मखना कक्का की बहू अब सास से दबती नहीं है; बराबर से सुना देती है। लड़के वाली बात पर वह साफ कह देती है कि बिटियाँ मेरे गले का हार हैं। यही मेरा उद्धार करेंगी। बहू की ये बातें सास के कलेजे में गड़ जाती हैं। मुहल्ला की औरतें कम नहीं हैं। वे उसी कमजोर नस को दबाती हैं, जिसमें दर्द उठता है।
काकी अक्सर हरबी जिज्जी को ठ्वासरे मारती थी कि उसे पूर्व जनम के पापों का फल लड़कियों के रूप में मिला है। हरबी जिज्जी को लड़का नहीं है, इसी को लेकर काकी उसे ताने मारती रही है। काकी की पोतियों के जन्म पर हरबी जिज्जी घी के दीए जला रही है।
काकी को हरबी जहाँ मिल जाती, वहीं लड़के वाली बात शुरू कर देती। हरबी जिज्जी यहीं कचट (कमजोर) पड़ जाती थी। काकी उससे सहानुभूति दिखाती हुई कहती, “बहू, भगवान ने कोख में पथरा धर दिया। एक डरइया (बेटा) होती, तो बिटियाँ ढँक जाती, साथ में तेरी जिनगी पार हो जाती। बिटियाँ चाहे सौ हों तऊ घर सूनौ। लरका से घर में दीपक जरत रहत।”
बेटे का अभाव हरबी का दिल छील देता। सोचती, ईश्वर ने एक बेटा दे दिया होता तो काहे किसी की जली-कटी सुनती। पर वह क्या करे, दो बेटियों के जन्म के बाद ही उसके पति चल बसे। दोहरी विपत्ति थी उसके लिए।
बेटियों के बीच वह सब कुछ भूल जाती थी। वही उसका संसार थीं। हरबी जिज्जी
अब काकी की बातों को हल्के में लेने लगी थी। काकी को यह हल्कापन असह्य था। हरबी की छोटी बेटी का पहनावा भी उसे नहीं भाता था। उस पर वह टीका-टिप्पणी करती रहती थी। एक दिन काकी चिढ़कर बोली, “बहू, तेरी मुनिया तो कहीं से मौड़ी नई लगत। बिलकुल लरका बना डार है का?”
“काकी, इस घर में तो हमीं आदमी, हमीं औरत हैं। लड़के के लिए किसे निहोरते फिरें। एक बार निहोर भी लें, तो आदमी न जाने कौन-सी कहानी गढ़ने लगे। लरका वाले काम हों या बिटिया वाले, सब हमीं करते हैं।”
“मैं काम की नई कहत बहू। मौड़ी की चाल-ढाल की बात कहत। सलवार-कुरता उसे बुरे थोड़े लगेंगे।”
“बुरे तो नईं लगत, पै मौड़ी को वही पसन्द है, सो मैंने नई रोको।”
“जीन्स पहनकर वह लरका तो न बन जाएगी?”
“काकी, हम तो लरका ही मानत।”
“भली कही बहू, लड़कों की सेंग से जीन्स तो पहनने लगी लेकिन लरका, लरका होत, मौड़ी ठाड़े होकर तो न मूत पाएगी?”
“हओ काकी, हमें मौड़ी को ठाड़े होकर नई मुताना है।” हरबी ने अपने आक्रोश को खूब दबाया पर तल्खी बाहर निकल ही आई, “काकी, ऐसे ही तुम सरोजी को कहती रही, अब मुनिया के पीछे पड़ गई।”
हरबी को मिर्ची लगने से काकी खुश हो गई। दिल को सुकून मिल गया था। वह उसकी तल्खी को दरकिनार करते हुए बोली, “बहू तू बिरथा बुरा मानती है। मेरे कहने का मतलब था कि बिटिया को घर-गृहस्थी के काम सिखाओ। ये रास्ता ठीक नहीं है। एक चोट लड़का का सट जात, बिटिया का नहीं। कल के दिन बिटिया को पराए घर जाना है। ससुराल वाले बहू चाहते हैं, लोग-मन्सेलू नहीं।”
काकी के हमले से हरबी तिलमिला उठी। उसकी आवाज तेज हो गई, ” हमारी बिटिया तुम्हें लोग-मन्सेलू दिखात। तुम बिटिया के पीछे काहे पड़ी हो?’
चोट कर्री थी। काकी सबर न कर पाई। वह तल्ख स्वर में बोली, “बहू, तैं मोय कान न खा। मैं अकेली नईं, गाँव भर चिल्लात।”
“काकी, जो कहेगा, वह सुनेगा। हमें कोई खिला नहीं जाता है, जो उनकी जली-कटी सुनते रहें।”
काकी अभिनय में माहिर थी। उसने तुरन्त अपना चैनल बदल दिया। वह प्यार से डपटती हुई बोली, “चल, बड़ी बिटिया वाली हो गई। तेरी ही बिटिया है, मेरी कुछ नहीं है? मैं आई थी काम से, ये राछरौ लेकर बैठ गई।”
प्राननाथ, हरबी बता रही थी कि इस डायन ने रास्ता निकलना मुहाल कर दिया था। भगवान ने अब उसे भी पोतियाँ दे दी। अब चाहे सलवार-कुरता पहनाए या साड़ी-बिलाउस। काकी अपनी बदजुबानी से अपने ही जाल में फँस गई है। कहा है
तो सुनना पड़ेगा।
हरबी जिज्जी तो सराप रही थी कि यह डायन पोते का कभी मुख न देख पाए। मैंने समझाया कि जिज्जी, अपनी जुबान खराब न कर। किसी को बद्दुआएँ देना ठीक नहीं है।
वह मान तो गई थी पर आक्रोश कम न हुआ था। हरबी जिज्जी को वह फूटी आँख नहीं सुहाती है। मैंने कहा, जिज्जी बीती बातों पर धूल डाल।
अपने जान तो मैंने अच्छी तरह समझा दिया है। अब उन्हें जैसा अच्छा लगे, सो करें।
एक बात और प्राननाथ। गब्बे जमानत पर छूट आया है। अब तो वह बदला-बदला सा लग रहा है। उसने घूमना-फिरना बन्द कर दिया है। पता नहीं, उसके मन में क्या चल रहा है।
तुम चिन्ता न करियो, मैं रसगुल्ला नहीं हूँ, जो सुटक लेगा।
गाँव में कल अधिकारी आए थे। खड़ंजों का मुआयना करते रहे। परधान जी के विरुद्ध किसी ने शिकायत कर दी थी। मुझे शक है कि शिकायत गब्बे ने की होगी। परधान जी ने उसकी दादागीरी जो नहीं चलने दी। मेरी रिपोर्ट में भी उन्होंने साथ दिया था। वह परधान जी से सीधे तो लड़ नहीं सकता है। इसी से वह पीठ पीछे वार कर रहा है।
अधिकारी कागज-पत्तर देखने लगे, तो वे मन ही मन बहुत भुनभुनाए थे। जुगाड़ लगाने और पैसा कमाने में वे बहुत उस्ताद हैं लेकिन कागज-पत्तर में कमजोर हैं। हैं तो हाईस्कूल पास, पर कुछ पढ़-लिख नईं पात, हींग को हगा लिखत।
गब्बे नेतागीरी करने लगा है। कहाँ क्या हो रहा है, आँखें गड़ाए रहता है। काए, क्या हो गया, बन सकता है नेता। उठाईगीरा ही नेतागीरी में सफल है। महान बनने के लिए भी उत्पात मचाना पड़ता है। पहले ताकत से अपनी जय-जयकार कराओ, फिर मसीहा बन जाओ। शक्तिशाली को पूजने की परंपरा सनातन से चली आ रही है। उसने शिकायत करके अपनी ताकत दिखा दी है।
अधिकारियों के सामने परधान जी सुटर-पुटर कर रहे थे। परधानिन चाची मुझे चाय-नाश्ता देने के लिए बुला ले गई थी। तभी उन्होंने बताया था कि अधिकारी इन्क्वायरी करने आए हैं। किसी ने ऊपर दरखास्त लगा दी है। चाची बड़बड़ा रही थी कि चाहे जितना काम कराओ, लोग खुश नहीं होते हैं। उन्हें हमारी कमाई दिखती है,
खर्च नहीं देखते हैं। इन्हीं का खर्च देख लो। चाय-नाश्ते के बाद खाना-पीना होगा। ब्रांडेड बोतलें मंगानी पड़ेंगी। जेब अलग से गरम करनी पड़ेगी। आदमी कहत कि हम मौज में है। साँप के पैर साँप को ही दिखते हैं।
