चुनाव लगातार करवटें बदल रहा है। कभी मेरी तरफ झुक जाता है तो कभी गब्बे की तरफ। राजनीति के धुरन्धरों को भी समझ में नहीं आ रहा है कि अब ऊँट किस करवट बैठने वाला है। सब के सब कयास लगा रहे हैं।
वोटरों का मेरी ओर झुकाव देखकर गब्बे घबड़ा गया है। कल उसने शक्ति प्रदर्शन किया था। सौ से अधिक लोगों को लेकर वह गाँव में प्रचार के लिए निकल पड़ा। उसमें एक झुण्ड महिलाओं का था। उसके सपोर्टर जोर जोर से नारे लगा रहे थे। उन्होंने पोस्टरों से दीवारें पाट दी।
इस प्रदर्शन से लग रहा था कि चुनाव की हवा न बदल जाए। सौ के लगभग आदमी और तीस-पैंतीस औरतें थी। ये वोट में बदल गए, तो उसके एक सौ पैंतीस वोट तो अभी हो गए। कुछ दबा वोट होगा। चार-पाँच सौ में जीत पक्की मानो। चार घर छोड़कर पाँचवें घर का आदमी जुलूस में शामिल था। मैं तो कहीं नहीं ठहर रही हूँ।
अभी मैं उबर भी नहीं पाई थी कि रोहू ने ऐसी खबर सुनाई, जिसे सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। वह बता रहा था कि गब्बे को शक्ति प्रदर्शन की सलाह परधान जी ने दी है। इस सूचना से मैं बहुत चिन्तित हूँ।
रोहू परधान जी से नाफिट रहता है। पिछले चुनाव में उसने परधान जी को वोट नहीं दिए थे। बहुत दिनों तक परधान जी ने अपने खेतों में उसकी भैंसें न चरने दी थी। तभी से उनके खिलाफ वह जहर उगलता रहता है।
रोहू को लगता है कि परधान जी ने ही उसे पिटवाया था। उनकी शह न होती, तो
गब्बे की हिम्मत नहीं थी कि उस पर हाथ उठा देता। वह जब से पिट गया है, तब से हर आदमी को शक की नजर से देखने लगा है। गब्बे से न जीता, तो उन पर आरोप मढ़ रहा है। वे ऐसे तुच्छ काम न करेंगे। रोहू से उन्हें कौन-सा खतरा था, जिसे पिटवाने की जरूरत पड़ गई।
मुझे समझ नहीं आ रहा है कि परधान जी उसे शक्ति प्रदर्शन की सलाह क्यों देंगे? गब्बे को अपने बराबर खड़ा करके वे अपने पैर पर कुल्हाड़ी न मारेंगे। गब्बे के उदय से इनकी राजनीति खत्म ही समझो। बिना राजनीति के नेता की जिन्दगी मौत से बदतर हो जाती है। उन्होंने जब अपना कंडीडेट खड़ा कर दिया है, तो उसी का सपोर्ट करेंगे। मान लो वे ऐसा कर भी रहे हैं, तो उसका कारण भी होना चाहिए। बिना कारण के अविश्वास… संभव नहीं।
मुझे उनके स्वभाव में परिवर्तन नहीं दिख रहा है। मनुष्य इतने बड़े धोखे को कैसे छिपा सकता है? शरीर का भी तो एक धर्म होता है। क्या शरीर अपना धर्म नहीं निभाएगा? उनके और मेरे बीच में किसी विषय पर असहमति भी नहीं हुई है। उन्होंने जो कहा, मैंने किया, जो सुझाव दिया मैंने माना। न मनभेद, न मतभेद।
रोहू की बात का मैं क्या अर्थ निकालूँ? वह मेरा प्रचार कम, दिमाग ज्यादा खराब करता है। उल्टी-सीधी न्यूज लाकर मेरा ध्यान भटकाता है। मैंने रोहू में एक बात नोट की है, जब भी मैं उससे राय-सलाह लेती हूँ, वह बुरा मुँह बना लेता है।
रोहू तो ऐसा ही है। मुझे ठंडे दिमाग से प्रचार पर ध्यान देना है। आक्रोश को साथ लेकर गाँव में घूमने निकलूँगी, तो स्वर में तल्खी आएगी, जिससे लोगों पर बुरा असर पड़ेगा।
रोहू बता रहा था कि प्रचार के पहले गब्बे ने किसी को दारू नहीं पीने दी। प्रदर्शन के बाद पिलाई गई थी। उसकी यह बात सही निकली।
कलुआ दारू में आंय-बांय बक रहा था। दारू की जुंग में वह चिल्ला रहा था कि गब्बे के सामने रमकल्लो कहीं न टिकेगी। भैया ही जीतेगा। कलुआ वहाँ नाच रहा था। दारू में लोग कसमें खा रहे थे।
उसके जुलूस में परधान जी के घर से कोई शामिल नहीं था। गब्बे की तरफ झुकाव भी समझ में नहीं आया। हाँ परधानिन चाची जरूर भुकरी रहत। मुझे लगता है, चाची चुनाव लड़ना चाहती थी, इसी से उनका मानसून गड्डबड्ड है। मैंने प्रचार के लिए साथ चलने को कहा था, तो मुझ पर खीझ उठी थीं। कह रही थीं, मैं सरतारी नहियाँ जो तेरे साथ गाँव भर में घूमती फिरूँ। मैंने दोबारा नहीं कहा। कहने से फायदा क्या?
