Monday, March 9, 2026
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आलोक शुक्ला की लघुकथा – आख़िरी देखभाल

बेंगलुरु की उस सुबह में कोई विशेष हलचल नहीं थी। धूप हमेशा की तरह खिड़की से छनकर कमरे में आ रही थी। वही कमरा, जहाँ वर्षों से नागेश्वर राव और संध्या  की दुनिया सिमटी हुई थी।
सेवानिवृत्ति के बाद यही उनका दुनिया थी । चाय की भाप, दवाइयों की शीशियाँ, और बीते दिनों की यादें । नागेश्वर अपनी अक्सर बीमार रहने वाली पत्नी की खूब देखभाल करते.. लेकिन इधर काफ़ी दिनों से  नागेश्वर राव अक्सर ख़ामोश रहने लगे थे। जैसे भीतर कहीं कुछ टूट रहा था, उस वह टूटन को वे शब्दों में नहीं ढाल पा रहे थे। अवसाद ने उन्हें ऐसे घेरा था जैसे कोई अदृश्य जेल उनके इर्द-गिर्द बन गई थी जिससे बाहर निकलने का उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था।
संध्या उन्हें देखती रहती चुपचाप बिना कुछ पूछे। शायद वर्षों का साथ गुजरते हुए सालों के साथ धीरे -धीरे चुप रहकर जीना सिखा देता है ये अलग कि ये मौन धीरे- धीरे आपको ख़त्म भी करने लगता है।
इस मौन जीवन में एक दिन नागेश्वर के मन में एक  सवाल बार- बार गूंजने लगा… 
“मेरे बाद वह कैसे जिएगी, कौन उसकी देखभाल करेगा “?
एक बिटिया अमेरिका में बाकी कोई नहीं क्योंकि जो कुछ रिश्तेदार थे वे मन और शहर दोनों से दूर थे। बंगलुरू शहर यूं तो बड़ा था, पर अपनापन उससे भी छोटा। अचानक उन्हें लगा कि दुनिया उनकी संध्या के लिए निर्दयी हो जाएगी.. उन्होंने तौलिया उठाया और…
वो क्षण कोई उग्र क्रोध का नहीं था, बल्कि एक विकृत करुणा का था। ऐसी करुणा जो प्रेम का मुखौटा पहनकर विनाश बन जाती है।
सब कुछ बहुत जल्दी हो गया। जब सब थम गया, नागेश्वर वहीं बैठे रहे । घड़ी की सुइयाँ चलती रहीं, पर समय रुक गया था।
उन्होंने  एक परिचित को फोन किया। आवाज़ सपाट थी, और उन्होंने जो कहा उस पर दूसरी ओर से हंसते हुए आवाज़ आई “मज़ाक मत करो।” लेकिन यह मज़ाक नहीं था। यह जीवन की सबसे भयावह त्रासदी थी।
पुलिस आई। सवाल पूछे गए। नागेश्वर के जवाब बिखरे हुए थे जैसे उनका मन। वे बार-बार बस इतना ही वे कहते रहे…
“मैं नहीं चाहता था कि वह अकेली पड़े… कष्ट सहे।”
किसी ने कहा “वह अवसाद में था”। 
किसी ने कहा “मानसिक रूप से अस्थिर”।
पर सच शायद इससे भी ज़्यादा डरावना था। यह उस समाज की कहानी थी जहाँ बुढ़ापा अकेला है,जहाँ मानसिक पीड़ा को कमजोरी समझा जाता है,.और जहाँ प्रेम, अगर संवाद से दूर जाकर मौन धारण कर लेता है तो कभी-कभी हिंसा का भी रूप ले लेता है।
उस घर में अब ख़ामोशी है। ऐसी ख़ामोशी, जो सवाल पूछती है। क्या देखभाल सिर्फ शरीर की होती है या मन की भी ?
( इसरो के पूर्व वैज्ञानिक नागेश्वर राव द्वारा बंगलुरु में अपनी पत्नी संध्या की हत्या करने की घटना पर आधारित लघु कथा)
आलोक शुक्ला वरिष्ठ रंगकर्मी, लेखक,  निर्देशक एवं पत्रकार हैं)
नई दिल्ली 110092


आलोक शुक्ला
आलोक शुक्ला
टीवी मीडिया में कई वरिष्ठ पदों पर रहे. अपनी रंग यात्रा में पुरे भारत के साथ यूरोप (जर्मनी) के कई शहरों में शोज किये, ट्रेवल शो बनाये और डरना जरूरी है व पहेली फिल्म के साथ कई लघु फ़िल्मों और धारावाहिकों मे काम किया. संस्कृति मंत्रालय ने 2018 में लोक रंगकर्म पर सीनियर फेलोशिप अवार्ड से सम्मनित. संपर्क - 9999468641
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