किचिन में हाथ बँटाकर मैं लौट आई थी। फिर जैसा हुआ हो, भगवान जाने। बहू मायके गई थी, इसीलिए बुला लिया था। बहू होती तो इतना भी पता न चलता। चाची चुकरिया में गुड़ फोड़ती रहती है।
अधिकारियों के सामने परधान जी के लठैत नहीं दिखे। उन्होंने इनकी जरूरत न समझी होगी। वे सत्ता के साथ शक्ति को जरूरी मानते हैं। शक्ति के बिना सत्ता दो कदम भी नहीं चल सकती है। सारे नियम शक्ति से संचालित होते हैं। वे रात-दिन अपनी बेवकूफी का जाप करते रहते हैं और इसकी हिफाजत में जी-जान तक लगा देते हैं। शिकायत हो गई, सो लठैत बिल में घुस गए। शक्ति से नियमों को तोड़कर अराजकता बढ़ाते रहे।
परधान जी काइयाँ किस्म के हैं। छिरिया के गोड़े बुकरिया में और बुकरिया के गोड़े छिरिया में बिंधाए रहते हैं। हो सकता है, अधिकारियों को सन्तुष्ट कर दिया हो। पैसा सारे ऐब-दोष ढँक देता है। कुछ न कुछ हुआ होगा। परधान जी अब या तो सुधर जाएँगे या पैसा की वसूली में और घपला करेंगे।
प्राननाथ, मैं तो चाहती हूँ कि इन्क्वायरी हो। गाँव के विकास के लिए सरकार अनसड़ रुपया भेजती है। विकास के नाम पर सब इनके पेट में चला जाता है। काम करवाते हैं क्या, लाओ-पबारो सा कर देते हैं। कागजों में ही सड़क, कागजों में ही बाँध-बंधिया डल जाती है। शऊर से काम कराएँ, तो गाँव चमक जाएँ। नित नई योजनाएँ आती हैं, सबमें अपना हिस्सा तय कर लेते हैं। रुपया खाने की चैन-सी बन गई है। सारी कड़ियाँ एक सीध में हो जाती हैं। लोभ के आगे जनहित सिसकता रह जाता है, स्वहित बाजी मार ले जाता है।ईमानदारी का जमाना नहीं रहा। अधिकारी ईमानदार हो जाएँ, तो माछी इनकी जो एक रुपया खा जाएँ। ईमानदारी के साथ साहसी होना जरूरी है। पिछली साल बी.डी.ओ. बाबू की हालत देखी तो थी। मुआयना करने गाँव आए थे। मुआयने के वक्त ज्यादा गड़बड़ियाँ दिखीं, सो उन्होंने वाउचरों में दस्तखत न किए। परधान जी ने बहुत मनाया कि साहब दस्तखत कर दो। साहब ने दस्तखत करने से स्पष्ट मना कर दिया। उन्हें मनाते हुए परधान जी रोड तक आ गए। वे न माने तो परधान जी को क्रोध आ गया। उन्होंने बी. डी. ओ. को रोड पर पटक दिया और उतार जूता सोंठ-सी फोड़ दी। परधान जी ने जबर्दस्ती कागजों पर दस्तखत करा लिए थे। वह इतना डर गया था कि उनके खिलाफ रिपोर्ट तक न लिखाई। उल्टा ट्रान्सफर कराके यहाँ से चला गया। गाँव भर ने तमाशा देखा था। तब से परधान जी का ऐसा जलवा बना कि गाँव वाले भी उनके खिलाफ मुँह नहीं खोलते। अधिकारी भी आँख मूदकर कागजों पर दस्तखत
करने लगे थे। वे परधान जी को बला समझते थे। जितने जल्दी यहाँ से टले, इसे टाल दो। बताव ले, ऐसी दबंगई से परधानी चलाई।
इन अफसरों को देखकर परधान जी के चेहरे का रंग उड़ गया था। लगता है, ये बड़े अधिकारी थे। इसी से परधान जी ज्यादा नहीं बोले। उन्होंने निपटा तो लिया होगा। वे कच्ची गोलियाँ नहीं खेलते हैं।
