मैं बसन्त मैं फूल बसन्ती
मैं बिखरी उन्मुक्त हूँ धरती
मैं बासन्ती पीला सावन
मैं आनन्द में केवल रहती
मैं बगिया का पीला सागर
मैं हँसती हूँ फूल बनाकर
नए गीत की माला सुन्दर
मैं बसन्त हूँ उनको गाकर
मैं नदिया, मैं बहता झरना
एक हँसी हूँ ऐसा कहना
मैं बिंदिया हूँ सरसों वाला
ऋतु महन्त हूँ कविता वाला
मैं चमक रही हूँ गेहूँ खेत
दमक रही हूँ, मुझको देख
मैं पीला आकाश भरी हूँ
यह यौवन है मेरी भेंट
मैं मन को अविरल करती हूँ
जल जैसा निर्मल करती हूँ
मैं कोई पहाड़ा कठिन नहीं
मैं शीतल हूँ, गर्म नहीं हूँ
मैं बसन्त पंचम तिथि हूँ
सरस्वती की सारथी हूँ
जब मन में आनन्द भरे
वही बसन्त है मैं कहती हूँ
वही बसन्त है मैं कहती हूँ
आशीष जी!
बसंत पर बेहतरीन रचना के लिए आपकी को बहुत-बहुत बधाइयाँ।