Wednesday, February 11, 2026
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डॉ. शिप्रा मिश्रा की लघुकथाएँ

1.
पेंशन (लघु कथा) 
“अम्मा! तुम भी ना… कर दी ना देर। तुम्हें तो समझाना बेकार है। एक दिन घंटी नहीं डुलाती तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता। जानती हो न बैंक में कितनी लंबी लाइन लगी रहती है। तो भी बैठ गई भोग लाने।”
माँ तो बस दम साधे निर्विकार भाव से बैंक की सीढ़ियों पर एक हाथ को रेलिंग के सहारे दूसरे हाथ को अपनी छोटी सी लाठी का सहारा देती हुई, अपने को ऊपर की ओर ढकेलती हुई किसी तरह चढ़ी जा रही थी।
कई बार ऊपर बड़ी उम्मीद से बेटे को देखती। शायद चार कदम पीछे उतर कर उसका हाथ पकड़ ले। लेकिन वह जानती थी हर बार की तरह आज भी उम्मीद करना बेकार है।
सचमुच आज बैंक में बहुत भीड़ थी। सोमवार का दिन था और कई दिनों के बाद बैंक खुला था तो भीड़ होना जायज़ भी था।
घंटों लाइन में खड़े होने के बाद रुपये मिले। माँ उन रुपयों को जी भर देखने का लोभ संवरण नहीं कर पाई।
संज्ञा शून्य सी न जाने कब तक खडी़ रहती। बेटे की बातों ने जैसे उसे नींद से उठाया।
“ये बीस रुपये रख लो माँ! बस पकड़ लेना। इधर-उधर मत चली जाना कथा कहानी बतियाने। कंडक्टर से बोल देना अच्छे से चढ़ा देगा और उतार भी देगा। दस रुपये से ज्यादा भाड़ा मत दे देना पिछली बार की तरह। और दस रुपए के बताशे ले लेना पोते के लिए। तुम तो एकदम से सठिया गई हो।”
माँ समझ गई थी हर बार की तरह आज भी उसके पेंशन से बहू की पाजेब और बच्चों की मिठाइयाँ आएंगी।… और हर बार की तरह वह आज की रात बिना कुछ खाए ही काटेगी। उसके पैर घिसटते हुए बस स्टैंड की ओर बढ़े जा रहे थे…
2.
अंतिम ग्लास ( लघुकथा) 
“आखिर क्या दिखाना चाहती हो? यही न.. कि तुम्हारे पैसे से घर चलता है। हाँ तो लेकर चली जाओ ना! मुझे इन सब की कोई जरूरत नहीं। जी लूंगा मैं… खुश हूँ अकेले।”
सुरभि के लिए यह तो रोज की बात हो गई थी।
“गई तो थी मायके… वहीं रह जाती। कोई बुलाने तो नहीं गया था।”
ये सारी बातें उस पर अब असर क्यों नहीं करती! कौन सी मजबूरी रोक लेती थी उसे। शादी से पहले तो छोटी- छोटी बातों पर अधिकार से लड़ लेती थी सबसे। लेकिन अब…
उसने अपने नन्हें से कमजोर बच्चे को छाती से लगाया और घर में बचे इकलौते अंतिम ग्लास को लाने चली गई।
अभी तो आधी रात बाकी है। शराब अभी खत्म नहीं हुई है…
3.
घिन (लघुकथा)            
“अरे वाह अंजना! तुम्हारे ईयर रिंग्स तो बड़े खूबसूरत हैं और सैंडल भी।”
“हाँ… वो पापा ने ला कर दिया कल। पापा-मम्मी दोनों बाजार गए थे ना।”
“लेकिन तुम्हारे पापा तो कुछ करते नहीं फिर ये सब कैसे?”
मालती को कुछ समझ में नहीं आ रहा था.. 
“कल दादी का पेंशन आया है न अकाउंट में।”
“अच्छा…!”
मालती की स्मृतियों में उसकी दादी का मायूस चेहरा बार-बार तैर रहा था। गंदे-मटमैले कपडों में बरतन मांजती दादी को उसने मुहल्ले की कोई फटेहाल नौकरानी समझ लिया था। उसने अपनी दादी को याद किया जो कुछ महीने पहले उन सभी को छोड़ कर जा चुकी थी। किसी की मजाल नहीं थी दादी की बातों को दरकिनार करने की। अम्मा और बाबा तो फोड़ ही डालते अपने बच्चों को। न जाने क्यों मालती को उस खूबसूरत इयर रिंग्स और सैंडल से घिन-सी क्यों आने लगी..
रोटी (लघुकथा) 
ढेबरी को मरे आज दस दिन हो गए। उसका वास्तविक नाम क्या था, किसी को ज्ञात नहीं। लेकिन उसके पति का नाम ढेबर था तो लोग उसे ढेबरी बुलाने लगे। वह थी भी नाटी, गोल-मटोल…
जब तक ढेबर जीवित था, उसका खर्चा-पानी किसी तरह चल जाता था। अब तो भीख मांगने के अलावा कोई चारा नहीं था उसके पास। कहने को तो चार- चार बेटे थे लेकिन कोई पलटकर उसे पूछता नहीं था। यहाँ तक कि भीख में जो चावल- आटा लाती थी, वह भी  उससे नाती-पोते मांग कर ले जाते। वे कहते- 
“लकड़ी गोइठा तो है नहीं तुम्हारे पास… फिर रोटी बनाएगी कैसे?”
बदले में कभी-कभार थोड़ा भूजा, सतुआ दे जाते। ढेबरी को रोटी से बहुत प्रेम था। रोटी खाने के लिए छछन जाती। छठे-छमासे किसी के यहाँ जग- परोजन होता तो पूड़ी, सब्जी, बुनिया मिल जाता। भीख देने वालों से रोटी मांगने में उसे संकोच होता, भीख मांगना उसका पेशा तो था नहीं।
आज उसका श्राद्ध है। बेटों ने ढेबरी के काम-क्रिया के लिए गाँव वालों से अच्छा चंदा वसूला है। बेटों को बहुत खुशी है इस पैसे से महीने भर बिना कमाए चल जाएगा।
श्राद्ध खूब धूमधाम से हुआ। ब्रह्मभोज हुआ, ब्राह्मण संतुष्ट होकर गए। पूड़ी, बुनिया, इमरती, लड्डू कई- कई दिनों तक चलता रहा। केवल तरसती रह गई तो एक ढेबरी। इहलोक और परलोक कहीं भी उसे रोटी नसीब नहीं हुआ। न जाने इस रोटी के लिए उसे और कितने जन्म लेने पड़ेंगे… 

डॉ. शिप्रा मिश्रा
ई-मेल – shipramishra1969@gmail.com 


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2 टिप्पणी

  1. आपकी कहानी ‘ढेबरी’ ने बचपन के बहुत सारे पात्र याद करा दिए,| गरीब आदमी की न जाति होती है न धर्म और न ही उसका कोई नाम होता है|
    ‘कफ़न ‘की आगे की कहानी है, लाजवाब

  2. शिप्रा जी
    आपकी चारों लघुकथाएँ पढ़ीं।चारों ही स्त्री प्रधान हैं पति के न रहने पर बेटे के द्वारा पेंशन तक हथिया लेना, खाने को नहीं देना,भीख का अनाज भी छीन लेना।सब बेहद मार्मिक और दुखद है। घर की अच्छी बेटी ससुराल में जाते ही बुरी कैसे हो जाती है यह गणित समझ में नहीं आता। क्यों नहीं सोचते लोग कि बच्चे अपने माता-पिता के जिस व्यवहार को देख रहे हैं भविष्य में वही उनको भोगना पड़ेगा और बोलने पर उन्हें जो जवाब सुनना पड़ेगा उसकी कल्पना भी नहीं कर पाएँगे वे।
    “जो बोया है वही पाएगा, तेरा किया के सामने आएगा।”
    काश लोग समझ पाएँ।

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