शौक़ उन्हें भी था। अब ज़रूरी तो नहीं कि शौक़ की फ़ेहरिस्त लंबी-चौड़ी या महँगी-सस्ती हो। वह तो बस होता है।
सो उन्हें भी था। ऐसा ही एक छोटा सा शौक़!
कह भी दिया था, उसे उन्होंने बड़े ही मज़ाक़िया लहज़े में अपने मियाँ से।
जब वह अपनी शरीक-ए-हयात की इत्ती सी चाहत से वाक़िफ़ हुए तब उनसे तो कुछ न बोले। किंतु खुद से ही वादा कर, उनकी मंशा पर अपनी क़बूल नामे की मोहर लगा ली।
बस फिर क्या था? जब पूर साझे परिवार की हांडी पकाकर और दुल्हन बेगम के सारे फ़र्ज़ निभाकर वह सेज़ पर आती तब सारे दिन के उतार-चढ़ाव के बातों के बताशे वह मियाँ के पहलू में बैठ बयां करती। मियाँ भी उनकी मेहंदी लगी हथेलियों से खेलते हुए इस सब का लुत्फ़ उठाते।
जब वह नींद की आग़ोश में समा जाती। तब वह उनकी इकलौती चाहत को बड़े आशिक़ाना अंदाज़ा में अंजाम देते हुए उन्हें उनकी चादर उढ़ा देते।
बस इतनी सी ही तो मंशा थी उनकी, कि जब वह अपनी सेज़ पर आराम फ़रमाए तो कोई उन्हें चादर उढ़ा दे। उन्हें खुद लेकर न ओढ़ना पड़े। इसमें उन्हें बड़ी मल्लिकाओं वाले एहसास होते थे।
एक बात और थी बिना ओढ़े वह नींद का असल मज़ा भी चख न पाती थी।
बीतते वक्त के साथ कई बार ऐसा भी हुआ कि बेगम के आरमगाह में आने से पहले ही मियाँ की नज़रें उनके इंतज़ार में थक कर सो रहीं।
मगरचे न जाने कौन उन्हें सख़्त से सख़्त नींद के पहरे से जगा देता। फिर वह उनकी चाहत को दिया अपना ख़ामोश वादा मुकम्मल कर देते।
इतने सालों में समझ तो वह भी गईं थीं कि मियाँ उनकी नादान सी ख़्वाहिश को दिलो-जान से निभाते हैं। किंतु न वह कुछ कहती न वह कुछ बोले थे।
वक्त ने करवट ली और मेहंदी का रंग हथेलियों को रचाने से ज़्यादा ज़ुल्फ़ों की ज़रूरत बन गया था।
अफ़सोस यह कि वह मियाँ बीबी से अम्मी, अब्बा का सफ़र न तय कर पाए। ज़िंदगी का स्वाद बेमज़ा हुआ जाता था।
कमी भी बीवी में थी। सभी की ज़ोर आज़माइश से पाँच तो जायज़ हैं। यह मियाँ को भी याद हो आया और घर के चिराग़ के लिए वह दूसरा निक़ाह पढ़ आए।
सगी छोटी बहन उनकी सौत बन कर आई जिसमें रज़ामंदी उनकी भी थी।
पर धीरे-धीरे मल्लिका होने का एहसास उनका उनकी आरामगाह से जाता रहा। पर बड़ी अम्मी होने का रुतबा उनके इक़बाल को बुलंद करता था। यह सुकून उनके हर सुकून से ऊपर था।
उनको आज कुछ हरारत सी थी। सर्दी ने भी जकड़ रखा था। वह सोने की फ़िराक़ में करवटें बदल रहीं थीं कि किसी ने आकर उन्हें चादर उढ़ा दी। वह चौंक के उठने को हुईं कि कोमल हाथों ने उनके सर पर अपना हाथ रख कहा-
“बड़ी अम्मी! आप की तबियत नासाज़ है। आप आराम फ़रमाओ मैं हूँ आपके साथ।”
दबे सैलाब से दो गर्म बूँदे गिरा वह सुकून की गहरी नींद सो रहीं।
Beautiful
ज्योत्स्ना सिंह जी की ‘चादर’ लघुकथा बहुत ही मार्मिक है। मैंने लेखन में मार्मिक शब्द कई जगह प्रयोग किया है पर इस लघुकथा में प्रयोग करते समय जैसा सुकून मिला वहां उतना नहीं मिला। छोटी ख्वाहिश पूरी जिंदगी जीने का आधार बन जाती है।
हर समय वह आधार बना रहे है यह आवश्यक नहीं है। जिंदगी तो हर पल अपना कोण बदलती रहती है। नायिका की एक तिर्यक रेखा ने जीवन को दो हिस्सों में बांट दिया था जिससे भावनाओं के समान्तर कोण बन गए। गणित में समान्तर कोण भी बराबर होते हैं।
और लघुकथा में कोण कब बराबर हुए? जब बड़ी अम्मी को चादर उढा़ई गई। ज्योत्स्ना जी आपको बहुत बहुत बधाई
अच्छी कहानी !!
जिंदगी की गहरी समझ के साथ लिखी हुई कथा। भले ही यह लघुकथा की श्रेणी में न आए लेकिन एक शानदार कथा जरूर बन गई है। जिसके लिए लेखिका को बहुत बधाई।
मन के कोमल तंतुओं को छूने का मखमली एहसास हुआ इस कथा को पढ़ते हुए। ज्योत्सना जी आपकी लेखनी से बहुत उम्मीदें हैं । शुभकामनाएं।
शौक या इच्छा ज़िंदगी में कब कैसे पूरी होती है यही तो है इस लघुकथा की आत्मा। बढ़िया लगी कहानी
चादर के सुकून ने हमे भी बहुत सुकून दिया, बढ़िया लघुकथा और भाषा भी काबिले तारीफ