भारतीय जनता पार्टी वाली सरकारों के गृह मंत्रियों को बहुत शौक़ रहा है कि उन्हें सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसा गृहमंत्री समझा जाए। मगर सरदार पटेल जैसा बन पाना आसान काम नहीं है। उन जैसी सोच और दूरदृष्टि वाला व्यक्तित्व सदियों में एक पैदा होता है। यह सच है कि यदि सरदार पटेल होते, तो मणिपुर और पश्चिम बंगाल की समस्या को कब का सुलझा चुके होते। पंडित नेहरू ने उनसे कश्मीर का मामला अपने हाथ में लिया, तो हम आज तक भुगत रहे हैं।
पश्चिमी देशों में एक मुहावरा बहुत प्रचलित है कि – सीज़र की पत्नी को संदेह से ऊपर होना चाहिए… दरअसल जूलियस सीज़र की पत्नी पर आरोप लगा था कि उसका किसी के साथ विवाहेतर संबंध है। सीज़र जानता था कि उसकी पत्नी निर्दोष है, मगर उसने फिर भी अपनी पत्नी को तलाक दे दिया। सीज़र का कहना था कि उसकी पत्नी का संदेह के दायरे से ऊपर होना आवश्यक है।
भारत के संदर्भ में भगवान श्री राम का उदाहरण लिया जा सकता है। माँ सीता पर एक धोबी ने आरोप लगाया था कि वे रावण के यहाँ रहीं, इससे उनके चरित्र पर सवाल उठता है। सीज़र ने वही किया, जो भगवान श्रीराम ने अपनी पत्नी के साथ किया था। श्रीराम ने लोकमत का सम्मान करते हुए अपनी पत्नी का त्याग कर दिया और उन्हें बनवास भेज दिया।
राजनीतिक या सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत लोगों पर इस दृष्टांत का अर्थ होगा कि – प्रमुख या सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों को अनुचित कृत्य के आभास से भी बचना चाहिए। गुजरात दंगों के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को ‘राजधर्म’ के पालन की सलाह दी थी। आज यही सलाह पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को देने का समय है।
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद ज़िले की जनसंख्या में मुसलमान बाहुल्य है। वहाँ की कुल आबादी में लगभग 70% मुसलमान हैं। यह इलाक़ा तृणमूल कांग्रेस (टी.एम.सी.) का गढ़ है। ममता बनर्जी अपने राजनीतिक वजूद को बनाए रखने के लिए इस वोट बैंक पर आश्रित हैं। इसलिए जब कभी वहाँ हिंसा भड़कती है, ममता बनर्जी की सरकार हमेशा अपने वोट बैंक के साथ खड़ी दिखाई देती है।
पिछले दिनों जब पश्चिम बंगाल में कोलकाता के आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज में एक ट्रेनी डॉक्टर से हुई दरिंदगी ने हर किसी को हिलाकर रख दिया था। लेडी डॉक्टर से पहले रेप किया गया, फिर उसकी बेरहमी से हत्या कर दी गई। मगर उस समय भी ममता बनर्जी का व्यवहार कुछ ऐसा था कि वह रेप पीड़िता के परिवार के साथ खड़ी नहीं दिखाई दे रही थीं, बल्कि अपराधियों को बचाने का आभास करा रही थीं। इस काण्ड के बाद भी पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू करने की माँग खड़ी हुई थी, और अब मुर्शिदाबाद हिंसा के समय भी यह माँग एक बार फिर खड़ी हो रही है। मगर ऐसा प्रतीत नहीं होता कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में इतना दम है कि वह ममता बनर्जी की सरकार भंग करके पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू कर सके।
भारतीय जनता पार्टी वाली सरकारों के गृह मंत्रियों को बहुत शौक़ रहा है कि उन्हें सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसा गृहमंत्री समझा जाए। मगर सरदार पटेल जैसा बन पाना आसान काम नहीं है। उन जैसी सोच और दूरदृष्टि वाला व्यक्तित्व सदियों में एक पैदा होता है। यह सच है कि यदि सरदार पटेल होते, तो मणिपुर और पश्चिम बंगाल की समस्या को कब का सुलझा चुके होते। पंडित नेहरू ने उनसे कश्मीर का मामला अपने हाथ में लिया, तो हम आज तक भुगत रहे हैं।
भारत में पहली बार धारा 356 का इस्तेमाल करते हुए वर्ष 1951 में प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा पंजाब में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था। यह स्थिति कांग्रेस पार्टी में फूट के कारण उत्पन्न हुई थी। उसके बाद लगभग 132 बार भिन्न राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया गया। जहाँ एक कारण तो राज्यों में सरकारों का बहुमत खो देना था, वहीं कुछ ऐसे भी मौके थे, जब केन्द्रीय सरकार में बदलाव के कारण राज्यों की सरकारें बरख़ास्त कर दी गईं।