मैंने परधान जी को बताया कि गब्बे ने अपनी ताकत दिखा दी है, हमें क्या करना है? वे कह रहे थे कि रमकल्लो चिन्ता न कर। जुलूस में शामिल सभी लोग उसके वोट न देंगे। चुनाव के दो दिन पहले मतदाताओं का मूड बनता है।
मतदाताओं से पहले मैं उनका मूड भाँपना चाहती थी। रोहू की बात में कितनी
सच्चाई है, मैं परखना चाहती थी। उन्हें देखकर नहीं लग रहा था कि वे मेरा साथ छोड़ रहे हैं।
प्राननाथ बढ़-चढ़कर प्रचार हो रहा है। मैं पीछे हटने वाली नहीं हूँ। जनता का रुझान किस ओर होगा, चुनाव बाद ही पता चलेगा। परिस्थितियाँ कैसी बनती हैं, मैं आपको अवगत कराती रहूँगी। आजकल मैं बहुत व्यस्त हूँ, पत्र न लिख पाऊँगी। कल प्रचार थम जाएगा। परसों वोटिंग होगी। इसके तीन दिन बाद वोटिंग खुल जाएगी। ईश्वर ने चाहा, तो जीत के जश्न में डूबा पत्र आपके हाथ में होगा।
मेरी समझ में जिन्दगी की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है। हर पल इसकी परिभाषाएँ बदलती रहती हैं। पल भर में क्या मिल जाए, क्या हाथ से निकल जाए, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। यह जीवन द्वन्द्व और संघर्षों से भरा ऐसा चक्रव्यूह है, जिसमें फंसकर मनुष्य छटपटा सकता है, निकल नहीं सकता। मैं भी इस चक्रव्यूह में घुस तो गई थी, पर निकलने का रास्ता मुझे न मिला। मुझ पर उन्हीं लोगों ने घात किया, जिनका हाथ मेरे सिर पर था।
मेरे साथ छल हुआ है प्राननाथ! दोष किसे दूँ? अपने नसीब को या जनता को, जिसने मात्र पन्द्रह वोटों से मुझे हरा दिया। यदि परधान जी के घर के वोट मिल जाते तो मैं जीत जाती। ऐन वक्त पर वे मेरे प्रतिद्वन्द्वी से जा मिले।
प्राननाथ, ये कैसी राजनीति है, जो आज दोस्ती में हाथ मिलाता है, कल वह उन्हीं हाथों को काटकर दुश्मन बन जाता है। सत्ता प्राप्ति के खेल में ये किसी भी हद तक जा सकते हैं क्योंकि इनके लिए असली सत्य सत्ता है, फिर चाहे किसी की गर्दन काटकर ही क्यों न मिले? लोकतंत्र का मुखौटा तो ये अपनी स्वार्थ लिप्सा की पूर्ति के लिए लगाते हैं। इनसे जनहित की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
परधान जी, मुझे शतरंज की गोट की तरह इस्तेमाल करते रहे। इसके लिए वे शर्मसार भी नहीं हैं। इतनी जल्दी ये अपने खोल कैसे बदल लेते हैं, अब मुझे आश्चर्य
नहीं होता है। इनके लिए सत्ता ही सब कुछ है। तिकड़मों से वोट हासिल करके सत्ता हासिल करना इनका खेल बन चुका है। रिश्ते-नाते, दोस्ती की इनके लिए कोई अहमियत नहीं है। स्वार्थ सिद्धि के लिए ये किसी भी हद तक अमानवीय हो सकते हैं। सुनती आ रही थी कि राजनीति में वफादारी का इनाम मौत होती है, आज प्रत्यक्ष देख लिया।
प्राननाथ, परधान जी अन्त समय तक यही प्रदर्शित करते रहे कि वे मेरे साथ हैं। मैं पागल यह न समझ पाई कि जो गुप्त योजनाएँ इनके साथ साझा कर रही हूँ, उनकी खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई जाएँगी। राजनीति के दो धुरन्धरों के बीच मुझ जैसी स्त्री के लिए कोई जगह न बची। मैं परधान जी के हाथ का खिलौना भर रह गई। कितना विश्वास था परधान जी पर, लेकिन उन्होंने मेरे विश्वास को बड़ी बेरहमी से कुचल दिया।
मुझ जैसी स्त्री चुनाव लड़ने के लिए नहीं बनी है क्योंकि मुझमें पुरुष जैसा काइयांपन नहीं है और न ही सत्ताधारियों जैसा कलेजा, जो दिखावटी मुस्कान की ढाल में सारे व्यंग्य वाणों को निष्फल कर देते हैं। सत्ता की पथबाधा बनी स्त्री को पुरुष विश्वास का जहर देकर मारने में माहिर हैं। यह उन्होंने सिद्ध कर दिया है।
परधान जी का काइयाँपन मुझ जैसी स्त्री को सहन न कर सका। मुझे सभी ने समझाया था कि परधान जी विश्वास के काबिल नहीं हैं, पर मेरी अक्ल पर पत्थर पड़ गया था। मैं समझती रही कि धोखा औरों को दिया जाता है, मुझे नहीं। ऐसा जान जाती तो सतर्क हो जाती। अगर इतनी नजदीकी हार न होती, तो समझ ही न पाती कि धोखा कैसा होता है। वोट खुलते ही मेरी जीत पक्की हो गई थी। अधिकतर वार्डों में मैं आगे चल रही थी। दो सौ वोटों की बढ़त कुछ होती है। लेकिन अपने मुहल्ले के वोट खुले तो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। इस मुहल्ले से मुझे मात्र दस वोट मिले। हरबी जिज्जी, रोहू और मखना कक्का के घर के वोट मेरे हिस्से आए। मखना कक्का का विश्वास नहीं था, पर उन्होंने मुझे वोट दिए।
