हाल ही में तिब्बत समर्थक समूहों के प्रतिनिधि, 7 से 13 मार्च 2026 तक धर्मशाला, भारत में आयोजित विशेष अंतर्राष्ट्रीय तिब्बत समर्थक समूह बैठक में एकत्रित हुए, जिसमें 32 देशों के 100 से अधिक प्रतिभागी शामिल थे और तिब्बती लोगों के स्वतंत्रता, न्याय और उनकी विशिष्ट राष्ट्रीय पहचान के संरक्षण के संघर्ष में उनके साथ एकजुटता से खड़े रहने की अपनी अटूट प्रतिबद्धता में एकजुट होकर, एतद्द्वारा घोषणा करते हैं:
तिब्बती केंद्रीय प्रशासन द्वारा परम पावन 14वें दलाई लामा के 90वें जन्मदिन के उपलक्ष्य में घोषित करुणा के इस शुभ वर्ष में, हम उन्हें हार्दिक शुभकामनाएं देते हैं और उनके दीर्घायु एवं स्वस्थ रहने की कामना करते हैं। हम दलाई लामा संस्था के गहन महत्व को दोहराते हैं, जो सदियों से तिब्बती बौद्ध धर्म का केंद्रीय स्तंभ और तिब्बती सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय पहचान का आधार रही है।
चीन द्वारा तिब्बत पर कम्युनिस्ट आक्रमण और कब्जे के बाद से तिब्बती लोगों को बहुत कष्ट सहना पड़ा है, न केवल उन्होंने अपने देश की स्वतंत्रता खो दी है बल्कि उनकी पहचान, संस्कृति, धर्म और जीवन शैली के विलुप्त होने का भी खतरा मंडरा रहा है। इसके बावजूद, परम पावन 14वें दलाई लामा के नेतृत्व में तिब्बती लोग तिब्बत में अपनी पहचान, संस्कृति, धर्म और जीवन शैली के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
तिब्बत के निर्वाचित नेतृत्व ने तिब्बती स्वतंत्रता और गरिमा की पुनः प्राप्ति के लिए अपने अहिंसक दृष्टिकोण का पालन करना जारी रखा है। धर्मशाला में एकत्रित तिब्बत के समर्थक तिब्बती लोगों के साहस और दृढ़ संकल्प की सराहना करते हैं, उनके संघर्ष के शांतिपूर्ण दृष्टिकोण की प्रशंसा करते हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अंतरराष्ट्रीय संकट से बचने के लिए ऐसे अहिंसक प्रयासों का प्रभावी ढंग से समर्थन करने का आह्वान करते हैं।
हमने तिब्बती धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दे पर, विशेष रूप से तिब्बती बौद्ध धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता के मुद्दे पर, परम पावन 14वें दलाई लामा के 2 जुलाई 2025 के उनके व्यापक वक्तव्य के स्पष्ट मार्गदर्शन का संज्ञान लिया है। हम दलाई लामा की सदियों पुरानी संस्था की निरंतरता की पुष्टि करने और पारंपरिक तिब्बती बौद्ध आध्यात्मिक अधिकारियों के परामर्श से कार्य करते हुए, उनके पुनर्जन्म की पहचान करने का अनन्य अधिकार गादेन फोड्रंग ट्रस्ट को सौंपने के लिए परम पावन के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। हम सर्वसम्मति से परम पावन के वक्तव्यों का समर्थन करते हैं और उन्हें उनके पुनर्जन्म के संबंध में अनन्य और अंतिम प्राधिकारी के रूप में मान्यता देते हैं। इसके अलावा, हम यह दृढ़ता से कहते हैं कि पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (पीआरसी) की सरकार द्वारा इस पवित्र तिब्बती धार्मिक परंपरा में हस्तक्षेप करने का कोई भी प्रयास अंतरराष्ट्रीय मानदंडों और धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का गंभीर उल्लंघन है। हम ऐसे किसी भी हस्तक्षेप का विरोध करने और उसका मुकाबला करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
हम निर्वासित तिब्बतियों की लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की सराहना करते हैं, जिसका उदाहरण निर्वाचित केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) के नेतृत्व में मिलता है। हम सीटीए को तिब्बती लोगों की एकमात्र वैध सरकार के रूप में मान्यता देते हैं और उसका समर्थन करते हैं, जो तिब्बत के अंदर और बाहर दोनों जगह तिब्बतियों की वास्तविक आवाज़ का प्रतिनिधित्व करती है। हम सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और नागरिक समाज से अपील करते हैं कि वे सीटीए को निर्वासित तिब्बती सरकार के रूप में औपचारिक मान्यता दें और उसके साथ उसी रूप में कार्य करें।
भारत तिब्बत संवाद मंच की तरफ से हमारे अध्यक्ष संजय शुक्ला जी ने अपने वक्तव्य में बताया कि किस प्रकार वे अपने साथ युवाओं को भी जोड़ रहे हैं और प्रबुद्ध लोगों को भी जिससे तिब्बत की जो लड़ाई है उसको हम जितने में अवश्य सफल होंगे उन्होंने बताया कि दिल्ली विश्वविद्यालय से महेश तिवारी जी पीएचडी कर रहे हैं बाकी लखनऊ विश्वविद्यालय से शोधार्थी शोध कर रहे हैं।
कार्यक्रम में डॉ मुक्ति शर्मा कश्मीर से, डॉ सोनिया जसरोटिया धर्मशाला केंद्रीय विश्वविद्यालय से, विजेंद्र जी राजस्थान से भारती जी राजस्थान से अपनी टीम के साथ शामिल हुए।
संजय शुक्ला जी ने अपने वक्तव्य में सभी को यह बताया कि ‘पुरवाई पत्रिका’ में – जो कि लंदन से प्रकाशित होती है – तिब्बत की आज़ादी को लेकर एक कविता लिखी गई है जिसका सृजन डॉक्टर मुक्ति शर्मा ने किया है… यह हम सबके लिए प्रेरणा है।
भारतीय संस्कृति का तिब्बत का मुद्दा एक भावुक और संवेदनशील हिस्सा है। कुछ राजनैतिक स्वार्थों ,शैथिल्यता और डरपोक नेतृत्व ने न केवल भारत से इसे छीना वरन इसके निवासियों को सदा के लिए खानाबदोश बना दिया है। ये तो तिब्बती लोगों की आत्मा अभी ज़िंदा है कि उन्होंने अपने मूल यानी भारत का साथ नहीं छोड़ा और व्यावहारिकता पूर्ण लचीला रवैया अपनाते हुए,भारत के जन जन और कण कण में और राजनैतिक परिदृश्य ने नाता बनाए रखा।
सांस्कृतिक हलचल में तिब्बत ,तिब्बती संस्कृति को अपने सक्रिय सदस्या द्वारा कवरेज करवाना पुरवाई की संवेदनशीलता,पत्रकारिता के तकाज़े और भारतीयता को अक्षुण्ण रखने तथा साहित्य संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम् हैं को दर्शाता है।
सार्थक,सारगर्भित रिपोर्टिंग देने हेतु डॉक्टर मुक्ति शर्मा को साधुवाद और पुरवाई पत्रिका का आभार।
धर्मशाला में आयोजित ‘विशेष अंतर्राष्ट्रीय तिब्बत समर्थक समूह’ की यह बैठक केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक दमित सभ्यता की पुकार और उसके अस्तित्व की रक्षा के लिए संकल्पित विश्व समुदाय का साझा मंच है। जिस प्रकार यहां 32 देशों के 100 से अधिक प्रतिभागियों की एकजुटता को रेखांकित किया गया है, वह तिब्बत के स्वतंत्रता संघर्ष और उनकी विशिष्ट राष्ट्रीय पहचान के प्रति ‘पुरवाई’ की गहरी संवेदनशीलता को दर्शाता है।
समाचार में परम पावन 14वें दलाई लामा के 90वें जन्मदिन के उपलक्ष्य में ‘करुणा वर्ष’ की घोषणा का उल्लेख करना अत्यंत सुखद है। बहुत स्पष्टता से यह संदेश प्रसारित किया हुआ है कि दलाई लामा की संस्था केवल एक पद नहीं, बल्कि तिब्बती बौद्ध धर्म का केंद्रीय स्तंभ और उनकी सांस्कृतिक अस्मिता का आधार है। चीन के आक्रमण और कब्जे के बाद जिस तरह से तिब्बती लोगों ने अपनी पहचान खोने का कष्ट सहा है, उसके विरुद्ध उनके अहिंसक दृष्टिकोण की सराहना करना अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक जागृति का कार्य करता है।
विशेष रूप से, दलाई लामा के पुनर्जन्म की मान्यता और गादेन फोड्रंग ट्रस्ट के अनन्य अधिकार के मुद्दे पर यह रिपोर्टिंग अत्यंत महत्वपूर्ण है। पीआरसी (चीन) के हस्तक्षेप को अंतरराष्ट्रीय मानदंडों और धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन बताना एक साहसिक और न्यायसंगत पक्ष है। यह समाचार स्पष्ट करता है कि तिब्बती धार्मिक परंपराओं में किसी भी बाहरी राजनीतिक सत्ता का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं हो सकता।
भारत तिब्बत संवाद मंच के माध्यम से युवाओं और शोधार्थियों को इस मुहिम से जोड़ना इस संघर्ष को एक बौद्धिक और भविष्योन्मुखी धरातल प्रदान करता है। दिल्ली और लखनऊ विश्वविद्यालय के शोधार्थियों का इस कार्य में संलग्न होना यह दर्शाता है कि यह लड़ाई केवल पुरानी पीढ़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी भी इस न्यायपूर्ण मांग के साथ खड़ी है। डॉ. मुक्ति शर्मा की कविता का ‘पुरवाई’ में प्रकाशित होना और उसे इस बैठक में प्रेरणा के रूप में उद्धृत किया जाना यह सिद्ध करता है कि साहित्य किस प्रकार राजनीतिक और मानवीय आंदोलनों को धार देता है।
यह समाचार न केवल तिब्बत के संघर्ष को वैश्विक समर्थन दिलाता है, बल्कि पत्रकारिता के उस ऊंचे मानदंड को भी स्थापित करता है जहाँ मानवीय मूल्यों और सांस्कृतिक स्वायत्तता के पक्ष में मुखर होकर खड़ा होना अनिवार्य होता है। जिस सूक्ष्मता से इस बैठक के हर बिंदु और क्षेत्रीय प्रतिनिधियों के योगदान को यहां प्रस्तुत किया गया है, वह पाठकों के मन में तिब्बत के प्रति एक भावुक और वैचारिक जुड़ाव पैदा करता है।
भारतीय संस्कृति का तिब्बत का मुद्दा एक भावुक और संवेदनशील हिस्सा है। कुछ राजनैतिक स्वार्थों ,शैथिल्यता और डरपोक नेतृत्व ने न केवल भारत से इसे छीना वरन इसके निवासियों को सदा के लिए खानाबदोश बना दिया है। ये तो तिब्बती लोगों की आत्मा अभी ज़िंदा है कि उन्होंने अपने मूल यानी भारत का साथ नहीं छोड़ा और व्यावहारिकता पूर्ण लचीला रवैया अपनाते हुए,भारत के जन जन और कण कण में और राजनैतिक परिदृश्य ने नाता बनाए रखा।
सांस्कृतिक हलचल में तिब्बत ,तिब्बती संस्कृति को अपने सक्रिय सदस्या द्वारा कवरेज करवाना पुरवाई की संवेदनशीलता,पत्रकारिता के तकाज़े और भारतीयता को अक्षुण्ण रखने तथा साहित्य संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम् हैं को दर्शाता है।
