाद।
बहुत बढ़िया संपादकीय, बधाई।
तीस वर्ष पूर्व जब मेरी शादी हुई थी तो मैं अक्सर यह महसूस करती थी कि पति पत्नी का अलग अलग कमरा होना चाहिए। बहुत तरह की असुविधाओं से गुजरती थी। लगता था मेरी कोई जगह नहीं, बिस्तर नहीं, कमरा नहीं। Very uncomfortable.
हाँ , एक दूसरे के कमरे में आने जाने में कोई रोक टोक नहीं होनी चाहिए।
किसी व्यक्ति की प्राइवेसी का रेस्पेक्ट किसी भी रिश्ते की बेहतरी के लिये आवश्यक है।
बदलते वक़्त ने इस समस्या का समाधान थोड़ी देर से ढूँढा। खैर बहुत अच्छी सलाह भी दी आपने , नयी पीढ़ी को एक दूसरे को समझने में शायद सहूलियत हो।
सुषमा जी एकदम माडर्न और स्पष्ट सोच है आपकी टिप्पणी की। हार्दिक धन्यवाद।
अंतरंग जीवन पर केंद्रित समस्याओं पर लेखनी चलाना आसान नहीं है। आज नब्बे प्रतिशत दंपति इस पीड़ा को झेल रहे हैं। इसके बावज़ूद वे समाधान रहित हैं।
आपने मनोविश्लेषणात्मक शैली में बहुत सुंदर ढंग से व्याख्यायित करते हुए काम को वह स्थान दिया है, जो पुरुषार्थ चतुष्टय में दिया गया है ।
दकियानूसी समाज में यह साहसिक कदम है । बधाई आदरणीय!
डॉ० गंगा प्रसाद शर्मा’गुणशेखर’
जागृत अवस्था में लज्जा, मर्यादा और परिवेश एवम् स्वप्न में काल्पनिक सृष्टि से गुज़रने के बाद सुसुप्ति में हम केवल अपने साथ अकेले ही तो होते हैं। अथवा आध्यात्मिक दृष्टि से ईश्वरीय शक्ति के साथ एकाकार हो जाते हैं। निद्रा भगवती की गोद में ऊर्जा का संचार होता है, इस लिए प्रातः जब उठते हैं तो कितना तरो-ताज़ा महसूस करते हैं।जबकि पत्नी के सहवास सुख की उपलब्धि तो थकान टूटन और आलस्य ही है। उसके उपरांत और भी गहरी नींद की आवश्यकता हमे स्लीप डाइवोर्स की ओर प्रेरित करती है।
आदरणीय व्योमा जी।
काफी अच्छा सा साक्षात्कार है और सबसे बड़ी बात यह है कि बहुत महत्वपूर्ण विषय पर है। शीर्षक सटीक है और यहाँ तो हम आपसे 100% सहमत हैं। जो सही लिखते हैं कृपया अन्यथा न लें। आपके द्वारा उल्लेखित पत्रिकाएँ ही पहले ज्यादा चलती थी और सजग माता-पिता अपने बच्चों के लिए उसे वार्षिक लगवाते थे। हम तो 4 साल के हुए थे और हमारे लिए पिताजी रोज एक कहानी की किताब लाकर देते थे हमने पढ़ना पहले सीखा लिखना बाद में। वर्तनी की गलतियाँ हमें भी चाँवल में कंकर की तरह खटकती हैं। हिंदी हमारे बाई पिताजी की भी बहुत अच्छी रही। पिताजी बहुत किताबें लाया करते थे उपन्यास भी। पांचवी क्लास से उपन्यास पढ़ना शुरू किया। वनस्थली के हमारे स्कूल की लाइब्रेरी भी बहुत समृद्ध थी रोज दो उपन्यास पढ़ने का हमारा नियम था। एग्जाम के दिनों में भी। हस्तलिखित वार्षिक पत्रिका का संपादन हमने भी किया। प्रूफ्र रीडिंग को लेकर हम आपकी हर बात से सहमत है। विराम चिन्हों का महत्व तो अब खत्म ही हो रहा है कविता में तो नजर ही नहीं आते और अनुस्वार और अनुनासिक की गलतियाँ भी बहुत होती हैं। लोग समझना ही नहीं चाहते कि असावधानी से अर्थ ही बदल जाते हैं, गलत विराम चिन्ह से अर्थ बदल जाते हैं।मास्टरनी की निगाह वाली बात आपने सही कही। यही निगाह काम करती है प्रूफ्र रीडिंग में।
लिटरेरी-एजेंट की जानकारी हमारे लिये नयी है। आपने इसे बेहतर समझाया। वैसे यह भी सही है कि लोगों को अपने लिखे पर इतना ओवर कॉन्फिडेंस होता है कि कोई अगर उनके लिखे पर उँगली उठाये तो उनको दिक्कत होने लगती है। गुस्सा आ जाता है। यह वाकई महत्वपूर्ण साक्षात्कार है इसके लिए शैली जी का बहुत-बहुत शुक्रिया। प्रस्तुति के लिए तेजेंद्र जी का शुक्रिया ।