जब मैं दो सौ वोटों से आगे चल रही थी, तब परधान जी की बेचैनी मुझे असहज कर रही थी। मैंने सोचा कि शायद वे इतने वोटों से संतुष्ट नहीं हैं। मुझे ज्यादा वोटों से आगे होना चाहिए था। गब्बे और परधान जी की गुफ्तगू ने मेरी त्योरियाँ चढ़ा दी थी पर जीत मेरी होगी, इस खुशी में मैंने सब कुछ नजरअंदाज कर दिया था।
परधान जी ने ऐसा क्यों किया, मुझे अब भी समझ में नहीं आ रहा है। पूरे गाँव में मेरे ही पक्ष में हवा बह रही थी लेकिन उन्होंने अपनी तिकड़मों से हवा का रुख ही मोड़ दिया। एक कोने की पूरी की पूरी हवा मोड़कर मेरे किए-कराए पर पानी फेर दिया।
मुझे हराने के लिए उन्होंने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। अपने मुहल्ले के वोट उन्होंने रुपयों से खरीद लिए। लोग बिक भी गए। हरबी जिज्जी और रोहू को खरीदने की उनकी हिम्मत न हुई। मखना कक्का को रुपये नहीं मिले, सो गुस्सा में अपने वोट मुझे दे
दिए। खरीद-फरोख्त वाली राजनीति देश-समाज को कहाँ ले जाकर छोड़ेगी, कहा नहीं जा सकता है।
जीवन भर कड़वा घूँट पीती आई हूँ लेकिन अब और घूँट पीने की हिम्मत मुझमें नहीं बची है। मैं हार चुकी हूँ। मेरे लिए यह जीवन भार हो गया है।
प्राननाथ, अब बहुत हो चुका। मेरा है ही कौन, जिसे मैं अपनी पीड़ा बाँट सकूँ। सहन करने की भी एक सीमा होती है, जो अब पार हो चुकी है। बस… अब और नहीं।
सिर्फ
रमकल्लो
___________
लखनलाल पाल
जन्मतिथि- 2 जुलाई सन 1968
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट इटैलिया बाजा जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश
शिक्षा – b.sc गणित M.A हिंदी b.ed पीएच-डी हिंदी
प्रकाशित रचनाएं- हंस, कथादेश, कथाक्रम ,लमही ,युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा, पुरवाई आदि में कहानियां प्रकाशित।
सम्प्रति – रमकल्लो की पाती उपन्यास धारावाहिक रूप से पुरवाई पत्रिका में प्रकाशित
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास) पंच बिरादरी , कोरोना लॉकडाउन और लड़की (कहानी संग्रह )
वर्तमान पता- कृष्णाधाम के आगे नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश 28 5 001
https://www.thepurvai.com/ramkallo-ki-paati-by-lakhanlal-pal-29-30/
इस उनतीसवीं पाती में चुनाव के करीबी दिन आते ही अचानक यह क्या होने लगा। मामला जैसे अप एंड डाउन हो रहा है। लगता है उस धूर्त गब्बे ने तमाम लोगों को कुछ झांसापट्टी देकर अपनी तरफ कर लिया है। उनको अपने चुनाव के प्रदर्शन में शामिल करके रमकल्लो को खुले आम चुनौती दे रहा है। इस बात से रमकल्लो की जैसे जान सूखने लगी है। हाल तराजू के दो पलड़ों सा हो रहा है। कभी एक पलड़ा भारी तो कभी दूसरा। रोहू की बातों से भी उसके रंग-ढंग अच्छे नहीं दिख रहे हैं। अब चुनाव के इस पड़ाव पर आकर रमकल्लो को घबराहट होने लगी है कि कहीं गब्बे न जीत जाये। प्रदर्शन के बाद वह उन लोगों को जमकर शराब पिलाता है पर प्रदर्शन के दौरान नहीं। बड़ा काइयां है वह। कि कहीं प्रदर्शन के दौरान नशे में लोग कोई घपला न कर दें। उनके अनाप-शनाप बकने से गब्बे की छवि बिगड़ सकती है और उसके वोटों को नुकसान हो सकता है। लेकिन शराब के लालच में ही लोग उसके लिए नारे लगाने को तैयार हो गये होंगे।