कुल मिला कर कांग्रेस के शासन काल में 88 बार धारा 356 का इस्तेमाल किया गया। इनमें पंडित जवाहर लाल नेहरू (7 – बार), लाल बहादुर शास्त्री (1 – बार), इंदिरा गांधी (51 – बार), राजीव गांधी (6 – बार), पी. वी. नरसिम्हा राव (11 – बार), मनमोहन सिंह (12 – बार) शामिल हैं। वहीं मोरार जी देसाई ने अपने दो वर्षीय शासन काल में (17 – बार); चौधरी चरण सिंह ने 6 महीने के शासन काल में 4 बार; चंद्रशेखर ने 5 बार; वी.पी. सिंह ने 2 बार; एच.डी. देवगौड़ा ने 1 बार; अटल बिहारी वाजपेयी ने 5 बार; और नरेन्द्र मोदी ने 10 बार राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया। कांग्रेस के 88 बार धारा 356 के इस्तेमाल से संविधान ख़तरे में नहीं आया।
मुर्शिदाबाद की हिंसा के मामले की जड़ में है वक़्फ़ कानून में बदलाव। अभी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बिल पर हस्ताक्षर भी नहीं किए थे, कि एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने अधिनियम को इस आधार पर चुनौती दे दी कि यह संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत वक़्फ़ को दी गई सुरक्षा को ख़त्म कर देता है। ममता बनर्जी ने केन्द्र सरकार को चुनौती देते हुए साफ लफ्ज़ों में कह दिया कि वे इसे पश्चिम बंगाल में लागू नहीं होने देंगी।
मुर्शिदाबाद में हिन्दुओं की हत्या के बाद ममता बनर्जी ने वहाँ जाना उचित नहीं समझा। उन्हें हिन्दू परिवारों के पलायन से कोई समस्या नहीं हो रही थी। उनके एक मंत्री ने तो बेहूदगी की हद कर दी, जब उसने कहा कि हिन्दू बंगाल में ही तो पलायन कर रहे हैं। किसी दूसरे प्रदेश में तो नहीं जा रहे हैं।
दरअसल, बुधवार को ममता बनर्जी ने इमामों और मौलवियों के साथ एक सभा करना अधिक उचित समझा। इस सभा में उन्होंने कहा, कि मुर्शिदाबाद में हुआ दंगा पूर्वनियोजित था। इसमें भाजपा, बी.एस.एफ़. और सेंट्रल एजेंसीज की मिलीभगत थी। बांग्लादेशी घुसपैठियों को देश में बुलाकर ये दंगे करवाए गए। साथ ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर हमला करते हुए कहा, कि यूपी के सीएम योगी बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। वे सबसे बड़े भोगी हैं।
पूर्व फ़िल्म स्टार और भाजपा के नेता मिथुन चक्रवर्ती ने ममता बनर्जी पर कड़ा प्रहार किया है। मिथुन चक्रवर्ती ने कहा, कि ममता बनर्जी बंगाली हिंदुओं के लिए ख़तरा बन चुकी हैं। बंगाली हिंदू बेघर हैं, राहत शिविरों में खिचड़ी खाने को मजबूर हैं। उनका दोष क्या है! साथ ही उन्होंने कहा, कि राज्य में भाजपा नहीं, ममता बनर्जी ने सांप्रदायिक तनाव बढ़ाया है। वे समुदायों के बीच अशांति पैदा कर रही हैं।
ममता बनर्जी के आरोपों के जवाब में बीएसएफ़ के एक अधिकारी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि – घुसपैठ कराकर हिंसा कराने की बात गलत है। बांग्लादेश बॉर्डर से कोई घुसपैठ नहीं हुई है। इधर पश्चिम बंगाल पुलिस ने मुर्शिदाबाद हिंसा की जाँच के लिए स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम (SIT) का गठन कर दिया है। टीम में नौ अधिकारी होंगे। मुर्शिदाबाद रेंज के डीआईजी को टीम की कमान सौंपी गई है।
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री सीवी आनन्द बोस ने फ़ैसला किया है कि वे हिंसाग्रस्त क्षेत्र का दौरा करेंगे और उन हिन्दू परिवारों से मिलने के बाद केन्द्र सरकार को हिंसा की वारदातों पर रिपोर्ट पेश करेंगे। ममता बनर्जी ने उन्हें अपना प्रस्तावित दौरा स्थगित करने के लिए कहा है। ममता के अनुसार हालात बेहतरी की ओर बढ़ रहे हैं।
थोड़ी हैरान करने वाली बात यह है कि वक़्फ़ मामले में सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और राजीव धवन जैसे महँगे और राजनीति में सक्रिय वकील याचिकाकर्ताओं के लिये बहस कर रहे हैं। क्या ये इन तीनों का वक़्फ़ (दान) है या फिर ये कोई तगड़ी फ़ीस मारने के चक्कर में हैं।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने मुर्शिदाबाद में हो रही हिंसा पर चिन्ता व्यक्त की है। उनका कहना है कि जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है, तो हिंसा के लिये कोई स्थान कैसे हो सकता है। वे तो तीन बिन्दुओं पर स्टे-ऑर्डर लिखवाने ही वाले थे, जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार की बात भी सुनी जानी चाहिए। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने अपना ऑर्डर रोक लिया और सॉलिसिटर जनरल को एक सप्ताह का समय दे दिया।
सोचने वाली बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना के दिमाग़ में क्या चल रहा है। वे सेवानिवृत्त होने के कगार पर हैं। क्या वे रिटायरमेंट के बाद किसी बढ़िया पोस्ट का सपना देख रहे हैं या फिर शहीदों की सूची में अपना नाम लिखवाकर अमर होने के चक्कर में हैं। शायद 5 मई को जब सुनवाई पूरी होगी तो इस बात का संकेत भी मिल जाएगा।
इस बार का संपादकीय – ‘सीज़र की पत्नी को संदेह से ऊपर होना चाहिए ‘ में पश्चिम बंगाल में हो रही हिंसक घटनाओं पर केन्द्रित है। वक्फ बिल के विरोध में की गई हिंसा निंदनीय है। लोग घर बार छोड़कर पलायन करने को मजबूर हो गए हैं। अब उनका कहीं ठौर ठिकाना नहीं है। वहां की मुख्यमंत्री वोट की खातिर उपद्रवियों से बहुत नरमी से पेश आ रही है। वोट वोट खेलने से तो समस्या और बढ़ती जाएगी। अगर ऐसी ही स्थिति रही तो वहां अन्य कोई न बचेगा। 70% वालों का ही बोलबाला रहेगा। अब 30% कहां जाएंगे? ऐसा भी हो सकता है कि 70+30 होकर पूर्ण बहुमत में हो जाएं। कुछ भी हो सकता है। लोग कहां तक मरेंगे। जिंदा रहने के लिए वे कुछ भी करेंगे। केन्द्र में बैठी सरकार भी कुछ नहीं कर पा रही है। वक्फ बिल पारित होना सही है या गलत है इस पर तो सरकारें और अदालतें लगी हुई हैं। हम इस पर क्या कहें।
मेरे हिसाब से आदमियों की हत्या करना घोर पाप है। इसे सभ्य समाज में उचित नहीं ठहराया जा सकता है।
खैर सरकारों से तो आशा नहीं है कि वे कुछ कर पाएंगे। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप में ही अपने आपको चमकाते रहेंगे।
तेजेन्द्र सर जी ने इस संपादकीय में श्रीराम और जूलियस सीजर का उदाहरण देकर राजनेताओं के सामने एक आदर्श रख दिया है। मुझे नहीं लगता है कि आज की राजनीति में खासकर भारतीय राजनीति में ये आदर्श प्रासंगिक रह गए हैं। वोट की खातिर नेता लोग इन आदर्शों के विरुद्ध हठपूर्वक आचरण करते हैं। यही हाल सारी पार्टियों का है।
आज जो नेता कूटनीतिक चालों में जितने चतुर है वही यहां शासन कर सकते हैं। इसके लिए भले ही कुछ इंसान मारकाट दिए जाएं उन्हें जरा सा भी फर्क नहीं पड़ता है। फर्क आम आदमी को पड़ता है। वे आम-आदमी भुक्तभोगी हों या भविष्य को आशंकित दृष्टि से देखने वाले आम शहरी हों, सभी पर फर्क पड़ता दिख रहा है।
फिलहाल अभी तो लोग हाय-तौबा मचा रहे हैं, लेकिन कुछ दिन बाद सब शांत हो जाएगा।
यह संपादकीय जितना आज प्रासंगिक है उतना आगे भी रहने वाला है। मैं निजी तौर पर बिलकुल नहीं चाहता हूं कि यह संपादकीय आगे प्रासंगिक रहे। हम तो बस यही दुआ कर सकते हैं कि सभी आपस में मिलजुलकर रहें। कोई किसी के दुख का भागीदार न रहे।
समसामयिक विषय को लेकर लिखी गई संपादकीय टीस देने वाली है। लेकिन सच से मुंह भी तो नहीं मोड़ा जा सकता है।
भाई लखनलाल पाल जी, हर सभ्यता में एक ऐसा काल अवश्य था जब सत्ता में बैठे लोगों को संदेह से ऊपर होना आवश्यक था। जो हालात बंगाल में इस समय चल रहे हैं, वो सचमुच में डरावने हैं।
आज की संपादकीय भी सामयिक समस्यि पर आधारित है और भूमिका भी एकदम सटीक है क्योंकि इसकी जड़ें तो आज़ादी के समय से ही जुड़ी हुई हैं। एक सत्तारूढ़ दल को छोड़कर कोई अन्य दल इन समस्याओं के विषय में मुंह में दही जमाये रहे हैं।
बंगाल में यह पहला मामला नहीं है, ये तो एक मानसिकता है जो कभी बदल ही नहीं सकती है। ममता बनर्जी भी तमिलनाडु की तरह बंगाल की जननी बनी रहेंगी। न्याय जैसी चीज के प्रति उनकी राय क्या है?
कर मेडिकल कॉलेज वाले कांड के साथ जो हुआ , वही मुर्शिदाबाद मामले में होने वाला है। अगर सत्ता में आने के सपने के साथ केन्द्र चल रहा है तो कहीं केंद्र की जड़ों में विष तो नहीं बो रहे हैं। अब न्याय जैसी व्यवस्था विश्वसनीय नहीं रह गई है क्योंकि पता नहीं किस न्यायाधीश की जबान फिसल जाये और वे अनर्थ को सार्थक का जामा न पहना दें।
रेखा जी, आपकी टिप्पणी सच में संपादकीय को समझने में सहायक है। हार्दिक धन्यवाद।
नमस्कार
सम्पादकीय सामयिक और प्रासंगिक है ।
परिवर्तन को दौर में जाने कब क्या हो अनिश्चितता का समय है ।
Dr Prabha mishra
धन्यवाद प्रभा जी।
अत्यंत दुखद स्थिति!
