Wednesday, February 11, 2026
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सौम्या पाण्डेय “पूर्ति” द्वारा ‘सखि हे! कि पुछसि अनुभव मोर!’ काव्य-संग्रह की समीक्षा

पुस्तक-समीक्षा- “”सखि हे! कि पुछसि अनुभव मोर!”
लेखक  : डॉ सच्चिदानंद पाण्डेय
समीक्षक  : सौम्या पाण्डेय “पूर्ति”
प्रकाशन वर्ष : 2024
प्रकाशक : रुद्र प्रकाशन (पब्लिशर एंड डिस्ट्रीब्यूटर)
मूल्य : ₹ 395, प्रष्ठ : 130
मानव जीवन विविधताओं से आच्छादित है, जिसमें भावों के ज्वार के मध्य स्थितिप्रज्ञ होकर स्वयं की अंतर यात्रा का यदि कोई साक्षी होता है तो वह ईश्वर है। ईश्वर की अनुभूति निष्पाप व शुद्ध मन की साधना से ही सम्भव है। शुद्धता की  विलक्षणता अंतः करण की जागृति के बिना अकल्पनीय है, किंतु मनुष्य के ‘स्व’ की एकाग्रता व ईश्वरीय बोध तभी प्राप्य है, जब मानव हृदय विकारों से मुक्त हो, जिससे उसमें विशुद्ध प्रेम उद्भासित हो सके। चूंकि प्रेम की पराकाष्ठा उसकी प्राप्ति में न होकर आत्मा की मुक्ति से सम्बद्ध है जो कि आत्मिक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है, ऐसे में परम् अनुभूति साधना के चरम आनंद तक पहुंचने से पूर्व जिन पड़ावों को पार करती है वे प्रेम के अपरिमित अवदान का स्वरूप है, जिसे केंद्र में रखते हुए काव्य सृजन किया है आदरणीय डॉ सच्चिदानंद देव पाण्डेय जी ने, अपने नवीनतम काव्य संग्रह 
“सखि हे! कि पुछसि अनुभव मोर!” के माध्यम से, जिसमें अनेकों भावों से संलिप्त रचनाओ का समागम देखने को मिलता है। चूंकि इस यात्रा का अनुभव सबका अपना भिन्न होता है इसलिए लेखक ने अपने निज अनुभव को आधार बनाकर सृजन किया है व उसी अनुरूप अपने काव्य संग्रह का शीर्षक चयनित किया है।
आदरणीय पाण्डेय जी की रचनाओं को यदि देखें, तो उसमें ‘सखि!’ उद्बोधन के द्वारा वे अपने अंतर्द्वंद्व को अपनी कल्पित प्रेयसी के समक्ष प्रस्तुत करते हुए अपनी बात रखने का प्रयास कर रहे हैं, जिसमें विरह की पीड़ा भी है, व उस असफलता की वेदना भी, जो कि वेदना की जनक है, जैसे-
पत्थर हो गए हैं नैन..
बहुत दिनों से इन्होंने
नहीं देखने की तरह ही सब कुछ देखा,
चित्रलिखित सा!
अपनी सखि! के विछोह को कवि इन शब्दों में व्यक्त करते हैं-
किसी अलभ्य काल्पनिक प्रेम की तलाश में
भटक रहा है मेरा कवि मन..
