इकत्तीसवीं पाती
कड़वे घूँटों का सच
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सरबत चाची रमकल्लो को ढाढ़स बँधा रही थी। हार का अफसोस चाची को भी था लेकिन रमकल्लो की हालत देखकर वह बेचैन हो जाती। चाची की आत्मीयता से रमकल्लो की आँखों से आँसुओं का सैलाब उमड़ पड़ता। उसने रमकल्लो को अपनी कौली में भर लिया। चाची करुणा भरे स्वर में बोली, “कैसे समझाऊँ इस नादान को। यह कुछ समझती ही नहीं है। दुनिया से टक्कर लेने चली थी, जरा सी ठोकर में बेहाल हो गई।”
सरबत चाची कागज-पेन एक तरफ सरकाते हुए बोली, “रमकल्लो पागलपन छोड़ और हकीकत को स्वीकार कर।”
“चाची, मैं चुनाव हार गई।” चाची का हाथ पकड़कर वह बोली, “सिर्फ पन्द्रह वोटों से हारी हूँ। दुख इस बात का है कि पुरुषों ने मुझे अपनी जीत का उपकरण मान लिया। परधान जी के दाँव-पेचों ने साबित कर दिया कि सलीके से बिछाई गई गोटें जीत दिला सकती हैं।”
“इन बातों को छोड़। तू ये क्यों नहीं मानती है कि अपने बूते तूने पुरुषों के दाँव-पेंचों को उलट के रख दिया।”
रमकल्लो ने गहरी साँस खींची, “उन भेड़ियों के बीच मैं अकेली थी चाची। उन्होंने ऐसा फंदा डाला कि मुझे भनक तक न लगने दी।”
“तू ये क्यों नहीं समझती है कि राजनीति कमजोर का वरण नहीं करती है। वह हमेशा ताकतवर को चुनती है। शेर से सवा शेर मिल जाए, तो वह उसे छोड़कर सवा
शेर का दामन थाम लेती है। तू इतने में सबर कर कि जनता ने तुझे आदर दिया।
“इसी बात का दुख है चाची। जनता ने तो आदर दिया, पर सत्ता के भूखे शेरों ने
हमारी जीत छीन ली।”
रमकल्लो की जीत लगभग सुनिश्चित हो चुकी थी पर ऐन वक्त पर परधान जी ने अपना दाँव खेल दिया।
गब्बे को आभास हो गया था कि वह चुनाव हार जाएगा। वह चुनाव जीतने के लिए ही लड़ रहा था। अगर यह चुनाव हार जाता, तो वह मिट्टी में मिल जाता। उसे विश्वास था कि प्रधान बनकर मुकदमे को सही से हैंडिल कर लेगा। गाँव में उसका मान भी बढ़ जाएगा। रमकल्लो उसकी आशाओं पर पलीता लगा रही थी। उसने डरा-धमकाकर उसे चुनाव से बाहर करना चाहा, पर परधान जी सामने खड़े थे। दादागीरी से वोट खिसकने का डर था। गब्बे को कुछ समझ नहीं आ रहा था। हार की आशंका से वह तिलमिला उठा था।
लोग दुविधा में थे कि चुनाव जीतकर प्रधानी रमकल्लो करेगी या परधान जी ? उसकी पीठ पर उनका ही ठप्पा लगा हुआ था। रमकल्लो की प्रधानी में इन्हीं का दखल रहेगा। लोगों की आशंकाओं से रमकल्लो अनभिज्ञ न थी। मतदाताओं को विश्वास दिलाना जरूरी हो गया था कि जीतने पर प्रधानी वही करेगी।
रमकल्लो उन्हें विश्वास दिलाने में काफी हद तक सफल हो गई थी। मतदाता आश्वस्त हो चुके थे पर परधान जी को उसके तेवर अच्छे न लगे। वे बाद में हाथ मलने के लिए रमकल्लो को चुनाव नहीं जितवा रहे थे।
यही एक कड़ी थी, जिसने परधान जी और गब्बे को पास लाकर खड़ा कर दिया था। रमकल्लो को पता ही नहीं चला कि कब उसकी हार के सन्धि पत्र पर उन दोनों ‘ने हस्ताक्षर कर दिए। चारपटिया मुहल्ला (जिसमें वह स्वयं, परधान जी तथा गब्बे आते हैं) छिटककर गब्बे की झोली में आ गिरा। यही अप्रत्याशित स्थिति रमकल्लो की हार का कारण बन गई।