अधिकारी तो कल ही चले गए थे। क्या लिखकर गए हैं, पता नहीं चला। चाची ये बातें कौन बताती है। अटक दबड़ में मेरे पास आकर कहती है, रमकल्लो मेरा ये काम कर दे। मैं चली जाती हूँ। मुहल्ला-पड़ोस है, एक-दूसरे से सबका काम पड़ता है।
प्राननाथ, तुम कहो तो मैं इनसे ज्यादा मतलब न रखूं। काए से ये आदमी ठीक नहीं है। पत्र में लिखकर मुझे बता देना। मैं तुम्हारी पाती का इन्तजार करूँगी।
आपकी ही
रमकल्लो
____________
लखनलाल पाल
जन्मतिथि- 2 जुलाई सन 1968
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट इटैलिया बाजा जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश
शिक्षा – b.sc गणित M.A हिंदी b.ed पीएच-डी हिंदी
प्रकाशित रचनाएं- हंस, कथादेश, कथाक्रम ,लमही ,युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा, पुरवाई आदि में कहानियां प्रकाशित।
सम्प्रति – रमकल्लो की पाती उपन्यास धारावाहिक रूप से पुरवाई पत्रिका में प्रकाशित
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास) पंच बिरादरी , कोरोना लॉकडाउन और लड़की (कहानी संग्रह )
वर्तमान पता- कृष्णाधाम के आगे नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश 28 5 001
हर एक पाती में रमकल्लो अपने मन की बातें उंडेलती रहती है। फिर भी सभी का भला चाहने वाली के प्राननाथ के दिल में आग नहीं लगती। वह अब तक गूंगे ही हैं। माजरा कुछ गड़बड़ लगता है। रमकल्लो गांव भर में चिहुंकती फिरती है और निरंतर सबके बारे में तिनका-तिनका खबरें बटोर कर अपनी चिट्ठियों में प्राननाथ को परोसती रहती है। आखिर वह करे भी तो क्या करे। उसे अकेलापन डसता होगा। वह अकेली रहते हुये समझदारी से हर कदम फूंक-फूंक कर रखती है। फिर भी गब्बे जैसे लोगों से उसे कभी कभार डर तो लगता ही होगा। उधर मखना कक्का की बहू को काकी की जली कटी सुननी पड़ती है। जिनके भी बेटियां हैं वह सभी उनके निशाने पर हैं। काकी की दिल जलाने वाली बातें। बेटियों के जन्म को लेकर पता नहीं कब उन्हें अकल आयेगी। कब सोचेंगी कि दोनों में कोई कम नहीं होता। आज बेटियां बेटों से कम नहीं हैं। इस बारे में लेखक ने मखना कक्का की बहू के सास को दिए मुंहतोड़ जबाबों से दर्शाया है। वह अब अपनी सास से नहीं दबती उसकी बातों का तड़ाक से जवाब देती है। और रमकल्लो को यह बात अच्छी लगती है। बेटियां क्या इंसान नहीं होतीं? काकी की ओछी सोच से गांव की और स्त्रियां भी तंग हो चुकी हैं। पहले हरबी जिज्जी की बेटी सरोजी को लेकर और अब उनकी दूसरी बेटी मुनिया के पहनावे आदि पर कुछ न कुछ उपदेश देती रहती हैं। उन्हें बेटियों का अस्तित्व अखरता है। वह भूल जाती हैं कि वह स्वयं भी तो किसी की बेटी रही हैं। अगर बेटियां न हुईं तो सृष्टि कैसे आगे बढ़ेगी। लेकिन काकी जैसी ओछी सोच के लोगों की जुबान बंद करने का यही तरीका है कि उन्हें मुंह तोड़ जबाब दिया जाये।
