Wednesday, February 11, 2026
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लखनलाल पाल की कलम से : रमकल्लो की पाती (भाग – 25-26)

: पच्चीसवीं पाती :
दाँव-पेंचों में उलझता गाँव
प्राननाथ,
गाँव की हवा दूषित हो रही है। बात-बात पर बवंडर खड़ा कर दिया जाता है। दो दिन पहले हरबी जिज्जी और कलुआ का झगड़ा हो गया था। जिज्जी भी कम नहीं है। वह कलुआ से गुत्थमगुत्था हो गई। एक बार कलुआ ने सरोजी की छाती पर हाथ नहीं रख दिया था, तभी की चिढ़ रखे है हरबी जिज्जी। बहाना चाहिए था, हरबी जिज्जी को पनारे के पानी का बहाना मिल गया। उसने कलुआ को चेतावनी देकर कहा कि नाली साफ कर दे, तुम्हारे पनारे का पानी हमारे द्वारे भर रहा है।
हरबी की ऐंठ कलुआ से सहन न हुई। उसने उसी ठेठ अंदाज में मना कर दिया। बात बढ़ गई और बहसा बहसी शुरू हो गई। इस बहस में कलुआ की अम्मा कूद पड़ी। हरबी जिज्जी का चउअर मुँह चलता है। उसने बाप और खसम के गोड़े एक कर दिए। इतना कौन सहन कर सकता है? दोनों गुँथ गईं। हरबी ने कलुआ की अम्मा के बाल पकड़कर नीचे गिरा लिया और घूंसे बरसाने लगी। महतारी को पिटते देख कलुआ आड़े आ गया। उसने माँ को उसके चंगुल से छुड़ाकर हरबी को जमीन पर पटक दिया और कस के धुनाई कर दी। पूरा मुहल्ला तमाशा देखता रहा, कोई उन्हें सुलझाने न आया। क्या करूँ, मुझे देखा न गया। मैंने जाकर कलुआ को फटकारा कि तुझे औरत पर हाथ उठाते शर्म नहीं आती है। भाग यहाँ से।
वह मेरी बात मान गया और वहाँ से चला गया। हरबी ज्यादा पिट गई थी। उसके होंठ और दाँतों से खून बहने लगा था। हरबी जिज्जी कारन कर-कर रोती रही।
अपमान और गुस्से से तिलमिलाई जिज्जी कलुआ के खिलाफ थाने में रिपोर्ट लिखा
आई। बेटे की रिपोर्ट से मखना कक्का घबरा उठे। क्या करें, उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था। घबराए मखना को गब्बे ने सलाह दी कि तू भी उसकी रिपोर्ट लिखा दे। तेरी औरत को भी तो हरबी ने पीटा है। सुना है दोनों तरफ की रिपोर्ट लिख गई हैं।
गब्बे का मखना की ओर खड़े हो जाने से परधान जी ने हरबी का पक्ष ले लिया। वह बीच में न आता, तो परधान जी दोनों को समझा-बुझाकर शांत करा देते। पुलिस थाने की नौबत न आ पाती।
एक-दो बार ऐसा और हो चुका है। जिसकी ओर परधान जी खड़े हो जाते हैं, दूसरी ओर गब्बे उनका साथ देने लगता है। जरा से झगड़े में वे लोगों को रिपोर्ट लिखाने थाने पहुँचा देते हैं। गाँव के एक चौथाई घरों का पक्ष लेकर गब्बे उनका हितैषी बन गया है। वह परधान जी से इस कारण चिढ़ गया है कि उन्होंने उसको जेल करा दी। मूढ़मगज यह नहीं समझता है कि उसे जेल परधान जी ने नहीं, मैंने कराई है। बुरे काम का अंजाम भोगना पड़ेगा। परधान जी से चिढ़ बाँधना बेकार है।
मुझे लगता है, गब्बे जानबूझकर झगड़ा करवा रहा है। वह बिरादरी-बिरादरी को फोड़ रहा है। परधान जी इस कोशिश में रहते हैं कि उनका आपस में समझौता हो जाए पर यह होने नहीं देता है। गब्बे परधान जी के किले में सेंधमारी कर रहा है। वे उबर नहीं पा रहे हैं। लगता है, आने वाले चुनाव में परधान जी का खेल खराब कर देगा। वे लगातार दो पंचवर्षीय से प्रधान पद पर काबिज हैं। अबकी बार उन्हें सोचना पड़ेगा।