एक बात से रमकल्लो बहुत चिंतित हो रही है कि परधान जी भी गब्बे को प्रोत्साहन दे रहे हैं। ऐसा उसने रोहू को कहते सुना है। क्या वह गिरगिट की तरह रंग बदल रहे हैं? उसे रोहू की बात पर विश्वास नहीं होता क्योंकि परधान जी ने ही तो उसे कैंडिडेट बनाकर चुनाव लड़ने को कहा था। इसलिए सोचती है कि यह सब सुनी सुनाई बातें ही हैं। गब्बे उसका मन जलाने के लिए भी तो ऐसा कह सकता है। उसके मन में चिंता से जो द्वंद मचा हुआ है उसका सारा विवरण उसने अपने पति को (जो अब तक कहीं गूंगे-बहरे बने बैठे हैं), लिख डाला है।
ओह नो! अब इस तीसवीं और आखिरी पाती को पढ़कर बड़ा झटका लगा। इसमें रमकल्लो की सारी आशाएं ध्वस्त हो गईं, सारे सपने चूर-चूर हो गये। यह परधान तो बड़ा बेईमान निकला। लग रहा है कि उसे राजनीति के इस खेल में फंसाकर परधान ने उससे कोई बदला लिया है। यह एक भयानक सच है कि वह गब्बे से हार गई है। राजनीति उसेअब एक घिनौना खेल लगने लगी है। उसकी समझ से परे है कि परधान ने उसके साथ यह सब क्यों किया। दगाबाजी करके उसे क्या मिला। स्वयं को आड़ में रखकर वह उसका मखौल बनाने के लिये गब्बे से हाथ मिलाता रहा। और ऐन वक्त पर उसका पांसा पलट दिया।
मर्द की फितरत रही है कि वह एक स्त्री को अपने से ऊंचा उठता नहीं देख सकता। और यही हुआ रमकल्लो के साथ भी। बेचारी रमकल्लो! खैर, रमकल्लो टूटकर व गिरकर भी उठने वाले लोगों में से है। पर कहानी का अंत होने से अब उससे विदा लेनी पड़ रही है। दो शब्द रमकल्लो के लिए कहना चाहती हूँ कि तुम्हे जिस रचयिता ने रचा उसने तुम्हें आदर्शों के उस शिखर तक पहुंचाया कि जिन्होंने तुम्हें पढ़ा और जाना उनके लिए तुम एक रोल मॉडल बन गईं। यदि तुम फिर कभी अवतरित होना तो फिर से वसंत की तरह ही खिलना। और पाठकों को फिर से मंत्रमुग्ध कर देना। और परधान जैसे धोखेबाज लोगों से बचकर रहना।
एक बात बताऊँ…तुमसे मिलना बहुत अच्छा लगा। लेकिन मिलन के बाद विदाई भी आती है। उसके बाद भी तुम मेरी यादों में हमेशा रहोगी। चलो अब गले मिलते हैं। गुडबाई रमकल्लो!
और ‘रमकल्लो की पाती’ उपन्यास के लेखक लखनलाल पाल जी को उत्कृष्ट लेखन के लिए हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।
शन्नो जी, आप इस उपन्यास की नियमित पाठक रही हैं। कभी-कभी परेशानियां के बाद भी आप रमकल्लो का हालचाल जानती रही हैं। इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है मेरे लिए। मैं आपका शुक्रगुजार हूं शन्नो जी।
शन्नो जी, पाठकों को यूं ही नहीं छोड़ा जा सकता है। पूरी पाती के दरमियान साहित्यकार और पाठक उसके पति के बारे में जानने को उतावले रहे हैं। अगली अंतिम पाती में उसके पति की एंट्री है। यहीं उपन्यास पूर्ण हो जाता है।
पिछली बार की भी दोनों पातियाँ पढ़ ली थीं लेकिन लिख भर नहीं पाए।
उनमें तो चुनाव की चर्चा ही थी लेकिन इस बार की पातियों ने तो दिल दुखा दिया।
चुनाव की राजनीति, दिल और दिमाग में दोगलापन, परस्पर स्वार्थ की भावना और कपट सब समझ में आ गया।
नेक दिल लोगों पर इन चीजों का गहरा असर पड़ता है।
रमकल्लो का सरल व नेकदिल बहुत आहत हुआ।
लोगों को, खासकर गाँव के लोग जिनमें समझ की कमी होती है किसी पार्टी से कोई लेना-देना नहीं रहता है।बस टाइम पर जो प्रोग्राम चलता है, शराब पैसा और चीजें बाँटने का गरीब लोग उसी से अधिक प्रभावित होते हैं।
उम्मीदवार को कोई फर्क नहीं पड़ता ।चुनाव में जो बाँटते हैं और खर्च करते हैं 5 सालों में उससे कई गुना अधिक कमा लेते हैं।
चुनाव का मतलब सिर्फ पैसा है। पहले खर्च करना फिर कामना। नेकी से दूर-दूर तक उनका कोई वास्ता नहीं।
रमकल्लो का दुख महसूस हुआ।
वास्तव में सीधे सरल लोगों के लिए राजनीति है ही नहीं! रमकल्लो के पास तो उसका स्वयं के पति का वोट भी खाली गया।
अबकी बार की पाती में चुनाव की नीति प्रकार सब कुछ खुली किताब की तरह सामने आदमी आ गया।
जिसने उसे जबरदस्ती खड़ा किया, साथ देने का वादा किया, विश्वास दिलाया,धोखा भी वहीं से हुआ।
रमकल्लो एक जीती जागती शख्सियत की तरह दिलों दिमाग में बैठ गई है।
पाती के माध्यम से ग्रामीण जीवन की एक सच्चाई को आपने निरंतर व्यक्त किया।
रमकल्लो के माध्यम से उसे जैसी सभी के लिये बहुत-बहुत प्यार और भविष्य के लिए आशीर्वाद और शुभकामनाएँ।
आपको भी बहुत-बहुत बधाई।
आदरणीया नीलिमा करैया जी, आपकी समीक्षा रचना को और पठनीय बना देती है। कुछ लोग आपकी समीक्षा से प्रेरित होकर इसे पढ़ते हैं।
रमकल्लो पर आपकी यह समीक्षा मुझे खुशी प्रदान कर रही है। नीलिमा करैया जी आपका बहुत-बहुत आभार
आदरणीय लखनलाल पाल
रमकल्लो की पाती का 29 – 30 भाग पढ़ लिया । लगता है अब यह रमकल्लो के जीवन का महत्वपूर्ण मोड सामने आ रहा है और पाती के अन्त में रमकल्लो के संदर्भ में निश्चित ठोस नतीजे सामने आएँगे इसमें कोई आशंका नहीं है।
इस पाती की सबसे बडी विशेषता यह है आपकी धारावाहिक लेखन शैली जो कौतुहल और उत्कंठा को बढ़ाती है और पाठक बरबस खींचा चला जाता है।
अति सुन्दर प्रस्तुति
आजकल मैं भी चुनाव कार्य में लिप्त हूँ इसलिए काफी देर से पढ पाया सो लिखने के लिए देरी हो गई !
बहुत बहुत बधाई !
प्रो. विजय महादेव गाडे
आदरणीय विजय गाडे जी आपकी टिप्पणी का मुझे बेसब्री से इंतजार रहता है। लेकिन जब आप ग्रुप में दिखे नहीं या अल्प काल के लिए दिखते हैं तो समझ में आ जाता है कि कोई काम जरूर आ गया होगा।
नौकरी पेशा वालों के लिए ऐसी स्थितियां बनती रहती है। चुनाव आदि राष्ट्रहित से जुड़े हुए हैं। इसलिए इस पुनीत कार्य में आपका योगदान महत्वपूर्ण है।
“इस पाती की सबसे बड़ी विशेषता है आपकी धारावाहिक लेखन शैली जो कौतूहल और उत्कंठा को बढ़ाती है और पाठक बरबस खिंचा चला आता है।” इस टिप्पणी का केंद्र बिन्दु है।
इतनी बढ़िया टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार सर
प्रधानी के चुनाव में रमकल्लो की हार स्त्री अस्मिता की सीधी पराजय है और जीत हुई है हर मामले में पिछड़े, समस्याओं-असुविधाओं अभावों से जूझते -खपते दकियानूसी किंतु सामंतवादी पुरुषसत्तात्मक सोच से ग्रसित समाज की।
वस्तुतः रमकल्लो जैसे स्त्री चरित्र भले ही चुनाव में पराजित हो जाए किंतु मुझे लगता है वे आत्म विजयी रहते हैं। रमकल्लो भले ही चुनाव हार गई हो परंतु वह भीतर से नहीं हारी है। उसके अंदर की जीवटता उसे संबल दिए रहती है…
रोहू जब प्रधान के भितरघात करने की बात रमकल्लो को बताता है तब रमकल्लो का जो आत्म – चिंतन है, स्वत: कथन है, वह इसी बात की गवाही देता है-
—“मुझे उनके स्वभाव में परिवर्तन नहीं दिख रहा है। मनुष्य इतने बड़े धोखे को कैसे छिपा सकता है? शरीर का भी तो एक धर्म होता है। क्या शरीर अपना धर्म नहीं निभाएगा? उनके और मेरे बीच में किसी विषय पर असहमति भी नहीं हुई है। उन्होंने जो कहा, मैंने किया, जो सुझाव दिया मैंने माना। न मनभेद, न मतभेद।”
कितने बड़े मनवाली स्त्री है रमकल्लो जो सामाजिक अपमान के जहर को पीरकर नीलकंठ बनी रहती है। वरिष्ठ कथाकार आदरणीय लखनलाल पाल की दृष्टि स्त्री अस्मिता और स्वातंत्र्य के नवीन निकष उत्पन्न करती है।
रमकल्लो जैसे अनूठे पात्र सृजन के लिए कथाकार भाई लखनलाल को अनेक बधाइयाँ।
आदरणीय डॉ रामशंकर भारती जी, आपने रमकल्लो की हार में भी स्त्री अस्मिता और आत्मिक विजय के रूप में जो वैचारिक जमीन प्रदान की है इससे पाती का महत्व बढ़ गया है।
आपने पाती के मर्म को गहराई से छू लिया है। इसके लिए बहुत-बहुत आभार भारती जी
बहुत दिनो बाद रमकल्लो से मिल रही हूं।अब तो वह राजनीति के.मैदान में उतर गई है और दूसरों के.लिए चुनौती भी बनी है।विरोधी उम्मीदवार गब्बे के शक्ति प्रदर्शन से वह कुछ चिंतित तो.हुई पर हौसले अभी भी बुलंद हैं। अब राजनीतिक दांव पेंच भी समझती है रमकल्लो इसलिए प्रधान जी की चाल को भी समझने की कोशिश कर रही है।उसे.लगता है कि नेता तो.राजनीति करने से बाज नहीं आ सकते।जैसा कि अपनी पाती में वो कहती भी है–**बिना राजनीति के नेता की जिन्दगी मौत से बदतर हो जाती है।*
हमारी रमकल्लो चुनाव हार जाती है या हरा दी जाती है।फिर भी वह उत्साह और कर्तव्य निष्ठा से भरी है,उसके हौसले बुलंद हैं।अपनी शिक्षा को सही अर्थों में उसने संवारा है। गाँव की चुनौतियाँ, सामाजिक विकृतियां भी उसे अपने रासते से डिगा नहीं पाती। यही तो वह गाँव के परिवेश में पली बढी ,वहीं के संस्कारो में ढली ,शिक्षित हुई रमकल्लो बहुत बडी प्रेरणा दे जाती है हम सबके लिए। इस बार की रमकल्लो बहुत समझदार और प्यारी लगी।और भी आगे बढे और बहुत कुछ कर सके जो उसके सपनों में है कामना करती हूं।
आदरणीया पद्मा जी,
रमकल्लो की पाती पर आपकी इस आत्मीय प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार
रमकल्लो के हौसले, उसकी राजनीतिक समझ और जिंदगी की चुनौतियों को आपने जिस गहराई से पकड़ा है, वह एक लेखक के लिए बड़ी बात है। आपकी यह प्रतिक्रिया रचना को जीवंत बना देती है।
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इस उनतीसवीं पाती में चुनाव के करीबी दिन आते ही अचानक यह क्या होने लगा। मामला जैसे अप एंड डाउन हो रहा है। लगता है उस धूर्त गब्बे ने तमाम लोगों को कुछ झांसापट्टी देकर अपनी तरफ कर लिया है। उनको अपने चुनाव के प्रदर्शन में शामिल करके रमकल्लो को खुले आम चुनौती दे रहा है। इस बात से रमकल्लो की जैसे जान सूखने लगी है। हाल तराजू के दो पलड़ों सा हो रहा है। कभी एक पलड़ा भारी तो कभी दूसरा। रोहू की बातों से भी उसके रंग-ढंग अच्छे नहीं दिख रहे हैं। अब चुनाव के इस पड़ाव पर आकर रमकल्लो को घबराहट होने लगी है कि कहीं गब्बे न जीत जाये। प्रदर्शन के बाद वह उन लोगों को जमकर शराब पिलाता है पर प्रदर्शन के दौरान नहीं। बड़ा काइयां है वह। कि कहीं प्रदर्शन के दौरान नशे में लोग कोई घपला न कर दें। उनके अनाप-शनाप बकने से गब्बे की छवि बिगड़ सकती है और उसके वोटों को नुकसान हो सकता है। लेकिन शराब के लालच में ही लोग उसके लिए नारे लगाने को तैयार हो गये होंगे।
एक बात से रमकल्लो बहुत चिंतित हो रही है कि परधान जी भी गब्बे को प्रोत्साहन दे रहे हैं। ऐसा उसने रोहू को कहते सुना है। क्या वह गिरगिट की तरह रंग बदल रहे हैं? उसे रोहू की बात पर विश्वास नहीं होता क्योंकि परधान जी ने ही तो उसे कैंडिडेट बनाकर चुनाव लड़ने को कहा था। इसलिए सोचती है कि यह सब सुनी सुनाई बातें ही हैं। गब्बे उसका मन जलाने के लिए भी तो ऐसा कह सकता है। उसके मन में चिंता से जो द्वंद मचा हुआ है उसका सारा विवरण उसने अपने पति को (जो अब तक कहीं गूंगे-बहरे बने बैठे हैं), लिख डाला है।
ओह नो! अब इस तीसवीं और आखिरी पाती को पढ़कर बड़ा झटका लगा। इसमें रमकल्लो की सारी आशाएं ध्वस्त हो गईं, सारे सपने चूर-चूर हो गये। यह परधान तो बड़ा बेईमान निकला। लग रहा है कि उसे राजनीति के इस खेल में फंसाकर परधान ने उससे कोई बदला लिया है। यह एक भयानक सच है कि वह गब्बे से हार गई है। राजनीति उसेअब एक घिनौना खेल लगने लगी है। उसकी समझ से परे है कि परधान ने उसके साथ यह सब क्यों किया। दगाबाजी करके उसे क्या मिला। स्वयं को आड़ में रखकर वह उसका मखौल बनाने के लिये गब्बे से हाथ मिलाता रहा। और ऐन वक्त पर उसका पांसा पलट दिया।
मर्द की फितरत रही है कि वह एक स्त्री को अपने से ऊंचा उठता नहीं देख सकता। और यही हुआ रमकल्लो के साथ भी। बेचारी रमकल्लो! खैर, रमकल्लो टूटकर व गिरकर भी उठने वाले लोगों में से है। पर कहानी का अंत होने से अब उससे विदा लेनी पड़ रही है। दो शब्द रमकल्लो के लिए कहना चाहती हूँ कि तुम्हे जिस रचयिता ने रचा उसने तुम्हें आदर्शों के उस शिखर तक पहुंचाया कि जिन्होंने तुम्हें पढ़ा और जाना उनके लिए तुम एक रोल मॉडल बन गईं। यदि तुम फिर कभी अवतरित होना तो फिर से वसंत की तरह ही खिलना। और पाठकों को फिर से मंत्रमुग्ध कर देना। और परधान जैसे धोखेबाज लोगों से बचकर रहना।
एक बात बताऊँ…तुमसे मिलना बहुत अच्छा लगा। लेकिन मिलन के बाद विदाई भी आती है। उसके बाद भी तुम मेरी यादों में हमेशा रहोगी। चलो अब गले मिलते हैं। गुडबाई रमकल्लो!