सरबत चाची नहीं चाहती थी कि रमकल्लो हार को दिल पर लेकर बैठ जाए। उसने रमकल्लो को इस सदमे से उबारते हुए कहा, “रमकल्लो, जीवन की राह कठिन अवश्य होती है पर इतनी भी नहीं कि उस पर चला न जा सके। हार-जीत जीवन रूपी सिक्के के दो पहलू हैं। हमें इसे स्वीकार कर लेना चाहिए।”
“सही कह रही हो चाची। किन्तु ताजा घाव पीड़ा देता है। मुझे इस पीड़ा से तड़पने दो चाची। मैं एक आम महिला हूँ, जो सुख में हँसती हैं और दुख में चिल्लाती हैं। मैं अभी उस स्तर तक नहीं पहुँच सकी हूँ, जहाँ सुख और दुख को एक तराजू पर तोल सकूँ। ऐसी महानता की हकदार नहीं बन पाई हूँ।”
सरबत चाची ने उसे हाथ पकड़कर उठाया, “एक जगह मत बैठ। भैंस को सानी-पानी कर दे, मन बँट जाएगा।”
चाची उसे धैर्य बँधाकर लौट आई।
दो दिन से भैंस भूखी बँधी थी। इस हालत में वह भूल चुकी थी कि शोक में खुद खाना न खाओ, चलेगा पर जानवर भूखा नहीं रह सकता है। उसने भैंस को सानी बनाकर डाल दी। वह भैंस की पीठ पर हाथ फेरने लगी। भैंस सानी खाते-खाते अपना मुँह उठाकर उसकी ओर देख लेती थी। मानो पूछ रही हो कि हार की सजा मुझे क्यों दे रही हो?
रमकल्लो ने अपना जीवन यादों के सहारे यूँ ही बिता दिया था। वह समझ ही न पाई कि ऐसी जिन्दगी का मतलब क्या है? वह पति से टूटकर प्यार करती रही। उसके राज कभी राज नहीं रहे। हर राज में उसने पति को शामिल किया। इसका सिला उसे क्या मिला? वह स्वयं नहीं जानती। हाँ, वह जिस काम को ठान लेती, उसे पूरा करके दम लेती। उसने यह दिखा भी दिया है।
पति ने आज तक उससे दो होंठ बात न की थी, फिर भी वह अपनी रौ में पत्र लिखती रही। इन पत्रों में वह अपने मन के भावों को व्यक्त करती रही। बिना आशा के कि वह पत्र का जवाब देगा या नहीं।
उसने पत्रों में प्रश्न किए हैं, तो उत्तर भी उन्हीं में छिपे हुए है। वह जानती थी कि पति उसके पत्रों का जवाब कभी न देगा, फिर भी वह पत्र लिखती रही, भेजती रही। उसने कभी इसकी परवाह न की कि मेरी हकीकत जानकर लोग क्या कहेंगे। स्त्रियोचित मानसिकता, पुरुष की सहचरी अथवा बिन पुरुष की आधी स्त्री। वह इन विवेचनाओं में नहीं पड़ी। वह केवल अपने दिल की सुनती रही। दिमाग का वाजिब हक भी न दे सकी थी रमकल्लो।
यही कारण है कि उसके जीवन में सरसता बनी रही। दिमाग से सोचने पर वह रस न झड़ता, जो दिल से झड़ता रहा। उसने जीवन में खोने-पाने की लालसा छोड़ दी थी। चुनाव हारने पर रोना-कलपना पाने की कामना नहीं थी। वह विश्वासघात से तिलमिलाई थी। इस धोखे को वह स्वीकार नहीं कर पा रही थी।
इस घटना ने रमकल्लो को कल्पना लोक से खींचकर यथार्थ के धरातल पर ला खड़ा किया था, जिससे वह सदा दूर भागती रही थी। चुलबुलेपन की जगह वह गुमसुम रहने लगी।
बत्तीसवीं पाती
कोई पूछ रहा है रमकल्लो को
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रमकल्लो के जीवन सरिता का प्रवाह मन्द पड़ चुका था। वह जीवन के उन पृष्ठों को नहीं खोलना चाहती थी, जो उसे पीड़ा पहुँचाएं, पर वे पृष्ठ हवा के थपेड़ों से खुल ही जाते थे। वह इन्हीं थपेड़ों से जूझ रही थी कि तभी हरबी ने आकर बताया कि तुझसे कोई मिलना चाहता है। उसकी पीड़ा को विराम मिल गया।
हरबी की बात से वह असमंजस में पड़ गई, “कौन है, जो उससे मिलना चाहता है?” उसने दिमाग पर जोर डाला पर किसी नतीजे पर न पहुँच सकी। हारकर उसने पूछ लिया, “जिज्जी, कौन मिलना चाहता है?”