परधान जी चिढ़े बैठे हैं। उनके खिलाफ इसने शिकायत कर दी थी। अवसर की तलाश में है, मौका मिल गया तो वे भुंटा सा लुटा देंगे। मखना कक्का का पक्ष लेकर उसने परधान जी को चुनौती दे दी है। इस चुनौती को उन्होंने स्वीकार कर लिया है। मखना कक्का परधान जी से रुष्ट हो गया है। सामने तो कुछ नहीं कहा पर हाव-भाव बता रहे हैं कि वह परधान जी से खुश नहीं है। उसके विचार से परधान जी को हरबी के पक्ष में नहीं खड़ा होना चाहिए था।
दोनों के बीच दाँव-पेंच चल रहे हैं। गब्बे सतर्क रहता है। खुलकर सामने नहीं आ रहा है। वह जानता है कि जमानत पर छूटा है, अगर दोबारा रिपोर्ट हो गई तो अब जमानत भी न मिलेगी। इसलिए वह भितरघात कर रहा है।
परधान जी के दाँव में फँस गया, तो जेल में सड़े बिना न रहेगा। वे झूठा केस इसलिए नहीं लगवा रहे हैं कि चुनाव आने वाला है। जनता न्याय-अन्याय देखती है। जड़-पेड़ होना चाहिए, हवा में फल नहीं लगते हैं। गाँव में गब्बे का ज्यादा अस्तित्व नहीं हैं। वे सीधे विरोध करके गब्बे को अपने बराबर नहीं लाना चाहते हैं। परधान जी दिखाना चाहते हैं कि अभी वह लौंडा-लांडी है। गब्बे परधान जी के पासंग नहीं है। दूसरा अन्तर यह भी है कि परधान जी वैभवशाली हैं और गब्बे नेठम नंग। कहीं से उनमें समानता नहीं है। परधान जी उससे हर स्तर पर आगे हैं पर वे सीधे टकराने से बचते हैं। साँप मरे न लाठी टूटे वाली बात पर परधान जी यकीन करते हैं।
प्राननाथ, गब्बे गाँव का माहौल खराब कर रहा है। लोगों को चैन से नहीं बैठने देता है। इतनी वैमनस्यता फैला दी है कि हर कोई एक-दूसरे के लिए हँसिया धरे बैठा है। प्राननाथ, मैं तो परधान जी की तरफ हूँ। उन्होंने मेरा साथ दिया था, मैं उन्हें कैसे छोड़ सकती हूँ? उनकी कुछ बातों से जरूर मैं सहमत नहीं हूँ पर इतना तो चलता रहता है।
और तो यहाँ सब ठीक है। गब्बे से मैं सतर्क रहने लगी हूँ। गुंडे का क्या भरोसा ? हँसिया धरकर लेटती हूँ। रात-बिरात यहाँ कौन कोई बैठा है, जो करना है मुझे ही करना है। मैं अपनी हिफाजत करने में सक्षम हूँ। किसी के भरोसे नहीं हूँ।
तुम वहाँ ठीक से रहियो, मेरी चिन्ता न करियो।
शेष फिर
तुम्हारी ही
रमकल्लो
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: छब्बीसवीं पाती : 
चुनाव की सुगबुगाहट
प्राननाथ,
यह चिठिया मैं अर्जेन्ट भेज रही हूँ। जवाब जल्दी दइयो। परधानी के चुनाव आ गए हैं। अपने ग्राम पंचायत की सीट वही बैकवर्ड है। परधान जी का विचार है कि इलेक्शन में मैं खड़ी हो जाऊं। इस बार वे चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं। तुम जानते तो हो, इन्होंने पाँचों साल रुपयों की गदर सी मचाई। आदमी सामने नहीं कहता है, पर मन ही मन झींकते हैं।
गाँव के बहुत से लोग मुझे चुनाव लड़ने के लिए कह रहे हैं। मैंने हामी भरकर गाँव में चुनाव की हवा फैला दी है। परधान जी जानते हैं कि इस बार चुनाव में खड़े हो गए, तो लोग हराने में कसर न छोड़ेंगे। वे राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं। इस चुनाव में बैठ जाएँगे, तो आदमी इनके सारे कारनामे भूल जाएँगे। अगले चुनाव में दन्न से जीत जाएँगे। अभी खड़े हो गए, तो हार जाएँगे। ये बातें वे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। मुझे कह रहे हैं कि रमकल्लो तू चुनाव लड़ ले। तू पढ़ी-लिखी है, बात भी ठीक कर लेती है। सच ही तो कहते हैं परधान जी; मैं झिझकती थोड़े हैं, सबसे बात कर लेती हूँ।
वे कह रहे थे कि तुझे दिक्कत न आने दूंगा, मैं तेरे साथ रहूँगा। मैंने हाँ तो कह दी है, आप और इजाजत दे दोगे, तो निर्द्वन्द्व होकर चुनाव लड़ लूँगी।
परधान जी को सामने नहीं लाऊँगी, वरना जनता समझेगी कि मैं उनकी डमी कंडीडेट हूँ। जीतने के बाद भी परधानी उन्हीं के यहाँ रहेगी। इतना तो मैं समझती हूँ,
बुद्ध थोड़े हूँ। रोहू लला भी कह रहे थे कि भौजी तू चुनाव लड़ेगी, तो मैं खुलकर समर्थन करूँगा।
परधान जी को मैं एहसास न होने दूंगी कि मैं उनकी कंडीडेट नहीं हूँ। उनका वोट बैंक अब भी ठीक-ठाक है। ये वोट मिल गए, तो बढ़त मिल जाएगी। जीतने के बाद परधानी अपने हिसाब से चलाऊँगी। मुझे रुपया-पैसा खाकर क्या करना, जनता की भलाई के काम करूँगी। जुगन तक रमकल्लो का नाम रहेगा। मैं खाऊ-उड़ाऊ संस्कृति से जनता को निजात दिलाना चाहती हूँ। चुनाव लड़ने का मेरा बहुत मन है। अगर तुम स्वीकृति दे दोगे, तो मैं अपनी यह मनोकामना भी पूरी कर लूँगी।
मुझे विश्वास है कि गाँव के लोग मेरा सपोर्ट करेंगे। उनके संकरे-गाढ़े में हमेशा साथ खड़ी रहूँगी। चिल्लर सर से भी सलाह कर ली है। उन्हें आफिसियल ज्ञान अच्छा है। उनके सहयोग से कुछ वोट मिल जाएँगे। नामांकन में सर को साथ ले जाऊँगी। फार्म में कोई कमी रह गई, तो नामांकन रद्द हो सकता है। जानकार आदमी साथ रहेगा, तो किसी तरह की चूक न होगी।
आधे गाँव का रुख अभी मेरी तरफ है। मैंने बात कर ली है। चुनाव की बयार बहेगी तो पूरा गाँव मेरे साथ खड़ा दिखाई देगा। तुम्ही बताव, ऐसी स्थिति में मुझे कौन हरा सकता है?
सुनने को मिला है कि गब्बे भी चुनाव लड़ने की सोच रहा है। उठाईगीरा धरो, उसे कौन वोट देगा। प्राननाथ, मुझे तो हँसी आ रही है, वह अपने आपको संभाल नहीं पा रहा है, गाँव संभालने की साई बाँध रहा है। आदमी को शरम-लिहाज नहीं है। गाँव भर में थुक्का-थाई हो गई, फिर भी प्रधानी के ख्वाब देख रहा है। कोई समझाने वाला भी तो नहीं है। दो-चार उचक्कों की दम पर चुनाव फतह करने की फिराक में है। उचक्कों की क्या है? फ्री की दारू पिलाए रहो, सो लैरमा कुत्तों की तरह पीछे-पीछे दुम हिलाते रहेंगे। गब्बे ने अभी से दारूबाजी शुरू कर दी है। इसी लालच में शाम को बैठक भर जाती है। दारूबाजी का खेल भी अजीब है, खुद पिलाओ और खुद गाली सुनो। कई लोगों से उसकी लात-पन्हइया तक हो गई। ऐसे निपान आदमी है कि रात को पन्हइयाँ चली सुबह सब भूल गए। मैंने जिन्हें कभी दारू पीते नहीं देखा, वे भी उसकी बैठक में दिख जाते हैं। इसे वोट चाहिए और उन्हें दारू।
परधान जी राजनीतिज्ञ हैं। वे कह रहे थे कि दारूबाजों की दम पर चुनाव नहीं जीते जाते हैं। जनता सही आदमी को वोट देती है। वे बता रहे थे कि दरबा जिताते कम, हो-हल्ला ज्यादा मचाते हैं। प्राननाथ मुझे विश्वास है कि औरतें मुझे ही वोट देंगी। आदमियों की दर मैं नहीं दे सकती हूँ। तुम आ जाव, तो आदमी संभाल लेना। आदमी, आदमी को अच्छी तरह से डील कर लेता है। बइयर-जनी को तो लोग बुद्धू बना देते हैं। औरतों की मुझ पर छोड़ दो, वे मेरा सपोर्ट करेंगी, साथ ही प्रचार भी करवाएँगी।
एक बात तो मैं बताना ही भूल गई। चिल्लर सर कह रहे थे कि निवर्तमान प्रधान के बहकावे में न आना। वह बड़ा चालबाज है। कहाँ की गोटियाँ कहाँ फिट कर दे, हर कोई नहीं समझ पाता है। दुनिया जाए भाड़ में, वह अपना स्वार्थ देखता है। स्वार्थसिद्धि के वास्ते वह किसी की भी बलि चढ़ा सकता है। इसमें वह संकोच नहीं करता है।
मुझे नहीं लगता है कि परधान जी मेरे साथ कोई खेल, खेल जाएँगे। माना कि उनमें स्वार्थ का प्रतिशत अधिक है पर अपने स्वार्थ के लिए मेरा उपयोग न करेंगे। देहरी-द्वार वाले से गद्दारी नहीं की जाती है। वे ही मुझे चुनाव लड़ा रहे हैं, तो धोखा कैसे दे सकते हैं।
चिल्लर सर मेरी दलील से सहमत न थे। वे कह रहे थे कि रमकल्लो तू बहुत भोली है। तेरा भोलापन तुझे ले डूबेगा। वास्तविकता का अनुमान करके ही आगे बढ़ना वरना बाद में तकलीफ होगी। मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि तू चुनाव न लड़। मैं ये भी नहीं कह रहा हूँ कि चुनाव लड़ तो जीत भी। जीत-हार को सहजता से स्वीकार करने का माद्दा अपने अन्दर पैदा कर। जिन्दगी में ये वाकये आते रहते हैं, लेकिन धोखा खाकर फिर चेतना मूर्खता है। दुश्मन साथ रहकर जितनी खूबी से अपने काम को अंजाम दे सकता है, दूर रह कर न कर पाएगा। विश्वास करो पर कुछ अंश शक-सुबहा के लिए बचाकर रखो। कभी-कभी जानते हुए भी विश्वास करना पड़ता है क्योंकि उस वक्त हमारे पास अन्य विकल्प नहीं होता है। मजबूरी में उसी पर दांव आजमाना पड़ता है। शक हमें कई तरह के विकल्प मुहैया करा देता है।
प्राननाथ, चिल्लर सर तो नकारात्मक बातें करते हैं। इनकी नजर में सारी दुनिया धुकैल है। हर बात पर संशय इनका स्थायी भाव बन गया है। संशय मात्र से किसी का काम नहीं चल सकता है।
उन्होंने तो परधान जी के प्रति मेरे मन में शक पैदा कर दिया है। मैं इस शक को जल्दी ही मन से निकाल दूँगी। तुम्हीं बताव प्राननाथ, शक की स्थिति में कोई काम कैसे हो सकता है? पढ़े-लिखे हैं, पर बहते हमेशा उल्टे ही हैं।
मैंने चिल्लर सर को एहसास नहीं होने दिया कि मुझे उनके विचार पसन्द नहीं आए। अगर मैं कह देती कि आपके विचार मुझे पसन्द नहीं हैं तो उन्हें बुरा लग जाता। मैं कम चालू नहीं हूँ, इतना तो मैं समझती हूँ। चुनाव में सब तरह के लोगों का साथ लेना पड़ता है। हर एक वोट की कीमत होती है।
आप तो समझदार हैं, मैं क्या लिखूँ? तुम हाँ-न का जवाब जल्दी दइयो, नहीं तो मैं जवाब के इन्तजार में यहाँ बैठी रहूँ और वहाँ नामांकन की तारीख निकल जाए। अपना खयाल रखना। ऊँच-नीच बातों से दूर रहियो।
आपकी ही
रमकल्लो
लेखक परिचय 
लखनलाल पाल 
जन्मतिथि- 2 जुलाई सन 1968 
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट इटैलिया बाजा जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश 
शिक्षा – b.sc गणित M.A हिंदी b.ed पीएच-डी हिंदी 
प्रकाशित रचनाएं- हंस, कथादेश, कथाक्रम ,लमही ,युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा, पुरवाई आदि में कहानियां प्रकाशित। 
सम्प्रति – रमकल्लो की पाती उपन्यास धारावाहिक रूप से पुरवाई पत्रिका में प्रकाशित 
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास) पंच बिरादरी , कोरोना लॉकडाउन और लड़की (कहानी संग्रह )
 वर्तमान पता- कृष्णाधाम के आगे नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश 28 5 001 
ई-मेल – [email protected]