और ‘रमकल्लो की पाती’ उपन्यास के लेखक लखनलाल पाल जी को उत्कृष्ट लेखन के लिए हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।
शन्नो जी, आप इस उपन्यास की नियमित पाठक रही हैं। कभी-कभी परेशानियां के बाद भी आप रमकल्लो का हालचाल जानती रही हैं। इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है मेरे लिए। मैं आपका शुक्रगुजार हूं शन्नो जी।
शन्नो जी, पाठकों को यूं ही नहीं छोड़ा जा सकता है। पूरी पाती के दरमियान साहित्यकार और पाठक उसके पति के बारे में जानने को उतावले रहे हैं। अगली अंतिम पाती में उसके पति की एंट्री है। यहीं उपन्यास पूर्ण हो जाता है।
https://www.thepurvai.com/ramkallo-ki-paati-by-lakhanlal-pal-29-30/
आदरणीय सर जी!
पिछली बार की भी दोनों पातियाँ पढ़ ली थीं लेकिन लिख भर नहीं पाए।
उनमें तो चुनाव की चर्चा ही थी लेकिन इस बार की पातियों ने तो दिल दुखा दिया।
चुनाव की राजनीति, दिल और दिमाग में दोगलापन, परस्पर स्वार्थ की भावना और कपट सब समझ में आ गया।
नेक दिल लोगों पर इन चीजों का गहरा असर पड़ता है।
रमकल्लो का सरल व नेकदिल बहुत आहत हुआ।
लोगों को, खासकर गाँव के लोग जिनमें समझ की कमी होती है किसी पार्टी से कोई लेना-देना नहीं रहता है।बस टाइम पर जो प्रोग्राम चलता है, शराब पैसा और चीजें बाँटने का गरीब लोग उसी से अधिक प्रभावित होते हैं।
उम्मीदवार को कोई फर्क नहीं पड़ता ।चुनाव में जो बाँटते हैं और खर्च करते हैं 5 सालों में उससे कई गुना अधिक कमा लेते हैं।
चुनाव का मतलब सिर्फ पैसा है। पहले खर्च करना फिर कामना। नेकी से दूर-दूर तक उनका कोई वास्ता नहीं।
रमकल्लो का दुख महसूस हुआ।
वास्तव में सीधे सरल लोगों के लिए राजनीति है ही नहीं! रमकल्लो के पास तो उसका स्वयं के पति का वोट भी खाली गया।
अबकी बार की पाती में चुनाव की नीति प्रकार सब कुछ खुली किताब की तरह सामने आदमी आ गया।
जिसने उसे जबरदस्ती खड़ा किया, साथ देने का वादा किया, विश्वास दिलाया,धोखा भी वहीं से हुआ।
रमकल्लो एक जीती जागती शख्सियत की तरह दिलों दिमाग में बैठ गई है।
पाती के माध्यम से ग्रामीण जीवन की एक सच्चाई को आपने निरंतर व्यक्त किया।
रमकल्लो के माध्यम से उसे जैसी सभी के लिये बहुत-बहुत प्यार और भविष्य के लिए आशीर्वाद और शुभकामनाएँ।
आपको भी बहुत-बहुत बधाई।
आदरणीया नीलिमा करैया जी, आपकी समीक्षा रचना को और पठनीय बना देती है। कुछ लोग आपकी समीक्षा से प्रेरित होकर इसे पढ़ते हैं।
रमकल्लो पर आपकी यह समीक्षा मुझे खुशी प्रदान कर रही है। नीलिमा करैया जी आपका बहुत-बहुत आभार
आदरणीय लखनलाल पाल
रमकल्लो की पाती का 29 – 30 भाग पढ़ लिया । लगता है अब यह रमकल्लो के जीवन का महत्वपूर्ण मोड सामने आ रहा है और पाती के अन्त में रमकल्लो के संदर्भ में निश्चित ठोस नतीजे सामने आएँगे इसमें कोई आशंका नहीं है।
इस पाती की सबसे बडी विशेषता यह है आपकी धारावाहिक लेखन शैली जो कौतुहल और उत्कंठा को बढ़ाती है और पाठक बरबस खींचा चला जाता है।
अति सुन्दर प्रस्तुति
आजकल मैं भी चुनाव कार्य में लिप्त हूँ इसलिए काफी देर से पढ पाया सो लिखने के लिए देरी हो गई !
बहुत बहुत बधाई !
प्रो. विजय महादेव गाडे
आदरणीय विजय गाडे जी आपकी टिप्पणी का मुझे बेसब्री से इंतजार रहता है। लेकिन जब आप ग्रुप में दिखे नहीं या अल्प काल के लिए दिखते हैं तो समझ में आ जाता है कि कोई काम जरूर आ गया होगा।
नौकरी पेशा वालों के लिए ऐसी स्थितियां बनती रहती है। चुनाव आदि राष्ट्रहित से जुड़े हुए हैं। इसलिए इस पुनीत कार्य में आपका योगदान महत्वपूर्ण है।
“इस पाती की सबसे बड़ी विशेषता है आपकी धारावाहिक लेखन शैली जो कौतूहल और उत्कंठा को बढ़ाती है और पाठक बरबस खिंचा चला आता है।” इस टिप्पणी का केंद्र बिन्दु है।
इतनी बढ़िया टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार सर
*रमकल्लो चुनाव हारी है, हिम्मत नहीं*
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प्रधानी के चुनाव में रमकल्लो की हार स्त्री अस्मिता की सीधी पराजय है और जीत हुई है हर मामले में पिछड़े, समस्याओं-असुविधाओं अभावों से जूझते -खपते दकियानूसी किंतु सामंतवादी पुरुषसत्तात्मक सोच से ग्रसित समाज की।
वस्तुतः रमकल्लो जैसे स्त्री चरित्र भले ही चुनाव में पराजित हो जाए किंतु मुझे लगता है वे आत्म विजयी रहते हैं। रमकल्लो भले ही चुनाव हार गई हो परंतु वह भीतर से नहीं हारी है। उसके अंदर की जीवटता उसे संबल दिए रहती है…
रोहू जब प्रधान के भितरघात करने की बात रमकल्लो को बताता है तब रमकल्लो का जो आत्म – चिंतन है, स्वत: कथन है, वह इसी बात की गवाही देता है-
—“मुझे उनके स्वभाव में परिवर्तन नहीं दिख रहा है। मनुष्य इतने बड़े धोखे को कैसे छिपा सकता है? शरीर का भी तो एक धर्म होता है। क्या शरीर अपना धर्म नहीं निभाएगा? उनके और मेरे बीच में किसी विषय पर असहमति भी नहीं हुई है। उन्होंने जो कहा, मैंने किया, जो सुझाव दिया मैंने माना। न मनभेद, न मतभेद।”
कितने बड़े मनवाली स्त्री है रमकल्लो जो सामाजिक अपमान के जहर को पीरकर नीलकंठ बनी रहती है। वरिष्ठ कथाकार आदरणीय लखनलाल पाल की दृष्टि स्त्री अस्मिता और स्वातंत्र्य के नवीन निकष उत्पन्न करती है।
रमकल्लो जैसे अनूठे पात्र सृजन के लिए कथाकार भाई लखनलाल को अनेक बधाइयाँ।
डॉ रामशंकर भारती
आदरणीय डॉ रामशंकर भारती जी, आपने रमकल्लो की हार में भी स्त्री अस्मिता और आत्मिक विजय के रूप में जो वैचारिक जमीन प्रदान की है इससे पाती का महत्व बढ़ गया है।
आपने पाती के मर्म को गहराई से छू लिया है। इसके लिए बहुत-बहुत आभार भारती जी
बहुत दिनो बाद रमकल्लो से मिल रही हूं।अब तो वह राजनीति के.मैदान में उतर गई है और दूसरों के.लिए चुनौती भी बनी है।विरोधी उम्मीदवार गब्बे के शक्ति प्रदर्शन से वह कुछ चिंतित तो.हुई पर हौसले अभी भी बुलंद हैं। अब राजनीतिक दांव पेंच भी समझती है रमकल्लो इसलिए प्रधान जी की चाल को भी समझने की कोशिश कर रही है।उसे.लगता है कि नेता तो.राजनीति करने से बाज नहीं आ सकते।जैसा कि अपनी पाती में वो कहती भी है–**बिना राजनीति के नेता की जिन्दगी मौत से बदतर हो जाती है।*
हमारी रमकल्लो चुनाव हार जाती है या हरा दी जाती है।फिर भी वह उत्साह और कर्तव्य निष्ठा से भरी है,उसके हौसले बुलंद हैं।अपनी शिक्षा को सही अर्थों में उसने संवारा है। गाँव की चुनौतियाँ, सामाजिक विकृतियां भी उसे अपने रासते से डिगा नहीं पाती। यही तो वह गाँव के परिवेश में पली बढी ,वहीं के संस्कारो में ढली ,शिक्षित हुई रमकल्लो बहुत बडी प्रेरणा दे जाती है हम सबके लिए। इस बार की रमकल्लो बहुत समझदार और प्यारी लगी।और भी आगे बढे और बहुत कुछ कर सके जो उसके सपनों में है कामना करती हूं।
आदरणीया पद्मा जी,
रमकल्लो की पाती पर आपकी इस आत्मीय प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार
रमकल्लो के हौसले, उसकी राजनीतिक समझ और जिंदगी की चुनौतियों को आपने जिस गहराई से पकड़ा है, वह एक लेखक के लिए बड़ी बात है। आपकी यह प्रतिक्रिया रचना को जीवंत बना देती है।