सोमा और रोमा का आज रिजल्ट मिलना है। अक्सर सोमा का मन कम ही लगता है पढ़ाई में। उम्र में मात्र 1 साल का अंतर। रोमा खुश हो रही है स्कूल जाने के लिए, सोमा को कोई खास उत्साह न था। यह क्या… बारिश की वजह से असेंबली में अनाउंस होने वाला नतीजा सबकी क्लास में बताया जाएगा। सोमा फोर्थ बी में रोमा थर्ड ए में अपनी क्लास में पहुंच गईं। फूल स्टाफ थोड़ी देर तक सहेलियां का एक दूसरे से मिलने का उत्साह बना रहा। थोड़ी ही देर में स्टाफ रूम से शिक्षक शिक्षिकाएं हाथ में सफेद रंग के रिपोर्ट कार्ड लेकर कक्षाओं में पहुंच गईं।
जो बच्चे बाहर टहल रहे थे, भाग कर सारे कमरे में आए,प्रार्थना हुई, टीचर का लेक्चर हुआ और पहला दूसरा तीसरा मुख्य रिजल्ट सुनाया गया। खूब तालियां बज रही थीं। सोमा चुपचाप पीछे की सीट पर बैठी थी अतः टीचर का इस बार का सरप्राइस बाकी था। क्लास में करीब 45 बच्चे थे। इस बार सब की रैंक बताई जायेगी। सबके दिल धड़कने लगे। बताने का क्रम धीरे-धीरे 20-30 की संख्या तक पहुंच गया किंतु सोमा का नाम नहीं आया ना ही उम्मीद थी। तभी 32 वां नंबर सोमा का था उसे बुलाकर रिपोर्ट कार्ड देते हुए टीचर ने कहा अगली बार खूब अच्छा करना कुल 45 बच्चों में 32वें नंबर पर आना बुरा नहीं था।
खूब खुश होकर घर जाने का उत्साह मन में था। तभी याद आया रोमा की क्लास से उसको बुला ले रिक्शा वाले भैया बाहर खड़े होंगे। उसका रिजल्ट पूछने से पहले उसने अपना खुद का रिजल्ट बता दिया कि मेरी 32वीं पोजीशन आई है। क्लास में तेरी कितनी है? रोमा रोती हुई बोली पांचवी है। सोमा के मुंह पर सन्नाटा था। बोली रोती क्यों है? यह तो बहुत अच्छी रैंक है चल मम्मी-पापा बहुत खुश होंगे। चल जल्दी चलें। घर पहुंचे तो मम्मी पापा दोनों घर पर नहीं थे। दोनों शाम का इंतजार करने लगी।
घर की घंटी बजते ही सोमा खुद दरवाजा खोलने गई तो गेट पर ट्यूशन टीचर खड़े थे। नाम था महेंद्र। बड़ी खुशी से बोली – सर बहुत अच्छा रिजल्ट आया है मेरा 32 वां नंबर है क्लास में। सर बोले – चलो पहले ऊपर चलते हैं फिर देखता हूं। ऊपर जाकर सोमा पानी-बिस्कुट लेने चली गई। तभी रोमा ने आकर अपना रिपोर्ट कार्ड दिखाया और रोकर बोली – सर मैं फर्स्ट,सेकेण्ड,थर्ड में से नहीं आई। तब तक सोमा सामने आई बोली – देखिए ना सर कितनी पागल है यह इतनी अच्छी रैंक लायी तब भी रोती है।
सर डाँटकर बोले – तुम तो चुप ही रहो तुमने अपनी रैंक देखी है, क्या बकवास है। यह भी कोई रैंक होती है क्या? एक से 10 के बीच नाम आने वाले बच्चों की रैंक मानी जाती है। तुम्हारी रैंक तो बकवास है।
सोमा को लगा कि कौन सा पहाड़ टूट पड़ा जहां कूद-कूद के 45 में 32 में पोजीशन लाने पर खुशी मना रही थी उसकी सारी खुशी धराशाई हो गयी। अब तो मम्मी पापा भी खुश नहीं होंगे। सर तो उनसे बुराई करेंगे। तब तक सर बोले रोमा तुमने बहुत मेहनत की है मेरा मन खुश हो गया तुम्हें इसके लिए प्राइज मिलेगा वह भी मेरी तरफ से रुको मैं अभी लेकर आता हूं। दो बहने दोनों का रिजल्ट और प्राइस एक को वह भी ट्यूशन टीचर से जो खडूस कभी टॉफी तक नहीं लाया वह प्राइज देगा। सोमा का मन बेचैन था।
घर के पास ही कई दुकानें थी। आधे घंटे में सर वापस पैक करा करके ले आये। खोलने का उत्साह सोमा को ज्यादा बेचैन किये जा रहा था। पर अलग चुपचाप खड़ी देख रही थी और बहन का नाटक खत्म ही नहीं हो रहा था। सर ने उसे बड़े सम्मान के साथ देते हुए कहा मुझे विश्वास है अगले वर्ष तुम बहुत अच्छा करोगी और गिफ्ट हाथ में देते हुए बोले यह तुम्हारे लिए। सोमा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी कि आखिर है क्या इसमें। इतना बड़ा सा है यह पागल खोलती क्यों नहीं इसे? अपने अच्छे प्रयास का एहसास होते ही सोमा ने कागज फाड़ना शुरू किया और यह क्या इतना सुंदर ज्योमेट्री बॉक्स … देखते ही स्वतः सोमा के मुंह से वाह!! निकल गया।
सोमा को देख सर ने उसे उपेक्षा भाव दिखाया। सोमा बाहर चली गई, मन में बहुत गुस्सा था। ऐसा भी क्या मेरे लिए कुछ और दिला देते छोटा सा ही सही पर कितने गंदे हैं मुझे कुछ नहीं दिया। तब तक मम्मी-पापा आ गए वह भी रोमा का रिजल्ट और गिफ्ट देख बहुत खुश हुए शाबाशी दी। सोमा चुप खड़ी रही। अब अपनी बात रखने की हिम्मत उसमें ना थी कि उसने भी अच्छा किया। उसके तर्क सुने कौन ? और क्यों?