“पता नहीं, बाहर के हैं।” हरबी बोली, “दो आदमी हैं। सरबत चाची ने अपनी बैठक में उन्हें ठहरा दिया है।”
उसने सोचा, होगा कोई रिश्तेदार। वह तैयार होकर हरबी के साथ चल दी।
रमकल्लो ने दो अपरिचितों को देखा, तो वह दरवाजे पर ठिठक गई। न तो वे उसके रिश्तेदार थे और न कोई परिचित। सूट-बूट में वे दोनों शहरी लग रहे थे। रमकल्लो अब भी नहीं समझ पा रही थी कि इनका मुझसे क्या काम है।
रमकल्लो को असमंजस में देखकर सरबत चाची धीरे से बोली, “रमकल्लो, ये लोग दिल्ली से आये हैं। नीले सूट वाले घन्सू के मकान मालिक रहे हैं।”
रमकल्लो ने सिर का पल्लू ठीक किया और उनके आगे हाथ जोड़ दिए। वे रमकल्लो को गौर से देखने लगे, जिससे वह असहज होने लगी। चाची ने उसे अपनी बगल में बैठा लिया।
मुहल्ले की अन्य औरतें भी वहाँ इकट्ठी हो गई थीं। इन आगंतुकों ने उनके भीतर जिज्ञासा उत्पन्न कर दी थी। किस उद्देश्य से ये रमकल्लो के पास आये हैं?
खेतों से लौट रहे रोहू ने जब अपने घर में भीड़ देखी, तो उसे कुछ शंका हुई। रोहू लंबे डग भरता हुआ वहाँ पहुँचा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उसने माहेश्वरी साहब को पहचान लिया था।
दिल्ली में घन्सू का कार एक्सीडेन्ट हो गया था। उसकी वहीं ‘ऑन स्पॉट डैथ’ हो गई थी। इस हादसे को सुनकर गाँव के दो-तीन लोगों के साथ रोहू भी गया था। जैसा कि गाँव में आम धारणा है कि उसके घरवालों को बुरी खबर की सूचना तुरन्त नहीं दी जाती है। इसी से रमकल्लो को इसकी जानकारी नहीं दी गई थी। उसे धीरे-धीरे पता चला था कि उसके पति का एक्सीडेन्ट हो गया है। हालत गम्भीर है।
डैड बॉडी इतनी बुरी हालत में थी कि उसे गाँव नहीं लाया जा सकता था। घन्सू का दाह संस्कार दिल्ली में कर दिया गया था। भाई बनकर दाह संस्कार रोहू ने किया था।
माहेश्वरी साहब ने इन लोगों की हर तरह से मदद की थी।
घन्सू पैसा कमाने दिल्ली गया था। शुरुआत में वह ईंट-गारे का काम करता रहा। राज माहेश्वरी के सम्पर्क में आने पर वह उनकी गाड़ी चलाने लगा था। माहेश्वरी दम्पत्ति अपने बंगले में अकेले रहते थे। बेटे-बेटियाँ पढ़-लिखकर विदेशों में सैटिल हो चुके थे। घन्सू के आत्मीय व्यवहार से वे खुश थे। कम समय में घन्सू उनके घर जैसा सदस्य हो गया था। घन्सू भी प्रसन्न था। उन्हें एक-दूसरे की जरूरत थी। अगले
महीने वह रमकल्लो को साथ लाने वाला था लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो न सका।
“माहेश्वरी साब, सब खैरियत तो है?” रोहू वहीं जमीन पर बैठ गया।
माहेश्वरी जी ने जवाब न देकर बैग से चिट्ठियाँ निकाल ली। वे उन चिट्ठियों को दिखाते हुए बोले, “रमकल्लो की ये चिट्ठियाँ हमने पढ़ीं, तो सोचा आप लोगों से बात कर ली जाए।”