पाती में रमकल्लो का खुश होना अच्छा लगता है कि हरबी जिज्जी भी अब काकी से निडरता से निपटने लगी हैं। जिनके बेटियां हैं उनके लिए काकी जैसे हौआ की तरह हैं। जींस पहनने पर बेटियां लड़कों की तरह खड़े खड़े कैसे मूतेंगीं? यह भी अब उनकी चिंता का विषय है: “लड़कों की सेंग से जीन्स तो पहनने लगी लेकिन लरका, लरका होत, मौड़ी ठाड़े होकर तो न मूत पाएगी?” इस तरह की खुराफाती बातें उनके दिमाग के इंजन में चलती रहती हैं। रमकल्लो जानती है कि समय के साथ उन्हें अपनी सोच बदल कर जुबान पर लगाम लगाने की जरूरत है।
उधर परधान जी भी कोई कम नहीं हैं। ऊपर से तो सही लगते हैं वह लेकिन पैसों को लेकर वह बड़े काइयां किस्म के हैं। उनके घर आकर इस बारे में जब बड़े अधिकारी छान-बीन करने आये तो उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। गांव की उन्नति में लगने वाले सरकार के दिये पैसों में वह घपलापाजी करते रहे थे। बिना काम हुये ही कागजों में खर्चे दिखाते रहे। अब लेने के देने पड़ गये। लगता है गब्बे बड़ा चालू निकला। उसने अपने अपमान का बदला बड़े अधिकारियों से परधान जी की शिकायत करके निकाल ही लिया। सबको हड़काने और डराने वाले परधान जी को अच्छा सबक मिला। परधानिन चाची का काम में हाथ बटाने गई रमकल्लो यह खबर ले आई। उसे हर किसी के घर में होने वाली बातें पता रहती हैं और प्राननाथ को बताती रहती है। लेकिन एक आदर्श पत्नी बनने की कोशिश में वह अपनी सुरक्षा के बारे में उन्हें हमेशा सांत्वना देती रहती है। नारियों के प्रति संवेदना और उनके विकास और प्रगति की कामना करने वाली रमकल्लो उस गांव में जैसे एक वरदान की तरह है।
ये दोनों 23 और 24 नंबर की चिट्ठियां काकी जैसी सोच और गांव के विकास में घुन जैसे लगे रहने वाले परधान जी जैसे लोगों की ओछी सोच से अवगत कराती हैं। जिनकी बातों और जिनकी मनमानी से बचने से लोगों को अपनी आवाजें बुलंद करनी चाहिये।
आदरणीया शन्नो अग्रवाल जी, रमकल्लो पर आपकी जानदार टिप्पणियों से अभिभूत हूं। आप जिस अंदाज में लिखती हैं, उसमें लगता ही नहीं है कि आपको सोचना होता होगा या पहले से तैयारी करनी पड़ती होगी। प्रवाह ऐसा कि उसमें बहते चले जाओ।
इसे ही प्रत्युत्पन्नमति कहा जाता हैं। आपकी यह प्रतिक्रिया इस बात की साक्षी है।
शन्नो जी, इस बेहतरीन टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार
सबसे पहले तो इसका शीर्षक बहुत पसंद आया-“मेरे दिल की आग अब तेरे दिल में जलेगी।”
बेटा और बेटी का भेद वाकई आग की तरह है। कई बार पूरे परिवार को जला देती है।सुख,सुकून और शांति सब चला जाता है।
गाँवों में कुछ रिश्ते सभी के लिए समान रूप से हो जाते हैं, और गाँवों में पद की बड़ी मान्यता रहती है।सब गाँव के हिसाब से चलता है।
विरोध करना जायज नहीं समझा जाता और विरोध का भी विरोध होने लगता है।
परंपराएँ और धारणाएँ सहजता से परिवर्तित नहीं होते हैं और जो पहल करता है आगे बढ़ने की वह तो बलि का बकरा बनता है।
लड़के और लड़की दोनों की अहमियत है। किंतु इसके लिए सिर्फ बहू को दोष नहीं दिया जा सकता।
वर्तमान में गाँव की दृष्टि से वेश-भूषा परिवर्तन भी काँटे की तरह खटकता है।
गाँव की खासियत है कि यहाँ की बोली में लोकोक्तियाँ बहुत चलती हैं। छोटा पैकेट बड़े धमाके कि तरह लोकोक्तियाँ और मुहावरे बड़े काम आते हैं।
रमकल्लो का एक कथ्य बहुत अच्छा लगा-
मैं रसगुल्ला नहीं हूँ ,जो सुटक लेगा।
चौबीसवीं पाती
इसमें खड़ंजों का अर्थ समझ में नहीं आया
काबिलेगौर-
*उठाईगीरा ही नेतागिरी में सफल है।*
“चुकरिया में गुड फोड़ना”
हमारे इधर इसे “कुलिया में गुड़ फोड़ना” कहते हैं।
मिट्टी की छोटी-छोटी कुलिएँ, पहले इसमें चाय देते थे।
एक ध्रुव वाक्य-
“शक्ति के बिना सत्ता दो कदम भी नहीं चलती।”
इस अंक में रमकल्लो ने राजनीति के सारे दाँव- पेंच बताते हुए राजनीति की पोल खोल दी -वास्तव में राजनीति क्या है?
रमकल्लो की पाती के माध्यम से ग्रामीण स्त्रियों के विकास को नई दिशा में जाते हुए देखकर पढ़ना अच्छा लग रहा है।
आपको बहुत-बहुत बधाई इस पाती के लिये।
गाँव की रमकल्लो जैसी साहसी और हिम्मती सभी लड़कियों और महिलाओं को शाबाशी और शुभकामनाएँ।
विकास की राह में परिवर्तन की धुरी की तरह होती है ऐसी लड़कियाँ या स्त्रियाँ।
आदरणीया नीलिमा करैया जी, आप रचना को बहुत गहराई से पढ़ती है। इसलिए उसके मर्म पर आपकी प्रतिक्रिया बहुत सटीक होती है।
गांव की गलियों में सीमेंट की ईंटें बिछाकर जो रास्ता बनाया जाता है उसे हमारे यहां खड़ंजा कहा जाता है। *चुकरिया* मिट्टी की बनी होती थी,जिसे आवां में पका लिया जाता था।पहले इसमें दूध घी रखा जाता था। चुकरिया में गुड़ फोड़ने का मतलब है कि उस आदमी की गुप्त योजनाएं किसी काम की नहीं है। या योजनाएं सफल हो ही नहीं सकती है। चुकरिया में गुड़ फोड़ोगे तो चुकरिया ही फूट जाएगी। स्थान भेद के कारण चुकरिया ही कुलिया हो जाती है।
दीपक शर्मा जी
नमस्कार,आपकी कहानियां अक्सर पढ़ती हूँ।
मुर्दा दिल भी उसी कड़ी में उम्दा है ।
Dr Prabha mishra
https://www.thepurvai.com/ramkallo-ki-pati-by-lakhanlal-pal-23-24/
हर एक पाती में रमकल्लो अपने मन की बातें उंडेलती रहती है। फिर भी सभी का भला चाहने वाली के प्राननाथ के दिल में आग नहीं लगती। वह अब तक गूंगे ही हैं। माजरा कुछ गड़बड़ लगता है। रमकल्लो गांव भर में चिहुंकती फिरती है और निरंतर सबके बारे में तिनका-तिनका खबरें बटोर कर अपनी चिट्ठियों में प्राननाथ को परोसती रहती है। आखिर वह करे भी तो क्या करे। उसे अकेलापन डसता होगा। वह अकेली रहते हुये समझदारी से हर कदम फूंक-फूंक कर रखती है। फिर भी गब्बे जैसे लोगों से उसे कभी कभार डर तो लगता ही होगा। उधर मखना कक्का की बहू को काकी की जली कटी सुननी पड़ती है। जिनके भी बेटियां हैं वह सभी उनके निशाने पर हैं। काकी की दिल जलाने वाली बातें। बेटियों के जन्म को लेकर पता नहीं कब उन्हें अकल आयेगी। कब सोचेंगी कि दोनों में कोई कम नहीं होता। आज बेटियां बेटों से कम नहीं हैं। इस बारे