जी हरिहर भाई।
Superb भ्राता श्री शानदार
साधुवाद
हार्दिक आभार, कपिल भाई।
वाह जी क्या कहें …आपने तो राजनीति की और न ही परिवारिक परिवेश की संपादकीय को एक अलग ही तरीके से.और बिना कुछ बोले सभी को कटघरे में समेट लिया है वाह बहुत कठिन विषय पर है … और बहुत ही सोचनीय विषय के साथ बहुत ही आभार तेजेन्द्र जी
हार्दिक आभार आदरणीय मधु जी।
समझ में नहीं आ रहा है कि बंगाल में जब वक़्फ़ क़ानून के विरोध में आंदोलन हो रहा है तो हिंदू क्यों मारे जा रहे हैं और पलायन करने को मजबूर हैं, एक बड़ा सवाल। केंद्र सरकार या भाजपा का कोई प्रतिनिधि दल जायज़ा लेने क्यों नहीं गया गृहमंत्रालय भी चुप है जबकि वहाँ से पुलिस की रिपोर्ट पहुँच चुकी है जिसमें चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं। VHP के अलावा मिथुन दा ने भी राष्ट्रपति शासन की माँग कर दी है। राज्यपाल, NHRC और NCW के अध्यक्ष का दौरा भी हो गया। हाईकोर्ट ने चिंता न व्यक्त की होती तो शायद ममता दीदी भी न मानतीं और सब रफ़ा दफ़ा कर दिया जाता। अब आगे क्या होगा राम जानें। वहाँ अतीत में हुई तमाम वारदातों की तरह इसे भी न भुला दिया जाए, डर है असमंजस है। वैसे लगता नहीं कि 356 का प्रयोग होगा क्योंकि इससे चुनाव में ममता दीदी को ही फ़ायदा मिलने की आशंका है। तत्काल संपादकीय आया और खूब अच्छी तरह।
आपने बहुत महत्वपूर्ण सवाल पूछा है भाई इंद्रजीत जी। राष्ट्रपति शासन लगना आवश्यक है।
पुरवाई का संपादकीय
सीजर की पत्नी को संदेह से ऊपर होना चाहिए,,, वर्तमान राजनीतिक प्रदर्शन पर एक स्पष्ट रूप से करारा तंज भी है और आंखें खोलने के लिए एक पत्रकारिता का निडर और आपेक्षित कृत्य भी है।
सत्तासीन दल को स्पष्ट रूप आईना दिखाता यथा गृह मंत्रियों को सरदार पटेल बनने का शौक?!और फिर कश्मीर और मणिपुर और अभी हिंसा झेल रहे हिंदुओं की दयनीय और शोचनीय स्थिति ,,, धारा 356 का प्रयोग ना कर पाने की विवशता???? यह आलेख , कम से कम सत्तासीन दल को और आम जन को दर्पण तो अवश्य दिखाता है।
वक्फ अधिनियम ,सुप्रीम कोर्ट,विपक्ष का रुख और भूमिका,,,और सबसे अहम बंगाल की मुख्यमंत्री का अपने वोट बैंक और सत्ता की कुर्सी से धृतराष्ट्र से कहीं अधिक मोह,एक वर्ग विशेष को दुर्योधन की भूमिका में खड़ा कर रहा है, जहां मानवीयता की सारी सीमाएं अब टूट कर बिखर चुकी हैं पर सियासत है कि मानती ही नहीं,,,,अगर प्रदेश सरकार धृतराष्ट्र बनी है तो केंद्र में भी ध्यूत सभा में हारे और खामोश पाण्डवी मोड चल रहा है।
पता नहीं,वर्ग विशेष के खड़े किए गए मदान्ध दुर्योधन को विपक्ष और सियासत कब विदाई देगा यह अभी तो दूर की कौड़ी प्रतीत होती है।
इतना साफ और बोल्ड संपादकीय जो केवल स्थिति और मानवीयता के साथ खड़ा है।
पुरवाई पत्रिका परिवार समूह को साधुवाद।
भाई सूर्यकान्त जी, ये सवाल उठाना ज़रूरी था। हर तरफ़ हालात अजीब बने हुए हैं।
राजनीतिक में मोहरा हमेशा निर्दोष लोग ही बनते हैं।कटु यथार्थ को प्रस्तुत करता आपका संपादकीय। बहुत ही बढ़िया बात कही आपने, संजीव खन्ना किसी बढ़िया पोस्ट का सपना देख रहे हैं। मेरे हैसबैड हमेशा एक बात कहते हैं कि जिस दिन न्यायधीश ने घूस देनी बंद कर दी उस दिन देश से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा।
अंजु जी, आपने बहुत सार्थक टिप्पणी की है। धन्यवाद।
लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई आपकी लाजवाब एवं सामयिक राजनीति के संदर्भ में लिखी,बेबाक संपादकीय को नमन करती हूं ,
सीजर का संदर्भ देखते ही
कि सीजर की पत्नी को संदेहों से ऊपर होना चाहिए,
तुरंत ही माता सीता का संदर्भ दिमाग में स्ट्राइक कर गया था
और इसी संदर्भ को लेकर आपने जो टिप्पणी की है कि सामाजिक उत्थान करने वाले पुरोधा हो या जनता के द्वारा चुने राज प्रतिनिधियों को आभासी संदेहों से भी परे रहना चाहिए