सार्थक,सारगर्भित रिपोर्टिंग देने हेतु डॉक्टर मुक्ति शर्मा को साधुवाद और पुरवाई पत्रिका का आभार।
बहुत बहुत आभार,
तिब्बत की आजादी हम सब का सपना है, इसमें भारतीय एवं विदेशी लोग भी शामिल हैं। बहुत मेहनत कर रहे हैं।
धर्मशाला में आयोजित ‘विशेष अंतर्राष्ट्रीय तिब्बत समर्थक समूह’ की यह बैठक केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक दमित सभ्यता की पुकार और उसके अस्तित्व की रक्षा के लिए संकल्पित विश्व समुदाय का साझा मंच है। जिस प्रकार यहां 32 देशों के 100 से अधिक प्रतिभागियों की एकजुटता को रेखांकित किया गया है, वह तिब्बत के स्वतंत्रता संघर्ष और उनकी विशिष्ट राष्ट्रीय पहचान के प्रति ‘पुरवाई’ की गहरी संवेदनशीलता को दर्शाता है।
समाचार में परम पावन 14वें दलाई लामा के 90वें जन्मदिन के उपलक्ष्य में ‘करुणा वर्ष’ की घोषणा का उल्लेख करना अत्यंत सुखद है। बहुत स्पष्टता से यह संदेश प्रसारित किया हुआ है कि दलाई लामा की संस्था केवल एक पद नहीं, बल्कि तिब्बती बौद्ध धर्म का केंद्रीय स्तंभ और उनकी सांस्कृतिक अस्मिता का आधार है। चीन के आक्रमण और कब्जे के बाद जिस तरह से तिब्बती लोगों ने अपनी पहचान खोने का कष्ट सहा है, उसके विरुद्ध उनके अहिंसक दृष्टिकोण की सराहना करना अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक जागृति का कार्य करता है।
विशेष रूप से, दलाई लामा के पुनर्जन्म की मान्यता और गादेन फोड्रंग ट्रस्ट के अनन्य अधिकार के मुद्दे पर यह रिपोर्टिंग अत्यंत महत्वपूर्ण है। पीआरसी (चीन) के हस्तक्षेप को अंतरराष्ट्रीय मानदंडों और धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन बताना एक साहसिक और न्यायसंगत पक्ष है। यह समाचार स्पष्ट करता है कि तिब्बती धार्मिक परंपराओं में किसी भी बाहरी राजनीतिक सत्ता का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं हो सकता।
भारत तिब्बत संवाद मंच के माध्यम से युवाओं और शोधार्थियों को इस मुहिम से जोड़ना इस संघर्ष को एक बौद्धिक और भविष्योन्मुखी धरातल प्रदान करता है। दिल्ली और लखनऊ विश्वविद्यालय के शोधार्थियों का इस कार्य में संलग्न होना यह दर्शाता है कि यह लड़ाई केवल पुरानी पीढ़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी भी इस न्यायपूर्ण मांग के साथ खड़ी है। डॉ. मुक्ति शर्मा की कविता का ‘पुरवाई’ में प्रकाशित होना और उसे इस बैठक में प्रेरणा के रूप में उद्धृत किया जाना यह सिद्ध करता है कि साहित्य किस प्रकार राजनीतिक और मानवीय आंदोलनों को धार देता है।
यह समाचार न केवल तिब्बत के संघर्ष को वैश्विक समर्थन दिलाता है, बल्कि पत्रकारिता के उस ऊंचे मानदंड को भी स्थापित करता है जहाँ मानवीय मूल्यों और सांस्कृतिक स्वायत्तता के पक्ष में मुखर होकर खड़ा होना अनिवार्य होता है। जिस सूक्ष्मता से इस बैठक के हर बिंदु और क्षेत्रीय प्रतिनिधियों के योगदान को यहां प्रस्तुत किया गया है, वह पाठकों के मन में तिब्बत के प्रति एक भावुक और वैचारिक जुड़ाव पैदा करता है।
इतनी सुंदर एवं ज्ञानवर्धक टिप्पणी के लिए हृदय से आभार।