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4 टिप्पणी

  1. जब से शुरू किया
    उसने कॉलेज जाना
    चिल्लर सर ने उसकी
    प्रतिभा को पहचाना।

    घर-घर की कहानी
    रमकल्लो की जुबानी
    गांव में जिसके आगे
    सब भरते हैं पानी।

    कॉलेज में अपनी पढ़ाई और घर का काम-काज करते हुए रमकल्लो हर घर में क्या हो रहा है इसकी भी खोज खबर लेती रहती है। और इन सब बातों को अपने प्राननाथ को भी बताने में बड़ी चुस्त है। यह उसकी पुरानी आदत है। इसके बिना जैसे उसका खाना नहीं पचता। इन दिनों हरबी जिज्जी और कलुआ की अम्मा के बीच पनारे को लेकर जो हाथापाई हुई उसका अच्छा खास विवरण रमकल्लो की इस पाती में हुआ है। इस झगड़े में उसने ही बीच-बचाव करके मामला रफा-दफा करवाया। पर हरबी की हालत एक चोट खाई शेरनी की तरह थी और वह थाने में जाकर रपट लिखवा आई। तब से कलुआ का बाप मखना का डर के मारे बुरा हाल है। पुलिस के डंडे के आगे सब कांपते हैं। इस झगड़े में शामिल न होकर भी वह परिवार की वजह से फंस गया। निठल्ले कलुआ और गब्बे जैसे कुछ आतंकी भी गांव में मक्खी-मच्छर की तरह भनभनाते रहते हैं।

    ऐसा लगता है कि रमकल्लो अब बहुत आगे निकल आई है। उसका व्यक्तित्व हर दिन और निखर रहा है। उसकी शिक्षा का प्रभाव उसके बोलचाल के ढंग में साफ झलकने लगा है। अंग्रेजी के पूरे वाक्य वह बोल पाती है या नहीं इस बारे में अभी लेखक ने खुलासा नहीं किया है। पर अंग्रेजी के तमाम शब्द,जैसा कि इन दो चिट्ठियों से पता चलता है, वह फर्राटे से बोलने व लिखने में इस्तेमाल करने लगी है। गांव में उसकी इतनी धाक हो रही है कि परधान के आगामी चुनाव के लिए इस गांव के परधान ही रमकल्लो को प्रत्याशी के रूप में देखना चाहते हैं। और इस खुशी से वह मन ही मन फूली नहीं समा रही है। लगता है जैसे बिल्ली के भाग से छींका टूटा हो।

    दूसरी तरफ वह चिल्लर सर की सलाह से कुछ चौकन्नी भी हो रही है। परधान के मन में क्या खिचड़ी पक रही है इसका उसे पता नहीं। वह किस तरह का खेल खेल रहे हैं? असली वजह क्या है? कहीं इस खेल में उसका किसी मोहरे की तरह तो इस्तेमाल नहीं हो रहा? यह तमाम शंकाएं उसके मन में पैदा हो रही हैं। परधान जी ने भी कोई कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं।