व्यक्तिगत स्वार्थ को कभी भी देश हित के विरोध में उपयोग नहीं करना चाहिए, सरदार वल्लभभाई पटेल अगर प्रथम प्रधानमंत्री हुए होते हैं तो आज स्थिति बहुत बेहतर होती ,कम से कम वे एक सरल सहज आडंबर विहीन ,निस्वार्थ ,देशहित में कार्य करने वाले महान राजनेता थे ।
आज एक महान धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र ,को देश के नेता अपने अपने हितों ,कुरसी को साधने के लिए ,सांप्रदायिकता की आग में झोंकने से बाज नहीं आते,
चाहे नेता हों न्यायाधीश हों वकील हों
अब कहां रहे वचन पर मिट जाने वाले,देश की चाकरी में जान कुर्बान कर देने वाले
अब तो जब तक जीवन हे ऐश से जी लूं,क्या पता कौन से पल हो मौत को लाने वाले।
मेरे घर सरकारी नल हे तो में ही क्यों पानी की बचत सोचूं,जल बहता हे तो बहने दो
आज आम आदमी भी देश की स्थिति को सोच कर बता सकता है कि हमें क्या निर्णय लेना चाहिए की सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे,
पर मजाल है कोई अमल करे, सामाजिक पुरोधा तो सांप और लाठी दोनों के वजूद को नष्ट करके सिर्फ अपना वजूद बचाने में लगे हुए हैं।
हम क्या देकर जाएंगे अगली पीढ़ी को,यह सोच
को सोचने का वक्त ही नहीं हे ,निज स्वार्थों से लबरेज नागरिकों को आपकी संपादकीय ज्ञान,न्याय की रोशनी दिखा पाए इसी उम्मीद पर
आपको उत्तम संपादकीय के लिए आदरणीय साधुवाद
कुन्ती हरिराम झांसी
कुन्ती जी, आपने बहुत ही सार्थक और सार्गर्भित टिप्पणी की है। यह सही सवाल है कि हम अगली पीढ़ी को क्या सौंप कर जाने वाले हैं।
आपने जूलीएस सीजर और श्री राम के राज्य के प्रति कर्तव्य का आदर्श,ममता बनर्जी के मुख्यमंत्रित्व में पश्चिम बंगाल की हिंसा, धारा 356 न लगाए जाने पर दुविधा, सुप्रीम कोर्ट तथा संसद द्वारा पारित वक्फ बिलकुल पर कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंधवी तथा राजीव धवन जैसे वकीलों की पैरवी सुप्रीम कोर्ट के जज पर सेवनिवृति के पश्चात् किसी राजकीय पद की लालसा पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कई प्रश्न पाठकों के समक्ष रखे है।यह सच है कि सार्वजनिक क्षेत्र में कार्य करने वालों को अपने कार्य की शुचिता पर ध्यान देना चाहिए तभी वे समाज को सन्देश दे पाएंगे किन्तु यह आदर्श आज गौण हो गये हैं अगर ऐसा न होता तो ममता बनर्जी कभी दंगाइयों का साथ न देतीं। सुप्रीम कोर्ट अपने भ्रष्ट जज पर कार्यवाही करने की बजाय राष्ट्रपति को उनके कार्य करने के तरीके पर ज्ञान न देता। संसद द्वारा बनाये क़ानून पर आतंरिम रोक का प्रयास न करता। एक सुनवाई के लाखों की फीस लेने वाले वकील हर समय सरकार के हर फैसले किसान आंदोलन, CAA जैसे कानूनों के विरुद्ध न खड़े होते। बंगाल में धारा 356 अगर लगा भी जाये तो क्या ये वकील रात में भी सुप्रीम कोर्ट खुलवाकर स्टे नहीं ले आयेंगे तब पिसेगी तो मासूम जनता ही, तब क्या ममता बनर्जी की पुलिस निर्दोष लोगों को छोड़ेगी। सुप्रीम कोर्ट क्या कभी इन हिंसाओं पर स्वतः संज्ञान लेता।
यह सच है कि हर कोई सरदार पटेल नहीं हो सकता। उस समय अगर सरदार पटेल न होते तो भारत खंड-खंड होता। हैदराबाद और जूनागढ़ वैसे ही सिर दर्द बने रहते जैसे पंडित नेहरू के कारण कश्मीर समस्या है।
पाठकों के मन मस्तिष्क को झिझोड़ने वाले संपादकीय के लिए साधुवाद।
सुधा जी, हमारा प्रयास रहा है कि जब भी कभी कोई मुद्दा उठाया जाए, तो उसकी गहराई तक पड़ताल की जाए। आपने बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े किये हैं। धन्यवाद।
यह संपादकीय समस्या के अनेक पक्षों को उजागर कर रहा है।… क्या अब भी भारतीय नहीं जागेगा !! समस्या बढ़ती जा रही है। अब व्यावहारिकता की जरूरत है और बड़ी-बड़ी बातें अब एक धोखा बन गई हैं। यह एक सामयिक और सार्थक संपादकीय है। मेरी बधाई !!