रोहू उनके मुख की ओर देखने लगा।
माहेश्वरी बोले, “रमकल्लो अपनी चिट्ठियाँ मेरे पते पर भेजती थी। इन्हें मैं सहेजकर रखता गया।”
इसी बीच सरबत चाची ने उन्हें चाय दी। माहेश्वरी जी कप उठाते हुए बोले, “ये मेरे दोस्त हीरालाल चन्दानी जी हैं। इनका एक प्रेस है। हमारा और इनका उठना-बैठना रहता है। एक दिन हम दोनों बैठे गप-शप कर रहे थे कि तभी डाकिया इनका पत्र दे गया। जिज्ञासावश इन्होंने पत्र के बारे में पूछा तो मैंने वह पत्र इन्हें पढ़ने को दे दिया। पत्र पढ़कर ये बहुत प्रभावित हुए। इनकी रुचि देखकर मैंने वे सहेजे पत्र भी इन्हें पढ़ने को दे दिए। ये चाहते हैं कि इन्हें किताब के रूप में प्रकाशित कर दिया जाए।”
“यह सब कैसे होगा?” रोहू मुँह बा गया।
“ये खुद ही प्रकाशक हैं। इनके प्रकाशन की पुस्तकें दुनिया भर में पढ़ी जाती हैं।” माहेश्वरी जी रमकल्लो की ओर मुखातिब होकर बोले, “रमकल्लो की इजाजत मिल जाएगी, तो इन्हें पुस्तक रूप में छाप देंगे।”
“इसके लिए आपने व्यर्थ इतना कष्ट किया, बुला लेते, हमीं चले आते।” रोहू झुककर बोला।
चन्दानी जी मुस्कराए, “सही कहा रोहू, मेरे प्रकाशन की वह इमेज है कि सैकड़ों लोग मेरे पीछे घूमते हैं। हजारों इन्तजार में रहते हैं। मेरे पास समय नहीं होता है, लेकिन इस लड़की के जीवन संघर्ष, द्वन्द्व, पीड़ा आदि ने मुझे यहाँ आने को विवश कर दिया। इसका आन्तरिक और बाह्य पक्ष एक जैसा कैसे रह सकता है। यही सब कारणों से इनसे मिलने की ललक जगा दी।” चाय का आखिरी घूँट लेकर उन्होंने कप नीचे रख दिया, “मैं देखना चाहता था, पत्रों वाली लड़की को, जिसके लिखे को पढ़कर हँसते-हँसते कब रोना आ जाए और रोते-रोते कब हँसना आ जाए, कहना मुश्किल है।
मुख्य उद्देश्य पर आकर चन्दानी ने बैग से एग्रीमेन्ट पेपर निकालकर रमकल्लो की ओर बढ़ा दिया। उन्होंने कहा कि किताब छापने के एवज में हम कुछ रकम देंगे। रमकल्लो इस पेपर पर साइन कर दे। साथ में यह पचास हजार रुपये का अग्रिम चैक भी है।
रमकल्लो ने सरबत चाची की ओर देखा। चाची ने उनसे कागज ले लिए। चन्दानी
जी रायल्टी दे रहे हैं, चाची खुश हो गई।
“दस्तखत कर दे रमकल्लो।”
“मैं क्या करूँगी चाची उन पैसों का?”
“रमकल्लो आड़े वक्त में रुपये काम आते हैं।”
“चाची।” उसके मुँह से आह निकली, “पलंगभर का आदमी नहीं रहा तो इन कागज के टुकड़ों को लेकर मैं क्या करूँगी? मैं ये सौदा नहीं कर सकती हूं।”
चन्दानी जी के चेहरे पर एक साथ अनेक भाव उमड़ पड़े। यह लड़की पैसे लेने से क्यों मना कर रही है? इसे रुपये ले लेने चाहिए।
राज माहेश्वरी ने बात संभाली, “बेटी पैसे लेने में कोई हर्ज नहीं है। अगर तू दस्तखत नहीं करेगी, तो पुस्तक कैसे छपेगी?”
रमकल्लो अपने आप में खोई हुई थी। उसने माहेश्वरी की बात का कोई उत्तर न दिया, तो चन्दानी ने सरबत चाची की ओर इशारा कर दिया। बहुत समझाने के बाद अन्त में वह पुस्तक छपवाने पर राजी हो गई किन्तु चैक लेने से मना कर दिया।
चन्दानी जी ने मोबाइल कैमरे से रमकल्लो की फोटो खींच ली। बायोडाटा एक
कागज पर उतार लिया।
“यह पुस्तक किसी को समर्पित करोगी?” चन्दानी ने आत्मीयता से पूछा।
रमकल्लो सोच में पड़ गई। क्या कहे वह, कौन है उसका, जिसे पुस्तक समर्पित कर दे।
बताया नहीं बेटी।” माहेश्वरी जी उसकी ओर देखकर बोले।
रमकल्लो की नजरें रोहू पर टिक गईं।
सरबत चाची उसके पास आकर बोली, “कुछ तो बोल रमकल्लो।”
रमकल्लो अपने आप में खोई हुई थी। विगत जीवन की सारी घटनाएँ उसकी आँखों के सामने घूम गई। उसने पुष्प शैय्या को काँटों में तब्दील होते देखा है। वह बेबस उन काँटों में लेटकर लहुलुहान होती रही। फूलों के बाद काँटे और काँटों के बाद…।
“बोल दे रमकल्लो।”
रमकल्लो की आँखों से आँसू छलक आए। वह पीड़ा भरे स्वर में बोली, “चाची, जिसने जीवन भर साथ निभाने का वादा किया था, वही वादा तोड़कर…।” रमकल्लो की रुलाई फूट पड़ी।
“तो क्या…।” चन्दानी जी की बात पूरी होने से पहले वह बोल पड़ी, “हाँ, उसी को।”
मित्रो, इस पुस्तक का संपादन व प्रकाशन करके मुझे हार्दिक खुशी हो रही है। इसमें उस बेबस स्त्री की व्यथा-कथा है, जो चोट खाकर भी अपने-आपको बचाए रखती है। समय के कठोर हथौड़े से न तो वह टूटी और न विचलित हुई। वह अपनी पीड़ा को पत्रों के माध्यम से व्यक्त करती रही और अपने दुखों के साथ दूसरों के दुखों में भी शामिल होती रही।
इन पत्रों ने मुझे सोने नहीं दिया। पत्रों से ज्यादा उस लेखिका को देखने की जिज्ञासा प्रबल हो उठी थी। मैंने निश्चय कर लिया था कि मैं उससे एक बार जरूर मिलूँगा। मैंने माहेश्वरी जी को साथ चलने को कहा, तो वे तैयार हो गए और फिर हुई रमकल्लो से मुलाकात।
रमकल्लो जानती थी कि उसके लिखे पत्रों का कभी जवाब न मिलेगा, फिर भी वह पत्र लिखती रही। क्यों लिखती रही, यही जानने के लिए मैं गाँव गया था। मैं वहाँ कई लोगों से मिला, रमकल्लो के बारे में पूछा। सभी की दृष्टि में वह आम महिला थी पर मेरा मन उसे सामान्य औरत मानने को तैयार न था। लोक में असामान्यता चमत्कारिक मानी जाती है लेकिन यह असामान्य लड़की पत्र लिखकर कौन सा चमत्कार दिखाना चाहती है, यही मुझे जानना था।
पत्रों को पढ़कर पता चलता है कि वह व्यस्त रहना चाहती थी। प्रधानी का चुनाव उसने इसी उद्देश्य से लड़ा था। खुद व्यस्त रहेगी और दूसरों के जीवन को सुखी बनाने का प्रयास करेगी। दुर्भाग्यवश ऐसा हो न सका। यहीं वह टूट गई थी।
उसकी करीबी सरबत ने उसके बारे में जो बताया, उससे काफी हद तक सहमत
हुआ जा सकता है-
चुनाव हार जाने के बाद रमकल्लो को धक्का लगा, जिससे उसकी पीड़ा का बाँध फूट पड़ा। उसके भीतर का जमा दुख, संत्रास आँसुओं के रूप में बह निकला। उद्दाम आवेग से उसके भीतर के विकृत मनोभाव निष्कासित होकर मन का परिष्कार कर चुके थे। रमकल्लो अब पूरी तरह से रीत चुकी थी। उसके भीतर की चेतना जाग गई थी।
सरबत चाची ने उसे झिंझोड़ते हुए डपटा कि रमकल्लो होश में आ, तेरा ये पागलपन तुझे कहीं का न छोड़ेगा। वास्तविकता को समझ, रमकल्लो।
रमकल्लो फूट-फूटकर रो पड़ी, “चाची मैं क्या करती, मेरा जीवन कैसे कटता?”
“मैं जानती हूँ, पर यह सब तू अकेले सहती रही? उसे अपनी व्यथा सुनाती रही, जो इस दुनिया में ही नहीं है।”
“चाची, मुझे कभी नहीं लगा कि वे मर चुके हैं। मैं जब भी परेशान होती, पीड़ा का अनुभव करती, तो मन के आवेगों को पत्रों में उड़ेल देती। जी हल्का हो जाता था। मैं अपना जीवन ऐसे ही बिता देना चाहती थी पर यह आसान न हुआ। पैरों के नीचे का धरातल बहुत कठोर है, इस पर चलकर ही जान पाई। पहले मैं कठोरता को नकारती रही पर वह मेरा भरम था।”
सरबत चाची की आँखों से आँसू छलक पड़े, “रमकल्लो, मैं नहीं जानती हूँ कि मृत्यु के बाद मनुष्य का उद्धार होता है या नहीं, पर लोक यह मानता है कि तू जब तक उससे चिपटी रहेगी, वह भटकता रहेगा। तू उसकी भटकन का कारन न बन।” “
…।” रमकल्लो की आँखे शून्य में टिक गईं।
“पुरानी बातें छोड़, नई जिन्दगी की शुरुआत कर। जिन्दगी के बियावान में अकेले न चल पाएगी, किसी को साथ ले ले।”
“चाची, मैं उससे मुक्त हो चुकी हूँ। स्वेच्छा से अपनाए बन्धन भी कम तकलीफदेह नहीं होते हैं। मुझे इसका ज्ञान हो चुका है।” रमकल्लो आँखों में आँसू लिए बोली, “मैं भी उसे मुक्त कर चुकी हूँ चाची। अब वह मेरा अतीत भर है। अपने पागलपन से मैं निजात पा चुकी हूँ।”
चाची ने उसे अपनी कौली में भर लिया। दोनों गले लगकर रो पड़ी। सरबत चाची उसे आलिंगन से मुक्त करते हुए बोली, “रमकल्लो तू अपने बारे में सोच। बहुत दिनों से मेरे मन में एक बात दबी है। कई बार सोचा पर तुझे खुश देखकर हिम्मत न हुई।” चाची ने उसके गंभीर मुख की ओर देखा, “आज कह रही हूँ, मेरा बेटा रोहू है। वह तुझे तकलीफ न होने देगा। बने तो बना ले।”
रमकल्लो की नजरें चाची के मुख पर टिक गईं। उसके जेहन में रोहू का चेहरा कौंध गया। मुस्कराता हुआ चेहरा, इठलाता हुआ अल्हड़ युवा। हँसी-मसखरी से गूंजते पल उसे याद आ गए। रमकल्लो के चेहरे पर चमक उभर आई। वह सरबत चाची से लिपट गई, “माँ।”
इस जीवन गाथा को समेटने में मुझे काफी श्रम करना पड़ा। बेतरतीब पत्रों को सुसंगठित कर मुकम्मल उपन्यास का रूप दे दिया है। मैं ये वादा नहीं कर सकता हूँ कि रमकल्लो के सारे पत्र मुझे प्राप्त हो चुके हैं। कुछ पत्र गुम हैं। मेरे मित्र ने शुरुआत के पत्रों पर ज्यादा ध्यान न दिया था। उसके लिए इन पत्रों की कोई अहमियत न थी। लेकिन जब लगातार पत्र आने लगे, तब उन्होंने सहेजना शुरू कर दिया था।
संपादन में मैंने मूलभावना से छेड़छाड़ नहीं की है। कुछ ग्रामीण शब्द ऐसे थे जो अति क्षेत्रीयता से बंधे थे। उनका मैंने परिष्कार किया है। पत्रों के शीर्षक मेरे द्वारा दिए गए हैं। बिना शीर्षक के पत्र बेतरतीब से लगते। उसी को देखते हुए शीर्षक देना मैंने उचित समझा।
अन्त में पाठकों से अपील करता हूँ कि कृति कैसी बन पड़ी, आपके अमूल्य सुझाव हमारे लिए पाथेय साबित होंगे।
संपादक एवं प्रकाशक
हीरालाल चन्दानी

आदरणीय सर जी!
इस बार की पाती ने बहुत ही ज्यादा तकलीफ दी।
यह अप्रत्याशित दुख था और दोहरा नहीं बल्कि तिहरा। एक बुरे सपने की तरह आँखों के सामने से सब कुछ गुजर गया।
सच कहें तो कभी-कभी लगता है कि दुनिया अच्छे लोगों के लिए बनी ही नहीं है। पैसा+लाभ+ स्वार्थ= राजनीति/चुनाव
रमकल्लो जैसे लोगों के लिए राजनीति तो है ही नहीं।
हम तो यह सोचकर खुश थे कि शायद इस बार उसका पति वापस आ रहा है।
लेकिन सारे पाँसे पलट गए।अंत इतना अधिक अकल्पनीय होगा स्वप्न में भी नहीं सोचा था। इसकी कल्पना ही नहीं थी कि उसका पति मर चुका होगा।
आज अपनी पिछली लिखी हुई टिप्पणी पर पछतावा हो रहा है जिसमें हमने लिखा था कि वोट डालने भी नहीं आया।
एक लंबे समय से पढ़ते हुए रमकल्लो से बहुत आत्मीयता हो गई थी। वह एक जीवित पात्र की तरह महसूस होने लगी थी।
इस बार कहे बिना नहीं रहा जा रहा कि रमकल्लो की ही तरह हम भी नगर पालिका का चुनाव हारे थे और बिल्कुल इसी तरह इतने ही कम वोट से। यह विधायक का वॉर्ड था। बड़ी चुनौती थी। उन्होंने साम दाम दंड भेद से काम लिया। वाकई हमारी जिंदगी का सबसे बुरा अनुभव था वह।मानसिक रूप से सामान्य होने में लंबा वक्त लगा।
जब से रमकल्लो चुनाव में खड़ी हुई थी तब से हमारी धड़कने बढ़ी हुई थीं। एक ही ख्याल मन में आता था कि वह चुनाव जीत जाए और खटका भी रहता था कि प्रधान कोई गेम न खेल ले।
उपन्यास छप गया शादी हो गई यह कम से कम ठीक रहा।
पर हमें आपकी आज की पाती ने रुला दिया।
पति की मृत्यु वाली बात ने तो स्तब्ध कर दिया।
कभी-कभी संवेदनाएँ समझ ही नहीं पाती हैं कि जो अपन पढ़ रहे हैं वह सच्चाई नहीं कहानी है।
क्योंकि अपन जानते हैं कि कहानी हमेशा कल्पना नहीं होती हैं। उनका सृजन अपने आसपास से ही होता है।
पत्र शैली में लिखी गई एक बेहतरीन श्रृंखला के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
आदरणीय लखनलाल पाल जी
कभी हम ने पहले लिखा था कि रमकल्लो की प्राणनाथ से मिलने की प्रतीक्षा कब समाप्त होगी किन्तु
हा हन्त हन्त नलिनी गज उज्जहार ! जैसी हमारी स्थिति हुई है ।
जिस कथा का अन्त पाठक को चौकाता है वह श्रेष्ठ साहित्य का चिह्न है ऐसा हम मानते हैं।
इस पाती का अन्त बिलकुल अनपेक्षित और पाठकों को नए सिरे से सोचने के खातिर मजबूर करता है ।
पाठक की स्थिति – आए थे गुल के वास्ते और सार लेकर चले जैसी होती है।
राजनीति बदमाशों का आखिरी मुकाम होता है यह सभी जानते हैं और इस कारण इसकी बलिवेदी पर रमकल्लो बलि हो जाती है ।
फिर भी रचनाकार की जितनी प्रशंसा की जाए वह कम ही है । इसके पूर्व पातियों के अंश में रमकल्लो ने अपने दुःख को प्रकट नहीं किया । अगर वह ऐसा करती तो यह पाती साधारण पाती बन जाती और इसका महत्व भी कम हो जाता ।
सर आप की रमकल्लो पाठकों के स्मृतियों में सदैव रहेगी और एक अलग नया प्रयोग के रूप में इस पाती को भविष्य में भी देखा और पढ़ा
जाएगा यह हमारे मन में विश्वास है।
फिर एक बार आप को बधाई देते हुए हम अपनी बात को विराम देते हुए कहना चाहते हैं –
मंजिलें और भी हैं !
प्रो विजय महादेव गाडे
सांगली महाराष्ट्र
सार के स्थान पर खार (काँटे ) शब्द था लेकिन ऑटो स्पेल की चक्कर में सार शब्द आ गया
रमकल्लो की ये आखिरी दो पाती….
जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव हमें कितना कुछ सिखाते रहते हैं। सबके लिये नेक दिल, भरोसे मंद और अलमस्त रहने वाली रमकल्लो ने चुनाव हारने के बाद ऐसा झटका खाया कि उसका लोगों पर से विश्वास ही उठ गया। चिकनी-चुपड़ी बातें करने वाला परधान तो आस्तीन का सांप निकला। अचानक कुछ और ही प्लान करने लगा। और रमकल्लो की जीत होते-होते रह गई। अगर रमकल्लो जीत जाती तो वह अपनी पावर का स्वयं ही इस्तेमाल करना चाहती थी। वह परधान के हाथों में कठपुतली नहीं बनना चाहती थी। और इस बात के भांपते ही परधान ने रमकल्लो की पीठ में छुरा घोंपने की ठान ली। वह पैंतरे बदल कर बैंगन की तरह गब्बे की तरफ़ लुढ़क गया। लोगों को भड़काकर रमकल्लो को वोट देने के लिये प्रोत्साहित करने की वजाय वह गब्बे की तरफ हो गया। वोट जो रमकल्लो को मिलने चाहिये थे वे गब्बे की पेटी में चले गये। गब्बे ने हड़प लिये। धिक्कार है उस दगाबाज परधान को। रमकल्लो पूरी उम्मीद के साथ अपनी जीत का इंतजार कर रही थी। पर वह इस तरह हार जायेगी इसका उसे रत्ती भर भी अनुमान नहीं था। परधान ने उसके साथ यह राजनीतिक गंदा खेल क्यों खेला यह बात उसे हैरान कर रही है। इसे कहते हैं राजनीति की दोगली चाल।
रमकल्लो की हार से पाठक अभी उबर भी न पाये थे कि बत्तीसवीं पाती में एक और अप्रत्याशित व हृदय-विदारक घटना ने हिला दिया। इस आखिरी पाती में मुझे पूरी उम्मीद थी कि रमकल्लो की चुनाव में हार होने पर उसे ढाढस बंधाने उसका पति जरूर आयेगा। But we receive a heartrending news. यह क्या! उसके पति की तो पहले ही मौत हो चुकी थी। उसकी दुनिया तो कब की उजड़ चुकी थी। पर इस बात को उसकी इस बत्तीसवीं और आखिरी पाती से जाना। आह! विधि का विधान किसी को नहीं पता। अब तक लोग उसके पति को लेकर पता नहीं क्या-क्या अनुमान लगाते रहे थे। चुनाव की चोट से भी बढ़कर उसके पति का न होना। लेकिन अब तक सब इससे अनभिज्ञ थे। एक ऐसी चोट, एक ऐसा तूफान जिसे वह अपनी बनाई काल्पनिक दुनिया में रह कर झुठलाने की कोशिश कर रही थी। उसके पति घँसू की तो विवाह के कुछ दिनों पश्चात ही परदेस जाकर मौत हो गई थी। पर रमकल्लो उसकी यादों से अपने को जुदा नहीं कर पाई। और वह एक वीरांगना की तरह इस पुरुष रूपी भेड़ियों के समाज में अपने मन को मजबूत बनाकर उसकी यादों के सहारे एक वीरांगना की तरह जीने का प्रयत्न करती रही। सदमे के बाद सदमा। क्या उसके जीवन को किसी की नजर लग गयी थी? अंत बहुत ही मार्मिक व दुखद है। पर समाज में सरबत चाची जैसे सहृदय लोग भी हैं जो इस पहाड़ जैसी जिंदगी को काटने के लिये अपने बेटे का हाथ रमकल्लो के हाथ में देने को तैयार रहते हैं। कहते हैं Behind every dark cloud there is a silver lining.
सोच रही हूँ कि इस उपन्यास की नायिका रमकल्लो का चरित्र क्या किसी के वास्तविक जीवन से संबंध रखता है? या फिर हमारे समाज की कुरीतियों के निवारण हेतु लेखक ने इस उपन्यास के माध्यम से सबको एक संदेश दिया है। जो भी हो जिस कुशलता से इस उपन्यास को लिखा गया और इसकी आकर्षक भाषा शैली का चयन किया गया वह लेखक के उतकृष्ट लेखन को दर्शाता है। रमकल्लो की हर पाती जज्बाती व उसका अपना चरित्र अवर्णीय है। हर पाती में उसके अनोखे अंदाज में उसकी भावनाएं एक निर्बाध नदी की तरह बहती चलती हैं। शिकायतें, उलाहना, दुख, दर्द, संवेदनाएं, मान मनौवल सब कुछ ही तो है इन पातियों में। पर इन सबके पीछे है दर्द का वह समंदर जिसे उसने सबसे छुपाये रखा था। इससे पता चलता है कि जीवन से अकेले जूझने वाली कुछ ऐसी भी वीरंगनाएँ होती हैं। इस उपन्यास को पढ़ने की यात्रा देखते ही देखते न जाने कब पूरी हो गयी पता ही न चला।लखनलाल पाल जी आपको इस उपन्यास के लेखन पर बहुत बधाई व भविष्य के लिये भी ढेरों शुभकामनाएं।