Wednesday, February 11, 2026
होमलघुकथागिरिजा नरवरिया की लघुकथा - परवाह

गिरिजा नरवरिया की लघुकथा – परवाह

भास्कर स्कूल से आता तो उसे घर पर बाबा और दीदी के अलावा कोई न मिलता।कहने को संयुक्त परिवार था, लेकिन परिवार के सदस्य अपने-अपने काम पर चले जाते।   फिर भी  भानू को घर का दरवाजा हमेशा खुला मिलता। हर रोज की तरह आज भी भानू गाड़ी से उतर कर घर के अंदर हुआ ही था कि वैसे ही बाबा ने समझाइश देते हुए कहना शुरू कर दिया ‘ भानू आज घर पर कोई नहीं है, दीदी भी अपना टेस्ट  देने कोचिंग गई है। तुम अपना बैग रख कर ,अच्छी तरह हाथ पांव धोकर कपड़े बदल लेना और हा.. तुम्हारे लिए ऊपर रसोई में खाना भी रखा होगा ।खाना भी खा लेना, बाबा और कुछ बोलते उससे पहले ही भानू पीठ पर स्कूल की किताबों के बोझ तले हारा- थका सा धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ता हुआ अपने कमरे की ओर चलता चला गया।
आज भी भानू को बाबा की बात सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं थी क्योंकि बाबा हर रोज उसे यही समझाइश देते थे। कुछ ही देर बाद बैठक से आंगन में आकर बाबा ने टीवी की आवाज सुनकर फिर से पुकारा ‘भानू ओ..ओ भानू टीवी ही देखता रहेगा या खाना भी खाया है कि नहीं।’ भानू भी बाबा की आदतों से परिचित था इसलिए कार्टून देखने में मस्त होते हुए बोला ‘अरे बाबा इतनी फिक्र मत करो, मुझे अभी भूख नहीं है, मैं थोड़ी देर से खा लूंगा।बाबा ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा ‘भानू टीवी देखते देखते बहुत समय हो गया है, इसे बंद करो, खाना खाओ और थोड़ा सो जाओ ।’ बाबा के गुस्सा करने पर भानू टीवी को देखते देखते ही बेमन से  खाना खाकर सो जाता है। इसी बीच बाबा पूरे घर का  दबे पांव चक्कर लगा जाते हैं, कि भानू ने ऊपर जाकर खाना खाया भी है या नहीं और रसोई में खाना खुला तो नहीं छोड़ दिया है। फिर बाबा नीचे आकर बैठक में टीवी देखने लगते हैं।
कभी-कभी लगता है कि वे बाबा न होकर घर के प्रहरी है जो सभी सदस्यों के अपने-अपने काम पर जाने के बाद घर का पूरा ख्याल रखते हैं। बाबा की मौजूदगी से घर में कम से कम ताला लगाने की नौबत तो नहीं आती यही संयुक्त परिवार की सबसे बड़ी पूंजी है।  टीवी देखते देखते और टेबल पर पड़े अखबार को पलटते हुए बाबा का ध्यान बैठक  में लगी दीवार की घड़ी की सुईयों पर जाता है तो बाबा ने भानू को जगाने के लिए नीचे बैठक से ही चिल्लाते हुए भानू …भानू ओ भानू.. ..फिर सख्त आवाज में भानू …भा..नू ‘जग जाओ बेटा स्कूल का होमवर्क भी तो करना होगा। भानू भी सोते-सोते कह देता है ठीक है बाबा हां.. हां जग रहा हूं ।भानू जगकर स्कूल  का होमवर्क न करते हुए सोचता है ‘कि यह टाइम तो बाबा के चाय का है, आज तो दीदी भी नहीं है, बाबा की चाय कौन बनाएगा। भानू उठकर रसोई  में बर्तनों पर नजर गढ़ाते हुए एक छोटी सी पतीली को देखकर उसे याद आया कि हर रोज मम्मी चाय इसी पतीली में  चाय बनती थी। भानू ने अपने अंदर हिम्मत को इकट्ठा किया और  पतीली में दूध डालकर कांपते हाथों से गैस को जलाकर चाय बनाने के लिए रख दिया। एक कप चाय में पड़ने वाली सामग्री का 10 वर्षीय भानू को अंदाजा नहीं था। उसे याद आ रहा था कि मम्मी चाय में सबसे पहले चाय पत्ती डालती थी, कभी-कभी तुलसी के पत्ते भी डाल देती थी, अदरक डालकर चाय  को अच्छी तरह उबाल लिया करती थी।भानू को तुलसी और अदरक की खुशबू उबलते हुए चाय से आ रही थी, लेकिन बाल मन को यह समझ नहीं आया कि शक्कर की खुशबू नहीं मीठास होती है।  एक कफ चाय में उसने एक चम्मच शक्कर डालकर चाय की खुशबू को सूंगा तो उसमें शक्कर की खुशबू का एहसास नहीं हुआ । उसने फिर दो चम्मच शक्कर और डाल दी । कुछ ही देर में चाय बनकर तैयार हो जाती है। भानू नासमझ बालक ही था उसने चाय को जैसे तैसे चलनी से छान कर संकोच और डरे हुए भाव से सीढ़ियां उतरते समय मन ही मन सोचता है ‘कि बाबा फिर से गुस्सा न करने लगे।’
बाबा को चाय की प्लेट देते हुए हल्की सी मुस्कुराहट के साथ बोला – बाबा आज चाय मैंने बनाई है। चाय पी कर बताओ कैसी बनी है। बाबा ने चाय की प्लेट को हाथ में लेकर  पिया तब तक चाय की दम मर चुकी थी। और ठंडी होकर शरबत जैसी लग रही थी। फिर भी बाबा ने चाय की चुश्कियों का मजा लेते हुए भानू से कहा ‘तुमने चाय बहुत अच्छी और बहुत मीठी बनाई है। लेकिन इस तरह गैस पर शरारत मत किया करो मैं एक दिन चाय नहीं पियूगा तो कुछ बिगड़ेगा नहीं।’ भानू बीच में ही बोला ‘अरे बा …बा मैं अब बड़ा हो गया हूं, मैं  आपकी चाय ज्यादा अच्छी नहीं तो काम चलाऊं  बना सकता हूं। लेकिन अभी थोड़ा गैस से डर लगता है, लेकिन अब मैं आपको चाय बनाकर दूंगा तो वह डर भी दूर हो जाएगा।’ आप भी हम लोगों की कितनी परवाह करते हैं।  मुझे भी आपकी चाय की परवाह हो रही थी आप भी तो हमारी हर छोटी बड़ी आवश्यकता को बिना कहे पूरा कर देते हो । आप हमारे सबसे अच्छे बाबा हो । यह सुनते ही एकांत प्रेमी बाबा जो कभी नहीं हंसते आज खिलखिला कर हंसते हुए भानू के सिर पर हाथ फेरते हुए अपने मूलधन को सीने से लगा लेते हैं।।
गिरिजा नरवरिया
गिरिजा नरवरिया
सहायक प्राध्यापक हिंदी शासकीय महाविद्यालय महगांव भिंड संपर्क - [email protected]
RELATED ARTICLES

1 टिप्पणी

  1. गिरिजा जी। विषय अच्छा है लेकिन इसे थोड़ा सा संक्षिप्त कीजिये।लघुकथा इतनी बड़ी नहीं होती है। उसमें होता तो द पॉइंट बात होती है।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest