सुबह 10 बजने में कुछ मिनट बाकी थे। सबकी नजरें मुख्य द्वार पर टिकीं थी। और मिसेस अनिता जोशी ऑफिस में प्रवेश करती हैं। कांच का वो बड़ा-सा दरवाजा खोलकर अंदर कदम रखते ही सभी कर्मचारी तालियां बजाकर बड़ी गर्मजोशी से उनका स्वागत करते हुए फूलों की बरसात करते हैं। आज का दिन विशेष है यह एहसास उनके सहकर्मी जताने की कोशिश करते हैं। ऑफिस का हर क्षण आज उनके लिए अंतिम था। भावुक होकर वो हर क्षण को दिल के कैमरे में कैद करते हुए आज के हर पल को जीने की कोशिश कर रहीं थीं।
काफी कोशिशों के बावजूद भी मिसेस जोशी अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाईं, आँखों से छलकते आंसुओं को आँचल से पोंछते हुए आगे बढ़ती हैं, और अपनी सीट पर बैठ जाती हैं, इस एहसास के साथ कि कल से ये कुर्सी बेगानी हो जाएगी। सेवानिवृत्ति का अंतिम दिन उन्हें भीतर से झकझोर रहा था। रोज की आपाधापी भरी नटनी की जिंदगी से मुक्ति का आनंद या नौकरी खत्म होने का दुख…! दुविधा मनस्थिति…!
जैसे ही उन्होंने अपना मोबाइल खोला, उनके जेहन में भविष्य की योजनाओं का कारवां तीव्र गति से आगे बढ़ने लगा। सोचने लगीं- नौकरी करते हुए चालीस साल कैसे गुजर गए, पता ही नहीं चला। अगले ही पल उनकी आँखों के सामने घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों का दृश्य तैर गया, जो उन्हें अब भी निभाना था…। बेटी की गोद भराई रस्म, बहू–बेटे, पति, सास की जिम्मेदारियाँ, आगे पोता–पोती के साथ खेलेने के सपने, उनकी देखभाल, उनके शिक्षा की चिंता, उम्र के साथ संगाती बन रहीं बीमारियों से तालमेल…! सबकुछ तो अभी निभाना बाकी है…। तभी उनकी सहेली उषा उनके कंधों पर हाथ रखते हुए बोली,
“दीदी सेवानिवृत्ति मतलब ऑफिस से मिलने वाली तनख्वाह से निवृत्ति..। एक माँ कभी रिटायर होती है क्या ….?
2 – जिंदगीभीएकहवनकुंड
शहर के जाने-माने उद्योगपति अग्रवाल जी की 75वीं सालगिरह पर हवेली में होम हवन, पूजा-पाठ और सहभोज का आयोजन किया गया था। परिवार के सभी छोटे-बड़े सदस्य पंडित जी के साथ पूजा की रस्म निभा रहे थे। इस दौरान पंडित जी ने जीवन के मर्म से जुड़ी एक कथा सुनते हुए जीवन में आनंद और सुख चैन कैसे खोजना चाहिए इसका सार समझाया। तत्पश्चात होम करवाने में जुट गए।
स्वभावानुसार अग्रवाल जी हाथ सम्भालकर समिधा समर्पित करने लगे। जिससे अंत में उनके पास काफी समिधा बच गई। होम-हवन के समापन की घोषणा करते हुए पंडित जी ने अंतिम मंत्र पढ़ा और बोले, “अब जो सामग्री बच गई है उसे एक साथ हवन कुंड में समर्पित करके जोर से बोलो – स्वाहा।”अग्रवाल जी ने बची हुई सारी समिधा एक साथ कुंड में समर्पित करते हुए जोर लगाकर बोले – “स्वाहा।”
हवन कुंड में समिधा की मात्रा अधिक हो जाने से चारो ओर धुआं ही धुआं फैल गया। सबकी आंखों में जलन होने लगी। अग्रवाल जी ने भी अपनी आंखें मलते हुए मूंद ली और उनका भूतकाल आंखों में तैर गया – अरे, बचाने और हाथ बचाकर खर्च करने की फ़िक्र में मैंने अपने जीवन में भी काफी समिधा बचा ली है। अब तो एक साथ समर्पण की बारी आ गई। यहां से तो आंखों में सिर्फ नमी और सामने ग़ुबार ही ग़ुबार नज़र आ रहा है। इसका मतलब जीवन में भी समिधा समर्पण का संतुलन बिगड़ गया।
पंडित जी की कथा का स्मरण करते हुए उन्होंने अपनी आँखें खोली और संकल्प किया कि आज के बाद सामाजिक सरोकार के तहत वे गरीब, असहाय, विकलांग तथा जरूरतमंदों की सुश्रुषा में अपना अतिरिक्त धन एवं जीवन समर्पित करेंगे। सबके सामने उन्होंने यह घोषणा भी की। “जय हो, जय हो” के घोष के साथ सभी ने पूजा-पाठ, कथा तथा होम के आयोजन सार्थक-सार्थक बताया। अग्रवाल जी के जेहन से तुरंत निराशा के बादल छँट गए और नए जोश के साथ आनंद के उन क्षणों को जीने लगे।
3 – यहाँ तो हर शाख पे उल्लू बैठे हैं
गांव के बाहर, मंदिर के पास स्थित पीपल के पेड़ के नीचे तीन लोग बातें कर रहे थे। अचानक उनकी नजर सामने से आ रहे पंडित जी पर पड़ी। दक्षिणा में मिले बकरी के बच्चे को कंधे पर लादे पंडित जी अपनी धुन में घर की ओर जा रहे थे। उस बकरी के बच्चे को देखते ही उन तीनों के मन में लालच आ गया। उन तीनों ने आपस में राय मशवरा किया और करके बिखर गए।
जैसे ही पंडित जी पीपल के पास से गुजरे उनमें से एक जो कि मुंह में पान ठूसे हुए था, बोला, “महाराज जी इस कुत्ते को कंधे पर लादकर कहां ले जा रहे हैं?”
“अंधे हो क्या? दिखाई नहीं देता? ये कुत्ता नहींबकरी है…बकरी! यजमान ने दान दिया है।” मुंह बनाते हुए पंडित जी ने जवाब दिया।
“आपकी नज़रें धोखा खा रही हैं महराज जी, मुझे तो कुत्ता दिखाई दे रहा है! यजमान ने आपको फंसा दिया है। आगे जैसी आपकी सोच।” कहकर वह व्यक्ति चलते बना।
कनखियों से पंडित जी ने एक नज़र बकरी की ओर देखा और आगे बढ़ने लगे। कुछ दूर जाते ही दूसरे व्यक्ति ने उन्हें घेर लिया और बोला, “पंडितजी जयराम, का हाल चाल बा?”
“जयराम जी। सब कुशल मंगल है, अपनी सुनाओ।”
“सब ठीक है बाबा, मगर आप ई का अनर्थ कर रहे हैं? कंधे पर सूअर लादे कहां जा रहे हैं? ई आपको शोभा नहीं देता! राम राम राम… लोग क्या सोचेंगे?”
“अरे मूर्ख, तेरी आंखें फूट गई हैं क्या, जो बकरी को सूअर बता रहा है?”
“पंडितजी आपकी अब उम्र हो गई है। बकरी नहीं सूअर है सूअर! अब आप नहीं मान रहे हैं तो हम भला का कर सकते हैं?” इतना कहकर वह भी चलते बना।
आगे बढ़ते हुए पंडित जी सोचने लगे…। ऐसा कैसे हो सकता है ! उन्होंने पुन: बकरी को गौर से देखा और अपनी तसल्ली करते हुए आगे बढ़ने लगे। कुछ दूर जाने के बाद रास्ते में बैठा तीसरा व्यक्ति सामने आया और बोला, “बाबा पायलागू, इस गदहे को लादे भरी दुपहरिया में कहां जा रहे हैं? सब ठीक तो है ना? ई बोझा को काहें ढो रहे हैं?”
“अरे अकल का मारा, तू अंधा है क्याजो बकरी को गदहा बता रहा है?”
“बाबा, गदहा है गदहा! जरा गौर से देखें। खैर, मैंने जो देखा, सो बता दिया, आगे आप जाने।” इतना कहकर वह भी किनारे हो लिया।
पंडित जी को अब चिंता होने लगी। वे सोचने लगे कि एक ने कुत्ता कहा, दूसरे ने सूअर और ये तीसरा गदहा कह रहा है। जरूर ये कोई मायावी प्राणी है, जो बार-बार अपना रूप बदल रहा है और मुझे नजर नहीं आ रहा है। अन्यथा राह चलते लोग ऐसी बातें क्यों करेंगे ? आगे चलकर ये मुझे नुकसान पहुंचा सकता है! ऐसा सोचकर उन्होंने तुरंत उस बकरी को कंधे से उतारा तथा खेत की ओर भगा दिया।
पंडित जी ने अंतिम बार उसकी ओर देखा और मन कठोर करते हुए उसे वहीं छोड़कर घर की ओर चल दिए।
मौका देखकर उन तीनों ठगों ने पंडित जी पर ठहाका लगाया और झट से बकरी को लपक लिया। अपनी योजना कामयाब होते देख वे खुशी से झूम उठे। उनमें से एक बोला, “भाई ठगों की ठगी से कोई बच पाया है क्या? फिर चाहे विज्ञापन की दुनिया हो, नेताओं का भाषण हो या ढोंगी बाबाओं की माया?” उसके सूर में सूर मिलाते हुए दूसरे ने शायरी सुनाई, “बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था। यहाँ तो हर शाख पे उल्लू बैठे हैं।” तीसरे ने भी तान छेड़ी, “हाँ भाइयों, दुनिया झुकती है झुकाने वाला चाहिए।”
और अगले शिकार के इंतजार में वे अपनी–अपनी शाख पर बैठ गए।
हर शाख पर उल्लू बैठा है, यह कहानी पंचतंत्र से ली गई है। हमने बचपन में पढ़ी थी। ..