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आपका ज्ञान ही आपका परम मित्र है और अज्ञान परम शत्रु!
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नवीनता और आधुनिकता का स्वागत करो। नया विचार, नया ज्ञान जड़ता को तोड़ता है और मानसिक जागरूकता देता है।
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सबके ज्ञान की सीमाएँ होती हैं, पर मूर्खताएँ और अज्ञान सीमाहीन होते हैं। ज्ञान मनुष्य को ऊँचाइयों तक ले जाता है, जबकि अज्ञान अनंत गहराइयों में गिरा देता है।
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भाग्य हमको मिलता है, सौभाग्य की हम रचना करते हैं।
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सारा मनुष्य-जीवन एक लेन-देन है – ईश्वर के साथ, प्रकृति के साथ, समाज के साथ और स्वयं अपने साथ भी। लेन-देन अगर शुभ है, मंगलकारी है, सार्थक है तो आपका जीवन सफल, सुखमय और समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा।
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किसी भी विद्यार्थी द्वारा समय की बर्बादी का एक ही अर्थ होता है और इसकी एक ही व्याख्या है – स्वयं अपना ही शत्रु बनकर मूर्ख बने रहना और अपने ही संगी-साथियों से पिछड़ जाना।
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जिन घरों में औलादें निकम्मी निकलती हैं, उनकी पैतृक सम्पत्ति बिक जाया करती है।
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अपनी मानसिक शक्तियों की असीम-अपार शक्ति को पहचानो और समझो! एक प्रकृति को छोड़कर सारे संसार की सभ्यताओं, अर्थव्यवस्थाओं का निर्माण और सम्पूर्ण वैज्ञानिक विकास का आधार केवल और केवल मनुष्य की मानसिक शक्तियों की देन है।
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इतिहास भी एक शिक्षक है। इतिहास बीती घटनाओं-दुर्घटनाओं का विवरण मात्र नहीं होता। इतिहास वह विश्वविद्यालय है, जहां मनुष्य अपने वर्तमान के साथ-साथ भविष्य का जीवन जीने का पाठ सीखता है।
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विचार से बनता है ज्ञान… ज्ञान से बनता है कर्म और कर्मों से बनता है जीवन। यह एक मानसिक प्रक्रिया है जो सारे संसार में आदिकाल से है। ज्ञान का सृजन कर्ता विचार है। विचार ही भावना, कल्पना और भाषा-शैली का नियंत्रक है। विचार और कर्म ज्ञान का आधार हैं।
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किसी भी देश और संस्कृति की आत्मा उसका साहित्य होता है। कविता हो, कहानी हो, नाटक हो या निबंध आदि – साहित्य का प्रथम सर्वोपरि कर्तव्य है पाठक के जीवन की समझ को समृद्ध करना। साहित्य विवेकशीलता, मानवता-वादिता, उत्तरदायित्व की भावनाओं का समुचित विकास करता है। पाठक के मन पर साहित्य का प्रभाव अति सूक्ष्म और परिवर्तनकारी होता है।
- हरनेक! समझो !! जानो और पहचानो !! क्या होता है कल आज और कल। मेरे भाई ! जल ही बनता है बादल, और फिर बादल ही बन जाता जल ।।


डॉ हरनेक सिंह गिल जी ने ‘ज्ञान की पूंजी ‘ में जीवन के विविध आयामों पर 12 सूत्रों की रचना की है। ये जीवन सूत्र मानव को ऊपर उठाने के लिए बहुत उपयोगी है। जीवन के हर पक्ष को इसमें समाहित कर दिया है। कहीं कुछ भी तो नहीं छोड़ा है। शुरुआती सूत्रों में आपने मानव को एक तरह से फटकार लगाई है कि ज्ञान परम मित्र है और अज्ञान परम शत्रु। वहीं आप नवीनता और आधुनिकता के पक्षधर हैं तो वहीं आप मनुष्य को अपने सौभाग्य का निर्माता भी कहकर कर्म के प्रति सचेत करते हैं। घर परिवार, इतिहास के साथ मानसिक लोक की भी इसमें बात कही गई है। इन जीवन सूत्रों में विद्यार्थियों के लिए भी बहुत कुछ है। साहित्य की बात आपने सबसे अंत में कही है। इसका बहुत गहरा मतलब है। साहित्य इन सभी सूत्रों का कर्ताधर्ता जो है। साहित्य संवेदना के साथ उन सबकी रक्षा करने वाला है।
हरनेक सिंह गिल जी आपके ये सूत्र संग्रह करने योग्य है। लोगों द्वारा जरूर इन्हें पढ़ा जाएगा। बहुत-बहुत बधाई आपको।
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ।एक एक पंक्ति को अपने जीवन में उतारने की कोशिश करें
आपका ज्ञान ही आपका परम मित्र है और अज्ञान परम शत्रु!