अनजान जंगल की अजनबी पगडंडी पर
अब अकेला चल रहा हूँ मैं
जहाँ 
कांटों से घिरे हर फूल में मुझे,
तुम्हारा ही भृम होता है।
यहाँ कवि ने अपनी सखि! को कांटो से घिरा पुष्प संबोधित किया है, इसका आध्यात्मिक पक्ष ‘कांटो’ को सांसारिक भृमजाल एवं ‘फूल’ को परम् ब्रह्म के प्रतीक रूप में होने का आभास कराते हैं।
इसी प्रकार साधना का उच्चतम स्तर मृग – मरीचिकाओं के पीछे भागने से नहीं बल्कि कर्म करते रहने से है। धरणी की उत्पत्ति ही योगियों को उत्पन्न करने के लिए हुई है। यौगिक आनंद आकाश में विचरण करके नहीं अपितु धरती पर सांसारिक कर्मों के निर्वहन के मध्य ईश्वरीय आराधना में है, यही धरती पर जन्म लेने की सार्थकता है, जिसे कवि ने इस प्रकार व्यक्त किया है-
धरती छोड़ के भागने पर सुख नहीं,
उसकी मरीचिकाएँ ही मिलेंगी।
और अधिक अयथार्थ
और अधिक दुखदाई
धरती के नीचे
मधुरतम जल के स्रोत बहते हैं
तुम्हारे प्यार का विश्वास लेकर 
कठोरतम साधनाएं कर सकता हूँ
इस धरती पर आसानी से।
कवि के साधक मन में न जाने कितनी विचलन है जो साधना तक पहुंचने के मध्य की उलझनों के समान है जिसे साधक सुलझाते हुए साध्य की प्राप्ति करने को प्रयासरत है। एक अन्य रचना “खोई हुई प्रेमिकाएं” के माध्यम से कवि ने बड़े ही गूढ़ रहस्य उजागर करने का प्रयास किया है। कवि जीवन में आने वाले छलावों को प्रेमिकाओं के रूप में व्यक्त करता है जिसमें प्रेमिकाएं उन्हें रूप भ्रष्ट, धन भ्रष्ट, अक्ल भ्रष्ट मानकर त्याग देती हैं, जिससे उपजे ज्ञान की अभिव्यक्ति कुछ इस प्रकार है-
किंतु सोंचता हूँ कि जब
इस दुनिया की साधारण मूर्तियों का प्रेम न जीत सका
जो थोड़े से रस, रूप, गंध, शब्द स्पर्श की विशेषताओं से
जीती जा सकती हैं
तो क्या उस महान ईश्वरीय ज्योति को
जिसे पाने के लिए
“आपा मेटि जीवत मरै, तब पावै”  की कठिन शर्त होती है,
कैसे मिटा सकता हूँ,
अपनी अकिंचनी तकदीर से।
इसी रचना की कुछ अन्य पंक्तियां देखें-
अब मैं उस दुनिया में आँखे ही नहीं खोलना चहता था
जहाँ सौंदर्य और शील भरी प्रेमिकाएँ खो जाती हैं
इसलिए
मैं आँखे मूँद लेना चाहता हूँ
एक संकल्प के साथ कि शायद
आँखे मूंदने से दर्शन हो जायें
अंतः स्थित किसी चैतन्य आत्मा का।
यहाँ कवि विरक्ति के भाव में है। जब मनुष्य माया के छल से बार-बार छले जाने पर अपनी स्थितप्रज्ञ की चेतना को स्पर्श करता है तब उसकी आध्यत्मिक चेतना जाग्रति से पूर्व का त्वरित भाव विरक्ति है, कवि इस रचना के माध्यम से सांसारिक मोहमाया के बंधनों से मुक्त होने की छटपटाहट को व्यक्त करने हेतु प्रयत्न करते दिखाई देते हैं, यह अनुभव सभी का अपना विलक्षण होता है, यहाँ कवि ने निज अनुभूति की व्याख्या की है।
इसके बाद भी मनुष्य मोहग्रस्त हो जाता है, अतः मोह के आवरण से बाहर आने को रचित एक अन्य रचना “मोह” को रचनाकार ने इस प्रकार व्यक्त किया है- 
हे भुवन मोहिनी!
तुमने ही रचा है यह ‘मोह’
जो मोह में है
उसी के लिए ही यह संसार सुंदर है।
जिसे मुक्त कर दिया मोह से तुमने
उसके लिए यह सुंदरतम सृष्टि
चिता की धूल है, धूर्जटि  का अंगराग!
उस पर तुम्हारी अकृपा है।
यह रचना विरोधाभास उत्पन्न करती है। मोह के बंधन से निकलने को आतुर साधक मोह में किस प्रकार लिप्त होने को व्याकुल है, यह ठीक उसी प्रकार है जो मनभावन वस्तु को त्यागने को सज्ज साधक पुनः उसी में रम जाना चाहता है, मन योगी तो कंत प्रलोभनों में आसक्त है, यह बीच की कड़ी अथवा वह मनःस्थिति है जो एक सामान्य मनुष्य के योगी बनने के मध्य है, जिसे पार करके ही मानव विकार मुक्त हो सकता है, व योगमाया द्वारा रचित मायाजाल को भेद कर योग साधना में प्रवत्त हो जाता है।
यह संग्रह सामान्य आत्मकेंद्रित मनुष्य के विकेंद्रीकरण के द्वंदों से उपजा है जिसमें रचनाकार आत्म कथात्मक रूप से सखि! के माध्यम से अपनी विवशताओं, मानसिक विघटन की निज यात्रा के संचार को अभिव्यक्त करने में सफल रहे हैं। प्रथम दृष्टया यह संग्रह विशुद्ध प्रेम रचनाओं का संकलन ही प्रतीत होता है जो सामान्य दृष्टि में उतना गंभीर सृजन नहीं जान पड़ता है जैसा कि इसका स्वरूप है। संग्रह की लगभग प्रत्येक रचना का आरंभ प्रेम के प्रति समर्पण से ही हुआ है, रचनाकार प्रेयसी की कल्पनाओं में विचरण करते प्रतीत होते हैं, जो गंभीर चिंतक पाठक को आकर्षित नहीं कर सकती हैं, किंतु जब रचना को प्रथम चंद पंक्तियों से आगे पढ़ा जाता है, तब उनकी गूढ़ता का आभास होता है। 
आदरणीय पाण्डेय जी की रचनाओं को समझने के लिए कविताओं को पूरा व बार-बार पढ़ा जाना आवश्यक है, क्योंकि जिन रचनाकारों का प्रिय विषय प्रेम नहीं है, जैसे कि मैं स्वयं भी, उनको आरंभ में यह संग्रह बोझिल लग सकता है। मैंने यहाँ उद्धृत सभी पंक्तियां रचना के मध्य से चयनित की हैं, क्योंकि मेरी भी दृष्टि तभी प्रखर हुई जब मात्र चंद पंक्तियां पढ़कर धारणा न बनाते हुए मैंने पूरी रचना को पढ़ा, व रचना की गंभीरता को समझा। इसका आध्यात्मिक पक्ष तभी मेरे समक्ष आया इसलिए यह संग्रह तल्लीनता से पढ़ने योग्य है।
एक बात जो अखरती है वह है, कवि ने अपनी कई रचनाओं में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग किया है, जैसे- मिस, शेयर, हैप्पी, आदि का प्रयोग यदि न भी किया जाता तो बेहतर होता, यह वर्तमान समय में प्रासंगिक हो सकते हैं, जैसे “बाइक चलाती लड़की” में बाइक व स्टेयरिंग जैसे शब्द आएंगे ही, किंतु बहुतायत में इनका प्रयोग अखरता है क्योंकि एक ओर हिंदी की शुद्ध भाषा का प्रयोग किया गया है, दूसरी ओर अंग्रेजी शब्द इस संग्रह को कालजयी होने से रोकते हैं। हालाँकि भाषा बहुत सधी हुई व अच्छी प्रयुक्त हुई है, फिर भी इसमें यह सुधार हो सकता था, यह मेरा मत है। अंत में एक रचना अंग्रेजी में भी है, जिसकी आवश्यकता लगती नहीं है, यदि कुछ अन्य रचनाएँ भी अंग्रेजी में होतीं तो संग्रह में उनकी अधिक उपयुक्तता रहती। 
आज के रचना संदर्भ में देखें तो कुल मिलाकर यह एक अच्छा व पठनीय काव्य संग्रह है, जिसकी रचनाएँ साहित्य में रहस्यवाद की एक नई परिभाषा गढ़ने को सज्ज हैं। संग्रह की सफलता के लिए लेखक को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं!
सौम्या पाण्डेय “पूर्ति”
ग्रेटर नोएडा
जनरल मैनेजर
स्वतंत्र लेखन- उपन्यास, स्तंभ, आलेख, बाल साहित्य, कविताएँ इत्यादि
सम्पर्क- [email protected]


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