हरनेक जी बहुत बहुत शुक्रिया। आपने एकदम सटीक बातें कही हैं।
संपादक महोदय,
भारतवर्ष के आर्थिक, सांस्कृतिक ,बौद्धिक उत्थान और उत्त्कृष्टता को पहचान मुगल अक्रान्ता और संपन्न भारत में व्यापार करने आए व्यापारी और बाद में शासक बन बैठे ब्रिटिश लोग इतने ईर्ष्यालु हो उठे कि उनको हर तरह से कुचलने की कोशिश की। अंग्रेजों ने तो ‘बांटो और राज्य करो ‘का ‘ब्रह्मास्त्र ‘चलाकर भारत को ऐसा अ क्षत -विक्षत किया कि उन घावों से आज भी रक्त रिसता रहता है और टीस उठती रहती है। भारत देश को इस घृणित रोग की पीड़ा से कम मुक्ति मिलेगी ईश्वर ही जाने । जातीय जनगणना, मंदिर मस्जिद के सतत विवाद, अंबेडकर के रची इट विधान का अनावश्यक महिमा मंडन और प्रशस्ति गान सब इस विश्व का प्रभाव है। नहीं तो ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ जैसे वेद वाक्य वाले हमारे देश में इस सब की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।
बेबाक संपादकीय के लिए बधाई।
सरोजिनी जी, आपने संपादकीय को एक अलग ही दृष्टि से देखा है। आपको संपादकीय पसंद आया, हार्दिक धन्यवाद।
वाह, अति सुंदर विश्लेषण, सुदूर लंदन में बैठ कर बंगाल की राजनीति का इतना करीबी ई कहाँ आपकी निरंतर शोध प्रक्रिया ही कर सकती है।
बंगाल की राजनीति पूरे भारत से बिल्कुल अलग है,आप देखिएगा की जब कंगीस का शासन था तो पूरे 25 30 साल रहा । फिर सत्तर के दशक में कम्युनिस्ट आये ज्योति बसु और बुद्धदेव बाबू के अंतर्गत 35 साल अब ममता , यहां राजनीति पाड़ा की राजनीति होती है और पाड़ा के लड़कों को रोजगार देकर ममता भगववान बनी हुई है । बांग्लादेश बॉर्डर से लगे 7 जिले मुस्लिम बाहुल्य जिले हैं जहाँ मुस्लिम आबादी 50 से ऊपर है। मुर्शिदाबाद दिनाजपुर, मालदा उन्ही म् से है मालदा में केवल कॉंग्रेस का थोड़ा प्रभाव है गनिखन चौधरी का परिवार आज भी धुरी में है बाकी सारा इलाका tmc का गढ़ है। यहां अन्य पार्टी की गिनती 1 से आरम्भ होती है ममता की गिनती 35 से आरम्भ होती है।मैं व्यमतिगत रूप से tmc के वरिष्ठ मंत्री और ममता जी को जानता हूँ। वोट की राजनीतीहै अतः वह 35 से आरम्भ होने वाली गिनती को कभी भी कम नहीं करेंगी, “आपको अल्लाह का कसम बीजेपी को दुश्मन समझो निकल फेंको ” इस प्रकार का व्यक्तव्य म् मुस्लिम समाज को देती हैं।
स्थिति बंगला देश के बॉर्डर क्षेत्र की भयावह अवश्य है मुख्य कारण कोई फेंसिंग न होना। मेरे घर मे मैड है उसका आधा परिवार बंग्लादेश में रहता है वेब बताती है हम लोग तो रोज आना जाना करते हैं कोई रोक टोक नहीं है। मतलब बंगला देश से फ्री इन्फिल्टरेशन है। बीजेपी का अनुमान है करीब एक करोड़ लोग बंग्लादेश के भारतीय वोटर हैं जो सीधे ममता के वोट बैंक हैं। अब बात राष्ट्रपति शासन की कह्ये तो फायदा ममता को ही होने वाला है। बंगाली कौम सामान्यतः दीदी को नारी रूप में बहुत इज्जत कर्त्ति है बाकी बचे बंगाली भी राष्ट्रपति सहजन के बाद दीदी के पक्षधर ह्यो जाएंगे।
सुरेश भाई आपने तो पूरे मुद्दे के बारे में अंदरूनी जानकारी उपलब्ध करवा दी है। आप तो वहीं रहते हैं जहां सब घटित हो रहा है। बहुत आभार।
सादर अभिवादन
जगह जगह हो रही ऐसी घटनायें ये सोचने पर मजबूर करती हैं की धर्म के नाम पर होने वाली राजनीति हमारे देश को कहां लेकर जायेगी
रेणुका जी आपने बिल्कुल सही कहा। धन्यवाद।
जितेन्द्र भाई: एक बहुत मशहूर शेर पेशे ख़िदमत है: –
“ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने,
लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई।”
– मुज़फ़्फ़र रज़्मी
काश 1947 में जब अंग्रेज़ भारत छोड़ कर जा रहे थे उस समय “ट्राँस्फर औफ़ पावर” के ज़िम्मेरवार नेहरू और गाँधी न होकर आदरणीय सरदार वल्लभ भाई पटेल होते तो जो मुसीबतें भारत को और भारत में रहने वाले हिन्दुओं को आज झेलनी पड़ रही हैं वो नहीं होती। चाहे कोई कुछ भी कहे लेकिन भारत का बटवारा “टू नेशन थ्योरी” के तहत हिन्दु/मुसलमानों के बीच हुआ था। पाकिस्तान के हित को जिन्नाह देख रहा था और जिस बेदर्दी से नेहरू/गाँधी ने भारत का हित देखा, उसका इतिहास गवाह है। मैं पूछता हूँ कि क्या ज़रूरत थी जो उन लोगों को, जिन्होंने ने भारत के टुकड़े करके अपना अलग देश बना लिया था, भारत में रहें। नेहरू तो अपने आपको हरफ़न मॉला समझते थे लेकिन वो हर जगह नाकामयाब रहे। गान्धी ने भी, बहुत चालाकी से, नेहरू को भारत का दूसरा प्रधान मन्त्री तो बना दिया था (भारत के पहले प्रधान मन्त्री नेताजी सुभाष चन्दर बोस थे) लेकिन इतिहास गवाह है कि वो तो इस पद के काबिल ही नहीं थे।
अब रहा ममता बैनर्जी और पश्चिमी बँगाल का मामला। यहाँ यह कहना ग़लत नहीं होगा कि नासूर बहुत बढ़ चुका है और अब अँग को काटना ही होगा और यह काम सिवाय आदरणीय मोदी जी के इलावे कोई नहीं कर सकता। ममता बैनर्जी और नेहरू के वंशजों ने अब तक, वोट बैंक की ख़ातिर, जो भारत का नुकसान किया है और अब भी करते आरहे हैं उसे जड़ से समाप्त करने के दिन आ गए हैं। मोदीजी ने जो अब तक पश्चिमी बँगाल में राष्ट्रपति रूल नहीं किया है उसके पीछे भी कोई रणनीती हो सकती है।
विजय भाई, आप की बातें गहराई लिये हैं। आप कनाडा में रह कर भी भारत की समस्याओं से ख़ासे गहरे जुड़े हैं।
लंदन में रहकर भारत पर इतनी पैनी दृष्टि आपको अलग और विशिष्ट बनाती है। आपका विवेकपूर्ण और तार्किकता से भरा विमर्श प्रभावित करता है। सीजर की पत्नी को संदेह से ऊपर होना चाहिये का भारतीय संदर्भ में श्रीराम और सीता के प्रसंग से साम्य एक विरला संयोग है जिसे पहली बार आपके द्वारा सुना।
सुप्रीम कोर्ट के इंगित न्यायाधीश खुद कटघरे में आ गये दिखते हैं। भाजपा वक्फ बिल को लेकर राजनीतिक लाभ की स्थिति में है।
अरविंद भाई, आपकी टिप्पणी सच में सार्थक है।
मुझे समझ नहीं आता मुस्लिम समाज का एक बड़ा तबका इस बिल के पक्ष में खड़ा है लेकिन उनकी बात खुद मुस्लिम समुदाय नहीं सुन रहा।क्या हमारे जज साहब को भी सच्चाई का इल्म नहीं कि वक्फ बोर्ड के नाम पर कितनी सरकारी जमीन कब्जाई गई है।आपकी बात सही है जज साहब रिटायरमेंट से पहले ही अपने लिए नया प्लान बना चुके हैं।
दिव्या जी, मुस्लिम समाज के कुछ नेता नहीं चाहते कि उनके समाज का आम आदमी ख़ुद कुछ सोचे।
वर्तमान सामयिक विषय पर आदरणीय तेजेंद्र जी ने दृष्टि डाली। यदि कोई गलत रस्ते पर जा रहा है तो उसे सलाह अवश्य देना चाहिए पर यदि कोई सलाह मानने को ही तैयार न हो तो क्या किया जाए।
जो राजतंत्र से जुड़े लोग हैं उन्हें तो और अधिक लोककल्याणकारी भाव अपनाना चाहिए।
धन्यवाद
पद्मा आपने बिल्कुल सही कहा।
इस बार का सम्पादकीय ऐसा प्रतीत होता है कि पूर्ण रूप से राजनीति से प्रेरित है और किसी राजनीतिक दल का मुखपत्र है ! मीडिया की याददाश्त तो आर्थिक आधार पर टिकी रहती है! आर जी कर अस्पताल के रैप केस याद है ! दिल्ली का बहुचर्चित निर्भया काण्ड भूल गए ! हर गतिविधि को हिन्दू मुस्लिम का रूप देकर साम्प्रदायिकता से जोड़ा जाता है! इसे नागरिक समझ कर क्यों नहीं देखा जाता ! बांग्लादेशी घुसपैठिए कह कर तो शासन का अपने हाथ ऊपर करने का सबसे आसान तरीका है! मानो जैसे बंगला देश की सीमा खुली पड़ी है! कोई भी आसानी से आकर चला जा सकता है ! फिर सीमा सुरक्षा बल और देश की सेना है ही नहीं !