में लेखक ने मखना कक्का की बहू के सास को दिए मुंहतोड़ जबाबों से दर्शाया है। वह अब अपनी सास से नहीं दबती उसकी बातों का तड़ाक से जवाब देती है। और रमकल्लो को यह बात अच्छी लगती है। बेटियां क्या इंसान नहीं होतीं? काकी की ओछी सोच से गांव की और स्त्रियां भी तंग हो चुकी हैं। पहले हरबी जिज्जी की बेटी सरोजी को लेकर और अब उनकी दूसरी बेटी मुनिया के पहनावे आदि पर कुछ न कुछ उपदेश देती रहती हैं। उन्हें बेटियों का अस्तित्व अखरता है। वह भूल जाती हैं कि वह स्वयं भी तो किसी की बेटी रही हैं। अगर बेटियां न हुईं तो सृष्टि कैसे आगे बढ़ेगी। लेकिन काकी जैसी ओछी सोच के लोगों की जुबान बंद करने का यही तरीका है कि उन्हें मुंह तोड़ जबाब दिया जाये।
पाती में रमकल्लो का खुश होना अच्छा लगता है कि हरबी जिज्जी भी अब काकी से निडरता से निपटने लगी हैं। जिनके बेटियां हैं उनके लिए काकी जैसे हौआ की तरह हैं। जींस पहनने पर बेटियां लड़कों की तरह खड़े खड़े कैसे मूतेंगीं? यह भी अब उनकी चिंता का विषय है: “लड़कों की सेंग से जीन्स तो पहनने लगी लेकिन लरका, लरका होत, मौड़ी ठाड़े होकर तो न मूत पाएगी?” इस तरह की खुराफाती बातें उनके दिमाग के इंजन में चलती रहती हैं। रमकल्लो जानती है कि समय के साथ उन्हें अपनी सोच बदल कर जुबान पर लगाम लगाने की जरूरत है।
उधर परधान जी भी कोई कम नहीं हैं। ऊपर से तो सही लगते हैं वह लेकिन पैसों को लेकर वह बड़े काइयां किस्म के हैं। उनके घर आकर इस बारे में जब बड़े अधिकारी छान-बीन करने आये तो उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। गांव की उन्नति में लगने वाले सरकार के दिये पैसों में वह घपलापाजी करते रहे थे। बिना काम हुये ही कागजों में खर्चे दिखाते रहे। अब लेने के देने पड़ गये। लगता है गब्बे बड़ा चालू निकला। उसने अपने अपमान का बदला बड़े अधिकारियों से परधान जी की शिकायत करके निकाल ही लिया। सबको हड़काने और डराने वाले परधान जी को अच्छा सबक मिला। परधानिन चाची का काम में हाथ बटाने गई रमकल्लो यह खबर ले आई। उसे हर किसी के घर में होने वाली बातें पता रहती हैं और प्राननाथ को बताती रहती है। लेकिन एक आदर्श पत्नी बनने की कोशिश में वह अपनी सुरक्षा के बारे में उन्हें हमेशा सांत्वना देती रहती है। नारियों के प्रति संवेदना और उनके विकास और प्रगति की कामना करने वाली रमकल्लो उस गांव में जैसे एक वरदान की तरह है।
ये दोनों 23 और 24 नंबर की चिट्ठियां काकी जैसी सोच और गांव के विकास में घुन जैसे लगे रहने वाले परधान जी जैसे लोगों की ओछी सोच से अवगत कराती हैं। जिनकी बातों और जिनकी मनमानी से बचने से लोगों को अपनी आवाजें बुलंद करनी चाहिये।
लेखक लखनपाल जी को हार्दिक बधाई।
-शन्नो अग्रवाल
आदरणीया शन्नो अग्रवाल जी, रमकल्लो पर आपकी जानदार टिप्पणियों से अभिभूत हूं। आप जिस अंदाज में लिखती हैं, उसमें लगता ही नहीं है कि आपको सोचना होता होगा या पहले से तैयारी करनी पड़ती होगी। प्रवाह ऐसा कि उसमें बहते चले जाओ।