बाह बाह
भाई ! लखनलाल पालजी !! आपकी टिप्पणी मेरे लिए मां सरस्वती का स्नेहभरा आशीर्वाद है। बी.ए.और एम.ए. हिंदी के विद्यार्थी, मेरे इन विचारों को बहुत पसंद करते थे। मैं अक्सर कक्षा में विचारात्मक वाक्यों का बहुत प्रयोग करता था। विचार की शक्ति संकल्प बनकर , जब कर्म में ढलती है तो परिवर्तनकारी बन जाती है। हमारे व्यक्तित्व विकास में विचार ही सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं। रिटायरमेंट के बाद अब मैं ‘ मानसिक शक्तियां और सृजनात्मक हिंदी लेखन ‘ विषय पर लेक्चर देता हूं , जिसमें विचारों के महत्व को ही बताता हूं। बंधुवर ! आपकी इस टिप्पणी को मैं संजो कर रखूंगा। इन विचारों की संकलनकर्ता मेरे कॉलेज की ही एक प्रोफेसर हैं ,उन्होंने इस स्तंभ में अपना नाम नहीं दिया है, उनका और आपका हार्दिक आभार !!
आदरणीय हरनेक सिंह गिल सर आपके लिखे 12 सूत्र जीवन के हर उम्र के स्वर्णिम सूत्र हैं
जरूरी नहीं हर कार्य प्रैक्टिकल करके सीखा जाय ,कुछ ज्ञान हमे देखने सुनने ,पढ़ने लिखने ,ओर अनुभवी लोगो की बाते अनुसरण करने से भी प्राप्त करना चाहिए
निःसंदेह आपके लिखे ये स्वर्णिम वाक्य मात्र उपदेश नहीं दीर्घ जीवन के अनुभवों से गुजरने के बाद ,मंजिल की आसान राहें पगडंडियां हैं ,जो चलेगा ,निश्चित वो अपनी मंजिल पर अग्रसर होगा।
आपके इन उत्कृष्ट सूत्रों को साझा करने लिए साधुवाद
मंजिलों को पाने के लिए पथ प्रदर्शक अत्यंत जरूरी होते हे
————- आदरणीय कुंतीजी ! आपकी इस टिप्पणी से मेरा जीवन-अनुभव सार्थक और समृद्ध हुआ है। मैं आपका हृदय से आभारी हूँ।… मेरे कॉलेज की ही एक प्रोफेसर ने इन विचारों को संकलित करके , पुरवाई मैगजीन में प्रकाशनार्थ भेज दिया। इन विचारों का , मैं अपने यूनिवर्सिटी लेक्चरों में बहुत प्रयोग करता था। मैं मानता हूं कि विचार मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। इस शक्ति के सदुपयोग से ही मनुष्य जंगल छोड़ आया है और उसने सारी सभ्यताओं का निर्माण किया है। पर्याप्त विचार शक्ति के अभाव में ही सारे जीव-जंतु आज भी जंगल में कष्टपूर्ण जीवन जी रहे हैं। ज्ञान-विज्ञान का मूल आधार मनुष्य की विचार शक्ति ही है। मेरे अनेक विद्यार्थी आज भी इन विचारों को अपने-अपने कार्यक्षेत्र में उद्धृत करते हैं। आपका हार्दिक धन्यवाद ! आपने मेरे विचारों के महत्व को समझा !!….मेरे कर्म को मान-सम्मान दिया !!
————- आदरणीय कुंतीजी ! आपकी इस टिप्पणी से मेरा जीवन-अनुभव सार्थक और समृद्ध हुआ है। मैं आपका हृदय से आभारी हूँ।… मेरे कॉलेज की ही एक प्रोफेसर ने इन विचारों को संकलित करके , पुरवाई मैगजीन में प्रकाशनार्थ भेज दिया। इन विचारों का , मैं अपने यूनिवर्सिटी लेक्चरों में बहुत प्रयोग करता था। मैं मानता हूं कि विचार मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। इस शक्ति के सदुपयोग से ही मनुष्य जंगल छोड़ आया है और उसने सारी सभ्यताओं का निर्माण किया है। पर्याप्त विचार शक्ति के अभाव में ही सारे जीव-जंतु आज भी जंगल में कष्टपूर्ण जीवन जी रहे हैं। ज्ञान-विज्ञान का मूल आधार मनुष्य की विचार शक्ति ही है। मेरे अनेक विद्यार्थी आज भी इन विचारों को अपने-अपने कार्यक्षेत्र में उद्धृत करते हैं। आपका हार्दिक धन्यवाद ! आपने मेरे विचारों के महत्व को समझा !!….मेरे कर्म को मान-सम्मान दिया !!
गिल सर श्री गुरु नानक देव खालसा कॉलेज के बहुत ही प्रिय, आदरणीय ,प्राध्यापक रहे हैं आज भी हम कॉलेज में अक्सर उन्हें याद करते हैं । मानसिक शक्तियां और सृजनात्मक हिंदी लेखन पर वक्तव्य देने सर अक्सर विभिन्न कॉलेजों में जाते हैं जिससे सभी विद्यार्थी लाभान्वित होते हैं। मां सरस्वती की कृपा हमेशा आप पर बनी रहे।
आज आपको पढ़कर आश्चर्य हुआ कि अचानक क्योंकर आपको ज्ञान और अज्ञान के अंतर को स्पष्ट करने की आवश्यकता पड़ी होगी? पर पढ़ कर अच्छा लगा।
ज्ञान और अज्ञान दोनों ही एक दूसरे के विलोम है। ज्ञान प्रकाश है तोअज्ञान अंधकार, जो अंतर दिन और रात में है वही अंतर ज्ञान और अज्ञान में है। ज्ञान मित्र है और अज्ञानता शत्रु। इसे पढ़ते ही एक कहावत याद आ गई- “मूर्खों की दोस्ती ,जी का जंजाल।” अज्ञानता इस तरह की मूर्खता है जो सबके लिए मुश्किल पैदा कर सकती है।
समय की बर्बादी वाली बात सिर्फ विद्यार्थियों के लिए ही नहीं बल्कि सभी के लिए ध्यान देने योग्य है किस समय जो चला जाता है वह कभी नहीं आता इसलिए समय बर्बाद नहीं करना चाहिए वक्त की कीमत करना चाहिये।
लेकिन सिर्फ पढ़ना और ज्ञान प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं होता है उसमें दुनियादारी का सम्मिश्रण होना भी जरूरी है। प्रैक्टिकल होना भी जरूरी है। यह ध्यान देना जरूरी है कि हमारे चारों तरफ हो क्या रहा है? उसमें से क्या है ऐसा जो हमें लेना है? और क्या है ऐसा जिससे छोड़ना है? क्या है ऐसा जिससे बचना है।
पहले के लोग ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं होते थे लेकिन फिर भी वैचारिकता के कारण भी दुनियादारी को बेहतर समझते थे।
हमने बचपन में नंदन पत्रिका में घनश्याम दास बिड़ला के बारे में काफी पढ़ा था की बहुत परोपकारी थी दानी थे ठंड के दिनों में सुबह घूमने जाते हुए बहुत सारे कंबल लेकर जाते थे और फुटपाथ पर सोए हुए गरीबों को चुपचाप उढ़ा दिया करते थे। तभी यह भी पढ़ा था कि शायद उन्होंने स्कूली पढ़ाई नहीं की है, थोड़ा बहुत गणित और थोड़ी बहुत हिंदी सीखी हुई है। पर उन्होंने बड़ा बिजनेस किया।
ज्ञान तो जरूरी है ही पर जो ज्ञान पढ़कर ,सुनकर या देखकर लिया जाता है; उस ज्ञान को व्यवहार में किस तरह लाना चाहिए यह ज्यादा जरूरी है।ऐसा हम सोचते हैं।
इस विषय पर संस्कृत में एक बहुत अच्छी कहानी काफी पहले स्कूलों में चला करती थी। पर कहानी को रहने देते हैं।
इसे पढ़ कर सोचने वाली बात यह है कि समय की कीमत करें, सभी। बहुत अधिक पढ़ें और जो पढ़े उसे गुने भी।
सच पूछा जाए तो जो विषय आपने शुरू किया है,उस पर अगर बात हो तो कभी खत्म ही ना हो।
मुख्य रूप से अगर कहा जाए तो ज्ञान वास्तव में विवेक है। ज्ञान से वही जागृत होता है। वही बताता है कि क्या सही है, क्या गलत है? क्या अच्छा है, क्या बुरा है? क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए? क्या होना चाहिए ,क्या नहीं होना चाहिए? बस हम सब विवेकी ही बन सके तो ज्ञान का सही उपयोग हो सकेगा।
और हम सब सही को, अच्छे को, क्या करना है, इसे समझ पाएँ तो बेहतर और अच्छा ही होगा।
अच्छा लिखा आपने-
हर(व्यक्ति)नेक बन सके हरनेक जी!
आप सबका हृदय से आभार !!