बंगला देशी घुसपैठिए सर्जिकल स्ट्राइक कर चले जाते हैं और किसी को पता ही नहीं चलता !
ऐसा लगता देश की आन्तरिक सुरक्षा और बाह्य सुरक्षा का अच्छा मज़ाक बनाया गया है ! उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जैसे सर्वोच्च पद से सेवा निवृत होने के बाद अगर अपने भविष्य सुरक्षित करने के लिए जुगत भिड़ना पड़ रही है तो इससे सामान्य पदों से सेवानिवृत होने वाले कर्मचारी नागरिकों की स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है! की उनकी क्या आर्थिक स्थिति है! और पूर्व मुख्य न्यायाधीश के घर गणपति आरती में सारी सीमाएं तोड़ कर किसका भविष्य सुरक्षित करना था ! इसकी जानकारी किसी को भी नहीं है! सब भूल चुके हैं! ये सच है समय के साथ स्मृति भी क्षीण हो जाती है !
अटल जी ने एक बार अपने भाषण में बताया था कि बिल्ली जब चोरी से दूध पीती है तो आँखें बन्द कर लेती है और सोचती है कि उसे दूध पीते हुए किसी ने देखा ही नहीं !
बस ऐसा ही कुछ हाल भारत के हर नागरिक का है!
सब जो कुछ कर रहे हैं वो समझते हैं उनको किसी ने देखा ही नहीं!
ये जो पब्लिक है सब जानती है !
वक़्त आने पर बता देंगे !
कौन है सच्चा कौन है झूठा , यहाँ हर चेहरे पर नक़ाब है !
आदरणीय भाई कैलाश मुन्शी जी, टिप्पणी के लिये धन्यवाद।
आदरणीय तेजेन्द्र जी
बहुत सामयिक विषय पर है इस बार का संपादकीय।
पूरे संपादकीय को पढ़कर जो बात हमें सबसे ज्यादा प्रभावित कर गई वह आपके संपादकीय का शीर्षक है।
*सीजर की पत्नी को संदेह से ऊपर होना चाहिये।*
और इसका सही आशय यही है जैसा कि आपने लिखा कि प्रमुख या सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों को अनुचित कृत्य के आभास से भी बचना चाहिए।
पर विचारणीय बात तो यह है कि आज के समय में यह मुहावरा सटीक बैठे ऐसा लगता नहीं कि कोई सीजर की तरह सोचे।राम तो दूर की बात हैं।
यह शीर्षक ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। वास्तव में यह एक संदेश है, नीति है!पर आज के नेताओं को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनकी चमड़ी मोटी है, इतनी अधिक मोटी कि संटी कहीं भी पड़े कोई फर्क नहीं पड़ता।
आज के कोई भी नेता ऐसे नहीं जो वल्लभ भाई पटेल या उनके समकक्ष किसी की भी बराबरी कर सके।
बंगाल की राजनीति ममता के हिसाब से चलती है। और ममता बैनर्जी ही राजनीतिक तनाव बढ़ाने की उत्तरदाई हैं।
गुजरात दंगों के समय बाजपेई ने जिस तरह सी एम मोदी को सलाह दी वैसी ‘राजधर्म’ पालन की सलाह कोई ममता बैनर्जी को दे, तो भी वह मानेगी ऐसा लगता नहीं। वह बंगाली हिंदुओं की हितेषी है ही नहीं।
यह काबिले गौर है कि जब सुनवाई हो रही है हिंसा जैसे हालात बने।
कुल मिलाकर राजनीति की बलि वेदी पर वहां बंगाली हिन्दू बलिवेदी पर हैं।
वैसे मणिपुर हिंसा के समय मोदीजी ने भी कुछ नहीं किया न वहाँ गये। सबके अपने-अपने राजनीतिक हित हैं जिसमें जनता पिसती है।
बंगाली हिन्दुओं की हालत उस बुलबुल की तरह है जो सैयाद की कैद में है।उसे तो सहना ही है।
आपने एक संपादकीय में बहुत कुछ समेट लिया है।बधाई आपको।
आदरणीय नीलिमा जी, प्रयास रहता है कि पुरवाई का संपादकीय हमेशा हर मुद्दे को गहराई से पकड़े। कभी सफल हो पाते हैं… कभी लगता है कि कुछ कमी रही। आपने मुद्दे को बहुत गहराई से पकड़ा है। धन्यवाद।
सरदार पटेल जी के जैसा कोई दूसरा बन ही नहीं सकता।आज हमारे देश की एकता अखंडता का श्रेय आदरणीय सरदार पटेल जी को ही जाता है आपने बहुत बढ़िया लेख लिखा है
बहुत शुक्रिया संगीता जी।
https://mediavigil.com/op-ed/document/book-excerpt-piyush-babele-nehru-myth-and-truth-part-three-2/
महत्वपूर्ण लेख है, पढ़ा जाना चाहिए।