Wednesday, February 11, 2026
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लखनलाल पाल की कलम से – रमकल्लो की पाती (भाग – 1)

*सिद्ध श्री परमा जोग लिखी*
प्राननाथ
चरन स्पर्श।
नए साल की ढेरों शुभकामनाएँ। जब तक यह चिठिया तुम्हारे यहाँ पहुँचेगी, तब तक नई साल लग जाएगी। प्राननाथ, ऐसा लगता है कि यह साल कब निकर जाए। जब यह साल नई-नई आई थी, तब आशा बंध गई थी कि चलो जिन्दगी में कछु फेर-बदल होगा। पर यह तो बहुत ही हरजाई निकली। हमारा साथ छोड़कर भ्रष्टाचार खसम की ओली में जा बैठी। इसने हमारा बिलकुल मुँह न हेरा। रंडी मंहगाई का साथ पाकर और भन्ना उठी। काए-काए की बात करूँ, कछु सस्तौ नई रहो।
प्राननाथ मेरी चिन्ता न करियो। मैं तो पनपथू रोटी और नमक के पानी में लाल मिरची खूँतकर खा लेती हूँ। खूब रोटी खबत। घर वाले खेत में पिसिया बो दी, अब वह सिंचाई पर आ गई है। दमार लगे ट्यूबवैल को अभी बिगड़ना था। दो दिन पहलूँ ठीक हुआ था। आदमी करे तो करे क्या। अब बिजली महारानी खेल करने लगी। जब-कब झकइयाँ सी दे जाती है। पिसिया सूखने लगी है।
फिरत फिरत पन्द्रह दिन हो गए, खाद नईं मिली। रुपड्या दए पर ब्लाक में खाद नहीं मिलती है। सुनो है सरकार खाद तो खूब बनवाती है पर लोग-बाग बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में ब्लैक कर देते हैं। प्राननाथ चिन्ता न करियो, मैं सब संभाल लूँगी। भुरी भैंस ने शाम के वकत सानी खाबो छोड़ दी। जीव-जन्तुओं में आत्मा का वास होत, भुरी मोई विपदा जानत है।
परधान जी अच्छे हैं, उन्होंने मेरा जॉबकार्ड बनवा दिया है। मैंने बैंक में अपना खाता खुलवा लिया है। परधान जी महीना-दो महीना में तीनेक हजार रुपइया मेरे खाते में डाल देते हैं। मैं बैंक से रुपया निकालकर परधान जी के हाथ पर रख देती हूँ। सात सौ रुपये मुझे दे देते हैं, बाकी परधान जी ले लेते हैं। सात सौ कौन कम हैं? फ्री में मिल जाते हैं, कछु करना नहीं पड़ता है।
कोटेदार ने जरूर पिछले महीने का राशन नहीं दिया है। बरगए को मैंने खूब कहा कि चीनी तू बेंच ले पर गेहूँ तो दे दे। कोटेदार साफ झूठ बोल गया कि राशन इस महीने में नहीं आया। प्राननाथ वह बोरों की अन्टी लगाए धरें। कछ कहाव सो ऐंठ जात। रुपइयों की दम है। कोटेदार अफसरों को रुपया खबाता है। राशन-फाशन तो दिया नहीं, उल्टे पिछले महीनों की खाना-पूर्ति कार्ड में कर दी। मैंने टोका, तो उसने झल्लाकर कार्ड फैंक दिया। मैंने फिर नईं कछू कहो। का होत कहे से?
प्राननाथ, वहाँ तुम अच्छी तरह से रहियो। शहर है, ऊलादच्ची से बचे रहियो। मुन्नी खूब बदनाम बनी रहे, तुम मतलब न रखियो। चार पइसा कमाओ, तो दो पइसा खाबे- पीबे में खर्च कर लइयो, दो पइसा बचा के रखियो। मैंने सुना है, डिल्ली में करोड़पति बहुत रहत हैं, वहीं किसी से जुगाड़ लगाइयो, शायद नौकरी मिल जाए। तसला ढोए में का धरो। ए तनक सुनो तो… कान और नीगर लाओ… किसी नेता के यहाँ हिरकया जइयो। वहाँ बहुत फायदा हैं; कभी-कभी उन पर आयकर वालों का छापा पड़त है, तो नेता सबूत मिटाने के लिए बोरा भर-भर रुपया यहाँ-वहाँ फेंक देत। एकाध बोरा तुम भी टटकोर लेना। को दिखत? एक बोरा में तो सब दलुद्दर दूर हो जाएगा। राम-राम की लूट मची है, पै तुम आराम से काम निकारियो। पाती पढ़कर जोश में न आ जइयो। वे आदमी को मुरगा सौ मसक देत। चिठिया आराम से पढ़कर झुपड़िया में कहीं खौंस देना। मुझे तो डर लगता है कि किसी ऐसे-वैसे के हाथ न पड़ जाए।
यहाँ मैं खूब आराम से हूँ। मेरी चिन्ता करें की तुम्हे जरूरत नहियाँ। मंहगाई ऐसी ही थोड़े बनी रहेगी। रावण का तो गरब नई रहा, इस रंडी का क्या रहेगा। ऊने अंक की साल आनी है, खूब भला करेगी। डोन बरी प्राननाथ, सब ठीक हो जाएगा।
प्राननाथ, मैं तुमसे एक बात पूहूँ, तुम्हें मेरी याद आती है कि नईं? मैं जानती हूँ कि सोती बेरा तुम्हें मेरी सुरत जरूर होती होगी। प्राननाथ नई साल में आ रहे हो का? पिरोगान बनै तो आ जइयो। मेरा जी जुड़ा जाएगा।
प्राननाथ, एक बात तो मैं भूल ही गई कि डिल्ली में ठंड और कोहरा बहुत पड़ रहा है। कई रेलें सरकार ने बंद कर दी है। हो सकत अपने रोड (रूट) की भी बन्द हों। मैंने कल रेटियो में सुना था।
प्राननाथ ठंड बहुत पड़ रही है। अपने ओढ़ने के लिए ऊनी कंबल खरीद लेना। कंजूसी न करना, नईतर वहाँ ठंड में सिकुड़ जाव। मैंने तो उसी फटी रजइया में थिगरा लगा लिए हैं। जाड़ा तो मैं काट लूँगी। अबकी बार आओ, तो मोबाइल जरूर खरीद लइयो। चिठिया-बिठिया का चक्कर खतम हो जाएगा।
मेरी चिन्ता तुम बिलकुल न करियो। चिठिया जरूर भेजना।
आपकी, रमकल्लो

लखनलाल पाल
कृष्णा धाम के आगे अजनारी रोड नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश
परिचय – शिक्षा- बी.एस-सी.(गणित),बी.एड, एम.ए (हिन्दी) ,पीएच.डी
साहित्यिक गतिविधियां – हंस, कथादेश, कथाक्रम, लमही, युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा आदि में कहानियां प्रकाशित।
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा, ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास)
कहानी संग्रह – पंच बिरादरी,
मोबाइल नं – 7668715109
Email – [email protected]
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13 टिप्पणी

  1. *’रमकल्लो की पाती’ का पुनर्पाठ*

    झाँसी से अपने सुरीलों का गाँव क्योलारी (जालौन) में महाशिवरात्रि महोत्सव मनाने सपरिवार जा रहा हूँ। मेरी यह ट्रेन लगभग दो घंटे विलंब से सुबह 6:10 के बजाय 8:00 बजे चलेगी मैं वीरांगना लक्ष्मीबाई-लखनऊ इण्टरसिटी के D3 में अपनी आरक्षित सीट पर बैठा हुआ हिंदी की अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘पुरवाई’ में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हो रही डॉ० लखनलाल पाल की लोकप्रिय कहानी “रम्मकल्लो की पाती” का पुनर्पाठ करने लग गया हूँ…
    रम्मकल्लो! रम्मकल्लो!! रम्मकल्लो !!! का कोई अनहद साँसों की धौंकनी पर प्रेमराग का कोरस बन गूँज रहा है। कभी लगता है जैसे किसीने वसंत के टटके फूल सिरहाने रख दिये हों। इन्हीं सुवासित फलों के मकरंद ने मन को जकड़ लिया है…
    मगर, मन को देर तक बाँधे रहना बहुत मुश्किल है। मन जैसे ही छूटा तो सीधा रम्मकल्लो की पाती घुसकर मुखरित होने लगा।
    रम्मकल्लो जैसे चरित्र असधारण होते हैं। इनके विराट व्यक्तित्व को सिरजने में तमाम अनाम गुदगुदियों के साथ ही जिंदगी की विभीषिकाओं से भी दोचार होना पड़ता है। गाँव की स्त्री भले ही संभ्रांत महिला न बन पाई हो, नारी के लुभावने संबोधनों से अलंकृत न हो पाई हो, लेकिन वह अपनी अस्मिताओं के प्रति, अपनी सामाजिक प्रतिबद्धताओं के प्रति निरंतर जागरूक बनी रहती है, सचेत व सचेष्ट बनी रहती है।
    गँबई स्त्री का यह नैसर्गिक गुण ही उसकी अपराजिता की आधारशिला है। उसके अमूर्त मन में प्रेम जब मूर्तवान होकर मुखरित होता है तब कहीं कोई रम्मकल्लो जन्म लेती है समाज के विद्रूप
    को हँसते रोते उजागर करने के लिए… मेरे मित्र भाई डॉ० लखन लाल पाल बड़े भोलेभाले जितने ऊपर से देखते हैं, उतने ही वह कहानी लेखन के मामले में ‘चतुर सुजान’ हैं। उनकी यह सुजानता ‘रम्मकल्लो की पाती’ से अपलक झाँक रही है…
    क्रमशः…
    झाँसी- लखनऊ इण्टरसिटी
    प्रातः 9;00
    25/2/2025

  2. आदरणीय भारती जी, आपने रमकल्लो की पाती का पुनर्पाठ के माध्यम से इतनी विस्तृत और लुभावनी समीक्षा की है कि मन गदगद हो गया। अधिकतर रचनाओं को एक बार पढ़ने के बाद दोबारा पढ़ने का मन कम ही करता है। लेकिन आपने पुनः पढ़ा और समीक्षा की यह बड़ी बात है। भारती जी आपका हार्दिक आभार

    भारती जी, आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी ने इस अंतरराष्ट्रीय पत्रिका पुरवाई में रमकल्लो को धारावाहिक रूप से प्रकाशित करने का जो निर्णय लिया है यह मेरे लिए बड़ी बात है। चूंकि दो चार पातियां मैं ग्रुप में पहले डाल चुका हूं। इसलिए मित्रगण इस पर कुछ उदासीन से लग रहे हैं। लेकिन मैं इतना जानता हूं कि उन पातियों के बाद जो पातियां आएंगी, कोई अपने आपको पढ़ने से रोक न पाएगा।
    कभी-कभी तो मुझे भी लगने लगता है कि ये पातियां लिख कैसे गईं। शुरुआत में सिर्फ एक पाती लिखी थी। उसे एक पत्रिका में प्रकाशन के लिए भेज दिया था। प्रकाशित होने के बाद जो पाठकों के फोन आए तो मैं आश्चर्यचकित रह गया। मुझे पहले लगा कि इस पाती में ऐसा खास क्या है जिसे लोग इतनी तवज्जो दे रहे हैं। एक पाठक ने फोन किया तो मैंने उनसे पूछा कि इस पाती में ऐसा क्या है जो आपको पसंद आ रही है। भारती जी जानते हैं आप कि उन्होंने क्या कहा? उन्होंने कहा कि जो सहजता रमकल्लो में है वही उसकी ताकत है।
    इससे पहले मुझे लगता था कि रचना की कथा ऐसी लिखी जानी चाहिए जो एकदम मौलिक हो, किसी ने सुनी न हो। नई अवधारणा हो। पर उन पाठक महोदय जी ने आंखें खोल दी कि सहजता और ईमानदारी भी रचना को श्रेष्ठ बनाती है। आपने बढ़िया समीक्षा लिखी है भारती जी

  3. लखनलाल जी,

    गाँव मे रहकर भी रमकल्लो चिठिया लिखिबे में बहुत चुस्त है। चिठिया में कछु तो न छोड़ा। हर दुख और परेशानी को कहती चल रही है फिर भी अपने प्राननाथ को चिंता न करने पर जोर देती रहती है। उसे अपने खाने-पीने और रहने को लेकर सारे दुख-दर्द का जिक्र करने के बाद प्राननाथ की चिंता भी सताती रहती है कि न जाने कैसी विकट परिस्थितियों में रह कर उनका गुजारा हो रहा होगा।

    लेकिन रमकल्लो को कोई वेवकूफ न समझना। वह जानती है कि परधान उसे ठग रहा है। उसके नाम से जॉबकार्ड बनवाकर महीने में तीन हजार रुपये में से सिर्फ सात सौ रुपये ही उसके हाथ में देता है फिर भी रमकल्लो को ‘नहीं से तो कुछ भला’ सोचकर संतोष और तसल्ली रहती है। वह कोटेदार की बेईमानी भी जानती है। पर अपनी परेशानियों को लेकर वह पति से कभी कोई चिंता न करने को भी बार-बार कहती रहती है। वह उसे दिलासा देती है कि ‘सब दिन जात न एक समाना’

    वह एक समझदार, वफादार और जिम्मेदार पत्नी है जो पति के दूर होने पर कम पैसे में ही गुजर कर रही है। अपने प्यार का वास्ता देते हुये उससे नये साल में आने की विनती भी करती है। पति को चिंता न हो इसलिये वह समझदारी और सतर्कता से जीवन यापन करने की कोशिश कर रही है।

    उसे दिल्ली के बारे में तमाम खबरों की जानकारी भी रेडियो पर सुनकर रहती है। और फिर उसे चिंता होती है अपने पति के खाने-पीने और रहने के बारे में तो उसे हिदायत देना भी अपना कर्तव्य समझती है। गाँव में महँगाई, खाद,भ्रष्टाचार और भी तमाम समस्याओं के बारे में अपने पति को अवगत कराती है। मेरे बिचार से प्यार और अपने पति का ख्याल करने वाली पत्नी जो कुछ भी लिख सकती है वह सब कुछ रमकल्लो की इस चिठिया में समाहित है।

    एक अकेली औरत को चिंता बनी रहती है कि परदेस में पैसा कमाने गया पति कहीं किसी बदनाम मुन्नी के चक्कर में पड़कर उसे भुला न दे। जैसा कि हर पत्नी को डर रहता है। तो अपना सच्चा प्यार जताते हुये वह बड़ी होशियारी से पति के मन में अपने लिये प्यार की थाह भी लेने की कोशिश करती है।

    इस चिठिया को पढ़कर लगा जैसे मैं रमकल्लो के सुख-दुख और चिंता के मानसरोवर में गोता लगा कर आई हूँ। यह चिठिया कभी रुलाती है, कभी हँसाती है लेकिन चेहरे पर मुस्कुराहट बनी रहती है। रमकल्लो एक बहुत ही सुलझी और समझदार महिला है। गाँव में पति की अनुपस्थिति में एक स्त्री को क्या-क्या झेलना पड़ता है यह चिठिया उसका प्रमाण है।

    और आखिर में रमकल्लो को जब ध्यान आता है कि इस मोबाइल के युग में चिठिया-विठिया के झंझट में कौन पड़े तो उससे छुटकारा पाने को वह अपने प्राननाथ से एक मोबाइल उसके लिये लाने को कहना नहीं भूलती। उसे अपनी व प्राननाथ दोनों की ही चिंता सता रही है।
    (अब अगली बार किसी और की चिठिया का भी इंतजार रहेगा)

    जिस तरह की मनभावन भाषा-शैली में आपने इसे लिखा है तो मेरी तरह ही शायद हर पाठक का मन इसे बार-बार पढ़ने को करेगा। रमकल्लो से उसके प्राननाथ को लिखवाई इस शानदार चिठिया पर आपको बहुत बधाई।

    -शन्नो अग्रवाल

    • शन्नो जी आपकी इस टिप्पणी में रमकल्लो के मन की सारी स्थिति-परिस्थिति समाहित हो गई है। आपने उसके दुख सुख को लेकर जो समीक्षा की है वह बहुत उम्दा लगी मुझे। सही अर्थों में आपने उसके मनोविज्ञान को समझ लिया है।आपका बहुत-बहुत शुक्रिया शन्नो जी

  4. भाई लखन पाल जी ! एक अद्वितीय रचना !! कथानक, चरित्र , भाषा और शैली सब कुछ लीक से हटकर !!..इस रचना का नामकरण भी पात्र के सामाजिक-आर्थिक जीवन के अनुरूप और अनुकूल है, अनुपम है —- रमकल्लो की पाती !! … सचमुच भारतीय परिवारों में अति स्नेह के वशीभूत, लंबे नाम घिसकर छोटे हो जाते हैं और स्नेह से भीगकर प्रियकर ! प्यारे-प्यारे हो जाते हैं।…. हमारे समाज में , माता-पिता, भाई-बहिन,पति-पत्नी और मित्र, अपने प्रिय को छोटे-छोटे नामों से ही बुलाते हैं। इस रचना का शीर्षक आकर्षणपूर्ण और रुचिकर है। यह एक असाधारण, अनूठी रचना है।… इस प्रकार की अद्वितीय रचनाओं पर , लघु टेली-फिल्म बननी चाहिए। बंधुवर लखन लालजी ! मेरी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !!

    • सर आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। रमकल्लो की पाती उपन्यास पढ़कर एक टेली फिल्म निर्माता ने फोन पर इजाजत मांगी थी कि हम इस पर सीरियल बनाना चाहते हैं। लिखित इजाजत मैंने दे दी थी। अब देखते हैं क्या होता है। यह तो सब समय के गर्भ में है। सर पाती पढ़ने के लिए और इस पर इतनी बढ़िया टिप्पणी देने के लिए आपका पुनः धन्यवाद

    • अरे, प्रिय बहन अन्जू आपने चिट्ठी पढ़ ली। बहुत अच्छा लगा। पुरवाई पत्रिका रमकल्लो की पाती को धारावाहिक रूप में प्रकाशित करने जा रही है। हर माह में दो बार प्रकाशित होगी। यह पहली पाती है। रमकल्लो की लिखी 35 पातियां हैं। सभी इसमें छपेंगी।
      पाती पढ़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। प्रिय बहन को ढेर सारा आशीर्वाद।

    • अरे, प्रिय बहन अन्जू आपने चिट्ठी पढ़ ली। बहुत अच्छा लगा। पुरवाई पत्रिका रमकल्लो की पाती को धारावाहिक रूप में प्रकाशित करने जा रही है। हर माह में दो बार प्रकाशित होगी। यह पहली पाती है। रमकल्लो की लिखी 35 पातियां हैं। सभी इसमें छपेंगी।
      पाती पढ़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।
      प्रिय बहन को ढेर सारा आशीर्वाद। खुश रहो।

  5. पनपथू,,उलादच्ची

    आदरणीय सर जी!

    रमकल्लो की पाती पढ़ी। देशज भाषा ने पाती में मानो प्राण डाल दिये। पढ़ते हुए बॉर्डर पिक्चर की भी बात याद आ गई “बाकी सब ठीक है”
    पाती में ग्रामीण नैसर्गिक सच्चाई की स्पष्ट छाप है।भोलेपन ने पाती में सारी शिकायत दर्ज कर दी हैं रमकल्लो ने, समस्याएँ बता दी हैं और समस्याओं का कारण भी स्पष्ट किया है कि जो समस्या है वह क्यों है? सारी परेशानियाँ बता दी हैं ।गाँव के माहौल की सच्चाई का वर्णन कर दिया है।
    हमें याद आता है कि पुराने समय में प्राणनाथ का संबोधन चला करता था पति के लिये। एक लंबे समय के बाद पुनः यह सामने आया।
    हर इंसान को नए साल से कितनी आशाएँ रहती हैं! लेकिन जब समय नहीं बदलता है तो आशा निराशा में परिवर्तित हो जाती है।
    भ्रष्टाचार के हाथ, मुँह, पेट और पैर !चारों ही अंग बहुत बड़े हैं लंबे-लंबे डग भर कर जगह घेर रही है लंबे-लंबे हाथों से समेट मुँह मैं डाल रही है पर पेट इतना बड़ा है कि एक साथ में जाने कितना ही खा ले वर पेट भरेगा नहीं।
    अब पाती रमकल्लो की है और वह अपनी भाषा और समझ के अनुसार जो कहेगी वह सही होगा इसलिए हम यह नहीं कहेंगे कि “भ्रष्टाचार पुल्लिंग है,फिर बैठ भी खसम की ओली में रहा है। सच भी है अगर बीवी की होली में बैठता तो कुछ कर नहीं पता कसम की होली में है इसीलिए प्रसार की सुविधा,ताकत, हिम्मत और निर्भयता है। और भ्रष्टाचार मँहगाई की खाद से तो पोषित होता है।
    बेचारी रमकल्लो जानती हैश्रकि दिन में न भी आए तो सोते समय तो याद जरूर आती होगी प्राणनाथ को।
    पनपथू नहीं समझ पाए कि यह क्या है जिसकी रोटी उसने खाई?
    वरना पानी में नमक मिर्च डालकर रोटी हमारे घर भी हमसे पहले आने वाली बहुओं ने बहुत खाई। सब्जी के अभाव में। वैसे सच है ।ठंडी रोटी में तेल लगाकर उसमें नमक मिर्च और जीरे डाल लीजिए व बारीक-बारीक प्याज; वाकई बहुत अच्छा लगता है और ज्यादा खिला जाता है। अक्सर गर्मी में हम लोग अब भी खाते हैं। खाने का सही मजा तो गाँव वाले ही उठाते हैं ,साहेब लोग नहीं जानते असली खाना होता क्या है?
    ट्यूबवेल के बिगड़ने में दमार शब्द का क्या अर्थ है, यह समझ में नहीं आया।
    बेचारी अकेली जान
    रमकल्लो!! परेशानियाँ एक के बाद एक पीछा ही नहीं छोड़ रहीं ।
    नेता की सलाह अच्छी दी! और बाकायदा समझाइश‌ के साथ- फायदा समझाया और सावधानी भी.
    परधान जी बहुत अच्छे हैं। 3000 में से 700 देते हैं और 2300 खुद रख लेते हैं बेचारी रमकल्लो इतने में ही संतुष्ट। समझ ही नहीं पा रही कि नहीं देंगे उनको पैसे तो भी वह कुछ नहीं कर सकते।
    प्राणनाथ मोबाइल जरूर ले आएँ आखिरी अंक के पहले तो अच्छा रहे।
    इससे ठीक के माध्यम से रंग कल ने गाँव में फैले हुए भ्रष्टाचार की पोल खोल दी कि गांव का प्रधान भी कैसा है?
    और राशन की दुकानों में कैसी भ्रष्टाचारी मची है?
    खाद को लेकर मारा मारी।
    जो वाक्य बरबस चेहरे पर मुस्कान ले आए-
    *बिजली महारानी खेल करने लगी!जब तब झकइंया दे जाती है।*
    *”मैं जानती हूँ सोते बेरा तुम्हें मेरी सुरत जरूर होती होगी।”*