इसे ही प्रत्युत्पन्नमति कहा जाता हैं। आपकी यह प्रतिक्रिया इस बात की साक्षी है।
शन्नो जी, इस बेहतरीन टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार
https://www.thepurvai.com/ramkallo-ki-pati-by-lakhanlal-pal-23-24/
आदरणीय सर जी
तेईसवीं पाती
सबसे पहले तो इसका शीर्षक बहुत पसंद आया-“मेरे दिल की आग अब तेरे दिल में जलेगी।”
बेटा और बेटी का भेद वाकई आग की तरह है। कई बार पूरे परिवार को जला देती है।सुख,सुकून और शांति सब चला जाता है।
गाँवों में कुछ रिश्ते सभी के लिए समान रूप से हो जाते हैं, और गाँवों में पद की बड़ी मान्यता रहती है।सब गाँव के हिसाब से चलता है।
विरोध करना जायज नहीं समझा जाता और विरोध का भी विरोध होने लगता है।
परंपराएँ और धारणाएँ सहजता से परिवर्तित नहीं होते हैं और जो पहल करता है आगे बढ़ने की वह तो बलि का बकरा बनता है।
लड़के और लड़की दोनों की अहमियत है। किंतु इसके लिए सिर्फ बहू को दोष नहीं दिया जा सकता।
वर्तमान में गाँव की दृष्टि से वेश-भूषा परिवर्तन भी काँटे की तरह खटकता है।
गाँव की खासियत है कि यहाँ की बोली में लोकोक्तियाँ बहुत चलती हैं। छोटा पैकेट बड़े धमाके कि तरह लोकोक्तियाँ और मुहावरे बड़े काम आते हैं।
रमकल्लो का एक कथ्य बहुत अच्छा लगा-
मैं रसगुल्ला नहीं हूँ ,जो सुटक लेगा।
चौबीसवीं पाती
इसमें खड़ंजों का अर्थ समझ में नहीं आया
काबिलेगौर-
*उठाईगीरा ही नेतागिरी में सफल है।*
“चुकरिया में गुड फोड़ना”
हमारे इधर इसे “कुलिया में गुड़ फोड़ना” कहते हैं।
मिट्टी की छोटी-छोटी कुलिएँ, पहले इसमें चाय देते थे।
एक ध्रुव वाक्य-
“शक्ति के बिना सत्ता दो कदम भी नहीं चलती।”
इस अंक में रमकल्लो ने राजनीति के सारे दाँव- पेंच बताते हुए राजनीति की पोल खोल दी -वास्तव में राजनीति क्या है?
रमकल्लो की पाती के माध्यम से ग्रामीण स्त्रियों के विकास को नई दिशा में जाते हुए देखकर पढ़ना अच्छा लग रहा है।
आपको बहुत-बहुत बधाई इस पाती के लिये।
गाँव की रमकल्लो जैसी साहसी और हिम्मती सभी लड़कियों और महिलाओं को शाबाशी और शुभकामनाएँ।
विकास की राह में परिवर्तन की धुरी की तरह होती है ऐसी लड़कियाँ या स्त्रियाँ।
आदरणीया नीलिमा करैया जी, आप रचना को बहुत गहराई से पढ़ती है। इसलिए उसके मर्म पर आपकी प्रतिक्रिया बहुत सटीक होती है।
गांव की गलियों में सीमेंट की ईंटें बिछाकर जो रास्ता बनाया जाता है उसे हमारे यहां खड़ंजा कहा जाता है। *चुकरिया* मिट्टी की बनी होती थी,जिसे आवां में पका लिया जाता था।पहले इसमें दूध घी रखा जाता था। चुकरिया में गुड़ फोड़ने का मतलब है कि उस आदमी की गुप्त योजनाएं किसी काम की नहीं है। या योजनाएं सफल हो ही नहीं सकती है। चुकरिया में गुड़ फोड़ोगे तो चुकरिया ही फूट जाएगी। स्थान भेद के कारण चुकरिया ही कुलिया हो जाती है।
पाती पर टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार