ममता किरन जी से परिचय पुराना है शायद दो हजार नौ या दस में हमारी पहली मुलाक़ात हुई थी। इसके बाद यह पहचान कब मित्रता में बदली, कहना मुश्किल है। जिस बात के कारण ममता जी पहली मुलाक़ात के बाद भी याद रहीं, वह थी उनकी ग़ज़ल –
बाग़ जैसे गूँजता है बेटियों से
घर मेरा(मिरा) वैसे चहकता बेटियों से।
इसी ग़ज़ल में वे आगे कहती है –
दिल का टुकड़ा है डटा सीमाओं पर तो
सूना घर चुके है उसकी चिट्ठियों से।
इस ग़ज़ल ने मेरे मन को भीतर तक छू लिया था। इसके बाद हमारा मिलना-मिलाना होता रहा। ममता जी अपनी कविताओं, ग़ज़लों में समाज की, मानवीय भावनाओं की बात करती हैं। सुनने वाले को लगता है, मानो वह मेरी मन की बात ही कह रही है।
एक अन्य शे’र देखिये जहां वे निराशा के बीच सकारात्मक रहने का गुर सिखाती है –
है दूर तलक यूँ तो अँधेरा मेरे आगे
है मुझको यक़ीं होगा उजाला मेरे आगे।
इसी ग़ज़ल का आखिरी शे’र कहता है –
सजदे में उसी सूर्य के झुकता है मेरा सर
रखता है जो हर रोज़ उजाला मेरे आगे।
“आँगन का शजर” की अधिकांश ग़ज़लों को मुझे ममता जी से ख़ुद सुनने का मौका मिला है। इसीलिए इस पुस्तक के मायने मेरे लिए अलग है। ममता जी बचपन को याद करते हुए कहती हैं –
“अपने बचपन का सफ़र याद आया
मुझको परियों का सफ़र याद आया।”
इस पूरी ग़ज़ल से होकर गुज़रते हुए पाठक, अलग-अलग उम्र के, अलग-अलग दौर को मानो फिर से जी लेता है।
इसी तरह की एक अन्य ग़ज़ल को देखिए जहाँ वे जौहरी-से मिजाज़ रखती हैं –
“छुपा है दिल में क्या उनके ये सब हम जान लेते हैं
मुखौटा ओढ़ने वालों को हम पहचान लेते हैं।”
नितांत ग्रामीण परिवेश से आने वालों के लिए जो शहरों में रहने को मजबूत है, ममता किरण कहती हैं –
“गाँव की अमराईयों का भूल जाना कब हुआ
भागते इस शहर में आबोदाना कब हुआ।”
इस ग़ज़ल से होकर गुज़रता हुआ पाठक, दिन-रात की रेलमपेल से कुछ लम्हे फ़ुर्सत के निकालकर अपने भीतर झांकेगा ज़रूर।
ममता जी की लेखनी का कमाल है कि जितनी बार उन्हें सुनो, जितना पढ़ो, हर बार उनके कहन में कुछ ना कुछ नया ज़रूर मिलता है। हर बार वे “अपना-सी कोई बात” कहती मिल जाती है। मुझे लगता है कि एक कलमकार की यह सबसे बड़ी सफलता है कि उसका कहा आमजन की आवाज़ बन जाए। लोग उसे अपने मन की बात कहने के लिए प्रयोग करने लगे।
आमतौर पर ग़ज़ल का पारंपरिक मिज़ाज महबूब और हुस्न की बात करता है मगर ममता किरण की ग़ज़ल में ढ़लकर इसका कैनवास विस्तृत हो जाता है। वह पर्यावरण चिंतन पर भी सबका ध्यान खींचती है और आपसी भाईचारे का पैग़ाम भी देती है। सबको भटकाव से सम्हल कर कदम बढ़ाने की सीख देते हुए वह सूफियाना मिज़ाज भी धर लेती है जो समाज को सही-ग़लत का भेद आसानी से समझा देता है।
एक ग़ज़ल मुझे बहुत अपनी-सी लगती है इसको देखें –
“जो मरते वक़्त लब पर सिर्फ़ उसका नाम आ जाए
सुकूँ से मर सकूँ और रूह को आराम आ जाए।
निकलते वक़्त घर से हर किसी से मिल-मिला लेना
न जाने किस धमाके से तेरा प़ैगाम आ जाए।
सभी चीजें पुरानी घर की यूँ मत फेंक देना तुम
न जाने कौनसे पल चीज़ कोई काम आ जाए।
गुज़रता जा रहा है वक़्त आपाधापी में यूँ ही
कभी मेरे भी हिस्से इक सुहानी शाम आ जाए।
मरूँ चाहे कहीं भी ख़ाक अपने देश में पहुँचे
मेरी मिट्टी ही कुछ मेरे वतन के काम आ जाए।”
शायरा के भीतर की एक स्त्री जब अपने मन की दबी बात को उजागर करती है, तब वह पेज नंबर 51 पर बिखरे मोती-सी बन जाती है –
“अजब मेरी ख़्वाहिश, मैं क्या चाहती हूँ?
मैं तुझमें ही होना फ़ना चाहती हूँ…”
गणित की विद्यार्थी रही ममता को ग़ज़ल के पैरामीटर समझने में कुछ वक़्त लगा हो, मगर यह उनका नितांत व्यक्तिगत सफ़र रहा। हम जैसे पाठकों/श्रोताओं को वे मुकम्मल शायरा के तौर पर ही मिली। उनके कुछ शे’र, कुछ ग़ज़ल तो शायरी पसंद लोगों को जुबानी याद हो जाती है। इन्हीं में से एक यह है –
“भले दुश्मन हमें आघात देंगे
भरोसा है उन्हें हम मात देंगे…”
इसी तरह जुबान पर बैठा एक और शे’र देखिए –
“सारी दुनिया के सवालों से बचा लूँ तुमको
अपने दिल के किसी कोने में छुपा लूँ तुमको।“
वो प्यार ही क्या जहां रूठना-मनाना ना हो। जहाँ शिकवा-शिकायत ना हो। इस मिज़ाज का यह शे’र देखें –
“जब कसम दी थी भूल जाने की
क्या ज़रूरत थी याद आने की।
कुछ भी कह देगा वो न सोचेगा
उसकी आदत है दिल दुखाने की…”
उर्दू से हिन्दी की राह पर मजबूत कदम बढ़ाती ग़ज़ल, ममता जी की लेखनी पर चढ़कर संयुक्त परिवार की, बेटे-बहुओं की, होली की, हँसी-ठिठोली की बात भी करती है –
“सब बेटे-बहुओं की टोली आयी है
कई बरस में ऐसी होली आयी है…”
अलग-अलग मूड को लिखते हुए ग़ज़लकारा समाज को आईना दिखाने से भी नहीं चूकती। पेज नंबर 90 की ग़ज़ल के इस शे’र को देखिए –
“वो अपने सिवा औरों की सोचा नहीं करते
कुछ ऐसे शजर भी हैं जो साया नहीं करते।“
कहते हैं ना कि शुक्राना रखना चाहिए। संग्रह की आखिरी ग़ज़ल का भाव यही है जब शायरा कहती हैं –
“न किया ख़ुदा का हो शुक्रिया, मुझे याद ऐसी घड़ी नहीं
जो मुफ़ीद था मुझे मिल गया, रही और कोई कमी नहीं।”
छंदमुक्त कविता लिखने वाली ममता किरण ने ग़ज़ल कहना कब और कैसे शुरू किया, इसका भी दिलचस्प किस्सा है। कविता के साथ ग़ज़ल कहना, उतना आसान भी नहीं होता; मगर जो ठान लेते है, उनके लिए मुश्किल कुछ भी नहीं होता।
“आँगन का शजर” मुझे अशोक गुप्ता जी की संस्था कियान फाउंडेशन द्वारा प्राप्त हुई थी। इस ग़ज़ल संग्रह को 2020 में किताबघर प्रकाशन ने प्रकाशित किया। 96 पृष्ठों में 75 ग़ज़ल के इस खूबसूरत गुलदस्ते को सजाया गया है। इस पुस्तक का मूल्य है मात्र दो सौ रुपए।
सटीक और सार्थक टिप्पणी। यदि मुझे सही से याद है तो एक बार लेखिका ने रेडियो पर पर एक कवि गोष्ठी में इस संग्रह में कुछेक रचनाएं पढ़ कर सुनाए थीं और शायद वो भी तरन्नुम में।
जी सही याद है आपको…
बहुत आभार
Great review!
वंदना जी आपने संग्रह पढ़ा और उस पर अपने विचार व्यक्त किये… बहुत आभार..
ममता किरण जी के गजल संग्रह,”आँगन में शजर”पर आपकी समीक्षा पड़ी वन्दना जी!गजलें अच्छी ही होंगी क्योंकि उदाहरण में जितने शेर आपने लिखे हैं उनमें से कई शेर तो बहुत अच्छे लगे।
बाग़ जैसे गूँजता है बेटियों से
घर मेरा(मिरा) वैसे चहकता बेटियों से।
दिल का टुकड़ा है डटा सीमाओं पर तो
सूना घर चुके है उसकी चिट्ठियों से।
“सारी दुनिया के सवालों से बचा लूँ तुमको
अपने दिल के किसी कोने में छुपा लूँ तुमको।
सजदे में उसी सूर्य के झुकता है मेरा सर
रखता है जो हर रोज़ उजाला मेरे आगे।
है दूर तलक यूँ तो अँधेरा मेरे आगे
है मुझको यक़ीं होगा उजाला मेरे आगे।
जो गजल वंदना जी आपको अच्छी लगी, अपनी सी लगी वह गजल वाकई अच्छी है।
बधाइयां आपको इसकी समीक्षा के लिये!