    *राम-राम की लूट मची है पै तुम आराम से काम निकारयो*

    *मुन्नी खूब बदनाम बनी रहे ,तुम मतलब ना रखियो।*

    अंग्रेजी काफी अच्छी है
    रमकल्लो की-
    डोन बरी, डिल्ली, रेटियो,पिरोगान

    शुद्ध और सात्विक, माधुर्य भाव से भरी श्रृंगार रस से आपूरित, सरल हृदय, लेकिन साहसी महिला की तरह पाती लिखने वाली रमकल्लो पर हम न्योछावर जाते हैं।
    पता भेजिएगा सर जी! चिट्ठी लिखने का हमारा भी मन हो रहा है उसे!
    आज होशंगाबाद शहर है, जब शादी हुई थी तब इसी तरह का गाँव था।
    पाती शब्द ने ही न जाने कितनी सारी पुरानी यादें ताजा कर दीं।
    आपको बधाई, रमकल्लो को बहुत-बहुत प्यार।

    • नीलिमा करैया जी, आप बेहतरीन समीक्षक है। आपने रमकल्लो की भावनाओं को जिस तरह से पकड़ा है वह आश्चर्यचकित करता है। जो वो सोचती है उसी को तो कहा है आपने। रमकल्लो कम पढ़ी-लिखी है इसलिए वह अपनी भावनाएं अपने स्तर से व्यक्त कर देती है। उसने ये थोड़े सोचा था कि उसकी पाती को इतने सारे लोग पढ़ेंगे। रमकल्लो ने तो अपने पति को लिखा है। उसने वार्निंग भी तो दी है कि चिठिया पढ़कर सुरक्षित स्थान पर रख देना।
      आपने उसके हृदय की सारी बात निकाल ली। ऐसी समीक्षा से लेखन सार्थक हो जाता है। लेखक का लिखना सफल। मैं इस समीक्षा को सहेजकर रखूंगा। बहुत बढ़िया समीक्षा की है आपने।
      पनपथू रोटी – हाथों में पानी लगाकर जो रोटियां बनाई जाती हैं उन्हें हमारे यहां पनपथू रोटी कहा जाता है। मतलब पानी से पाथना।
      दमार शब्द दीमक का अपभ्रंश है। गुस्सा में किन्तु शालीनता के साथ दी जाने वाली एक तरह की गाली।
      ऊने अंक की साल – विषम संख्या वाली साल जैसे सन् 2021,2023,2025
      गांव में ऊना अंक शुभ माना जाता है। शादी ब्याह या शुभ कामों में रुपए 51,101 या 151 आदि इसी क्रम में व्यवहार लिखाया जाता है या चढ़ाए जाते हैं।
      बीत चुकी साल का भ्रष्टाचार खसम है। यहां रमकल्लो ने साल को स्त्रीलिंग माना है। भई रमकल्लो तो रमकल्लो है। किसे क्या मान ले वही जाने।
      नीलिमा करैया जी इस समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत आभार

  6. बहुत प्यारी लगी रमकल्लो की पहली पाती। मुझे आंचलिक भाषाएँ बहुत लुभाती हैं । जिन शब्दों के अर्थ नहीं आते उन्हें समझने की कोशिश करती हूँ। “पनपथिया” पानी लगा कर हाथ से फैलाई हुई रोटी “दमार ” — दइमारा एक तरह की गाली गाँव में। हाँ “उल्टे-सीधे भी समझ नहीं आया । रमकल्लो ने योजनाओं में भ्रष्टाचार की पोल अच्छे से खोल दी है पर अपनी मजबूरी भी समझती है।
    परदेस गये पति की चिंता रहती है उसे। उसे स्वास्थ्य के बारे में धोखेबाज़ों से और बदनाम औरतों के चक्कर में न पड़ने की सलाह और बेहतर काम ढूँढने की सलाह तो देती है पर अपनी ओर से निश्चिंत रहने को भी कहती है लेकिन चाहती कि वह उसे भी याद करे।
    सुंदर सृजन के लिये बहुत बधाई और शुभकामनाएँ आपको।
    —ज्योत्स्ना सिंह

    • ज्योत्स्ना सिंह जी, आपकी यह टिप्पणी मेरे लेखन की स्वीकार्यता की ओर इंगित कर रही है। आपका रमकल्लो से स्वाभाविक जुड़ाव मेरे लेखन को प्रेरणा देता है। पाती पढ़कर उस पर अच्छी टिप्पणी लिखने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

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