    गब्बे परधान जी से ऐसा चिढ़ा व जला भुना बैठा है कि उनके चुनाव लड़ने पर वह कोई भी गुंडागर्दी करके उनका खेल बिगाड़ सकता है। यह सोच कर इस बार उन्होंने गुनी रमकल्लो को चुना। रमकल्लो भी शायद इस बात को समझती है। पर वह हाथ में आई बटेर यानि इस मौके को जाने नहीं देना चाहती। सोचती होगी कि अगले चुनाव तक आते-आते शायद वह इतनी अनुभवी हो जाये कि वह गांव वालों का मन जीत ले। और फिर चुनाव में उसे कोई दूध की मक्खी की तरह नहीं निकाल सकेगा। वह सभी के दिलों पर अपनी समझदारी और इंसाफी से राज करने लगेगी। लेकिन इंसाफ का साथ देते हुए रमकल्लो जैसी निडर वीरांगना को भी कभी-कभी गब्बे जैसे लोगों से डर लगने लगता है। पर उसने अन्याय के आगे झुकना नहीं सीखा है।

    लखनलाल पाल जी आपकी कलम रमकल्लो को बड़ी सुघड़ता से गढ़ रही है। उसके माध्यम से आप एक ऐसी बुद्धिमान व शक्तिशाली नारी को गढ़ रहे हैं जिसके नाम के आगे कभी कोई अबला शब्द न लगा सके। और भविष्य में वह अन्य नारियों के लिए एक उदाहरण बन सके। आपको बहुत बधाई।

    • आदरणीया शन्नो अग्रवाल जी, सही कहा आपने,रमकल्लो का चरित्र काफी हद तक स्पष्ट हो गया है। वह गांव के मामलों की खोज खबर रखने लगी है।
      अंग्रेजी वह नहीं बोल पा रही है। पर चलन में आने वाले अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग में वह संकोच नहीं करती है।
      शन्नो जी आप कल्पना की उड़ान में सच्चाई के बहुत नजदीक पहुंच जाती हैं। देखते हैं चुनाव में क्या होता है।
      बेहतरीन टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार शन्नो जी

  2. आदरणीय सर जी!

    रमकल्लो की 25-26 वीं दोनों पाती पढ़ीं।

    दोनों पातियों से रमकल्लो और गाँव की सारी जानकारियाँ हासिल हुईं। साथ ही सारी राजनैतिक हलचल की जानकारी भी मिली।

    गाँवों में इस तरह की हलचल और झगड़े होते रहते हैं। टूटने और जुड़ने के काम चलते रहते हैं।
    आजकल गाँव के लोग सीधे नहीं रह गए। अपना हित साधने में कोई किसी से कम नहीं रहता।

    यह अच्छा है कि रमकल्लो पढ़ लिखकर थोड़ी दबंग हो रही है। जो अकेले रहने वाली लड़कियों/महिलाओं के लिए जरूरी भी है।

    रमकल्लो चुनाव में खड़ी हो रही है, यह खबर चौंका सकती थी, किंतु जिस तरह से वह हौसले से पढ़ रही है और आगे बढ़ रही है, अपनी हिम्मत के दम पर‌; और वह भी अकेली, इसलिये समझ में आ रहा है कि उसका भविष्य उज्जवल है।
    हमारी तरफ से बहुत- बहुत शुभकामनाएँ उसे।

    वास्तव में यह पाती लड़कियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत की तरह है, कि अकेले रहने पर भी डरना नहीं चाहिये। हिम्मत से स्थितियों का सामना करना चाहिये।
    डरने वालों को रौंदने के लिए बहुत लोगों की आँखें गड़ी रहती हैं।
    बेहतरीन पाती के लिये आपको बधाई।

    • आदरणीया नीलिमा करैया जी, आपने रमकल्लो के व्यक्तित्व को गांव की आम महिलाओं से जोड़कर मेरे लेखन पर सार्थक टिप्पणी की है।
      इसके लिए नीलिमा करैया जी,मैं आपका आभारी हूं

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