Wednesday, February 11, 2026
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सरस दरबारी की लघुकथा – अधिकार

“नहीं अब मुझसे यह न होगा।” हिचकियों के बीच उसका दिल आर्तनाद कर उठा। 
“क्या दिक्कत है तुम्हें।”
“बिना किसी मेहनत के अच्छे खासे पैसे आ रहे हैं। बढ़िया खाती हो आराम करती हो। बढ़िया से बढ़िया आहार, दूध अखरोट बादाम का नाश्ता। कभी मुहय्या हो सकता था हमारी आमदनी में?”
“अगर ज़रा से श्रम से मिल सकता है तो क्या दिक्कत है, सिर्फ नौ महीने की बात है, इसके लिए पूरे 3 लाख मिल रहे हैं। एडियाँ रगड़कर भी इतने पैसे हम दोनों मिलकर नहीं कमा सकते।”
“आँखें भरे में छा रहीं हैं, मैं अब तुम्हारी एक नहीं सुनूँगा। तुम्हें यह करना ही होगा.।”
“कह चुके अपनी?”
“कभी मेरे बारे में सोचा है। तुम्हें सिर्फ वह तीन लाख दिखायी देते हैं, मैं किस नर्क से गुज़रती हूँ, जानते भी हो? नौ महीने उस बच्चे को कोख में रखकर उसकी एक एक हरकत एक एक जुम्बिश महसूस करते करते मैं स्वयं कितना जुड़ जाती हूँ उस शिशु से?
और समय पूरा होने पर कैसे बेदर्दी से उसे मुझसे छीन लिया जाता है। हर प्रसव के बाद एक नया जन्म लेती हूँ। उस जानलेवा पीड़ा को, मेरी ममता, मेरे दर्द को कोई नहीं समझ सकता। हर बार खाली गोद और भरी छाती लेकर तड़पती रह जाती हूँ।” 
“अपने जाये को दूध पिलाने को तरस जाती हूँ…! मेरे हाड मास से बने उस शिशु पर मेरा कोई अधिकार नहीं…? इतना कष्ट सहने के बाद, हर बार खाली हाथ रह जानातुम्हें सिर्फ पैसे बटोरने से मतलब है, कभी सोचा है मेरे बारे में, कितना टूटकर बिखरती हूँ हर बार? पैसो के लालच में, तुमने कभी हमारा बच्चा नहीं होने दिया। इतनी बार माँ बनकर भी निपूती हूँ। नहीं अब न हो पायेगा, मेरा शरीर, मेरा अधिकार है। अब जो मैं चाहूँगी वही करूँगी।”
“मैने फैसला कर लिया है, अब मैं अपने बच्चे को जन्म दूँगी जिसे मुझसे  कोई नहीं छीन सकेगा, जिस पर सिर्फ मेरा अधिकार होगा.”
“नहीं दूँगी अपनी कोख किराये पर…!” 
सरस दरबारी
संपर्क – [email protected]
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8 टिप्पणी

  1. इस हृदय को छू जाने वाली लघुकथा के लिये बहुत बहुत साधुवाद।

  2. अपनी कोख पर बच्चा अपना नहीं । पैसे के लिये स्त्रियों के लिये कितना दुख भरा होता है । मार्मिक विवरण !

  3. प्रिय सरस!

    मार्मिक लघुकथा है! आजकल इस तरह हो भी रहा है बहुत। कहीं कुछ शारीरिक प्रॉब्लम रहती है और कहीं महिलाएँ प्रेगनेंसी से घबराती हैं।
    प्रेगनेंसी का समय बहुत कठिन होता है। न जाने कैसी मजबूरी रहती होगी जो किसी स्त्री को यह सब भोगना पड़ता है।
    कहीं-कहीं पति लोभ में भी उलझ जाते हैं।
    कष्ट दो हर हाल में स्त्री को ही भोगना पड़ता है लेकिन एक सकारात्मक निर्णय पर कथा खत्म होती है।
    बेहतरीन लघु कथा के लिए बधाई प्रिय सरस!

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