आज आपको पढ़कर बहुत कुछ नया जाना। निश्चित ही यह सहेजने लायक साक्षात्कार है बहुमुखी प्रतिभा के लिए व्योमा जी को शुभकामनाएँ।एक बेहतरीन साक्षात्कार के लिए शैली जी को बधाई! प्रस्तुति के लिए तेजेंद्र जी का शुक्रिया और पुरवाई का आभार तो बनता है।
आदरणीय नीलिमा जी आपने व्योमा जी के साक्षात्कार पर टिप्पणी यहां ही पोस्ट कर दी है। संपादक के तौर पर धन्यवाद करते हुए, आपसे गुज़ारिश है कि इस टिप्पणी को सही जगह पोस्ट कर दें।
एक महत्वपूर्ण विषय। स्लीप डिवोर्स भी एक उम्र से जुड़ी स्थिति है। एक उम्र के बाद जब जैवीय आकर्षण न्यूनतर होने लगता है तो अलगाव समस्यामूलक नहीं रह जाता।
मगर नये वैवाहिक जोड़ों मे एकाध दशक में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाय तो उभय पक्ष में कोई तलाक की मांग कर देगा।
अरविंद भाई ख़ासी प्रेक्टिकल टिप्पणी है आपकी। हार्दिक धन्यवाद।
जितेन्द्र भाई: इस बार का सम्पादकीय का विषय तो आपने बहुत ही बढ़िया चुना। शुरू शुरू में नाम पढ़कर तो यकायक एक झटका सा लगा। पढ़ने के बाद सुझाव है कि इसको Sleep Divorce न कहकर यदि Sleep Adjustment कहें तो बहतर होगा। आपने इस के जितने कारण बताए उन में से ख़ुर्राटेँ सब से टॉप पर आता है। इन में से यदि किसी भी एक कारण से पति पत्नी अलग अलग कमरों में सोते हैं तो कोई हर्ज नहीं है। बजाए इसके कि सुबह उठते ही एक दूसरे को ब्लेम दें कि ‘तुम्हारी वजह से मैं रात भर सो नहीं पाया/पाई” और नई सुबह का श्रीगणेश ही झगड़े से हो तो इस से तो अच्छा है कि अलग अलग कमरों में सोएँ। अब सवाल यह उठता है कि अगर घर में अलग अलग कमरे न हों तो फिर मियाँ जी को तो सोफ़े पर सोना पड़ेगा। ऐसा जोड़ा यदि किसी दूसरे शहर में अपने मित्र या सम्बन्धी के घर जाता है और उनके पास दो अलग अलग कमरे न हों तो फिर क्या करोगे? एक बार मेरे यहाँ कई दो कपल एक साथ आ गए। बच्चे घर पर नहीं थे इसलिए उनके दोनों कमरे उनको दे दिए। मुझे नहीं मालूम था कि उन में से एक कपल अलग अलग सोते थे। ख़ैर वो दोनों एक कमरे में सोने चले तो गए लेकिन सुबह जब वो उठे तो देखा कि रात को मियाँ जी ने बैड की matress उठा कर ज़मीन पर बिछा ली और उस पर सोए। क्योंकि उन पति पत्नि की खर्राटों की समस्या नहीं थी इस लिए मेरे पूछने पर कि नींद कैसी आई तो जवाब मिला कि सब ठीक रहा।
आप अपनी इस लिस्ट मेँ एक और कारण जोड़ लें तो अच्छा होगा। और वो है कि पत्नि को hard matress पर नींद आती है और पति को soft matress चाहिए। इस समस्या के लिए दोनों को अलग अलग सोने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि आजकल मार्केट में number matress आगई हैं जहाँ आप matress की firmness अपने हिसाब से adjust कर सकते हें।
अन्त में यही कहना चाहूँगा कि आपसी सम्बन्धों अच्छे रहें इसके लिए स्मस्या का समाधान ढ़ूँडना है न कि एक दूसरे को ब्लेम देना है। सम्पादकीय के लिए बहुत बहुत साधुवाद जितेन्द्र भाई।
विजय भाई, हमेशा की तरह आपने संपादकीय को गहराई से पकड़ते हुए अपनी ओर से बढ़िया योगदान दिया है। अपने निजी अनुभव को संपादकीय से जोड़ कर आपने कुछ अलग स्थितियां प्रदान की हैं। इस सृजनात्मक योगदान के लिए विशेष धन्यवाद।