डॉ. ऋतु वार्ष्णेय गुप्ता
असिस्टेंट प्रोफेसर
हिंदी विभाग
किरोड़ीमल महाविद्यालय
समस्या उठातें तो समाधान भी देतें हैं..मानो न मानो फर्क पड़ता है ऋतु डियर..
shuriya
ऋतु जी!
इस लघुकथा को पढ़ने के बाद हम थोड़ा गंभीर हो गये।
लघुकथा गहरे संवेदनाओं की कथा होती है। और यह कथा तो ऐसी थी जिसमें आपका सकारात्मक रुख न केवल अपेक्षित था बल्कि बहुत जरूरी था।
कम से कम इस विषय पर लघुकथा में तो सकारात्मकता बहुत जरूरी है , प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष!
इस समय परीक्षा का दौर चल रहा है। अभी पेपर पूरे हुए भी नहीं है और आत्महत्या की खबरें आना शुरू हो गयी हैं। ऐसे में यह कहानी नकारात्मकता लिये हुए महसूस हुई। भले ही सोमा का 32 वाँ नंबर था उसे प्रोत्साहित किया जा सकता था कि कोई बात नहीं अगली बार तुम और मेहनत करना।वह तो इस
स्थान पर भी खुश थी लेकिन उसे हतोत्साहित किया जा रहा था ,वह भी ट्यूशन टीचर के द्वारा। रोमा को समझाना था कि पाँचवाँ स्थान भी बुरा नहीं है, अगली बार और मेहनत करना। ट्यूशन टीचर की तो सबसे ज्यादा गलती है। हमारा बस चले तो हम तो ऐसे टीचर को अलविदा ही कह दें जो बच्चों को हतोत्साहित करते हैं, वह भी ट्यूशन क्लास में!
चाहे स्कूल हो या ट्यूशन हो; लेकिन टीचर को कैसा होना चाहिए यह समझना बहुत जरूरी है। सभी बच्चों की मेंटिलिटी एक सी नहीं होती है और ना ही सबकी बुद्धि एक समान होती है। समझने का सबका अपना-अपना और अलग-अलग तरीका होता है. कोई एक बार में समझ लेता किसी को दो-तीन बार समझाना पड़ता है। टीचर को बच्चों की प्रवृत्ति को समझना बहुत जरूरी होता है।
आपके लेखन कला में कोई दोष नहीं है। हमारा विचार है कि आप इस पर एक बार फिर काम करें। इसके अंत को बदलिये। ट्यूशन टीचर जब उपहार लेकर आएँ तो दोनों के लिए लेकर आएँ। भले ही उसे कह दिया जाए कि तुम्हें उपहार नहीं मिलेगा। पर उसे भी उपहार देकर आश्चर्यचकित किया जाए और उसे भी शाबाशी दी जाए कि अगली बार और मेहनत करना ,ताकि उसमें भी उत्साह जागे। रोमा को समझाएँ कि कभी-कभी ऐसा हो जाता है। अगली बार और मेहनत करना।
रोमा जैसे बच्चे ही जब बड़े होते हैं तो थोड़ी भी निराशा उन्हें आत्महत्या करने पर मजबूर कर सकती है। इस साइकोलॉजी को हर टीचर को समझना बहुत जरूरी है।
हो सकता है आपको हमारी बातें बुरी लगें लेकिन हम सच कह रहे हैं, क्योंकि हम भी लेक्चरर रहे। इस तरह की स्थितियों को हमने भी फेस किया है।एक टीचर के हैसियत से इस कहानी ने हमें चिंतित किया।
सब कुछ ठीक है बस अंत में थोड़ा सा परिवर्तन अपेक्षित है और आपकी लघुकथा अपने सही उद्देश्य को पूरा करेगी।
यह हमारा निवेदन ही समझें बाकी तो फिर आपकी रचना है और आपकी रचना पर आपका पूरा अधिकार है आप उसे बदले या ना बदले। सादर
आपकी बात से सहमत हूँ, ये कहानी ऐसा करने वालों को उजागर करती है इसलिए इसका अंत अलग है, बाल मन की पीड़ा छुपी है इसमें, इसके मर्म को देखना जरुरी है अगर सब अच्छा ही होता तो, फर्क नहीं करना था
shukriya