पारिवारिक रिश्तों में कई समस्याओं का समाधान है यह
Sweetly named, sleep divorce.आज जब सभी जगह अधिकांश महिलाऐं कामकाजी होती जा रही हैं यह उनके पक्ष में एक सटीक सुझाव है।यह व्यवस्था कई घरों में वर्षों से चल रही है काश निम्नवर्गीय परिवार को भी इसका ज्ञान होता
तब साथ रहकर हरसमय YES हो जाने की मजमबूरी से भी वो बच जाती ।
नीहार जी, आपकी सकारात्मक और सार्थक टिप्पणी महत्वपूर्ण है। धन्यवाद।
आपके इस संपादकीय का विषय अलहदा सा है । दरअसल जिंदगी की समस्याओं के समाधान का नया नाम है स्लीप डिवोर्स । आजकल नींद न आने की समस्या बढ़ भी रही है। ऐसे में नींद पूरी करने के लिए कुछ भी उपाय किये जाएँ, उचित ही हैं l भारत में भी मेट्रो शहरों में युवा पीढ़ी इसे खूब अपना रही है । भले ही वे शादी के कुछ वर्ष बाद अपनाए । 70 घंटे काम करने वाली नौकरियों में सुबह चुस्त-दुरुस्त दिखने का दवाब ज्यादा ही है । चिड़चिड़े दाम्पत्य में प्राथमिकता रहती है कि, “कहीं भी सो लो /पर ठीक से बोलो :)। वे सुबह साथ में वाक पर जाकर क्वालिटी टाइम देने में विश्वास करते हैं । बाकी कमी के लिए वीकिन्ड l एक युवा लड़की ने मुझे हँसते हुए इसी बात को बताया : हम वीकिन्ड वाले कपल हैं।”
अलबत्ता सामाजिक सोच यही है कि अगर पति-पत्नी अलग-अलग कमरे में सो रहे हैं तो उनमें संबंध अच्छे नहीं होंगे । अगर थोड़े भी उन्नीस-बीस हुए तो लोग तुरंत कयास लगाना शुरू कर देते हैं । इस दवाब में साथ सोना भी कोई कारगर उपाय नहीं है l ऐसे में इस तरह के लेख उनकी दृष्टि का परिमार्जन करेंगे।
हालाँकि मेरे विचार से जिन्होंने भी इसका नामकरण किया, उसे डिवोर्स प्रत्यय लगाने की जगह कुछ सकारात्मक नामकरण करना चाहिए था। ये मामले की संजीदगी को कम कर देता है। क्योंकि बहुधा अलग-अलग सोने वाले जोड़े कभी बीमार पड़ने पर, ऑफिस या घर का काम कम होने पर मानसिक रूप से थका या कमजोर महसूस करने पर एक-साथ में आ जाते हैं । कुछ दिन बाद फिर अपनी दिनचर्या में लौट जाते हैं । आखिरकार ये कानूनी मामला नहीं है और अपनी सुविधा के लिए गए निर्णय की दीवारें जब चाहे खिसका कर बड़ी-छोटी करी जा सकती हैं l
नई समस्या के नए समाधान खोजते हुए इस शानदार संपादकीय के लिए बहुत बधाई सर
नमस्कार तेजेन्द्र जी
बहुत अलग किंतु महत्वपूर्ण विषय! हमारा समय अलग था, शायद अधिकांश लोग इस विषय पर बात करने से बचते रहे होंगे लेकिन समस्या तो शाश्वत व सत्य है। इस संपादकीय के शीर्षक पर दृष्टि पड़ने पर उत्सुकता होना स्वाभाविक ही था, हमारी पीढ़ी को किसी न किसी कारण से इस विषय पर अब सोचने की आवश्यकता नहीं है किंतु मनोवैज्ञानिक तौर पर हम अपनी अगली पीढ़ी से चर्चा कर सकें तो परिस्थितियों में सुधार हो सकता है।
हमारे समय में या तो अधिकांश लोगों में इस विषय पर चर्चा की ही नहीं जाती थी अथवा पत्नियों को ही भाषण सुनना होता था। कभी-कभी तो घर के हैल्पर्स ही दूसरे घरों की बातें इधर-उधर करते रहते जिससे बिना किसी विशेष कारण के ही अफ़वाहों का बाज़ार गर्म हो जाता था। उन्हें डाँटना ही पड़ता था।
आज की पीढ़ी की महिलाएं फिर भी खुलकर अपने अंतरंग संबंधों पर चर्चा करने लगी है,थोड़ा सोचने पर उन्हें समाधान भी प्राप्त हो ही जाते हैं।
इतने महत्वपूर्ण विषय पर बात करने के लिए आपको हृदय से साधुवाद! ऐसे विषयों पर बात करना क्वालिटी लाइफ़ के लिए आवश्यक है।